भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
मीर क़ासिम १७६
हज़ारों हिन्दोस्तानी व्यापारियों को इस एलान से लाभ हुआ।
[बंगाल में फिर से खुशहाली] वे अंगरेज़ों से कम ख़र्च में ज़िन्दगी बसर कर
सकते थे और अपना माल सस्ता बेचकर भी
लाभ कमा सकते थे। तिजारत का दरवाज़ा
एक बार फिर बिल्कुल खुल गया, फिर चारों ओर से आ आकर
बंगाल में व्यापारियों की संख्या बढ़ने लगी और देश की तिजारत
और कृषि दोनों फिर ज़ोरों के साथ उन्नति करने लगीं। अंगरेज़ों
को यह कब गवारा हो सकता था। फ़ौरन कलकत्ते में फिर
कौन्सिल का इजलास हुआ। तय हुआ कि नवाब की नई आज्ञा
नाजायज़ है और नवाब को मजबूर किया जाय कि अपनी इस
आज्ञा को वापस लेकर देशी व्यापारियों से पहले की तरह महसूल
वसूल करे। ऐमयाट और हे नाम के दो अंगरेज़ मुंगेर जाकर नवाब
से मिलने और सब बातें नए सिरे से तय करने के लिए नियुक्त हुए।
बंगाल की प्रजा के साथ अत्याचारों और बंगाल के शासक
[दूसरा सूबेदार खड़ा करने की तजवीज़] के साथ ज़बरदस्तियों का प्याला अब लबालब
भर चुका था। मीर क़ासिम को यह भी मालूम
था कि बंगाल के तीनों प्रान्तों की दीवानी के
अधिकार प्राप्त करने के लिए दिल्ली सम्राट के साथ अंगरेज़ों का
गुप्त पत्र व्यवहार बराबर जारी है। मीर क़ासिम और वन्सीटॉर्ट के
दरमियान इस समय जो पत्र व्यवहार हुआ वह पढ़ने के योग्य है।
मीर क़ासिम ने बार बार अपने कर्मचारियों और अपनी प्रजा के
ऊपर अंगरेज़ों के अत्याचारों की शिकायतें कीं। अत्यन्त दर्द भरे
१८० भारत में अंग्रेज़ी राज
शब्दों में उसने लिखा कि—"कम्पनी के जो तिलंगे सिपाही सम्राट
और सूबेदार की सहायता के लिए कह कर रक्खे गए थे और
जिनके ख़र्च के लिए मैं कम्पनी को पचास लाख रुपए की ज़मींदारी
दे चुका हूँ वे अब देश भर में मेरे और मेरे आदमियों के विरुद्ध
काम में लाए जा रहे हैं।" अन्त को एक पत्र में उसने साफ़ साफ़
लिखा कि—"मुझे मालूम हुआ है कि बहुत से अंगरेज़ एक दूसरा
सूबेदार खड़ा करना चाहते हैं। × × × हर शख़्स पर ज़ाहिर है
कि यूरोपवालों का एतबार नहीं किया जा सकता।"
मीर क़ासिम के साथ अंगरेज़ों के इस समय के व्यवहार की
आलोचना करते हुए मालेसन लिखता है :—
"जो अनुचित, नीच और शर्मनाक कार्रवाइयाँ मीर जाफ़र को मसनद
से हटाने के बाद तीन साल तक कलकत्ते की अंगरेज़ गवरमेण्ट ने कीं उनसे
अधिक अनुचित, अधिक नीच और अधिक शर्मनाक कार्रवाइयों की मिसालें
किसी भी क़ौम के इतिहास में नहीं मिलतीं।"*
मालेसन यह भी लिखता है कि—"मीर क़ासिम का एक मात्र
क़सूर यह था कि उसने यूरोप निवासियों की लूट से अपनी प्रजा
की रक्षा करने की कोशिश की।"† इस पर भी "मीर क़ासिम
*" The annals of no nation contain records of conduct more unworthy,
more mean, and more disgraceful, than that which characterised the English
Government of Calcutta during the three years which followed the removal
of Mir Jaffar."—The Decisive Battles of India, p. 133.
† " Whose only fault . . . was his endeavour to protect his
subjects from European extortion."—Ibid, p. 136.
