भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ भारत में अंगरेज़ी राज
सिराजुद्दौला ने एक बार कम्पनी को अलग टकसाल क़ायम
कम्पनी की करने से रोक दिया था। बाद में कुछ शर्तों
के साथ उसे इज़ाज़त देनी पड़ी, किन्तु इस
टकसाल पर भी सिराजुद्दौला के समय में कम्पनी की
टकसाल बंगाल में क़ायम न हो सकी। इतिहास लेखक और्म
लिखता है कि प्लासी के युद्ध के बाद कलकत्ते में कम्पनी की
टकसाल क़ायम हुई और १६ अगस्त १७५७ को पहले पहल कम्पनी
के नाम के रुपए ढाले गए। फिर भी तीन साल तक अंगरेज़ों
को इस टकसाल से अधिक लाभ न हो सका, क्योंकि बंगाल
भर में मुर्शिदाबाद के सरकारी रुपयों के सामने कम्पनी के रुपयों
को, उनमें चांदी कम होने के कारण, बिना बट्टे कहीं कोई न लेता
था। अब अंगरेज़ों को इस असुविधा के दूर करने का मौक़ा मिला।
२० अक्तूबर को गद्दी पर बैठते ही मीर क़ासिम ने कम्पनी के नाम
एक परवाना जारी किया, जिसमें उसने उन्हें अपनी कलकत्ते की
टकसाल में अशर्फ़ियाँ और रुपए ढालने की इजाज़त दी, इस शर्त
पर कि कम्पनी के सिक्के वज़न और धातु में मुर्शिदाबाद के
सरकारी सिक्कों के बिलकुल बराबर हों। इसके साथ साथ उसने
एक निहायत कड़ा हुकुम जारी कर दिया कि कोई सर्राफ़ या
सौदागर कलकत्ते के सिक्कों को लेने से इनकार न करे और न उन
पर किसी तरह का बट्टा माँगे।"
besides to send down to Calcutta, to help out the Company in their present
occasions there and at Madras . . . "-Vansittart and Caillaud in their
letter to the Select Committee at Fort William dated 21st October, 1760.