भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
१३६ भारत में अंग्रेज़ी राज
से कुछ घंटे पहले कम्पनी की सेना ने अचानक मीर जाफ़र को
महल में सोते हुए जा घेरा। मीर जाफ़र की उस समय की
मानसिक स्थिति को मालेसन ने बड़े सुन्दर शब्दों में चित्रित करने
का यत्न किया है। वह लिखता है :—
“निस्सन्देह उस दिन प्रभात की महत्वपूर्ण घड़ी में बूढ़े नवाब को तीन
मीरजाफ़र का साल से कुछ अधिक पहले के उस दिन की अवश्य
दुःख और पश्चात्ताप याद आई होगी, जब कि प्लासी के मैदान में, इन्हीं
अंग्रेज़ों के साथ गुप्त समझौता करके उस मसनद के
लिए, जिसे अब उसका एक दूसरा सम्बन्धी उसी तरह के उपायों द्वारा उसके
हाथों से छीन रहा था, उसने अपने स्वामी और आत्मीय सिराजुद्दौला के साथ
विश्वासघात किया था। मीर जाफ़र अवश्य इस समय सोचता होगा कि—
‘जिस सत्ता को मैंने इतने नीच और कलंकित उपाय से प्राप्त किया था उससे
मुझे क्या लाभ पहुँचा ? मैंने सिराजुद्दौला से उसका महल छीना ! उस महल
में तीन साल तक नवाबी की ! किन्तु इन तीन साल के अंदर जो यातनाएं
मुझे सहनी पड़ीं उनके सामने मेरे जीवन के पहले ५८ साल के तमाम कष्ट
फीके हैं ! वे लोग, जिनके हाथ मैंने अपना मुल्क बेचा था, आज मुझे डर
दिखला रहे हैं ! यदि प्लासी में मैं अपने उस बालक सम्बन्धी के साथ
वफ़ादार रहा होता, जिसने अत्यन्त हसरत भरे शब्दों में मुझसे अपनी
पगड़ी की लाज रखने की प्रार्थना की थी तो इस समय मेरी स्थिति क्या
होती ? निस्सन्देह जो गुस्ताख़ विदेशी प्लासी से अब तक मुझ पर हुकुम
चलाते रहे और जो अब मुझे मसनद से उतारने की धमकी दे रहे हैं, यदि
प्लासी के मैदान में मैंने उनके नाश के मुख्य साधन बनने का यश प्राप्त कर
मीर जाफ़र १३७
लिया होता, तो इस समय मेरे हाथों में वास्तविक सत्ता होती, मेरा नाम
इज्ज़त से लिया जाता और मेरा मुल्क बच गया होता ! किन्तु अब,—अपने
महल की खिड़की से बाहर नज़र डालते ही मुझे लाल वरदी वाले अंगरेज़
सिपाही दिखाई दे रहे हैं, जो मेरे ही बाग़ी रिश्तेदार के झंडे के नीचे जमा
हैं ! जो व्यवहार मैंने स्वयं सिराजुद्दौला के साथ किया, क्या मैं मीर क़ासिम
से उससे अधिक दया की आशा कर सकता हूं?' इत्यादि । निस्सन्देह अपने
स्वामी और रिश्तेदार के साथ मीर जाफ़र ने जो व्यवहार किया था उसकी
याद इस समय मीर जाफ़र की आँखों के सामने से फिर गई होगी x x x ।"*
*"Well, indeed, on that eventful morning, might the thoughts of the
old man have carried him back to a period little more than three years distant,
when, on the field of Plassy, he too, in secret compact with these same
English, had betrayed his kinsman and master to obtain the seat which
another kinsman was now by similar means wresting from him. What to
him had been the power thus basely and dishonourably obtained? All the
agonies of the preceding fifty-eight years of his life paled before those which
he had suffered during the three years he had ruled as Nawab in the usurped
palace of Sirajuddowlah. He could not but contrast his position threatened
by the men to whom he had sold his cuuntry, with that which he would have
occupied if, at Plassy, he had been loyal to the boy relative who had, in the
most ouching terms, implored him to defend his turban. With the prestige
of having been the main factor in the destruction of the insolent foreigners
who had since dictated to him, and who now threatened to dethrone him, he
would have wielded a real power; his name would have been honoured; his
country would have been secure. But now : -a glance from the window of his
palace showed him the red-coated English soldiers rallying round the standard
of his kinsman in revolt `against himself. Would Mir Kasim show him more
mercy than he had shown to Sirajuddolah? The recollection of the fate to
which he had abandoned his kinsman and master must have passed through
his mind . . ."—The Decisive Battles of India, by Colonel Malleson,
pp. 131, 132.
