भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ भारत में अंगरेज़ी राज
नवाब वज़ीर ने अब इलाहाबाद और कड़ा दोनों स्थान सम्राट के
लिए (?) कह कर कम्पनी को दे दिए और लड़ाई का जो हरजाना
पिछली सन्धि में पचास लाख रुपये नियुक्त किया गया था उसे
बढ़ाकर अब ६ लाख पाउण्ड यानी क़रीब ६० लाख रुपये कम्पनी
को भर देने का वादा किया ।
बनारस से आगे बढ़ कर क्लाइव इलाहाबाद पहुँचा । ६ अगस्त
[कम्पनी को दीवानी] सन् १७६५ को उसने सम्राट शाहआलम से भेंट
[के अधिकार] की और उसी रोज़ बंगाल, बिहार और उड़ीसा
की दीवानी के अधिकार अंगरेज़ कम्पनी को
देकर निर्बल और अदूरदर्शी शाहआलम ने मुर्शिदाबाद की सूबेदारी
और मुग़ल साम्राज्य दोनों की मौत के परवाने पर दस्तख़त कर दिए ।
इसका मतलब यह था कि आइन्दा से दोनों प्रान्तों का लगान और
दूसरे सरकारी टैक्स वसूल करने और उसमें से २६ लाख रुपये सम्राट
की मालगुज़ारी दिल्ली भेजते रहने और मुर्शिदाबाद दरबार के खर्च
के लिए रक़म अदा करने का काम कम्पनी के सुपुर्द हो गया । तीनों
प्रान्तों का शेष शासन प्रबन्ध सूबेदार के हाथों में रहा और बची
हुई मालगुज़ारी कम्पनी की सम्पत्ति हो गई । इस समय से बंगाल में
दो अलग अलग 'सरकारें' साफ़ दिखाई देने लगीं—एक मुर्शिदाबाद
की भारतीय सरकार और दूसरी कलकत्ते की अंगरेज़ सरकार ।
इसमें सन्देह नहीं, सम्राट से इस महत्त्वपूर्ण परवाने के हासिल
करने में बल प्रदर्शन से भी काम लिया गया । 'सीअरुल मुताख़रीन'
में लिखा है कि सम्राट और वज़ीर दोनों को—