मीर क़ासिम १८१
अपनी स्वाधीनता और प्रजा के सुख इन दोनों का नाश किए बिना
और किसी भी क़ीमत पर अंगरेज़ों के साथ अमन से रहने को
उत्सुक था।"*
किन्तु मीर क़ासिम के विरुद्ध साज़िश अभी पूरी तरह पकने न
पाई थी, इसलिए उसके अन्तिम पत्र के उत्तर में वन्सीटॉर्ट ने मीर
क़ासिम को लिख दिया—"यह क़िस्सा कि अंगरेज़ दूसरा नाज़िम
खड़ा करना चाहते हैं, चालबाज़ लोगों की मनगढ़न्त है x x x।"
इसके बाद जब वन्सीटॉर्ट ने मीर क़ासिम को लिखा कि
[हाशिया: मीर क़ासिम से नई नई माँगें] ऐमयाट और हे एक नई सन्धि करने के लिए
मुंगेर भेजे गए हैं तो मीर क़ासिम ने उत्तर में
लिखा कि—"हर साल नई सन्धि करना क़ायदे
के ख़िलाफ़ है, क्योंकि इनसानों की सन्धियों की कुछ उमरें होती
हैं।" उसने यह भी लिखा कि—"एक ओर आप चारों तरफ़ फ़ौजें
भेज रहे हैं और दूसरी ओर मुझसे बातचीत करने के लिए आदमी
भेज रहे हैं।"
ऐमयाट और हे का मुंगेर भेजना केवल एक चाल थी। बंगाल
के अंदर इस तीसरी बग़ावत के लिए अंगरेज़ों की तैयारी जोरों के
साथ जारी थी।
मीर क़ासिम को इतने में पता चला कि मेरे विरुद्ध साज़िशों
का जाल स्वयं मेरी राजधानी के अंदर पूरा फैल चुका है। वही
- "Mir Kassim, still anxious for peace at any price short of sacrificing
his own independence and the happiness of his people."—Ibid p. 140.
१८२ भारत में अंगरेज़ी राज
जैन जगतसेठ, जो छै साल पहले सिराजुद्दौला के पतन में अंगरेज़ों
का सहायक हुआ था, अब फिर इस नई साज़िश में शामिल था।
पता चलते ही मीर क़ासिम ने जगतसेठ और उसके भाई स्वरूप-
चन्द दोनों को मुंगेर बुलाकर नज़रबन्द कर दिया। ये दोनों भाई
मीर क़ासिम की प्रजा थे। अंगरेज़ों को इस पर एतराज़ करने का
कोई हक़ न था, किन्तु वन्सीटार्ट ने इस पर भी एतराज़ किया।
इस बीच ऐमयाट और हे दोनों दूत मुंगेर पहुँच गए। २५ मई
सन् १७६३ को इन दोनों ने कम्पनी की ओर से ११ नई माँगें लिख
कर मीर क़ासिम के सामने पेश कीं—(१) यह कि अंगरेज़
कौन्सिल ने तिजारती महसूल और एजन्टों के बारे में जो कुछ तय
किया है, नवाब उसे ज्यों का त्यों लिखकर स्वीकार करे, (२) यह
कि नवाब अपनी प्रजा यानी देशी व्यापारियों पर नए सिरे से
महसूल लगावे और अंगरेज़ों की बिना महसूल तिजारत जारी रहे,
(३) यह कि अंगरेज़ों और उनके जिन जिन आदमियों को नई
आज्ञा से व्यापारिक नुक़सान हुआ है, नवाब उन सब का हरजाना
पूरा करे, (४) यह कि नवाब अपने उन सब कर्मचारियों को
जिन्हें अंगरेज़ कहें दंड दे। इत्यादि, इत्यादि।
निस्सन्देह कोई स्वाभिमानी शासक इन शर्तों को स्वीकार न
कर सकता था। ऐमयाट का व्यवहार नवाब के
[हाशिया: हथियारों से भरी] साथ अत्यन्त रूखा और धृष्टतापूर्ण था। यहाँ
[हाशिया: हुई किश्तियाँ] तक कि उसने मीर क़ासिम की शिकायतें सुनने
तक से इनकार कर दिया। वास्तव में अंगरेज़ युद्ध चाहते थे और
मीर क़ासिम १८३
युद्ध की पूरी तैयारी कर चुके थे। १४ अप्रैल सन् १७६३ ही को
अंगरेज़ों ने अपनी सेना को तैयार हो जाने की आज्ञा दे दी थी।
पटने में एलिस नामक एक अंगरेज़ कम्पनी के एजन्ट की हैसियत
से रहता था। एलिस ने वहाँ के नायब नाज़िम को दिक़ करना
और बात बात में उसकी आज्ञाओं का उल्लंघन करना शुरू कर
दिया था। मीर क़ासिम ने अनेक बार वन्सीटॉर्ट से एलिस के
व्यवहार की शिकायत की, किन्तु व्यर्थ। अब कलकत्ते से एलिस
