भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
फिर मीर जाफ़र २०६
दिया और मीर जाफ़र को पटने से कलकत्ते बुलवा लिया। कठ-
पुतली तथा बेबस मीर जाफ़र को अंगरेज़ों की आज्ञा माननी पड़ी।
मेजर कारनक की जगह मेजर मनरो अब पटने की सेना का
[हाशिया: मनरो का रोहतास के क़िले पर क़ब्ज़ा] प्रधान सेनापति नियुक्त हुआ। जुलाई मास में
वह पटने पहुँचा। अंगरेज़ों को डर था कि यदि
लड़ाई देर तक चली तो सम्भव है मराठों और
अफ़ग़ानों की सेनाएँ शुजाउद्दौला की मदद के लिए आ जावें।
इसलिए मेजर मनरो को आज्ञा दी गई कि तुम शुजाउद्दौला की
सेना पर हमला करके लड़ाई का शीघ्र अन्त कर डालो। मालूम
होता है मेजर मनरो के आते ही कम्पनी के कुछ हिन्दोस्तानी
सिपाही मीर जाफ़र के साथ अंगरेज़ों के इस अन्याय को देखकर
या किसी दूसरी वजह से अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत कर बैठे।
मेजर मनरो ने फ़ौरन बिना किसी तहक़ीक़ात या पूछ ताछ के तमाम
बाग़ियों को तोप के मुंह से उड़वा दिया।
इसके बाद मेजर मनरो ने रोहिताश्व (रोहतास) के क़िले
पर क़ब्ज़ा किया। इस क़िले के विषय में, सय्यद ग़ुलामहुसेन
लिखता है कि मेजर मनरो ने आते ही डॉक्टर फुलरटन की मारफ़त
सय्यद ग़ुलामहुसेन को पत्र लिखा कि—"यदि आप रोहिताश्व
का क़िला अंगरेज़ों के हवाले करने की तदबीर कर सकें तो आप
अंगरेज़ों की मित्रता और कृतज्ञता के हक़दार होंगे।" सय्यद
ग़ुलामहुसेन लिखता है कि—"इस सूचना के मिलने पर मैंने राजा
साहूमल से बातचीत की।" राजा साहूमल रोहिताश्व के क़िले का
१४
२१० भारत में अंगरेज़ो राज
क़िलेदार था। वह गुलामहुसेन की बातों में आ गया। उसने
अपनी शर्तें पेश कीं। अंगरेज़ों ने उसकी शर्तें मंजूर करलीं और
चुपचाप उसकी मदद से क़िले पर कब्ज़ा कर लिया। बाद में
अंगरेज़ों ने राजा साहूमल के साथ एक भी शर्त का पालन नहीं
किया। राजा साहूमल ने गुलामहुसेन से शिकायत की, किन्तु व्यर्थ।
यह भी कहा जाता है कि इस समय मीर क़ासिम के साथ
शुजाउद्दौला का व्यवहार जैसा चाहिए वैसा न रहा था।
१५ सितम्बर सन् १७६४ को बक्सर में दोनों ओर की सेनाओं
[बक्सर की मशहूर] में संग्राम हुआ। शाहआलम के दिल और दिमाग़
[लड़ाई] पर अंगरेज़ों की चालों का काफ़ी असर हो चुका
था। "सीअरुल-मुताख़रीन" का रचयिता, जो
इस काम में अंगरेज़ों का ख़ास मददगार था, लिखता है :—
"किन्तु शाहआलम ने जो भीतर से वज़ीर (शुजाउद्दौला) से असन्तुष्ट
था × × × कई तरह के बहाने करके समय टालना उचित समझा। वजह
यह थी कि वह कुछ पहले ही से अंगरेज़ों से मिल जाने की तदबीर सोच
चुका था। अंगरेज़ क़ौम इस विषय का कुछ सन्देशा उसके पास भेज चुकी
थी, जिससे वह उनसे मिल जाने का इच्छुक हा गया था और उनकी सहायता
से लाभ उठाने का भी निश्चय कर चुका था।"
जब कि स्वयं भारत सम्राट की यह हालत थी तो न जाने उस
दिन और कितने भारतीय सेनानियों ने सक्रिय या निष्क्रिय रूप में