१३८ भारत में अंगरेज़ी राज
एक बार मीर जाफ़र ने अंगरेज़ों को मुक़ाबला करने की
मीर जाफ़र का धमकी दी। किन्तु तुरन्त ही उसने अपनी बेबसी
मसनद से हटाया को महसूस कर लिया और उसका साहस टूट
जाना गया। उसने अपने तईं मीर क़ासिम के हाथों
में सौंपने से इनकार कर दिया। उसी दिन सवेरे मीर जाफ़र को
मसनद से हटाकर कलकत्ते भेज दिया गया और मीर क़ासिम को
उसको जगह सूबेदारी की मसनद पर बैठा दिया गया।
मीर जाफ़र की आयु उस समय ६० साल की और मीर
क़ासिम की क़रीब ४० साल की थी।
२१ अक्तूबर को वन्सीटार्ट और केलो ने इस घटना को विस्तार
से बयान करते हुए सिलेक्ट कमेटी के नाम एक पत्र लिखा, जिसका
सार क़रीब क़रीब उन्हीं के शब्दों में इस तरह है :—
“१५ अक्तूबर को नवाब मीर जाफ़र गवर्नर वन्सीटार्ट से भेंट करने के
लिए क़ासिमबाज़ार आया। अगले दिन वन्सीटार्ट और केलो नवाब से मिलने
मुर्शिदाबाद गए। दोनों दिन मामूली बातचीत होती रही। १८ ता० को
अंगरेज़ों की पुरानी शिकायतों और नई माँगों पर बातचीत करने के लिए
नवाब फिर क़ासिमबाज़ार आया। ये सब शिकायतें और माँगें पहले से तीन
पत्रों के अन्दर लिख दी गई थीं। ये पत्र बातचीत के शुरू ही में वन्सीटार्ट
ने मीर जाफ़र को दे दिए।
“मीर जाफ़र पत्रों को पढ़कर बहुत घबरा गया। उसने अपने महल
वापस जाकर खाना खाने और सलाह करने के लिए समय चाहा। किन्तु
अंगरेज़ों ने उस पर ज़ोर दिया कि आप यहाँ ही खाना मँगवाकर हाथ के
मीर जाफ़र १३६
हाथ तमाम मामले का फ़ैसला कर दें। अन्त में बूढ़ा मीर जाफ़र इस दर्जे
थका हुआ मालूम हुआ कि अंगरेज़ों को मजबूर होकर उसे आराम करने और
फिर विचार करने के लिए अपने महल लौटने की इजाज़त देनी पड़ी।
अंगरेज़ों ने यह भी देख लिया कि बिना थोड़ी बहुत ज़बरदस्ती किए मीर
जाफ़र राज की बाग मीर क़ासिम के हाथों में देने के लिए राज़ी न होगा।
मीर जाफ़र के जाने के दो घंटे बाद मीर क़ासिम वहाँ पहुँचा। मीर क़ासिम
इस समय मीर जाफ़र के सामने जाने से डरता था। १६ ता० मीर जाफ़र
को विचार करने के लिए दी गई, किन्तु उस दिन मीर जाफ़र की तरफ़ से
कोई जवाब न मिल सका। फ़ौरन् वन्सीटार्ट और उसके साथियों ने ज़बर-
दस्ती करने का निश्चय किया। १६ की रात को महल के अन्दर किसी त्यौहार
की तक़रीब में दावत थी। तमाम लोग थक कर सोए हुए थे। अंगरेज़ों ने
उस मौक़े को बहुत ग़नीमत समझा। चुपचाप रात को तीन बजे करनल
केलो ने दो कम्पनी गोरों की और छै कम्पनी काले सिपाहियों की लेकर नदी
को पार किया और पौ फटते फटते मीर क़ासिम और उसके कुछ आदमियों
को साथ लेकर मीर जाफ़र को महल के अन्दर सोते हुए जा घेरा। सब
काररवाई अच्छी तरह गुप्त रक्खी गई, चूँकि महल के अन्दर के सहन के
फाटक बन्द थे इसलिए केलों ने बाहर के सहन में अपने सिपाहियों को खड़ा
कर दिया। मीर जाफ़र के पास वन्सीटार्ट का एक पत्र भेजा गया। मीर जाफ़र
पत्र पढ़कर एकबार क्रोध से भर गया। उसने मुक़ाबले का इरादा ज़ाहिर
किया। क़रीब दो घंटे तक संदेश आते जाते रहे। अन्त में अपनी बेबसी
को पूरी तरह अनुभव कर मीर जाफ़र ने मीर क़ासिम को बुलवा भेजा और
मसनद उसके सुपुर्द कर देने की रज़ामन्दी ज़ाहिर की।
१४० भारत में अंगरेज़ी राज
“मीर क़ासिम ने शासन का सारा भार अपने ऊपर ले लिया और सेना
की पिछली तनख़्वाहों की बक़ाया अदा करने और सम्राट को बराबर ख़िराज
भेजते रहने का वादा किया। इस तरह २० अक्तूबर को सवेरे मीर जाफ़र
बंगाल की मसनद से अलग किया गया और उसकी जगह मीर क़ासिमअली
ख़ाँ के नाम की नौबत बजने लगी।”*
अंगरेज़ द्विभाषिया लशिंगटन के अनुसार मीर जाफ़र ने अन्त
में कर्नल केलो से जो कुछ कहा वह यह था :—
“आप ही लोगों ने मुझे मसनद पर बैठाया था, आप चाहें तो मुझे
उतार सकते हैं। आप लोगों ने अपने वादों को तोड़ना मुनासिब समझा।
मैंने अपने वादे नहीं तोड़े। अगर मेरे दिल में भी इसी तरह की चालें होतीं
और मैं चाहता तो बीस हज़ार फ़ौज जमा कर सकता था और आप से लड़
सकता था। मेरे बेटे मीरन ने मुझे इन सब बातों के बारे में पहले ही से
आगाह कर दिया था।”†
बंगाल की इस दूसरी बग़ावत का यह सारा बयान उस
बग़ावत के कर्त्ता धर्त्ता अंगरेज़ों ही की ज़बानी दिया गया है।
मीर जाफ़र के साथ इस व्यवहार को जायज़ क़रार देने के
[मीर जाफ़र पर] लिए उस पर कुछ न कुछ इलज़ाम लगाना
[झूठे दोष] आवश्यक था। १० नवम्बर सन् १७६० को
कलकत्ते में अंगरेज़ अफ़सरों की एक सभा हुई
जिसमें कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम मशहूर जालसाज़ हॉलवेल
- First Report 1772, p. 231.