को लिख दिया गया कि तुम आज्ञा पाते ही पटने पर क़ब्ज़ा करने
के लिए तैयार रहो। कम्पनी की काफ़ी सेना पहले ही पटने पहुँचा
दी गई थी। उधर ऐमयाट साहब सुलह के लिए मुंगेर में ठहरे हुए
थे और इधर हथियारों से भर ई कई किश्तियाँ एलिस की मदद
के लिए कलकत्ते से पटने की ओर जा रही थीं। जब ये किश्तियाँ
मुंगेर के पास से निकलीं, नवाब उन्हें देखकर चौंक गया। उसने
किश्तियों को आगे बढ़ने से रोक दिया और २ जून सन् १७६३
को वन्सीटॉर्ट को लिखा कि—"कम्पनी की नई माँगें बेजा और
पहली सन्धियों के विरुद्ध हैं × × × पटने की अंगरेज़ी फ़ौज या
तो कलकत्ते वापस बुला ली जावे और या मुंगेर में रक्खी जावे,
नहीं तो मैं निज़ामत छोड़ दूँगा।"
इसके जवाब में ऐमयाट ने मीर क़ासिम से साफ़ साफ़ कहा
कि बजाय वापस बुलाने के पटने में अंगरेज़ी फ़ौज बढ़ाई जायगी।
हथियारों की किश्तियाँ मुंगेर में रुकते ही कलकत्ते की कौन्सिल ने,
जो केवल एक बहाने के इन्तज़ार में थी, ऐमयाट और हे को वापस
१८४ भारत में अंग्रेज़ी राज
बुला लिया और एलिस को आज्ञा दे दी कि तुम फ़ौरन पटने पर
हमला करके नगर पर क़ब्ज़ा कर लो ।
२४ जून की रात को अचानक हमला करके एलिस ने पटने पर
[पटने पर अचानक] क़ब्ज़ा कर लिया । मीर क़ासिम की बरदाश्त
[रात के समय] की कोई हद न थी। इतिहास लेखक ऐल्फ़िन्स्टन
[हमला] लिखता है कि—"उसे ग़ुस्सा आने के बेशुमार
कारण थे, फिर भी उसने धैर्य और बरदाश्त से
काम लिया ।"* किन्तु अब मजबूर होकर उसे एलिस के विरुद्ध
सेना भेजनी पड़ी। मीर क़ासिम की सेना ने पटने पहुँच कर फिर
से नगर अंग्रेज़ों से विजय कर लिया। इस बार की लड़ाई में
कम्पनी के क़रीब ३०० यूरोपियन और ढाई हज़ार हिन्दोस्तानी
सिपाही काम आए। एलिस और उसके कई यूरोपियन साथी
पहिली जुलाई को क़ैद करके मुंगेर पहुँचा दिए गए।
ऐमयाट चुपके से किश्ती में बैठकर कलकत्ते की ओर भाग
गया। मीर क़ासिम ने हे को मुंगेर में रोक लिया।
[ऐमयाट की] मालूम होता है मीर क़ासिम ने अपने आदमियों
[मृत्यु] को हुकुम भेज दिया कि ऐमयाट को भी रोक कर
वापस मुंगेर भेज दिया जाए। क़ासिमबाज़ार के निकट नवाब के
एक कर्मचारी मोहम्मद तक़ी ख़ाँ ने अपने एक आदमी को भेजकर
- " . . . He conducted himself under innumerable provocations
with temper and forbearance, . . ."—Rise of the British power in India
by Elphinstone, pp. 390, 391.
मीर क़ासिम
[ श्री बहादुर सिंह सिंघी, कलकत्ता, की कृपा द्वारा,
एक प्राचीन चित्र से ]
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मीर क़ासिम १८५
ऐमयाट से खाना खाने के बहाने किनारे पर आने की प्रार्थना की।
ऐमयाट ने इनकार किया और उसकी किश्तियाँ बीच धार से
चलती रहीं। एक दूसरा उच्च कर्मचारी भेजा गया, जिसने किनारे
से फिर कहा कि खाना तैयार है और यदि आप सेनापति मोहम्मद
तक़ी ख़ाँ की प्रार्थना स्वीकार न करेंगे तो उन्हें दुख होगा। ऐमयाट
ने फिर इनकार कर दिया। इसके बाद किनारे के अफ़सरों ने
किश्तियों को रुकने का स्पष्ट हुकुम दिया। जवाब में ऐमगाट ने
वहीं से किनारे की ओर गोलियों की बौछार शुरू कर दी। नवाब
के आदमियों ने अब ज़बरदस्ती किश्तियों पर पहुँच कर बदला
लिया। उस लड़ाई में ऐमयाट का भी वहीं पर काम तमाम होगया।
२८ जून को मीर क़ासिम ने वन्सीटॉर्ट और उसकी कौन्सिल के
नाम यह पत्र लिखा :—
[हाशिया: मीर क़ासिम की] “ × × × रात को डाकू की तरह मिस्टर एलिस