शत्रु का साथ दिया होगा। नतीजा यह हुआ कि दिन भर के
घमासान में क़रीब पाँच छै हज़ार आदमी काम आए और असहाय
फिर मीर जाफ़र २११
शुजाउद्दौला को अपनी सेना सहित मैदान से पीछे हट जाना पड़ा,
जिसमें कहा जाता है उसके हज़ारों सैनिक गंगा की दलदल में फँस
कर रह गए ।
मीर क़ासिम जानता था कि यदि मैं अंगरेज़ों के हाथों में पड़
गया तो जो व्यवहार उन्होंने सिराजुद्दौला के
मीर क़ासिम की साथ किया उससे बेहतर सलूक की मुझे अंगरेज़ों
मृत्यु से आशा नहीं हो सकती । इसलिए वह बक्सर से
भाग कर सीधा इलाहाबाद पहुँचा । वहाँ से चल कर उसने बरेली
में दम लिया और अन्त को १२ साल से ऊपर एक गृहविहीन
जलावतन की तरह जगह जगह मुसीबतें उठाकर सन् १७७७ ई० में
दिल्ली में उसकी मृत्यु हुई । निस्सन्देह भारत की स्वाधीनता के
लिए अपने आप को मिटा देने वालों में मीर क़ासिम का नाम सदा
के लिए स्मरणीय रहेगा ।
सम्राट शाहआलम ने लड़ाई के समाप्त होते ही शुजाउद्दौला
का साथ छोड़कर अंगरेज़ी सेना के साथ डेरा डाला । अंगरेज़ों ने
फ़ौरन उसके सामने हाज़िर होकर उसका बाक़ायदा आदर मान
किया और उसे अपना सम्राट कह कर सलाम किया । सम्राट ही
के साथ अंगरेज़ों ने गंगा को पार किया और वहाँ से शुजाउद्दौला
के दीवान बेनीबहादुर को बुलवाकर शुजाउद्दौला के साथ सुलह की
बातचीत शुरू की । अंगरेज़ों ने दीवान बेनीबहादुर को यह विश्वास
दिलाने की कोशिश की कि कम्पनी ने अपने मुलाज़िमों को आज्ञा
दे दी है कि हिन्दोस्तान के अन्दर अब और नए इलाक़े फ़तह न
२१२ भारत में अंगरेजी राज
किए जायँ । इस पर भी शुजाउद्दौला और अंगरेज़ों में इस समय
सुलह न हो सकी।
मालूम होता है कि सम्राट बक्सर से इलाहाबाद की ओर चल
दिया। शुजाउद्दौला फिर से मुक़ाबला करने की तैयारी के इरादे
से पीछे हटा और अंगरेज़ शुजाउद्दौला का पीछा करने के लिए
आगे बढ़े।
मार्ग में अंगरेज़ों ने चुनार के क़िले का मोहासरा किया।
[चुनारगढ़ में] "सीअरुल-मुताख़रीन" में लिखा है कि अंगरेज़
[अंगरेज़ों की हार] सेनापति ने कम्पनी के नाम सम्राट का एक
दस्तख़ती परवाना क़िलेदार मोहम्मद बशीर ख़ाँ
के सामने पेश किया, किन्तु क़िले के भीतर की भारतीय सेना ने
इस परवाने की ख़ाक परवा न की। इस सेना ने जब यह देखा कि
हमारा क़िलेदार भी डाँवाडोल हो रहा है तो उन्होंने उसे क़िले से
बाहर निकाल कर उस सड़क पर छोड़ दिया, जो नवाब शुजाउद्दौला
के ख़ेमों की ओर जाती थी और स्वयं वीरता के साथ विदेशियों
से क़िले की रक्षा शुरू की। अंगरेज़ों ने अपनी तोपें सामने कीं।
कई दिन की गोलेबारी के बाद वे केवल क़िले की दीवार का एक
थोड़ा सा टुकड़ा गिरा पाए, किन्तु ज्योंही एक दिन अँधेरी रात में
अंगरेज़ी सेना ने इस रास्ते से क़िले के भीतर प्रवेश करना चाहा,
भीतर की भारतीय सेना ने अपनी बन्दूकों से उनमें से अधिकांश
का वहीं दीवार के ऊपर काम तमाम कर दिया। लाचार होकर
और बुरी तरह हार कर अंगरेज़ों को चुनार का मोहासरा छोड़