† Malcolm's Life of Clive, vol. ii, p. 268.
मीर जाफ़र १४१
का लिखा हुआ वह पत्र पढ़ा गया, जिसका ज़िक्र ऊपर एक जगह
आ चुका है। उस पत्र में लिखा था :—
"नवाब जाफ़रअली ख़ाँ निहायत ज़ालिम और लालची तबीयत का
आदमी था, साथ ही बड़ा काहिल भी था, और उसके आस पास के आदमी
या तो कमीने, गुलाम और खुशामदी थे या उसकी बुरी इच्छाओं को पूरा
करने के ज़रिये थे। हर श्रेणी के इस तरह के लोगों की बेहद मिसालें मौजूद
हैं जिनका बिना किसी वजह के उसने ख़ून कर डाला।"*
इसके बाद इसी पत्र में पिता या पति के नाम इत्यादि समेत
बड़ी तफ़सील के साथ अनेक ऐसे पुरुषों और स्त्रियों की सूची दी
हुई है, जिनकी बाबत कहा गया है कि मीर जाफ़र ने उन्हें मार
डाला। किन्तु १ अक्तूबर सन् १७६५ को मीर जाफ़र की मृत्यु के
बाद क्लाइव और उसके साथियों ने डाइरेक्टरों के नाम एक दूसरा
पत्र भेजा जिसमें लिखा है:—
"× × × हम आपको सूचित कर देना अपना फ़र्ज़ समझते हैं कि
मि० हॉलवेल ने × × × जिन भयंकर हत्याओं का इलज़ाम मीर जाफ़र पर
लगाया है वे उस नवाब के चरित्र पर झूठे कलंक और उसके साथ ज़ुल्म हैं।
उनमें ज़रा भी सच्चाई नहीं है, जिन स्त्री पुरुषों की (हॉलवेल के उस पत्र में)
- "The Nawab Jaffir Ali Khan, was of a temper extremely tyrannical
and avaricious, at the same time very indolent, and the people about him
being either abject slaves and flatterers, or else the base instruments of his
vices; . . numberless are the instances of men, of all degrees, whose
blood he has spilt without the least assigned reason."—Holwell's Address to
the proprietors of the East India Stock, p. 46.
१४२ भारत में अंग्रेज़ी राज
सूची दी गई है और कहा गया है कि मीर जाफ़र ने उन्हें मरवा डाला,
सिवाय दो के उनमें से सब इस समय ज़िन्दा हैं x x x ।"*
न जाने इसी तरह के और कितने झूठ सिराजुद्दौला और मीर
जाफ़र दोनों के ख़िलाफ़ इस समय तक प्रचलित हैं और इतिहास
की पुस्तकों में दर्ज हैं।
मीर जाफ़र को मसनद से उतार कर कलकत्ते में नज़रबन्द
रक्खा गया। दो हज़ार रुपए माहवार उसके ख़र्च के लिए नियत
किए गए। कहते हैं कि इस पर बूढ़े मीर जाफ़र ने करबला जाने
की इजाज़त चाही और उसके लिए ख़र्च की दरखास्त की, किन्तु
उसे करबला जाने की भी इजाज़त न मिल सकी।
अब केवल यह देखना बाक़ी है कि मीर जाफ़र के साथ इस
विश्वासघात द्वारा अंगरेज़ों और अंगरेज़ कम्पनी
कम्पनी और अंगरेज़ों को क्या क्या लाभ पहुँचा।
को लाभ सब से पहले तीन ज़िले बर्धमान, मेदिनीपुर
और चट्टग्राम जिनकी सालाना आमदनी तमाम बंगाल की आम-
दनी का एक तिहाई थी, सदा के लिए कम्पनी के हवाले कर दिए
- "... . In Justice to the memory of the late Nawab Mir Jaffir, we
think it incumbent on us to acquaint you, that the horrible massacres where-
with he is charged by Mr. Holwell, in his 'Address to the proprietors of
East India Stock' (p. 46), are cruel aspersions on the character of that prince,
which have not the least foundation in truth. The several persons there
affirmed and who have been generally thought to have been murdered by his
order, are all now living, except two, . . . . "--Letter addressed to the
Hon'ble Court of Directors by Clive and others, 1st October, 1765.