[हाशिया: प्रजा के साथ ज़ुल्म] ने पटने के क़िले पर हमला किया, वहाँ के बाज़ार को
[हाशिया: और ज़्यादतियाँ] और तमाम व्यापारियों और नगर के लोगों को लूटा
और सुबह से तीसरे पहर तक लूट और क़त्ल जारी रक्खी । × × × चूंकि
आप लोगों ने बेइंसाफ़ी और ज़ुल्म के साथ शहर को रौंद डाला है, लोगों को
बरबाद किया है और कई लाख का माल लूट लिया है, इसलिए अब इंसाफ़
यह है कि कम्पनी ग़रीबों का नुक़सान भर दे, जैसा पहले कलकत्ते में हो
चुका है। आप ईंसाई लोग विचित्र दोस्त निकले। आपने सन्धि की, उस
पर ईसा मसीह के नाम से क़सम खाई। इस शर्त पर कि आपकी सेना सदा
मेरा साथ देगी और मेरी सहायता करेगी, आपने अपनी सेना के ख़र्च के लिए
१८६ भारत में अंगरेज़ी राज
मुझसे इलाक़ा लिया। असलियत में मेरे ही नाश के लिए आप फ़ौज रख
रहे थे, क्योकि उसी फ़ौज के हाथों ये सब कार्य हुए हैं x x x इसके
अलावा कई साल से अंगरेज़ गुमाश्तों ने मेरी निज़ामत के अन्दर जो जो
ज़ुल्म और ज़्यादतियों की हैं, जो बड़ी बड़ी रक़में लोगों से ज़बरदस्ती वसूल
की हैं और जो नुक़सान किए हैं मुनासिब और इंसाफ़ यह है कि कम्पनी इस
समय उस सबका हरजाना दे। आपको सिर्फ़ इतनी ही तकलीफ़ करने की
ज़रूरत है कि जिस तरह से बर्धमान और दूसरे इलाक़े आपने लिए थे उसी
तरह मुझपर इनायत करके आप उन्हें वापस लौटा दीजिए।”*
निस्सन्देह मजबूर होकर मीर क़ासिम ने अब कड़ाई का निश्चय
कर लिया।
७ जुलाई को यह पत्र कलकत्ते पहुँचा। उसी रोज़ कलकत्ते की
[हाशिया: मीरजाफ़र के साथ दोबारा साज़िश] अंगरेज़ कौन्सिल की ओर से मीर क़ासिम के साथ युद्ध का एलान प्रकाशित हुआ, जिसमें प्रजा को
यह सूचना दी गई कि मीर क़ासिम की जगह
मीर जाफ़र को अब फिर से बंगाल की मसनद पर बैठा दिया
गया है। नवाब मीर जाफ़र ही के नाम पर बंगाल भर से सेना
जमा की गई और मीर जाफ़र ही के नाम पर प्रजा से अंगरेज़ी
सेना का साथ देने के लिए कहा गया। किन्तु इस बाक़ायदा
एलान से पहले ही पटना विजय हो चुका था और फिर से छिन
भी चुका था। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि कलकत्ते के
अंगरेज़ व्यापारियों की कौन्सिल को बंगाल के सूबेदार को मसनद
- Long's Selections, pp. 325, 326.
अवध विलय, लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति एवं भारतीय हथकरघा-उद्योग का विनाश
मीर क़ासिम १८७
से उतारने या दूसरा सूबेदार नियुक्त करने का अधिकार कभी
किसी ने न दिया था।
मीर जाफ़र के साथ जो नई सन्धि इस अवसर पर की गई
उसका ज़िक्र अगले अध्याय में किया जायगा।
कम्पनी की सेना मेजर एडम्स के अधीन ५ जुलाई को यानी
[हाशिया: कई छोटी छोटी लड़ाइयाँ] युद्ध के एलान से दो दिन पहले कलकत्ते से
मुर्शिदाबाद की ओर रवाना हुई। मीर क़ासिम
की सेना सिपहसालार मोहम्मद तक़ी ख़ाँ के
अधीन मुंगेर से चली। तक़ी ख़ाँ वीर और योग्य सेनापति
था, किन्तु उसकी तमाम तजवीज़ों में बात बात में मुर्शिदाबाद
का नायब नाज़िम सय्यद मोहम्मद ख़ाँ, जो अंगरेज़ों से मिला
हुआ था, रुकावटें डालता रहता था। तक़ी ख़ाँ की सेना के अन्दर
भी अंगरेज़ काफ़ी सफलता के साथ विश्वासघात के बीज बो चुके
थे। तीन स्थानों पर दोनों ओर की सेनाओं में कई छोटी बड़ी
लड़ाइयाँ हुईं। इन लड़ाइयों का विस्तृत हाल “सीअरुल-मुताख़रीन”
नामक ग्रन्थ में दिया हुआ है। उस ग्रन्थ में मुसलमान सेना के