फिर मीर जाफ़र २१३
इलाहाबाद का रास्ता लेना पड़ा। वास्तव में बिना रिशवत, दग़ा
या इसी तरह के दूसरे उपायों के अंगरेज़ों ने कभी कहीं किसी एक
लड़ाई में भी किसी भारतीय सेना के ऊपर विजय प्राप्त नहीं की।
इलाहाबाद के क़िले की संरक्षक सेना ने भी अंगरेज़ी सेना का
इलाहाबाद पर खासा मुक़ाबला किया। किन्तु अंगरेज़ों के
अंगरेज़ों का क़ब्ज़ा सौभाग्य से वही नजफ़ ख़ाँ जिसने ऊदवानाला
पर अंगरेज़ों को बुरी तरह दिक़ किया था और
जो बहुत अरसे तक इलाहाबाद के क़िले में रह चुका था और
उसके रहस्यों से परिचित था, इस मौक़े पर अंगरेज़ों से मिल
गया। क़िले की दीवारों को गिराने के लिए अंगरेज़ी सेना के पास
इस समय जो एक सबसे अच्छी तोप थी वह हिन्दोस्तान ही की
बनी हुई थी और शुजाउद्दौला के ख़ेमों की लूट में उन्हें मिली थी।
नजफ़ ख़ाँ ने अंगरेज़ों को क़िले के सब गुप्त रास्ते बतला दिए और
इस तोप ने भी उन्हें ख़ासी मदद दी। अन्त में थोड़ी सी लड़ाई
के बाद अंगरेज़ी सेना ने इलाहाबाद के क़िले में प्रवेश किया।
क़िले पर हमला करने और भीतर वालों से शर्तें तय करने में
महाराजा शिताबराय की फ़ौज आगे थी, किन्तु क़ब्ज़ा करते समय
कम्पनी की अपनी सेना आगे थी।
शुजाउद्दौला अब भाग कर बरेली पहुँचा। वहाँ से लौट कर
कम्पनी और नवाब मलहरराव होलकर की कुछ मराठा सेना की
शुजाउद्दौला में सहायता से उसने कड़ा में अंगरेज़ी सेना पर
संधि फिर हमला किया। एक दो छोटी मोटी लड़ाइयाँ
२१४ भारत में अंगरेज़ी राज
भी हुईं। अन्त में महाराजा शिताबराय ने बीच में पड़ कर नीचे
लिखी शर्तों पर कम्पनी और शुजाउद्दौला में सुलह करवा दी :—
१—युद्ध में कम्पनी का जो ख़र्च हुआ है उसके लिए शुजाउद्दौला
पचास लाख रुपए कम्पनी को दे। पच्चीस लाख फ़ौरन् और पच्चीस
लाख सालाना क़िस्तों में।
२—इलाहाबाद के आस पास का प्रान्त जो इससे पहले अवध
के सूबे में शामिल था, सम्राट के उपयोग के लिए अलग कर दिया
जाय। इलाहाबाद का शहर और क़िला सम्राट के रहने के लिए
नियुक्त हो और इलाहाबाद के क़िले में सम्राट की रक्षा के लिए
कम्पनी की एक सेना रहे।
३—ग़ाज़ीपुर और उसके आस पास का इलाक़ा कम्पनी को
दे दिया जाय।
४—अंगरेज़ों का एक वकील शुजाउद्दौला के दरबार में रहा
करे, किन्तु नवाब शुजाउद्दौला के राज प्रबन्ध में वह किसी तरह
का दख़ल न दे।
५—आइन्दा हर पक्ष दूसरे पक्ष के शत्रु या मित्र को अपना
शत्रु या मित्र समझे।
अवध के नवाब वज़ीर के साथ अंगरेज़ों की यह पहली सन्धि
थी। अवध की नवाबी का प्रारम्भ सन् १७२० के क़रीब दिल्ली
दरबार की निर्बलता के दिनों में हुआ था। दिल्ली के सम्राट ने पहले
नवाब सआदत ख़ाँ को अवध का सूबेदार नियुक्त करके भेजा था।
उसके बाद सआदत ख़ाँ के भतीजे दूसरे नवाब सफ़दरजंग ने दो
फिर मीर जाफ़र २१५
करोड़ रुपये नादिरशाह को नज़र करके अपनी नवाबी क़ायम
रक्खी । सफ़दरजंग ही को पहली बार दिल्ली सम्राट ने साम्राज्य के