गए। इन तीनों ज़िलों के लिए मुर्शिदाबाद के दरबार से कम्पनी
के नाम अलग अलग सनदें जारी कर दी गईं। बर्धमान के लिए
जो सनद् जारी की गई उसमें लिखा है कि वहाँ के ज़मींदार और
काश्तकार दोनों पहले की तरह क़ायम रहेंगे, केवल सरकारी माल-
गुज़ारी का जो रुपया अभी तक सूबेदार के कर्मचारी वसूल करके
मुर्शिदाबाद भेजा करते थे, वह आइन्दा कम्पनी के नौकर वसूल
करके कम्पनी के पास कलकत्ते भेजा करेंगे और इस धन के ख़र्च
से कम्पनी साम्राज्य की रक्षा के लिए या जब ज़रूरत हो, सम्राट
या सूबेदार की मदद के लिए, पाँच सौ यूरोपियन सवार, दो हज़ार
यूरोपियन पैदल और आठ हज़ार हिन्दोस्तानी सिपाहियों की एक
सेना रक्खेगी। इसी तरह की सनदें मेदिनीपुर और चट्टग्राम के
लिए भी जारी की गईं।
इसके अलावा वन्सीटार्ट और केलो ने कलकत्ता कमेटी को
लिखा कि इस बग़ावत से :-
"निस्सन्देह कम्पनी को बड़ा लाभ हुआ है। × × × पटने की फ़ौज
को देने के लिए करनल के हाथ रुपए की रक़म भेजी जावेगी और हमें यह
भी आशा है कि इसके अलावा कलकत्ते भेजने के लिए हमें तीन या चार
लाख रुपए और मिल जावेंगे, जिनसे कम्पनी की वहाँ की और मद्रास की
इस समय की ज़रूरतें पूरी हो सकेंगी।"*
- "The advantages to the Company are great indeed. . . . . A
supply of money will be sent with the Colonel for the payment of the troops
at Patna, and we have even some hopes of obtaining three or four lacks
१४४ भारत में अंगरेज़ी राज
सिराजुद्दौला ने एक बार कम्पनी को अलग टकसाल क़ायम
कम्पनी की करने से रोक दिया था। बाद में कुछ शर्तों
के साथ उसे इज़ाज़त देनी पड़ी, किन्तु इस
टकसाल पर भी सिराजुद्दौला के समय में कम्पनी की
टकसाल बंगाल में क़ायम न हो सकी। इतिहास लेखक और्म
लिखता है कि प्लासी के युद्ध के बाद कलकत्ते में कम्पनी की
टकसाल क़ायम हुई और १६ अगस्त १७५७ को पहले पहल कम्पनी
के नाम के रुपए ढाले गए। फिर भी तीन साल तक अंगरेज़ों
को इस टकसाल से अधिक लाभ न हो सका, क्योंकि बंगाल
भर में मुर्शिदाबाद के सरकारी रुपयों के सामने कम्पनी के रुपयों
को, उनमें चांदी कम होने के कारण, बिना बट्टे कहीं कोई न लेता
था। अब अंगरेज़ों को इस असुविधा के दूर करने का मौक़ा मिला।
२० अक्तूबर को गद्दी पर बैठते ही मीर क़ासिम ने कम्पनी के नाम
एक परवाना जारी किया, जिसमें उसने उन्हें अपनी कलकत्ते की
टकसाल में अशर्फ़ियाँ और रुपए ढालने की इजाज़त दी, इस शर्त
पर कि कम्पनी के सिक्के वज़न और धातु में मुर्शिदाबाद के
सरकारी सिक्कों के बिलकुल बराबर हों। इसके साथ साथ उसने
एक निहायत कड़ा हुकुम जारी कर दिया कि कोई सर्राफ़ या
सौदागर कलकत्ते के सिक्कों को लेने से इनकार न करे और न उन
पर किसी तरह का बट्टा माँगे।"
besides to send down to Calcutta, to help out the Company in their present
occasions there and at Madras . . . "-Vansittart and Caillaud in their
letter to the Select Committee at Fort William dated 21st October, 1760.