अन्दर एक ख़ास देशघातक मिरज़ा ईरज ख़ाँ का ज़िक्र आता है,
जिसने भीतर ही भीतर अंगरेज़ों से मिलकर मीर क़ासिम और
मोहम्मद तक़ी ख़ाँ के साथ दग़ा की। क़रीब दो सौ यूरोपियन
और अन्य ईसाई, जो नवाब की सेना में ख़ासकर तोपख़ाने में
नौकर थे, ऐन मौक़े पर शत्रु की ओर जा मिले। इन लड़ाइयों में से
एक में मोहम्मद तक़ी ख़ाँ मार डाला गया। इन्हीं लड़ाइयों के
१८८ भारत में अंगरेज़ी राज
सम्बन्ध में मालेसन लिखता है कि—"अंगरेज़ों की सफलता में
जितनी सहायता भारतीय नेताओं और नरेशों की परस्पर की ईर्षा
से मिली है उतनी दूसरी किसी भी चीज़ से नहीं मिली।”*
मीर क़ासिम की सेना ने अब ऊदवानाला नामक ऐतिहासिक
[हाशिया: उदवानाला में] स्थान पर अपना अन्तिम पड़ाव किया। प्राकृतिक
[हाशिया: दोनों ओर की] स्थिति और मीर क़ासिम की दूरदर्शिता दोनों ने
[हाशिया: फ़ौजें] मिलकर इस स्थान को सुरक्षित और अभेद्य बना
रक्खा था। एक ओर गंगा थी, दूसरी ओर
ऊदवानाला नाम की गहरी नदी जो गंगा में गिरती थी, तीसरी
ओर राजमहल की दुरारोह पहाड़ियाँ और चौथी ओर मीर
क़ासिम की बनवाई हुई ज़बरदस्त खाड़ियाँ और क़िलेबन्दी,
जिसके ऊपर सौ से अधिक मज़बूत तोपें लगी हुई थीं। पहाड़ियों
की तलहटी में खाड़ियों से ऊपर की ओर एक झील और एक लम्बी
चौड़ी दलदल थी। इस दलदल के अन्दर से ही दुर्ग से बाहर आने
जाने का एक अत्यन्त पेचदार रास्ता था, जिसका अंगरेज़ी सेना
को किसी तरह पता न चल सकता था। एक महीने तक मीर
क़ासिम की सेना इस दुर्ग के अन्दर और कम्पनी की सेना, जिसके
साथ बूढ़ा मीर जाफ़र भी था, ऊदवानाला के बाहर पड़ी रही,
किन्तु न अंगरेज़ अपनी तोपों के गोलों से संगीन क़िलेबन्दी पर
किसी तरह का असर पैदा कर सके और न भीतर की सेना को
- "Few things have more contributed to the success of the English
than the action of jealousy of each other of the native princes and leaders of
India."—Ibid, p. 150.
मीर क़ासिम १८६
ज़रा भी हानि पहुँचा सके। दूसरी ओर एक साहसी और परहेज़-
गार मुसलमान सेनापति मिरज़ा नजफ़ ख़ाँ रोज़ रात के पिछले
पहर उसी दलदल के रास्ते आकर अंगरेज़ी सेना पर धावा करता
और अनेकों को ख़त्म कर और बहुत सा माल लेकर उसी रास्ते
लौट जाता। अंगरेज़ी सेना किसी तरह उसका पीछा न कर पाती
थी। लड़ाई का सामान भी अंगरेज़ों की निस्बत मीर क़ासिम की
सेना के पास कहीं अच्छा था। अंगरेज़ इतिहास लेखक ब्रूम लिखता
है कि भारत की बनी हुई जो बन्दूकें इस समय मीर क़ासिम की
सेना के पास थीं वह अंगरेज़ी सेना की, इंगलिस्तान की बनी हुई
बन्दूकों से धातु, बनावट, मज़बूती, उपयोगिता इत्यादि सब बातों
में कहीं बढ़िया थीं।* ईमानदारी की लड़ाई में अंगरेज़ किसी
तरह मीर क़ासिम पर विजय न प्राप्त कर सकते थे।
मीर क़ासिम की सेना का एक ख़ास दोष, जो उसके लिए
मीर क़ासिम के घातक सिद्ध हुआ, यह था कि उसने अनेक
ईसाई अफ़सरों यूरोपियन और आरमीनियन ईसाइयों को अपनी
की नमकहरामी सेना के बड़े बड़े ओहदों पर नियुक्त कर रक्खा
था। ईसा की ११ वीं सदी से लेकर जब कि
यूरोप की कई ईसाई शक्तियों ने मिल कर पहली बार मुसलमानों
से जेरुसेलम (बैतुलमुक़द्दस) छीनना चाहा, आज तक हज़रत ईसा
और हज़रत मोहम्मद के अनुयायियों के बीच प्रायः लगातार संग्राम
होते रहे हैं। ईसाई ताक़तों ने अनेक मुसलमान राज्यों के स्वतन्त्र
- History of the Bengal Army, by Broome, p. 351.