वज़ीर की पदवी प्रदान की और तभी से अवध के नवाब 'नवाब
वज़ीर' कहलाने लगे । शुजाउद्दौला सफ़दरजंग का बेटा था ।
निस्सन्देह नवाब शुजाउद्दौला ने अंगरेज़ों का ख़ासा मुक़ाबला
किया और इसमें भी सन्देह नहीं कि यदि स्वयं शाहआलम और
उसके अन्य साथी अंगरेज़ों के हाथों में न खेल जाते, तो बक्सर
के मैदान में ही शुजाउद्दौला अंगरेज़ों की उभरती हुई ताक़त को
सदा के लिए अन्त कर देता । शाहआलम की अयोग्यता ने
शुजाउद्दौला को पंगुल कर दिया । किन्तु शुजाउद्दौला के बाद से
सन् १८५६ तक अंगरेज़ कम्पनी और भारतीय नरेशों के परस्पर
संग्रामों में भारतवासियों को अवध के नवाबों से कभी विशेष
फ़ायदा नहीं पहुँचा । इसके विपरीत ब्रिटिश सत्ता के क़ायम करने
में अवध के निर्बल नवाब अक्सर कम्पनी की साज़िशों में एक
उपयोगी साधन साबित हुए । कम्पनी की भारतीय सेना के अधि-
कांश सिपाही सदा अवध से ही आते रहे और कम्पनी के अफ़सरों
को जब जब रुपये की ज़रूरत पड़ी, तो डर कर या मूर्खतावश,
उन्हें धन देने में अवध के ख़ज़ाने ने सदा कामधेनु का काम दिया ।
मीर जाफ़र को भी अंगरेज़ों ने अपनी महत्वाकांक्षा की शिखर
[हाशिया: मीर जाफ़र का] तक पहुँचने के लिए बतौर एक सीढ़ी के इस्तेमाल
[हाशिया: अन्त] किया और ज्योंही वे ऊपर तक पहुँच गए
उन्होंने बिना सङ्कोच उसे लात मार कर अलग
२१६ भारत में अंगरेज़ी राज
कर दिया। उसकी ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों को उन्होंने अत्यन्त
दुखमय बना दिया। अक्तूबर सन् १७६४ में उससे पाँच लाख रुपए
माहवार कम्पनी को देने का वादा करा लिया, जिससे वह अन्त
तक बहुत तङ्ग रहा और सदा शिकायत करता रहा। सन्धि से
बाहर नित्य नई और बढ़ बढ़ कर माँगें उससे की जाती रहीं।
आए दिन की इन ज़बरदस्तियों ने उसके स्वास्थ्य और आयु
दोनों पर असर डाला। प्रसिद्ध इतिहास लेखक सर विलियम
हण्टर लिखता है :—
"मीर जाफ़र जनवरी सन् १७६५ में मरा और कहा जाता है कि जिस
बेजा तरीक़े से कलकत्ते के अंगरेज़ों ने अपने व्यक्तिगत नुक़सानों के हरजाने
की अदायगी के लिए उससे तक़ाज़े शुरू किए, उनसे उसकी मौत और
जल्दी हुई।"*
वास्तव में मीर जाफ़र की मृत्यु फ़रवरी सन् १७६५ के आरम्भ
में मुर्शिदाबाद के महल में हुई। उसकी आयु उस समय ६५ वर्ष
की थी। अन्त समय में मीर जाफ़र की इच्छा के अनुसार उसके
अनेक सम्बन्धियों और बेटों के रहते हुए उसके चिर मित्र महाराजा
नन्दकुमार ने एक हिन्दू मन्दिर से गंगाजल लाकर मीर जाफ़र के
मुंह में डाला और उसी जल से अपने हाथों से उसने मीर जाफ़र
को आख़िरी स्नान कराया।
- "His death took place in January 1765, and is said to have been
hastened by the unseemly importunity with which the English at Calcutta
pressed upon him their private claims to restitution."—Sir W. W. Hunter,
in Statistical Account of Bengal vol. ix, p. 191.
