सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

मीर जाफ़र ११६

जा चुकी है। उस क्रांति के बाद एक सन्धि की गई है जिससे कम्पनी को बड़े
ज़बरदस्त फ़ायदे हुए हैं। मुझे मालूम है कि इन सब बातों की तरफ़ एक
दर्जे तक (अंगरेज़) क़ौम का ध्यान आकर्षित हो चुका है। किन्तु मौक़ा मिलने
पर अभी बहुत कुछ और किया जा सकता है, बशर्ते कि कम्पनी इस तरह के
प्रयत्नों में लगी रहे जो उसके आज कल के इतने बड़े इलाक़े और आगे की
ज़बरदस्त सम्भावनाओं दोनों के अनुरूप हों। मैंने कम्पनी को अत्यन्त ज़ोरदार
शब्दों में इस बात की ज़रूरत दर्शा दी है कि उन्हें इतनी सेना हिन्दोस्तान
भेज देनी चाहिये और बराबर हिन्दोस्तान में रखनी चाहिये, जिससे वे अपने
धन और इलाक़े को बढ़ाने के सब से पहले मौक़े से फ़ायदा उठा सकें।
दो साल की मेहनत और तजरुबे से मैंने इस देश की हुकूमत के विषय
में और यहाँ के लोगों के स्वभाव के विषय में जो परिपक्व ज्ञान प्राप्त किया
है उससे मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि इस तरह का मौक़ा जल्दी ही
फिर आने वाला है। मौजूदा सूबेदार × × × बूढ़ा है और उसका नौजवान
बेटा इतना ज़ालिम और निकम्मा है और अंगरेज़ों का इतना खुला दुशमन
है कि इस नवाब के बाद उसे मसनद पर बैठने देना क़रीब क़रीब ख़तरनाक
होगा। केवल दो हज़ार यूरोपियनों की छोटी सी सेना हमें इन दोनों की ओर
से बेखटके कर देगी और यदि इनमें से कोई हमारे साथ झगड़ा करने की
हिम्मत करेगा तो इस सेना द्वारा हुकूमत की बाग़ हम अपने हाथों में ले सकेंगे।
"हिन्दोस्तान के लोगों को अपने राजाओं के साथ किसी तरह का प्रेम
नहीं है, इसलिए इस तरह का काम कर डालने में हमें और भी कम कठि-
नाई होगी × × ×
"किन्तु मुमकिन है, इतना बड़ा राज एक तिजारती कम्पनी के लिए बहुत

१२० भारत में अंग्रेज़ी राज
ज़्यादा हो जावे और मुझे डर है कि बिना अंगरेज़ क़ौम की सहायता के अकेली
कम्पनी इतने बड़े राज को क़ायम नहीं रख सकती × × × खूब सोचने की
बात है कि यह तमाम नक़्शा बिना अपनी मातृभूमि पर ख़र्च का बोझ डाले पूरा
किया जा सकता है, जबकि अमरीका में अपना राज क़ायम करने के लिए
इंगलिस्तान को बेहद ख़र्च बरदाश्त करना पड़ा था। इंगलिस्तान से एक छोटी
सी सेना इसलिए काफ़ी होगी क्योंकि हम जब जितने काले सिपाही चाहें
यहाँ जमा कर सकते हैं × × × मैं केवल इतना और कहूँगा कि मैंने सिवाय
आपके और किसी को यह बात नहीं लिखी; और मैं आपको भी कष्ट न देता
यदि मुझे इस बात का विश्वास न होता कि क़ौम के फ़ायदे की जो तज़वीज़
भी आपके सामने रक्खी जायगी, आप उसका अच्छी तरह स्वागत करेंगे। "*