मीर जाफ़र १४५
इससे सरकारी आमदनी का बड़ा मद टूट गया और मुर्शिदा-
बाद दरबार की माली और राजनैतिक स्थिति को और अधिक
धक्का पहुँचा। नवाब और उसकी प्रजा के साथ यह ज़बरदस्त
अन्याय था। किन्तु कम्पनी के लिए आमदनी का और जैसा आगे
चल कर साबित हुआ जालसाज़ी का एक बहुत बड़ा नया मद
खुल गया।
कम्पनी को इस तरह जो कुछ लाभ हुआ उसके अलावा मीर
क़ासिम ने इस अहसान के बदले में वन्सीटार्ट और उसके साथियों
को बीस लाख रुपए नक़द बतौर नज़राने के भेंट किए।
अनेक इतिहास लेखकों ने कड़े शब्दों में मीर जाफ़र के साथ
अंग्रेज़ों के इस विश्वासघात की आलोचना की है। इतिहास
लेखक टॉरेन्स लिखता है :—
“उन लोगों तक में, जिन्होंने यूरोपनिवासियों को दिखाने के लिए
यूरोपवालों के एशियाई करतूतों पर मुलम्मा फेरने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर
ले रक्खी है, इस अन्याय को प्रायः कोई भी क्षम्य नहीं कहता। मीरजाफ़र
x x x और कम्पनी के बीच मित्रता की क़समें खाई जा चुकी थीं और
वह मित्रता ख़ून से पक्की की जा चुकी थी। और यदि कभी भी ईमानदारी
का कम से कम ऊपरी रूप बनाए रखना मनुष्य के लिए ज़रूरी था
तो इस मामले में कलकत्ते के गवर्नर और उसकी कौन्सिल को इतनी
शर्म होनी चाहिये थी। किन्तु इस पर भी उस दो लाख पाउण्ड के बदले
जो उन्हें व्यक्तिगत हैसियत से मिले और उन तीन ज़रखेज़ इलाक़ों के बदले
१०
१४६ भारत में अंगरेज़ी राज
जो कम्पनी को मिले इन लोगों ने अपने ऐसे मित्र और सहायक को बेच
दिया जो इन पर हद से ज़्यादा विश्वास करता था ।”*
- "The iniquity of this transaction finds few apologists even among
those who have taken upon themselves to dress and to enamel Oriental deeds
for European view. The treaty with Mir Jaffir still subsisted ; . . . He
was the sworn and bloodknit ally of the Company ; and if ever men were
bound by decency to maintain at least the forms of good faith, the Governor
and Council of Calcutta were so bound. Yet, being so, for the sum of
£s. 200,000 to them privately paid, and for the cession of three rich and
populous provinces, they sold their too confiding friend and ally "—Empire
in Asia, by W. M. Torrens M. P. p. 42.
चौथा अध्याय
———
मीर क़ासिम
मुर्शिदाबाद के दरबार और बंगाल की प्रजा दोनों की हालत
मीर क़ासिम के मसनद पर बैठते ही और अधिक
[हाशिया: बंगाल की हालत] शोचनीय होती गई। सब से पहले मीर क़ासिम
ने देखा कि राज की आर्थिक अवस्था अत्यन्त
बिगड़ी हुई थी। सरकारी मालगुज़ारी ठीक तौर पर वसूल न हो
रही थी। खज़ाना क़रीब क़रीब खाली था। सालाना खर्च आमद
से बढ़ गया था, और फ़ौज की कई महीने की तनख़ाहें चढ़ी हुई
थीं। इसके अलावा ठीक मीर जाफ़र के समान मीर क़ासिम ने
अब महसूस किया कि जो बड़े बड़े वादे उसने अंगरेज़ों के साथ
कर रक्खे थे उन्हें पूरा करना इतना आसान न था। इन वादों और
दूसरी नई नई माँगों को पूरा करने के लिए मीर क़ासिम ने अपने
यहाँ के ज़मींदारों और रईसों को अंगरेज़ों ही के सिपाहियों की
१४८ भारत में अंगरेज़ी राज
मारफ़त बुला बुला कर ज़बरदस्ती उनसे रक़में वसूल करना शुरू
किया। जब इससे भी काम न चल सका तो उसे जगतसेठ से क़र्ज़
लेना पड़ा और अन्त में अंगरेज़ों को रक़में देने के लिए रियासत के
जवाहरात बेचकर और महल के सोने चाँदी के बरतन गलवा कर
सिक्के ढलवाने पड़े।
कम्पनी की टकसाल कलकत्ते में क़ायम हो चुकी थी। किन्तु
कम्पनी के खोटे अंगरेज़ों ने मीर क़ासिम की इस शर्त की बिल्कुल
सिक्के परवाह न की कि जो सिक्के कलकत्ते में ढाले
जावें वह मुर्शिदाबाद की सरकारी टकसाल के
सिक्कों के समान वज़न और समान धातु के हों। अंगरेज़
बराबर अपनी टकसाल में घटिया सिक्के ढालते रहे। नतीजा
यह हुआ कि बावजूद मीर क़ासिम की कड़ी आज्ञाओं के प्रजा ने
कलकत्ते के सिक्कों को बिना बट्टे के लेने से इनकार किया। इस
पर अंगरेज़ों ने मीर क़ासिम से प्रार्थना की कि जो सिक्के हम
कलकत्ते में ढालें उन पर भी हमें मुर्शिदाबाद का नाम और मुर्शिदा-