छठा अध्याय
मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद
मीर जाफ़र के बड़े बेटे मीरन की हत्या का हाल ऊपर आ चुका
[हाशिया: नवाब नजमुद्दौला] है। मीर जाफ़र का दूसरा बेटा नजमुद्दौला अब
[हाशिया: और उसके साथ] मुर्शिदाबाद की मसनद पर बैठा, किन्तु असम्भव
[हाशिया: नई सन्धि] था कि अंगरेज़ हर ऐसे अवसर से पूरा लाभ न
उठाते। कलकत्ते का अंगरेज़ गवर्नर उन दिनों
“बंगाल में फ़ोर्ट विलियम क़िले का गवर्नर” कहलाता था।
अंगरेज़ ‘गवर्नर और कौन्सिल’ के पास मुर्शिदाबाद की सरकारी
सेना से कहीं अधिक सेना थी। बिना इस ‘गवर्नर और
कौन्सिल’ की रज़ामन्दी के मुर्शिदाबाद का कोई सूबेदार अब अपने
आप को क्रियात्मक सूबेदार न समझ सकता था। उस समय
के गवर्नर स्पेन्सर ने जो बन्सीटार्ट का उत्तराधिकारी था और
उसकी अंगरेज़ कौन्सिल ने नजमुद्दौला को उस समय तक
२१= भारत में अंगरेज़ी राज
सूबेदार मानने से इनकार किया, जब तक कि उससे एक नई सन्धि
पर दस्तख़त न करा लिए । इस नई सन्धि की मुख्य शर्तें ये थीं :—
( १ ) नवाब नजमुद्दौला 'नायब सूबेदार' का एक नया ओहदा
क़ायम करे, नायब सूबेदार नवाब के नाम पर शासन का सारा
काम करे, और अंगरेज़ों का एक ख़ास आदमी मोहम्मद रज़ा ख़ाँ
इस नए ओहदे पर नियुक्त किया जावे ।
( २ ) माल के महकमे में बिना कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल
की रज़ामन्दी के नवाब न किसी को बरख़ास्त करे और न कोई
नया आदमी नियुक्त करे ।
( ३ ) कम्पनी को फ़ौज के ख़र्च के लिए पाँच लाख रुपए
माहवार बराबर मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने से मिलते रहें ।
( ४ ) सिवाय इतनी फ़ौज के जो सरकारी मालगुज़ारी वसूल
करने और दरबार की इज़्ज़त क़ायम रखने के लिए ज़रूरी हो,
नवाब और अधिक फ़ौज अपने पास न रक्खे । और
( ५ ) देश भर में हर तरह के व्यापार पर अंगरेज़ों के लिए
महसूल माफ़ रहे ।
इन शर्तों के बाद बंगाल के सूबेदार की सत्ता केवल छाया मात्र
रह गई । किन्तु नजमुद्दौला को ये सब शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं,
और इनके अलावा बीस लाख रुपये नक़द बतौर दोस्ताने या रिश्वत
के स्पेन्सर और उसके साथियों की नज़र करने पड़े । यह बीस लाख
की रक़म गवर्नर और उसकी कौन्सिल के मेम्बरों ने आपस में
बाँट ली ।
मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २१६
नए नवाब ने महाराजा नन्दकुमार को अपना दीवान नियुक्त
करना चाहा। अंगरेज़ नन्दकुमार से काफ़ी
[हाशिया: नन्दकुमार की गिरफ़्तारी] सावधान हो चुके थे। उन्होंने इजाज़त न दी
और नवाब पर उसकी बेबसी प्रकट कर देने के
लिए वे महाराजा नन्दकुमार को क़ैद करके ज़बरदस्ती मुर्शिदाबाद
से कलकत्ते ले आए।
कम्पनी का कारबार अब काफ़ी बढ़ गया था। उसकी आकां-
क्षाएँ बहुत ऊँची हो गई थीं। अपने कारबार की
[हाशिया: क्लाइव का दोबारा भारत आना] ठीक व्यवस्था करने और इन आकांक्षाओं को