  • "The great revolution that has been effected here by the success of
    the English arms, and the vast advantages gained to the Company by a
    treaty concluded in consequence thereof, have, I observe, in some measure
    engaged the public attention; but more may yet in time be done, if the
    Company will exert themselves in the manner the importance of their present
    possessions and future prospects deserves. I have represented to them in
    the strongest terms the expediency of sending out and keeping up constantly
    such a force as will enable them to embrace the first opportunity of further
    aggrandising themselves; and I dare pronounce, from a through knowledge
    of the Country Government, and of the genius of the peoples acquired from
    two years' application and experiences, that such an opportunity will soon
    occur. The reigning Soubah . . . is advanced in years; and his son is
    so cruel, worthless a young fellow, and so apparently an enemy to the
    English, that it will be almost unsafe trusting him with the succession. So
    small a body as two thousand Europeans will secure us against any appre-
    hensions from either the one or the other; and in case of their daring to be
    troublesome, enable the company to take the sovereignty upon themselves.
    "There will be less difficulty in bringing about such an event, as the
    natives themselves have no attachment whatever to particular princes. . .

मीर जाफ़र १२१
बंगाल के बल्कि आमतौर पर भारत के अन्दर अंगरेज़ों की उस
समय की योजनाओं का यह ख़ासा सुन्दर और सच्चा चित्र है।
इस पत्र से यह भी साबित है कि अंगरेज़ इस समय बंगाल में
मीर जाफ़र और मीरन दोनों के खिलाफ़ दूसरी बग़ावत खड़ी करने
का फ़ैसला कर चुके थे।
मीरन एक समझदार युवक था। अंगरेज़ों की चालों और
[मीरन की दूर-] नीयत को वह इस समय तक ख़ासा पहचान गया
[दर्शिता] था। मीर जाफ़र भी इन लोगों की दोस्ती से
बेज़ार हो चला था। ख़ासकर मीरन अपने बाप
को अक्सर सलाह दिया करता था कि किसी तरह इन लोगों
के पंजे से निकलने की कोशिश की जावे। यही वजह थी कि क्लाइव
"मसनद पर मीरन को बैठने देना ख़तरनाक" समझता था।
क्लाइव के बाद "ब्लैक होल" के क़िस्से का गढ़ने वाला मश-
हूर गप्पी हॉलवेल कलकत्ते का गवर्नर नियुक्त हुआ। पाँच महीने
बाद जुलाई सन् १७६० में हेनरी वन्सीटार्ट ने उसकी जगह ली।
"But so large a sovereignty may possibly be an object too extensive for
a mercantile company: and it is to be feared they are not of themselves able,
without the nation's assistance, to maintain so wide a dominion. . . . It
is well worthy consideration, that this project may be brought about without
draining the mother country, as has been too much the case with our posses-
sions in America. A small force from home will be sufficient, as we always
make sure of any number we please of black troops, . . . I shall only
further remark, that I have communicated it to no other person but yourself;
nor should I have troubled you, Sir, but from a conviction that you will
give a favourable reception to any proposal intended for the public good."
—Malcolm's Life of Clive, vol. ii, pp. 119 et seq.

१२२ भारत में अंगरेज़ी राज
केलो (Caillaud) बंगाल में कम्पनी की सेनाओं का प्रधान सेना-
पति नियुक्त हुआ ।
सन् १७५६ के अन्त में शहज़ादे अलीगौहर ने दूसरी बार
[पार्श्व टिप्पणी: सम्राट शाह आलम] बिहार पर चढ़ाई की । इस बीच बंगाल की
[पार्श्व टिप्पणी: की बंग यात्रा] अफ़सोसनाक हालत की और अनेक शिकायतें
मुग़ल दरबार तक पहुँच चुकी थीं । इसके सिवा
नाम को तो बंगाल अभी तक सम्राट के अधीन था, किन्तु आए
दिन की बग़ावतों के सबब बंगाल से दिल्ली खिराज जाना कई
साल से बन्द था । इन शिकायतों को दूर करना और शाही खिराज
वसूल करना शाहज़ादे की इस चढ़ाई का उद्देश था ।
शहज़ादे की सेना ने अभी बिहार प्रान्त में क़दम रक्खा ही था
कि शहज़ादे को सम्राट आलमगीर दूसरे की मृत्यु का समाचार
मिला । शाहज़ादा अलीगौहर अब दिल्ली से बाहर होते हुए भी,
शाहआलम दूसरे के नाम से सम्राट ऐलान हुआ और भारत-
सम्राट ही की हैसियत से उसने अब बिहार में प्रवेश किया । शाह
आलम अब मुग़ल साम्राज्य का अनन्य अधिपति था । उसकी
फ़रमांबरदारी हर सूबेदार, तमाम प्रजा और यूरोपियन व्यापारियों
सब पर वाजिब थी । किन्तु अंगरेज़ों की नीति उसकी तरफ़ कुछ
अजीब रही । एक तरफ़ उन्होंने मीर जाफ़र और मीरन दोनों
पर इस बात के लिए ज़ोर दिया कि आप लोग अपनी सेना सहित
पटने पहुँचकर सम्राट का मुक़ाबला कीजिए और सम्राट की सेना
के बिहार में प्रवेश करते ही करनल केलो फ़ौरन अपनी सेना सहित