१६० भारत में अंगरेज़ी राज
अस्तित्व को मिटाकर अनेक बार अपना जुश्रा मुसलमान क़ौमों के
कन्धों पर रक्खा है। ईसाइयों श्रौर मुसलमानों के इस सदियों के
विरोध के श्रालावा भी यूरोपियनों का ख़ास कर किसी यूरोपियन
क़ौम के विरुद्ध अपने किसी एशियाई स्वामी के साथ वफ़ादारी
कर सकना क़रीब क़रीब नामुमकिन है। इस सच्चाई को न समझ
सकना श्रनेक भारतीय श्रौर श्रन्य एशियाई शासकों के लिए घातक
साबित हुआ है।
कलकत्ते में इस समय श्रारमीनिया का एक मशहूर ईसाई
सौदागर ख़ोजा पेतरूस रहता था। इस सौदागर का एक भाई
ख़ोजा ग्रिगरी मीर क़ासिम की सेना में एक अफ़सर था श्रौर भी
कई श्रारमोनियन ईसाई मीर क़ासिम की सेना में नौकर थे। मेजर
एडम्स ने ख़ोजा पेतरूस की मारफ़त गुप्त पत्र व्यवहार द्वारा इन
सब लोगों को अपनी श्रोर फोड़ लिया।
इनके अलावा मीर क़ासिम की सेना में एक अंगरेज़ सिपाही
एक अंगरेज़ भी था, जो कुछ समय पहले अंगरेज़ी सेना को
विश्वासघातक छोड़कर नवाब के यहाँ भरती हो गया था। इस
अंगरेज़ को अपनी सेना में भरती कर लेना मीर
क़ासिम के नाश का सबसे बड़ा सबब साबित हुआ। उसने
मिरज़ा नजफ़ ख़ाँ के आने जाने के मार्ग को धीरे धीरे श्रच्छी तरह
देख लिया श्रौर एक दिन, जब कि मालूम होता है दुर्ग के भीतर के
श्रन्य ईसाई श्रौर ग़ैर ईसाई विश्वासघातकों के साथ सारी योजना
पक्की की जा चुकी थी, ४ सितम्बर की रात को क़रीब दस बजे
मीर क़ासिम १६१
यह अंगरेज़ नवाब की सेना से निकल कर अंगरेज़ी सेना की ओर
चला आया और वहाँ से शत्रु की सेना को साथ ले उसी मार्ग से
रातों रात अचानक नवाब की सेना पर आ टूटा। क़िले के अन्दर
के और भी कई अफ़सर शत्रु से मिले हुए थे और “सीअरुल मुता-
ख़रीन” से पता चलता है कि अनेक अपने स्थान की अभेद्यता और
शत्रु की अशक्तता पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा करके अपने कर्त्तव्य
से असावधान हो गए थे। ऐसी स्थिति में सेना का कर्त्तव्य विमूढ़
हो जाना स्वाभाविक था। नतीजा यह हुआ कि मीर क़ासिम के
पूरे पन्द्रह हज़ार सैनिक उस रात की लड़ाई में काम आए ।
इस अंगरेज़ विश्वासघातक के काम के बारे में कर्नल मालेसन
लिखता है :—
“केवल एक व्यक्ति के इस कार्य ने अंगरेज़ों की ना उम्मेदी को विश्वास
में बदल दिया ; और इस कार्य के नतीजे ने मीर क़ासिम की सेना के आत्म-
विश्वास को ना उम्मेदी में बदल दिया । अंगरेज़ी सेना के लिए इस आदमी ने
इस मौक़े पर ईश्वर का काम किया ।”*
“जनरल एडम्स ने मीर क़ासिम की सेना को केवल विजय ही
नहीं किया, बल्कि उसका संहार कर डाला ।”† मीर क़ासिम की
क़रीब चार सौ तोपें इस युद्ध में अंगरेज़ों के हाथ आईं ।
- "It was the act of a single individual which converted the despair of
the English into confidence; it was the consequence of that act which changed
the confidence of Mir Kassim's army into despair. The individual on this
occasion performed the divine function for the English army." -Ibid. p. 157.
† Ibid, p. 160.
