भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२१
वह उसी समय से अपनी ऊपर लिखी योजना को पूरा करने के
प्रयत्नों में लग गया।
सम्राट शाहआलम अभी तक इलाहाबाद में था। सम्राट और
क्लाइव का इलाहा- नवाब वज़ीर शुजाउद्दौला दोनों अंगरेज़ों से दबे
बाद आना हुए थे। बंगाल के तीनों प्रान्तों के 'दीवानी' के
अधिकार सम्राट से प्राप्त कर लेने की अंगरेज़
पहले भी कोशिशें कर चुके थे। यही बात क्लाइव की ऊपर लिखी
योजना में भी शामिल है। उसने इस काम के लिए अब सीधे
इलाहाबाद पहुँचने का इरादा किया।
मार्ग में सबसे पहले क्लाइव मुर्शिदाबाद ठहरा। वहाँ पर
मोहम्मद रज़ा ख़ाँ की सहायता से क्लाइव ने
शुजाउद्दौला से पाँच लाख रुपये नक़द बतौर नज़र के अपने
नई सन्धि लिए नवाब नजमुद्दौला से वसूल किए और इस
तरह का पक्का इन्तज़ाम कर दिया कि जिससे आइन्दा के लिए
क़रीब क़रीब सारी अमली हुकूमत अंगरेज़ों के हाथों में आ गई
और सूबेदार केवल एक नाम मात्र की चीज़ रह गया। वहाँ से
चलकर क्लाइव जनरल कारनक के पास बनारस पहुँचा। शुजा-
उद्दौला भी उस समय बनारस में था। शुजाउद्दौला और अंगरेज़ों
के बीच हाल ही में सन्धि हो चुकी थी। दो अगस्त को क्लाइव की
शुजाउद्दौला से भेंट हुई। उसी दिन इस हाल की सन्धि की ख़ाक
परवा न करते हुए क्लाइव ने शुजाउद्दौला को फिर से लड़ाई की
धमकी देकर उससे एक नई सन्धि मंजूर करा ली, जिसके अनुसार