मीर जाफ़र १२३
कलकत्ते से मुर्शिदाबाद की ओर बढ़ा और वहाँ से मीरन के अधीन
नवाब की कुछ सेना साथ लेकर १८ जनवरी सन् १७६० को सम्राट
की सेना के मुक़ाबले के लिए पटने की ओर रवाना हुआ। दूसरी
ओर अंगरेज़ों ने मीर जाफ़र और मीरन दोनों से ऊपर ऊपर शाह
आलम से गुप्त बातचीत शुरू कर दी।
अंगरेज़ों का शाह आलम से लड़ने के लिए तैयार हो जाना
[सम्राट के खिलाफ़] इतिहास लेखक मिल के शब्दों में "खुली बग़ावत
[खुली बग़ावत] थी।"* गवर्नर हॉलवेल यह भी लिखता है—
"शाह आलम ने अंगरेज़ों की सब शर्तें मंज़ूर
कर लेने की रज़ामन्दी प्रकट की।"† मालूम नहीं वे क्या शर्तें थीं
और बाद को उनका क्या हुआ।
करनल केलो ने अपने पत्रों में इस बात की शिकायत की है कि
मीरन ने सम्राट के विरुद्ध केलो का उस तरह साथ नहीं दिया जिस
तरह केलो चाहता था। निस्सन्देह मीर जाफ़र और मीरन दोनों सम्राट
से लड़ने के खिलाफ़ थे किन्तु केलों उन्हें लड़ाना चाहता था। इस
पर अंगरेज़ों और उन दोनों में ख़ासा मतभेद हो गया। अंगरेज़ों
और मीरन में पहले से भी भीतर ही भीतर वैमनस्य बढ़ रहा था।
मुर्शिदाबाद की सेना के पहुँचने से पहले ही "अंगरेज़ों का पक्का
हितसाधक" रामनारायन अपनी सेना लेकर शाह आलम के मुक़ा-
बले के लिए पटने से बाहर निकला। इस मामले में वह पूरी तरह

  • "To oppose him was undisguised rebellion." Mill, vol. iii. p. 202.
    † Ibid.