१६२ भारत में अंग्रेज़ी राज
ऊदवानाला ही विदेशी व्यापारियों के विरुद्ध बंगाल के भारतीय
सूबेदारों की आशा का अन्तिम आधार था।
[ऊदवानाला की] ४ सितम्बर सन् १७६३ की रात को वह आशा
[पराजय] सदा के लिए टूट गई। जो चीज़ सिराजुद्दौला के
लिए प्लासी साबित हुई वही मीर क़ासिम के लिए ऊदवानाला
साबित हुआ, और दोनों जगह क़रीब क़रीब एक ही से उपायों द्वारा
अंगरेज़ व्यापारियों ने बंगाल की शाही सेना पर विजय प्राप्त की।
ऊदवानाला की पराजय का एक सबब यह भी बताया जाता
है कि उस रात को मीर क़ासिम ख़ुद अपनी सेना के साथ दुर्ग के
अन्दर मौजूद न था। अंगरेज़ इतिहास लेखक बोल्ट्स की राय है
कि यदि मीर क़ासिम स्वयं अपने अफ़सरों को सावधान रखनेऔर
अपने सैनिकों को उत्साह दिलाने के लिए मौजूद होता तो—"शायद
हो नहीं बल्कि बहुत ज़्यादा मुमकिन है कि उस दिन से अंगरेज़
कम्पनी के पास इन प्रान्तों में एक फुट ज़मीन भी न रह जाती।"*
ऊदवानाला की पराजय से मीर क़ासिम को बहुत बड़ा धक्का
[कुछ ख़ास ख़ास] लगा, किन्तु उसने विदेशियों की अधीनता
['विश्वासघातक] स्वीकार न की और न वह इतनी जल्दी हिम्मत
हारा। ऊदवानाला के बाद उसने मुंगेर के क़िले
को सँभाला। यह क़िला भी अत्यन्त मज़बूत था। उसकी रक्षा का
- " . . . it is more than probable that, the English Company would
have been left, from that day, without a single foot of ground in these
Provinces."—Consideration on Indian Affairs, By Bolts, p. 43.
मीर क़ासिम १६३
उचित प्रबन्ध कर मीर क़ासिम अज़ीमाबाद (पटना) के लिए
रवाना हो गया। “सीअरुल-मुताख़रीन” से पता चलता है कि
मीर क़ासिम के जाते ही मुंगेर के क़िलेदार अरब अली ख़ाँ ने नक़द
रिशवत लेकर अपना क़िला चुपचाप अंगरेज़ों के सुपुर्द कर दिया।
अंगरेज़ों ने मुंगेर पर क़ब्ज़ा जमा कर अब मीर क़ासिम का पीछा
किया। महाराजा कल्यानसिंह की पुस्तक “ख़ुलासतुल तवारीख़”
में लिखा है कि अज़ीमाबाद क़िले के संरक्षक मीर मोहम्मदअली ख़ाँ
ने अपने लिए पाँच सौ रुपए मासिक पेन्शन कम्पनी से मंज़ूर करा
कर बिना विरोध वहाँ का क़िला भी शत्रु के हवाले कर दिया।
मीर क़ासिम को इस समय अपने चारों ओर सिवाय दग़ा के
और कुछ नज़र न आता था। अंगरेज़ों को अब केवल दो बातों की
चिन्ता थी। एक एलिस इत्यादि जो अंगरेज़ मीर क़ासिम के पास
अभी तक क़ैद थे उन्हें छुड़ा लेना और दूसरे किसी प्रकार मीर
क़ासिम को गिरफ़्तार करना। १६ सितम्बर सन् १७६३ को एडम्स
और कारनक ने मीर क़ासिम के एक फ़्रान्सीसी मुलाज़िम जाँती
(Gentil) को इस मज़मून का पत्र लिखा :—
“मुसलमानों के हाथों में जब कभी ताक़त होती है और उन्हें कोई डर
नहीं होता तो वे सदा हमारे सहधर्मियों और यूरोप निवासियों के साथ क्रूर
से क्रूर पाशविकता का व्यवहार करते हैं। किसी ईसाई के लिए मुसलमानों
की नौकरी करना बड़ी ज़िल्लत का काम है। हमारा यह भी अनुमान है कि
किसी बहुत ही ज़बरदस्त ज़रूरत से मजबूर होकर ही आपने इतनी ज़िल्लत
की नौकरी स्वीकार की होगी। अब ऐसी कष्टकर गुलामी से बच निकलने का
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और हमारी क़ौम की फिर से मित्रता लाभ करने का आपके लिए अच्छा
मौक़ा है। आप इससे इनकार नहीं कर सकते कि हमारी क़ौम के साथ
आपने बहुत बेजा सलूक किया है (जब कि आजकल हमारी और आपकी
क़ौमों में सुलह है)। यदि आप हमारे आदमियों को क़ासिमअली ख़ाँ के
हाथों से निकाल कर हमारे पास भेजने की तदबीर कर सकें तो आप अंगरेज़ों
की कृतज्ञता पर पूरा भरोसा रखिए और हम आपको पचास हज़ार रुपए
फ़ौरन देने का वादा करते हैं।"*
'सीअरुल-मुताख़रीन' में लिखा है कि इसके बाद मीर क़ासिम
मीर क़ासिम को को किसी तरह गिरफ़्तार करने की अंगरेज़ों को
गिरफ़्तार करने चिन्ता हुई। वन्सीटार्ट और वारन हेस्टिंग्स
की योजना ने कलकत्ते के ईसाई सौदागर ख़ोजा पेतरूस से
जिसे आग़ा बेदरूस भी कहते थे, ख़ोजा ग्रिगरी
के नाम जिसे गुरघिन ख़ाँ भी कहते थे, इस सम्बन्ध में एक पत्र
- "We are persuaded also that it must have been the most absolute
necessity only which could have engaged you in so dishonourable a service
to a Christian as that of the moors, who always treat with the grossest
brutality those of our religion and Europeans when it is in their power to do
it with impunity. A favourable opportunity now offers to enable you to
rid yourself of so irksome a slavery and to reconcile yourself with our
nation, towards which you can not deny but you have acted very improperly
(and which is now at peace with yours). If you can contrive means for the
delivery of our gentlemen from the power of Cossim Ally Khan and will
convey them to us, you may place a firm reliance on the gratitude of the
English; and we promise you fifty thousand Rupees immediately."-Letter
dated 19th September, 1763, from Adams and Carnac to one Monsieur Gentil
in the employ of Meer Kassim—Long's Records, pp. 332, 333.