बाद ही की छाप रखने की इजाज़त दी जावे। मीर क़ासिम ने इस
जाली काररवाई को तो मंज़ूर न किया, किन्तु उसने अंगरेज़ों को
सन्तुष्ट करने के लिए कलकत्ते के सिक्कों को लेने से इनकार करने
वाले या उन पर बट्टा माँगने वाले ज़मींदारों और अन्य लोगों को
सज़ाएं देना शुरू कर दिया। इन सख्तियों की वजह से अनेक
ज़मींदार मीर क़ासिम से असन्तुष्ट हो गए, यहाँ तक कि कई जगह
नए नवाब के ख़िलाफ़ बगावत की तैयारियाँ होने लगीं।
मीर क़ासिम १४६
कुछ साल पहले कम्पनी का क़र्ज़ चुकाने के लिए मीर जाफ़र
ने बर्धमान के इलाक़े की मालगुज़ारी कम्पनी
[margin: बर्धमान में कम्पनी के अत्याचार] के नाम कर दी थी। उस समय से बर्धमान
का इलाक़ा अंगरेज़ों के इन्तज़ाम में था और
कम्पनी के सिपाहियों ने, जिनमें अधिकांश मद्रास से लाए गए थे,
उस इलाके भर में लूट मार जारी कर रक्खी थी। इन तिलंगे
सिपाहियों के अत्याचारों की शिकायत करते हुए सितम्बर सन्
१७६० में वर्धमान के ज़मींदार राजा तिलकचन्द ने कलकत्ते की
अंगरेज़ कमेटी को लिखा :—
"अनेक तिलंगों ने मण्डलघाट, मानकर, जहानाबाद, चितवर, बरसात,
बलगुरी और चोमहैन के परगनों और दूसरे स्थानों में घुसकर वहाँ के
बाशिंदों को लूट लिया है और उनके साथ इस तरह के ज़ुल्म किए हैं
जिनसे लोगों की जान तक ख़तरे में पड़ गई है। इन ज़ुल्मों से मजबूर होकर
वहाँ के बाशिंदे गाँव छोड़ कर भाग गए हैं और उन मौज़ों की मालगुज़ारी में
दो या तीन लाख रुपए का नुक़सान हुआ है।"*
इस पर भी इन तिलंगों की लूट मार जारी रही और राजा
तिलकचन्द को कुछ समय बाद फिर लिखना पड़ा :—
"तिलंगों के व्यवहार से रय्यत को ज़बरदस्त कष्ट हो रहा है और मजबूर
होकर रय्यत अपने घर बार छोड़ छोड़ कर भाग रही है।"*
किन्तु कम्पनी ने इन शिकायतों की ओर कुछ भी ध्यान न दिया।
लिखा है कि बर्धमान के कई परगने इस समय वीरान पड़े हुए थे।
- Long's Records p. 236.
१५० भारत में अंगरेज़ी राज
अब मीर क़ासिम ने यह तमाम इलाक़ा हमेशा के लिए कम्पनी
को सौंप दिया और वहाँ के ज़मींदार को अंगरेज़ों के अधीन कर
दिया। जब यह नया परवाना राजा तिलकचन्द के पास पहुँचा
तो उसे दुख होना स्वाभाविक था। उसने गवर्नर वन्सीटार्ट को
अपनी ज़मींदारी की शोचनीय अवस्था की फिर से इत्तला दी और
अपने यहाँ की मालगुज़ारी का सब हिसाब भेज दिया।
वन्सीटार्ट ने किसी तरह उसकी मदद न की और न कम्पनी
[हाशिया: वर्धमान और बीर] के सिपाहियों के अत्याचार बन्द हुए। मजबूर
[हाशिया: भूम पर कम्पनी] होकर कहा जाता है राजा तिलकचन्द ने बीरभूम
[हाशिया: का क़ब्ज़ा] के राजा के साथ मिलकर अंगरेज़ों और मीर
क़ासिम दोनों से लड़ने के लिए फ़ौज जमा करना
शुरू किया। इस पर कलकत्ते की कौंसिल ने “वर्धमान और मेदनीपुर
के इलाक़ों पर क़ब्ज़ा करने के लिए” कप्तान व्हाइट के अधीन कुछ
सेना बर्धमान भेजी। राजा तिलकचन्द के एक पत्र से मालूम होता
है कि इस सेना ने भी मार्ग भर में असहाय ग्रामवासियों पर तरह
तरह के ज़ुलम किए, उन्हें खूब लूटा और खूब खून बहाया।
२८ दिसम्बर सन् १७६० को कप्तान व्हाइट की सेना और
बर्धमान के राजा की सेना में लड़ाई हुई, जिसमें राजा की सेना
हार गई। अंगरेज़ी सेना का एक हिस्सा बीरभूम की राजधानी
नागौर पर क़ब्ज़ा करने के लिए भेज दिया गया। वहाँ का राजा
अपनी राजधानी छोड़कर पहाड़ों की ओर भाग गया और बर्धमान
तथा नागौर दोनों पर कम्पनी का क़ब्ज़ा हो गया।
मीर क़ासिम १५१
आए दिन के राज परिवर्तन की वजह से बंगाल के शासन की
अवस्था अत्यन्त अस्तव्यस्त हो रही थी। कम्पनी की व्यापार
सम्बन्धी ज़बरदस्तियाँ बंगाल भर में ज़ोरों के साथ बढ़ रही थीं।
अंगरेज़ों ने जो क़रीब तीस हज़ार नई सेना मीर क़ासिम और
सम्राट की सहायता के नाम पर और साम्राज्य की रक्षा के लिए
कहकर जमा कर रक्खी थी, जिसके ख़र्च के लिए मीर क़ासिम
से तीन बड़े बड़े ज़िले लिए गए थे, वह सब अब सूबे भर में इन
ज़बरदस्तियों को जारी रखने के लिए काम में लाई जा रही थी।
प्राचीन भारतीय नरेशों के अधीन राज की आमदनी का एक
[हाशिया: महसूल की माफ़ी] बहुत बड़ा ज़रिया तिजारती माल का महसूल