१२४ भारत में अंगरेज़ो राज
अंगरेज़ों के हाथों में खेल गया। सम्राट की सेना ने उसे हरा दिया।
और ज़ख़्मी करके पीछे हटा दिया और पटने का मोहासरा शुरू कर
दिया। १५ फ़रवरी को केलो और मीरन की सेनाएँ पटने पहुँचीं
सम्राट और अंगरेज़ों में गुप्त पत्र-व्यवहार जारी था। सम्राट की
सेना मोहासरे से हट गई। २२ फ़रवरी को दिल्ली और बंगाल की
सेनाओं में थोड़ी सी लड़ाई हुई जिसमें मीरन के कुछ चोट आई।
न जाने अंगरेज़ों ने सम्राट को क्या समझाया कि सम्राट की सेना
अब खुद बखुद वहाँ से मुड़कर मुर्शिदाबाद की ओर बढ़ी। मीरन
सम्राट की सेना का पीछा करने के खिलाफ़ था, किन्तु केलो ने
२६ फ़रवरी सन् १७६० को उसे पटना छोड़ने पर मजबूर किया।
निस्सन्देह मीरन और मीर जाफ़र दोनों को एक दर्जे तक मजबूरन्
अंगरेज़ों के इशारे पर चलना पड़ता था। चार अप्रैल को केलो
और मीरन की सेना मीर जाफ़र की सेना से आ मिली। ६ अप्रैल
को जब कि दिल्लो और बंगाल की सेनाएँ एक दूसरे के अत्यन्त
निकट आ गईं, केलो ने मीर जाफ़र पर फिर ज़ोर दिया कि आप
सम्राट की सेना पर हमला कीजिए, किन्तु मीर जाफ़र और मीरन
ने मंजूर न किया। तीन दिन के अन्दर सम्राट् की सेना फिर उसी
रास्ते बिहार की ओर लौट गई।
कम्पनी के डाइरेक्टरों के एक सरकारी पत्र में लिखा है कि
कुछ अंगरेज़ों ही ने कर्नल केलो पर यह इलज़ाम लगाया था कि
इस मौक़े पर केलो ने गुप्त तरीक़े से सम्राट को मरवा डालने का भी
उद्योग किया था, किन्तु वह सफल न हो सका।

मीर जाफ़र १२५
कर्नल केलो स्वयं मीर जाफ़र और मीरन की सेनाओं के साथ
[शाह आलम की] उन्हीं के ख़ेमों में ठहरा रहा और कप्तान नॉक्स
[अनिश्चितता] को उसने कुछ सेना सहित पटने की ओर भेजा।
यह सब वृत्तान्त हम ने कर्नल केलो के बयान के
आधार पर दिया है। मीरन और मीर जाफ़र दोनों को इस प्रकार
नज़रबन्द रखने का एक सबब यह भी था कि अंगरेज़ों को डर था
कि कहीं मीरन और मीर जाफ़र अंगरेज़ों के खिलाफ़ सम्राट से न
मिल जावें, और सम्राट से अपनी बातचीत का अंगरेज़ उन्हें पता
तक लगने देना न चाहते थे। सम्राट की सेना के सामने या तो पहले
से कोई निश्चित कार्यक्रम न था और या शाह आलम को राजधानी
के ख़ाली होने के कारण दिल्ली लौटने की जल्दी थी। जो कुछ रहा
हो, दो बार पटने पर चढ़ाई करके कप्तान नॉक्स के पहुँचते ही न
जाने सम्राट और अंगरेज़ों में क्या बातचीत हुई कि सम्राट की सेना
शहर का मोहासरा छोड़कर दिल्ली की ओर लौट गई।
कहा जाता है कि पूर्णिया का नबाब ख़ुद्दामहुसैन, जिसे मीर
[मीरन की हत्या] जाफ़र ने दो साल पहले युगलसिंह की जगह
वहाँ का नवाब नियुक्त किया था, अब अपनी
सेना सहित मीर जाफ़र के ख़िलाफ़ सम्राट की सहायता के लिए
आ रहा था। केलो और मीरन उसके मुक़ाबले के लिए बढ़े। मीरन
पूर्णिया के नवाब से लड़ना न चाहता था, किन्तु अंगरेज़ मीरन
को पूर्णिया के नवाब से लड़ाकर पूर्णिया के नवाब का भी नाश
करना चाहते थे। कम्पनी की सेना और पूर्णिया की सेना में कुछ