पूरा करने के लिए डाइरेक्टरों ने क्लाइव को, जो
अब 'लॉर्ड क्लाइव' था, दोबारा भारत भेजना आवश्यक समझा।
क्लाइव फिर एक बार 'फोर्ट विलियम का गवर्नर' नियुक्त हुआ
जिस समय क्लाइव इंगलिस्तान से कलकत्ते आ रहा था मद्रास में
उसने मीर जाफ़र की मृत्यु का समाचार सुना । उसका ख़ास
उद्देश इस समय बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दिवानी के अधि-
कार शाह आलम से प्राप्त करना था। इतिहास लेखक होलर
लिखता है:—
"मीर जाफ़र की मृत्यु की ख़बर सुनकर क्लाइव बहुत खुश हुआ । वह
अब बंगाल प्रान्तों के राज्य शासन में उस नई पद्धति को जारी करने के लिए
उत्सुक था, जिसका सात साल से अधिक हुए वह इंगलिस्तान के प्रधान मंत्री
पिट से ज़िक्र कर चुका था। वह चाहता था कि एक ऐसे नए आदमी को
नवाब बना दिया जाय जो केवल शून्य मात्र हो, सारा शासन प्रबन्ध
२२० भारत में अंगरेज़ी राज
हिन्दोस्तानी कर्मचारियों के हाथों में रहे, असली मालिक अंगरेज़ रहे। वे ही
मालगुज़ारी वसूल करें, वे ही बाहर के हमलों और भीतर के विद्रोहों
से तीनों प्रान्तों की रक्षा करें, जंग करें और सन्धियाँ करें; किन्तु अंगरेज़ों
की यह बादशाइत जन सामान्य की आँखों से छिपी रहे, अंगरेज़ इस
तरह नवाब के नाम पर और मुग़ल सम्राट के दिए हुए अधिकार से शासन
करते रहें।" *
क्लाइव को उस समय तक यह मालूम न था कि अंगरेज़ों ने
नजमुद्दौला को नवाब मान लिया है। उसकी
क्लाइव की तजवीज़ यह थी कि मीर जाफ़र के छै साल के
तजवीज़ एक पोते को मुर्शिदाबाद की मसनद पर बैठाकर
उसके नाम पर अपनी यह सारी योजना पूरी की जावे।
मई सन् १७६५ में क्लाइव कलकत्ते पहुँचा। यहाँ आकर जब
उसने सुना कि स्पेन्सर और उसके साथियों ने नजमुद्दौला को
नवाब स्वीकार कर लिया और इस सौदे में बीस लाख रुपए नक़द
अपनी जेबों में भर लिए, तो क्लाइव को बड़ा क्रोध आया। किन्तु
- ". . . was delighted at the news. He was anxious to introduce
the new system for the Government of the Bengal provinces, which he had
unfolded to Pitt more than seven years before. He would set up a new
Nawab who should be only a cypher. He would leave the administration in
the hands of native officials. The English were to be the real masters ; they
were to take over the revenues, defend the three provinces from invasion
and insurrection, make war and conclude peace. But the sovereignty of the
English was to be hidden from the public eye. They were to rule only in
the name of the Nawab and under the authority of the Moghul Emperor."—
Wheeler's Early Records of British India, pp. 329, 330.
१
सम्राट् शाहआलम लार्ड क्लाइव को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्रदान कर रहा है
[By the courtesy of the Trustees, Victoria Memorial, Calcutta.]
मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२१
वह उसी समय से अपनी ऊपर लिखी योजना को पूरा करने के
प्रयत्नों में लग गया।
सम्राट शाहआलम अभी तक इलाहाबाद में था। सम्राट और
क्लाइव का इलाहा- नवाब वज़ीर शुजाउद्दौला दोनों अंगरेज़ों से दबे
बाद आना हुए थे। बंगाल के तीनों प्रान्तों के 'दीवानी' के
अधिकार सम्राट से प्राप्त कर लेने की अंगरेज़
पहले भी कोशिशें कर चुके थे। यही बात क्लाइव की ऊपर लिखी
योजना में भी शामिल है। उसने इस काम के लिए अब सीधे
इलाहाबाद पहुँचने का इरादा किया।
मार्ग में सबसे पहले क्लाइव मुर्शिदाबाद ठहरा। वहाँ पर
मोहम्मद रज़ा ख़ाँ की सहायता से क्लाइव ने
शुजाउद्दौला से पाँच लाख रुपये नक़द बतौर नज़र के अपने
नई सन्धि लिए नवाब नजमुद्दौला से वसूल किए और इस
तरह का पक्का इन्तज़ाम कर दिया कि जिससे आइन्दा के लिए
क़रीब क़रीब सारी अमली हुकूमत अंगरेज़ों के हाथों में आ गई
और सूबेदार केवल एक नाम मात्र की चीज़ रह गया। वहाँ से
चलकर क्लाइव जनरल कारनक के पास बनारस पहुँचा। शुजा-
उद्दौला भी उस समय बनारस में था। शुजाउद्दौला और अंगरेज़ों
के बीच हाल ही में सन्धि हो चुकी थी। दो अगस्त को क्लाइव की
शुजाउद्दौला से भेंट हुई। उसी दिन इस हाल की सन्धि की ख़ाक
परवा न करते हुए क्लाइव ने शुजाउद्दौला को फिर से लड़ाई की
धमकी देकर उससे एक नई सन्धि मंजूर करा ली, जिसके अनुसार
२२२ भारत में अंगरेज़ी राज
नवाब वज़ीर ने अब इलाहाबाद और कड़ा दोनों स्थान सम्राट के
लिए (?) कह कर कम्पनी को दे दिए और लड़ाई का जो हरजाना
पिछली सन्धि में पचास लाख रुपये नियुक्त किया गया था उसे
बढ़ाकर अब ६ लाख पाउण्ड यानी क़रीब ६० लाख रुपये कम्पनी
को भर देने का वादा किया ।
बनारस से आगे बढ़ कर क्लाइव इलाहाबाद पहुँचा । ६ अगस्त
[कम्पनी को दीवानी] सन् १७६५ को उसने सम्राट शाहआलम से भेंट
[के अधिकार] की और उसी रोज़ बंगाल, बिहार और उड़ीसा
की दीवानी के अधिकार अंगरेज़ कम्पनी को
देकर निर्बल और अदूरदर्शी शाहआलम ने मुर्शिदाबाद की सूबेदारी
और मुग़ल साम्राज्य दोनों की मौत के परवाने पर दस्तख़त कर दिए ।
इसका मतलब यह था कि आइन्दा से दोनों प्रान्तों का लगान और
दूसरे सरकारी टैक्स वसूल करने और उसमें से २६ लाख रुपये सम्राट
की मालगुज़ारी दिल्ली भेजते रहने और मुर्शिदाबाद दरबार के खर्च
के लिए रक़म अदा करने का काम कम्पनी के सुपुर्द हो गया । तीनों
प्रान्तों का शेष शासन प्रबन्ध सूबेदार के हाथों में रहा और बची
हुई मालगुज़ारी कम्पनी की सम्पत्ति हो गई । इस समय से बंगाल में
दो अलग अलग 'सरकारें' साफ़ दिखाई देने लगीं—एक मुर्शिदाबाद
की भारतीय सरकार और दूसरी कलकत्ते की अंगरेज़ सरकार ।
इसमें सन्देह नहीं, सम्राट से इस महत्त्वपूर्ण परवाने के हासिल
करने में बल प्रदर्शन से भी काम लिया गया । 'सीअरुल मुताख़रीन'
में लिखा है कि सम्राट और वज़ीर दोनों को—
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नजमुद्दौला
[ From the "History of Murshidabad", by Major Walsh