[हाशिया: और उसका] था। मुग़ल सम्राटों के अधीन ईरान, अरब,
[हाशिया: दुरुपयोग] मिश्र, इतालिया, स्पेन, पुर्तगाल, इङ्गलिस्तान,
बर्मा, चीन, जापान इत्यादि अनेक बाहर के मुल्कों
के साथ और स्वयं भारत के अन्दर भारतीय तिजारत बेहद बढ़ी
हुई थी, जिसमें हज़ारों भारतीय जहाज़ हर साल लगे रहते थे और
हर व्यापारी को अपना माल एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में
सरकारी महसूल देना पड़ता था। केवल ईस्ट इण्डिया कम्पनी के
लिए मुग़ल सम्राट ने खुश होकर यह महसूल माफ़ कर दिया था।
इस माफ़ी का मतलब यह था कि कम्पनी अगर विलायत से कोई
माल लाकर हिन्दोस्तान में बेचना चाहे या हिन्दोस्तान का बना
माल ख़रीद कर विलायत ले जाना चाहे तो उस माल पर कोई
महसूल न लिया जावे। शाही फ़रमान में कम्पनी के मुलाज़िमों या
१५२ भारत में अंगरेज़ी राज
दूसरे अंगरेज़ों को निजी तौर पर बिना सरकारी महसूल दिए
तिजारत करने की इजाज़त कहीं न थी और न कम्पनी को ही देश
के भीतर की मामूली तिजारत में बिना महसूल दिए हिस्सा लेने
का अधिकार दिया गया था। इतना ही नहीं, बल्कि जैसा पिछले
अध्याय में कहा जा चुका है, नमक, छालिया, तम्बाकू, इमारती
लकड़ी, सूखी मछली इत्यादि बहुत सी चीज़ों में शुरू से ही बंगाल
भर के अन्दर यूरोपनिवासियों को तिजारत करने की मनाही थी।
सब से पहले मीर जाफ़र के समय में अंगरेज़ों ने ज़बरदस्ती
इस नियम को तोड़ा और नमक वग़ैरह की तिजारत शुरू कर दी,
जिसका ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है। मीर जाफ़र ने बहुतेरा
एतराज़ किया, किन्तु उसकी एक न चल सकी। अंगरेज़ों का यह
तमाम व्यापार शाही फ़रमान के विरुद्ध था, किन्तु कम से कम
कुछ दिनों तक अंगरेज़ व्यापारी अपनी इस नाजायज़ तिजारत के
माल पर महसूल उसी तरह अदा करते रहे, जिस तरह तमाम देशी
व्यापारी अपने माल पर करते थे।
अब मीर क़ासिम को नवाब बनाने के बाद कम्पनी के मुलाज़िम
और दूसरे अंगरेज़, कम्पनी का पास (दस्तक) लेकर, बिना किसी
तरह का महसूल दिए, देश भर में हर चीज़ का व्यापार करने लगे
और जब नवाब के कर्मचारी एतराज़ करते थे या महसूल माँगते
थे तो उन्हें कम्पनी के नए सिपाहियों के हाथों दुरुस्त कर दिया
जाता था। इतिहास लेखक मिल लिखता है :—
"इस तरह कम्पनी के मुलाजिमों का माल बिलकुल बिला महसूल
मीर क़ासिम १५३
सब जगह आता जाता था, जब कि और सब व्यापारियों का अपने माल पर
भारी महसूल देना पड़ता था। नतीजा यह हुआ कि देश का सारा व्यापार
तेज़ी के साथ कम्पनी के मुलाज़िमों के हाथों में आने लगा और सरकारी
आमदनी का एक स्रोत बिलकुल सूखने लगा । जब महसूल जमा करने वाला
कोई सरकारी कर्मचारी कम्पनी के दस्तक के इस दुरुपयोग पर एतराज़ करता
और माल को रोकता था तो उसे गिरफ़्तार करके पास की अंगरेज़ी कोठी में
पहुंचा देने के लिए सिपाहियों का एक दस्ता भेज दिया जाता था ।”*
अंगरेज़ों की इस नाजायज़ तिजारत के साथ जो जो ज़ुल्म
[व्यापार सम्बन्धी] और ज़बरदस्तियाँ होती थीं उनकी गवाही
[अत्याचार] अनेक अंगरेज़ लेखकों के बयानों से मिलती है।
जहाँ जहाँ कोई अंगरेज़ बैठकर इस तरह व्यापार
करता था, वहाँ वहाँ ही अंगरेज़ी झंडा और कम्पनी के कुछ
सिपाही उसके साथ रहते थे। वारन हेस्टिंग्स २५ अप्रैल सन्
१७६२ के एक पत्र में लिखता है :—
“जहाँ जहाँ मैं गया हूँ वहाँ वहाँ अनेक अंगरेज़ी झंडे लहराते हुए
देखकर मैं चकित रह गया हूँ × × × चाहे किसी भी अधिकार से ऐसा क्यों
- "The Company's servants, whose goods were thus conveyed entirely
free from duty, while those of all other merchants were heavily burdened,
were rapidly getting into their own hands the whole trade of the country, and
thus drying up one of the sources of the public revenue, When the Collec-
tors of these tolls, or transit duties, questioned the power of the Dustuck,
and stopped the goods, it was customary to send a party of Sepoys to seize
the offender and carry him prisoner to the nearest factory." Mill's History
of India, vol. iii, pp. 229, 230.