१२६ भारत में अंग्रेज़ी राज
लड़ाई हुई, किन्तु केलो का बयान है कि मीरन ने इस काम में
अंगरेज़ों को मदद न दी, इसीलिए अंगरेज़ पूर्णिया के नवाब पर
विजय प्राप्त न कर सके। दो जुलाई तक केलो और मीरन की सेनाएँ
साथ साथ नवाब पूर्णिया की सेना के पीछे पीछे चलती रहीं।
खुद्दामहुसेन पर दोबारा अकेले हमला करने की केलो की हिम्मत न
थी और मीरन इस में केलो का साथ देने को किसी तरह राज़ी न
था। केलो और मीरन में वैमनस्य बढ़ा। २ जुलाई की आधी रात
को मीर ज़ाफ़र का बेटा और मुर्शिदाबाद का युवराज मीरन एका-
एक अपने बिछौने पर मरा हुआ पाया गया। कह दिया गया कि
मीरन पर बिजली गिर पड़ी। सुप्रसिद्ध अंगरेज़ विद्वान एडमंड
बर्क ने पार्लिमेण्ट के सामने बड़ी सुन्दरता के साथ दिखलाया कि
यह कैसी विचित्र बिजली थी। जिस ख़ेमे के नीचे मीरन सो रहा
था उस पर या उसके कपड़े पर बिजली का ज़रा सा भी असर नहीं
हुआ और उसके नीचे सोया हुआ मीरन मर गया। बिजली के
गिरने की आम तौर पर बड़ी ज़बरदस्त आवाज़ होती है जो मीलों
तक सुनाई देती है। किन्तु जो बिजली मीरन पर गिरी उससे ख़ेमे
के चारों ओर सोए हुए लाखों सिपाहियों और दूसरे आदमियों में
से किसी एक की भी आँख न खुली। मीरन उस समय सचमुच
अंगरेज़ों के पहलू में एक काँटा था। इसमें कोई सन्देह नहीं हो
सकता कि मीरन को मार डाला गया और इस हत्या में कर्नल
केलो का ख़ास हाथ था। इस हत्या के ठीक एक महीने बाद हॉल-
वेल ने नये गवरनर वन्सीटार्ट को लिखा :—

मीर जाफ़र और मीरन
[ From the "History of Murshidabad", by Major Walsh

[This page is blank / contains no legible text]

मीर जाफ़र १२७
"दरबार में एक दल खड़ा हो गया था जिसके नेता नवाब का बेटा
मीरन और राजा राजवल्लभ थे। ये लोग अंगरेज़ों के जुए को अपने कंधों पर
से हटाने के लिए रोज़ तदबीरें सोचा करते थे और लगातार नवाब पर
ज़ोर देते रहते थे कि जब तक यह न हो सकेगा, तब तक नवाब की हुकूमत
केवल एक नाम की हुकूमत रहेगी।"*
समस्त सेना को पटने लौटा लाया गया और पटने लौट आने
तक मीरन की मृत्यु को उसकी सेना से छिपाकर रक्खा गया।
बंगाल और वहाँ की प्रजा की हालत इस समय अत्यन्त शोक
जनक थी। मुसलमान इतिहास लेखक मौ०
बंगाल की बदरुद्दीन अहमद उस समय की हालत को बयान
दर्दनाक हालत करते हुए लिखता है :—
"कम्पनी और उसके ख़ास ख़ास मुलाज़िमों से अलग अलग जो बड़े
बड़े वादे कर लिए गए थे, उन्हें पूरा करने में नाज़िम (मीर जाफ़र) के ख़जाने
का एक एक सिक्का दिया जा चुका था। बंगाल दिवालिया हो चुका था और
तेज़ी के साथ अराजकता की ओर बढ़ा चला जा रहा था। शाहज़ादे की चढ़ाई
से वहाँ की हालत और भी ख़राब हो गई थी, उससे नाज़िम की पूरी बेबसी
ज़ाहिर हो गई थी और कम्पनी को पता चल गया था कि बाहर के हमलों से
अपने इलाक़े की रक्षा करने के लिए नाज़िम हर तरह हमीं पर निर्भर है।"†

  • "A party was soon raised at the Durbar, headed by the Nawab's son,
    Miran, and Raja Rajebullab, who were daily planning schemes to shake off
    their dependence on the English, and continually urging to the Nawab, that
    until this was effected his government was a name only":—First Report, 1772,
    Appendix 9, p. 225.
    † Calendar of Persian correspondence, vol. iii, p. viii.