मीर जाफ़र की मृत्यु के बाद २२३
“अपनी इच्छा के विरुद्ध मजबूर होकर यह प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ी।”
क्लाइव अब अपना उद्देश पूरा कर इलाहाबाद से कलकत्ते वापस
आ गया।
क्लाइव जब मुर्शिदाबाद से बनारस के लिए रवाना हुआ था
[हाशिया: नजमुद्दौला की] उसी समय अचानक नवाब नजमुद्दौला की मृत्यु
[हाशिया: हत्या] हो गई। जिन हालात में यह मृत्यु हुई वे काफी
शक पैदा करने वाले थे। 'सीअरुल मुताख़रीन'
से मालूम होता है कि नजमुद्दौला और मोहम्मद रज़ा ख़ाँ दोनों
मुर्शिदाबाद के बाहर एक बाग़ तक क्लाइव को छोड़ने के लिए आए।
क्लाइव के रवाना हो जाने पर जब ये दोनों अपने अपने महलों की
ओर लौटे तो मार्ग ही में नौजवान नवाब के पेट में एकाएक ज़बर-
दस्त दर्द पैदा हुआ और महल तक पहुंचते पहुंचते उसकी मृत्यु हो
गई। लिखा है कि उन दिनों आम लोगों का ज़ोरों के साथ यह
ख़याल था कि मोहम्मद रज़ा ख़ाँ ने नजमुद्दौला को मरवा डाला।
मोहम्मद रज़ा ख़ाँ अंगरेज़ों का खास आदमी था। वेरेल्स्ट
नामक अंगरेज़ के एक ख़त से मालूम होता है कि कलकत्ते में उन
दिनों यह ज़बरदस्त अफ़वाह थी कि नवाब नजमुद्दौला की हत्या में
लॉर्ड क्लाइव और उसके कई अंगरेज़ साथियों की साज़िश थी। *
इसमें सन्देह नहीं, क्लाइव नजमुद्दौला के ख़िलाफ़ था। पाँच लाख
रुपये नक़द ले लेने के बाद उसने डाइरेक्टरों के नाम एक ख़त में
लिखा—“नजमुद्दौला के हाथों सत्ता सौंप देना और ख़ैरियत से
- Third Report 1773, p. 325.
२२४ भारत में अंगरेज़ी राज
रह सकना नामुमकिन है ।"* इसके अलावा कोई नीच से नीच
काम ऐसा न हो सकता था जिसे अपनी इष्टसिद्धि के लिए क्लाइव
करने को तैयार न हो जाता । नजमुद्दौला के मृत्यु से एक लाभ
कम्पनी को और हुआ। उन्होंने 'दीवानी' मिलने पर नवाब के सैनिक
ख़र्च के लिए ५५ लाख रुपये सालाना देश की आमदनी में से देने का
वादा किया था । अब उसे घटा कर ४१ लाख ८१ हज़ार कर दिया ।
नजमुद्दौला की मृत्यु के साथ साथ मुर्शिदाबाद के नवाबों की
सत्ता की रही सही छाया भी बंगाल के इतिहास से लोप हो जाती
है। यद्यपि नाम या उपचार के लिए नजमुद्दौला के बाद उसका एक
छोटा भाई मसनद पर बैठा दिया गया और यह दोअमली वारन
हेस्टिंग्स के समय तक जारी रही, किन्तु वास्तव में बंगाल का सूबे-
दार अब केवल एक 'शून्य' रह गया, तीनों प्रान्तों का शासन
अंगरेज़ों के नियुक्त किए हुए तीन 'नायबों' के हाथों में आगया और
'अंगरेज़ सरकार' का ही बंगाल भर में ज़हूर दिखाई देने लगा । उस
समय से बंगाल का इतिहास केवल अंगरेज़ गवर्नरों के कारनामों
का इतिहास रह जाता है।
ईस्ट इण्डिया कम्पनी के तमाम छोटे बड़े अंगरेज़ मुलाज़िमों
[हाशिया: भयंकर लूट और दोअमली] में धन का लोभ और दुराचार दोनों अब इस
दर्जे फैल गए थे कि नेकी, बदी या न्याय अन्याय
का विचार तो दूर रहा, अपने व्यक्तिगत स्वार्थ
- "It is impossible, therefore, to trust him with power, and be safe."—
Clive's letter to the Court of Directors, dated 30th September, 1765.