मीर क़ासिम १६५
लिखाया। अचानक एक दिन रात को एक बजे मीर क़ासिम के
एक विश्वस्त जासूस ने उसे जगाकर ख़बर दी—"आप बिछौने
पर पड़े क्या कर रहे हैं, आपका सेनापति गुरघिन ख़ाँ आपको
साफ़ फ़िरङ्गियों के हाथों में बेच रहा है! कुछ बाहर के लोगों के
साथ और मालूम होता है कि भीतर के लोगों, यानी आपके क़ैदियों,
के साथ भी उसकी साज़िश हो चुकी है।"
अभी तक एलिस और उसके अंगरेज़ साथियों के साथ मीर
क़ासिम ने बड़ी उदारता का व्यवहार किया था। इन खुले बाग़ियों
को ख़तम कर देने के बजाय वह तीन महीने से बराबर उन्हें आदर
पूर्वक अपने साथ रक्खे था और खिला पिला रहा था। किन्तु
'सीअरुल-मुताख़रीन' के अनुसार जब उसने देखा कि ये सब लोग
अब भी मेरे ख़िलाफ़ गहरी साज़िश कर रहे हैं और बाहर से शस्त्रों
वगैरह का भी गुप्त प्रबन्ध कर चुके हैं, तो उसने मजबूर होकर पटने
में ख़ोजा ग्रिगरी को, एलिस और उसके तमाम साथियों को—केवल
एक अंगरेज़ डॉक्टर फ़ुलरटन को छोड़कर—जगतसेठ और उसके
भाई महाराजा स्वरूपचन्द को, यानी उन सबको जो इस साज़िश
में शामिल थे, क़त्ल करवा दिया। कहा जाता है कि ख़ोजा ग्रिगरी
इस साज़िश का सरग़ना था।
इसके बाद जब अंगरेज़ पटने की ओर बढ़े तो मीर क़ासिम ने
[हाशिया: मीर क़ासिम के शासन का अंत] कर्मनासा नदी को पार कर कुछ सेना और तोप
ख़ाने सहित ४ दिसम्बर सन् १७६३ को अपनी
सरहद से निकल कर नवाब शुजाउद्दौला के
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सूबे अवध में प्रवेश किया। तीन साल तक वह बंगाल का सूबेदार
रह चुका था। उसका सारा शासन काल आपत्तियों से भरा हुआ
था। अब इस प्रकार उसके शासन का अन्त हुआ। मीर क़ासिम
के बाक़ी प्रयत्नों और उसकी मृत्यु का ज़िक्र अगले अध्याय में किया
जायगा। निस्सन्देह वह योग्य, वीर और अपने देश और प्रजा
दोनों का सच्चा हितचिन्तक था। सिराजुद्दौला के समान वह
विश्वासघात का शिकार हुआ। उसके शासन काल और पतन के
सारे क़िस्से को पढ़कर और उसकी कोशिशों के साथ उसके
विरोधियों की समस्त करतूतों की तुलना कर प्रत्येक निष्पक्ष मनुष्य
के चित्त में उसकी ओर दया, प्रेम और सहानुभूति का उत्पन्न
होना स्वाभाविक है। बहुत दरजे तक वह अन्तिम भारतीय वीर
था, जिसने बंगाल की स्वाधीनता की रक्षा के लिए एक बार जी
तोड़ प्रयत्न किया और इसी प्रयत्न में अपने आपको मिटा डाला।