१२८ भारत में अंगरेज़ी राज
बंगाल की प्रजा ने अपनी गाढ़ी कमाई के पैसों से संचित
कम्पनी की मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने को अपनी आँखों के
व्यापार सम्बन्धी सामने दुलदुल कर विदेशियों के हाथों में जाते
ज़्यादती हुए देखा। आए दिन के संग्रामों और सैन्य
यात्राओं के कारण देश की कृषि पर मिट्टी छित गई
थी और उद्योग धन्धों का नाश हो रहा था। इस पर देश के एक एक
व्यापार के ऊपर कम्पनी ज़बरदस्ती अपना अधिकार जमाती जा रही
थी। मिसाल के लिए नमक, छालिया, इमारती लकड़ी, तम्बाकू,
सूखी मछली इत्यादि का व्यापार देशवासियों की रोज़ी और सूबे-
दार की आमदनी दोनों का उन दिनों एक ख़ास ज़रिया था। इसी-
लिए इस तरह की कई चीज़ों का व्यापार शुरू से यूरोपनिवासियों
के लिए इस देश में बन्द कर दिया गया था। विदेशी व्यापारियों
के नाम सम्राट की साफ़ आज्ञाएँ इस विषय में मौजूद थीं। फिर
भी प्लासी के फ़ौरन ही बाद अंगरेज़ों ने ये सब व्यापार ज़बरदस्ती
अपने हाथों में ले लिए। मीर जाफ़र ने मसनद पर बैठने के एक
महीने के अन्दर क्लाइव से इस ज़बरदस्ती की शिकायत की। कुछ
देर के लिए कुछ रोक थाम का भी ढोंग रचा गया, किन्तु अन्त
में किसी ने परवा न की। शोरे का ठेका कम्पनी को मिल ही चुका
था। इस सब से राज की आमदनी में बहुत बड़ी कमी होती जा
रही थी और प्रजा के अन्दर दुख, दरिद्रता और बदअमनी ज़ोरों
के साथ बढ़ती जा रही थी। इस पर तारीफ़ यह कि जब कभी
मीर जाफ़र अपने राज के आर्थिक, सैनिक या किसी प्रबन्ध में भी

[Header]
मीर जाफ़र १२६

किसी तरह का सुधार करना चाहता था तो उसे फ़ौरन रोक दिया
जाता था। मीर जाफ़र भी मसनद पर बैठने के चन्द महीने के
अन्दर अपनी बेबसी को समझने लगा था और अनुभव करने लगा
था कि अंगरेज़ों की नई मित्रता ने मुझे और मेरे देश दोनों को चुप-
चाप नाग के लपेटों की तरह जकड़ लिया है। सिराजुद्दौला के
साथ उसके विश्वासघात का फल अब मीर जाफ़र और उसकी
प्रजा दोनों को भोगना पड़ रहा था।
सिराजुद्दौला की हत्या को अभी तीन साल भी पूरे न हुए थे।
[हाशिया: बंगाल में दूसरी बग़ावत की तय्यारी] मीर जाफ़र ने जो सन्धि अंगरेज़ों के साथ की
थी उसकी तमाम शर्तों को वह अक्षरशः पूरा कर
चुका था। सन्धि से बाहर भी अनेक बेजा माँगें
पै दर पै मीर जाफ़र के सामने पेश की जा चुकी थीं और ज़बरदस्ती
पूरी कराई जा चुकी थीं। देश और प्रजा की यह हालत थी। इस
स्थिति में अपने सच्चे मित्र मीर जाफ़र को लात मार कर उसकी
जगह किसी और ऐसे मनुष्य को मसनद पर बैठाने के लिए,
जिसके द्वारा बंगाल को और अधिक सफलता के साथ चूसा जा
सके, अंगरेज़ों ने अब उस दूसरी बग़ावत के लिए तदबीरें शुरू
कर दीं जिसका इशारा ऊपर क्लाइव के एक पत्र में आ चुका है।
मीर जाफ़र एक बहुत बड़ी रक़म कम्पनी के नए गवर्नर
हॉलवेल को नक़द भेंट कर चुका था। फिर भी हॉलवेल पहले दिन
से इस दूसरी बग़ावत की धुन में था। मई सन् १७६० में गवर्नर
हॉलवेल और कर्नल केलो के बीच इस नए षड्यन्त्र के सम्बन्ध में
६

