भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 392, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ें१४० भारत में अंगरेज़ी राज
“मीर क़ासिम ने शासन का सारा भार अपने ऊपर ले लिया और सेना
की पिछली तनख़्वाहों की बक़ाया अदा करने और सम्राट को बराबर ख़िराज
भेजते रहने का वादा किया। इस तरह २० अक्तूबर को सवेरे मीर जाफ़र
बंगाल की मसनद से अलग किया गया और उसकी जगह मीर क़ासिमअली
ख़ाँ के नाम की नौबत बजने लगी।”*
अंगरेज़ द्विभाषिया लशिंगटन के अनुसार मीर जाफ़र ने अन्त
में कर्नल केलो से जो कुछ कहा वह यह था :—
“आप ही लोगों ने मुझे मसनद पर बैठाया था, आप चाहें तो मुझे
उतार सकते हैं। आप लोगों ने अपने वादों को तोड़ना मुनासिब समझा।
मैंने अपने वादे नहीं तोड़े। अगर मेरे दिल में भी इसी तरह की चालें होतीं
और मैं चाहता तो बीस हज़ार फ़ौज जमा कर सकता था और आप से लड़
सकता था। मेरे बेटे मीरन ने मुझे इन सब बातों के बारे में पहले ही से
आगाह कर दिया था।”†
बंगाल की इस दूसरी बग़ावत का यह सारा बयान उस
बग़ावत के कर्त्ता धर्त्ता अंगरेज़ों ही की ज़बानी दिया गया है।
मीर जाफ़र के साथ इस व्यवहार को जायज़ क़रार देने के
[मीर जाफ़र पर] लिए उस पर कुछ न कुछ इलज़ाम लगाना
[झूठे दोष] आवश्यक था। १० नवम्बर सन् १७६० को
कलकत्ते में अंगरेज़ अफ़सरों की एक सभा हुई
जिसमें कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम मशहूर जालसाज़ हॉलवेल
- First Report 1772, p. 231.
† Malcolm's Life of Clive, vol. ii, p. 268.