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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२५
के सामने ये लोग कम्पनी के हित अहित की भी परवा न करते थे।
३० सितम्बर सन् १७६५ को क्लाइव ने कम्पनी के डाइरेक्टरों के
नाम एक लम्बा पत्र लिखा, जिससे उस समय के अंगरेज़ों की
हालत का ख़ासा पता चलता है। इस पत्र में क्लाइव लिखता है :—
“ x x x ये लोग ( कम्पनी के अंगरेज़ मुलाज़िम ) अपने अपने
व्यक्तिगत और थोड़ी देर के लाभ के पीछे इस जोश के साथ बढ़े चले जा रहे
हैं कि इनमें से अपनी इज़्ज़त का ख़्याल या अपने मालिकों की ओर अपना
कर्त्तव्य पूरा करने का ख़याल दोनों जाते रहे। इन लोगों के पास दौलत एका
एक बढ़ गई है और बहुतों ने उसे नाजायज़ तरीक़ों से हासिल किया है;
जिसकी वजह से तरह तरह की ऐश परस्ती इन लोगों में घर कर गई है
और यह ऐश परस्ती बड़ी ख़तरनाक हद को पहुँच गई है। x x x यह
बुराई रोग की तरह एक से दूसरे को लगती गई और दीवानी तथा फ़ौजी
दोनों महकमों के अंगरेज़ मुहर्रिरों, झंडा बरदारों और स्वतन्त्र व्यापारियों तक
में फैल गई है। x x x
“मैं अभी समझ भी न पाया था कि यह धन किन किन विविध उपायों
से प्राप्त किया गया है कि इतने में मैं यह देख कर अत्यन्त चकित रह
गया कि ये लोग इतनी जल्दी धनवान हो गए हैं कि अंगरेज़ी बस्ती भर में
शायद ही कोई एक अंगरेज़ ऐसा होगा, जिसने बहुत ही थोड़े समय के अन्दर
अपनी विशाल पूँजी सहित इंगलिस्तान लौट जाने का निश्चय न कर रक्खा हो।”
कम्पनी के अंगरेज़ों के धन कमाने का एक ख़ास उपाय उन
दिनों खुले डाके डालना था। इतिहास लेखक
खुले डाके टॉरेन्स ने साफ़ लिखा है कि ये लोग “बंगाल
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