१३० भारत में अंगरेज़ी राज
गुप्त पत्र व्यवहार शुरू हो गया था। जुलाई में गवर्नर वन्सीटार्ट के
आने पर इस षड्यन्त्र ने शक्ल ली । हॉलवेल और केलो के उस
समय के बयानों में मीरन की मृत्यु का साफ़ इस तरह ज़िक्र आता
है, जिससे मालूम होता है कि मोरन की हत्या इसी षड्यन्त्र
का एक अंग थी। सितम्बर सन् १७६० में इस षड्यन्त्र को
अन्तिम रूप देने के लिए और मीर जाफ़र से छेड़ छाड़ शुरू करने
का बहाना ढूंढ़ने के लिए वन्सीटार्ट के सभापतित्व में कलकत्ते
में कई गुप्त सभाएँ हुईं । ११ सितम्बर की सभा की काररवाई
में दर्ज है :—
“करनाल क्लाइव की क्रांति से आज तक समय समय पर हमारा प्रभाव
कम्पनी की धन और बढ़ता गया है और उस प्रभाव को क़ायम रखने
धरती की प्यास के लिए हमें वैसे वैसे ही अपना सैन्यबल भी बढ़ाना
पड़ा है। अब हमारे पास एक हज़ार से ऊपर यूरोपियन
सिपाही और पाँच हज़ार हिन्दोस्तानी सिपाही हैं। इनका ख़र्च और
उसके साथ साथ सेना का ग़ैर मामूली ख़र्च मिलाकर इतना अधिक है कि जो
जागीरें हमें मिली हुई हैं उनकी सालाना आमदनी से किसी तरह पूरा नहीं
हो सकता । X X X
X X X X
“इसलिए नवाब से कहना चाहिये कि आप इससे कहीं ज़्यादा
सालाना आमदनी कम्पनी के नाम कर दें और इसके पूरे पूरे और ठीक ठीक
प्रबन्ध के लिए इस तरह के कुछ ज़िलों का अनन्य अधिकार कम्पनी को
दे दें जिनका हम बहुत आसानी से इन्तज़ाम कर सकें । x x x हम

मीर जाफ़र १३१
समझते हैं कि हमारी इस तरह की तजवीज़ के रास्ते में जितनी रुकावटें डाली
जा सकती हैं, सब अवश्य डाली जावेंगी । x x x
“ x x x इस सम्बन्ध में अपनी तमाम इच्छाओं की पूर्ति को पक्का कर
लेने का एक ऐसा अच्छा मौक़ा इस समय हमारे सामने है कि जैसा शायद
फिर कभी न आ सके, इस मौक़े से शक्ति और अधिकार दोनों हमें मिल
सकते हैं ।
“दूसरी मुख्य बात, जो हमें अपनी आज कल की नीति बदलने पर
विचार करने के लिए मजबूर करती है, धन की कमी है। यह कमी केवल
हम तक ही परिमित नहीं, बल्कि नीचे लिखी चीज़ें भी बहुत दर्जे तक उसी
पर निर्भर हैं :—
“समुद्रतट की कारवाइयाँ,
“पुदुदुचरी ( पौण्डिचरी ) का विजय करना, और
“अगले साल [ बम्बई, मद्रास और कलकत्ता ] तीनों प्रान्तों से माल
लाद कर इंगलिस्तान जहाज़ भेजने के लिए पहले से धन का प्रबन्ध ।*
यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि उस ज़माने में इंगलिस्तान
और हिन्दोस्तान के बीच की तिजारत का अर्थ यह नहीं था कि
इंगलिस्तान का बना हुआ कोई माल हिन्दोस्तान में लाकर बेचा


*"Our influence inc asing from time to time since the revolution
brought about by Colonel Clive, so have we been obliged to increase our
force to support that influ . We have now more than a thousand
Europeans, and five thousat Sepoys, which, with the contingent expenses of
an army, is far more than th revenues alloted for their maintenance. . . .
"It must therefore be proposed to the Nawab, to assign to the Com-
pany a much larger income, and to assign it in such a full and ample manner,