१५४ भारत में अंगरेज़ी राज
न कर लिया गया हो, मुझे विश्वास है कि जगह जगह इन झंडों की
मौजूदगी से नवाब की आमदनी, देश के अमन या हमारी क़ौम की इज़्ज़त
तीनों में से किसी को भी लाभ नहीं पहुँच सकता। × × × रास्ते में हमारे
सिपाहियों के व्यवहार के ख़िलाफ़ मुझसे अनेक शिकायतें की गईं। हम
लोगों के पहुँचते ही लोग अधिकांश छोटे क़स्बों और सरायों को ख़ाली छोड़
कर भाग जाते थे और दुकानों को बन्द कर देते थे, क्योंकि उन्हें हमसे भी
उसी तरह के व्यवहार का डर था।"*
वेरैल्स्ट नामक अंगरेज़ इस सम्बन्ध में हमें एक और नई बात
बताता है। वह लिखता है :—
"उन दिनों बहुत से काले (हिन्दोस्तानी) व्यापारी अपनी सुविधा के
लिए कम्पनी के किसी नौजवान मुहर्रिर को धन देकर उसका नाम ख़रीद
लेते थे और उसके नाम के 'दस्तक' के ज़रिए देश के लोगों को तंग करते
और उन पर ज़ुल्म करते थे। इस ज़रिए से इतनी ज़्यादा आमदनी होने लगी
कि कई नौजवान (अंगरेज़) मुहर्रिर १५ हज़ार और २० हज़ार रुपए साल
ख़र्च कर सकते थे, नफ़ीस कपड़े पहनते थे और रोज़ अच्छे से अच्छा खाना
उड़ाते थे।"
वह आगे चल कर लिखता है :—
*"I have been surprised to meet with several English flags flying in
places which I have passed: . . . . By whatever title they have been
assumed, I am sure their frequency can bode no good to the Navab's reve-
nues, the quiet of the country, or the honor of our nation . . . Many
complaints against them (Sepoys) were made me on the road; and most of
the petty towns and serais were deserted at our approach and the shops
shut up from the apprehensions of the same treatment from us." - Warren
Hastings in a letter to the President, dated Bhagalpur 25th April, 1762.
मीर क़ासिम १५५
"बिना महसूल दिए तिजारत की जाती थी और उसके जारी रखने में
बेहद ज़ुल्म किए जाते थे । × × × मीर क़ासिम के साथ लड़ाई की यही
उस समय वजह हुई ।"*
कम्पनी के डाइरेक्टरों तक ने ८ फ़रवरी सन् १७६४ के एक
पत्र में स्वीकार किया है कि "कम्पनी के नौकरों, गुमाश्तों, एजन्टों
और दूसरों की यह निजी तिजारत" "नाजायज़" थी, "दस्तक का
लज्जाजनक दुरुपयोग" थी, "हर तरह से अनधिकार युक्त" थी,
और नवाब और उसकी "क़ुदरती प्रजा" दोनों के साथ यह "दोहरा
अन्याय" था । किन्तु डाइरेक्टरों के इस पत्र के बाद भी इस
अन्याय में कोई कमी न पड़ी ।
उन सिपाहियों के ज़रिए, जो नवाब के पैसे से नियुक्त किए
गए थे, नवाब ही की प्रजा के ऊपर जिस जिस तरह के ज़ुल्म
किए जाते थे उनका कुछ अनुमान मीर क़ासिम के नाम बाकरगंज
के एक सरकारी कर्मचारी के २५ मई सन् १७६२ के पत्र से किया
जा सकता है । उसमें लिखा है :—
- "... At this time many black merchants found it expedient to purchase
the name of any young writer, in the Company's Service, by loans of money,
and under this sanction harassed and oppressed the natives. So plentiful a
supply was derived from this source that many young writers were enabled
to spend £s, 1,500 and £s. 2,000 per annum, were clothed in fine linen, and
fared sumptuously every day."
A trade was carried on without payment of duties, in the prosecution
of which infinite oppressions were committed. . . . This was the immediate
cause of the war with Mir Cassim."—Verelst's View of Bengal, pp. 8 and 46.