१३२ भारत में अंगरेजी राज
जावे। ईस्ट इंडिया कम्पनी इस उद्देश से नहीं बनी थी। न इंगलि-
स्तान के उद्योग धन्धों की उस समय यह हालत थी कि इंगलिस्तान
का बना हुआ कोई माल हिन्दोस्तान में लाकर बेचने का किसी को
स्वप्न में भी गुमान हो सकता। भारत से इंगलिस्तान की तिजारत
का अर्थ उस समय केवल यह था कि भारत के उन्नत उद्योग धन्धों
और यहाँ की आंतरिक तिजारत में किसी तरह भाग लिया जावे
और जिस तरह हो, व्यापार द्वारा या लूट द्वारा, यहाँ से माल और
धन लाद कर इंगलिस्तान भेजा जावे।
मीर जाफ़र पर किसी तरह का भी झूठा सच्चा दोष नहीं
[मीर जाफ़र से] लगाया जा सका, किन्तु अंगरेज़ कम्पनी के लिए
[नई माँगें] अपनी धन और धरती की प्यास को बुझाना
ज़रूरी था। कम्पनी की ओर से नई माँगें मीर
जाफ़र के सामने पेश की गईं। इन माँगों के विषय में इतिहास
लेखक मिल लिखता है :—
“मीर जाफ़र की हालत शुरू से ही शोकजनक थी। ख़ज़ाना लुट
चुका था, देश लुट चुका था, बड़े बड़े अनिवार्य ख़र्च उसके सामने थे और
by giving to the Company the sole right of such districts, as lay most con-
venient for our management . . . it is to be supposed, that such a
proposal would meet with all the difficulties that could possibly be thrown
in our way. . . .
“ . . . There seems now to offer such an opportunity of securing to
ourselves all we could wish in this respect, as likely may never happen again ;
an opportunity that will give us both power and right.
“ Another principal motive, that urges us to think of changing our

मीर जाफ़र १३३
इस पर कड़ी से कड़ी माँगें पूरी करने के लिए उसे मजबूर किया जाता
था x x x ।"*
मौलवी बदरुद्दीन अहमद ने लिखा है कि जो माँगें इस समय
अंगरेज़ों ने मीर जाफ़र के सामने पेश कीं उनमें एक यह भी थी
कि श्रीहट्ट (सिलहट) और इस्लामाबाद के इलाक़ों के 'फ़ौज-
दारी' के अधिकार कम्पनी को दे दिए जावें। मीर जाफ़र
इस हद तक जाने के लिए तैयार न था। उसने अपने विश्वस्त और
होशियार दामाद नौजवान मीर क़ासिम को अंगरेज़ों से बातचीत
करने के लिए कलकत्ते भेजा।
१५ सितम्बर सन् १७६० की गुप्त सभा में अंगरेज़ों ने तय
किया कि मीर क़ासिम और राजा दुर्लभराम इन
मीर क़ासिम के दोनों को भी इस नई साज़िश में शामिल कर
साथ गुप्त सन्धि लिया जावे और राजा दुर्लभराम की मार्फ़त
सम्राट शाह आलम को अपनी ओर करने की कोशिश की जावे।
यह भी तय हुआ कि कुछ मामूली लोगों को ख़ास ख़ास नौकरियों
system, is the want of money; a want that is not confined to ourselves alone,
but on which greatly depend,
"The operations on the cost,
"The reduction of Pondicherry, and
"The provision of an investment for loading home the next year's ships
at all the three presidencies."- Proceedings at Fort William, 11th September,
1760, First Report, 1712, pp. 228, 229.

  • "The situation of Jaffir was deplorable from the first. With an
    exhausted treasury and exhausted country, and vast engagements to dis-
    charge, he was urged to the severest exactions; . . . ."-Mill, vol. iii,
    pp. 213, 214.

१३४ भारत में अंगरेज़ी राज
के वादे देकर इस साज़िश में शामिल किया जावे और इस समय
उनसे रुपए वसूल कर लिए जावें। मीर क़ासिम से बात करने के
लिए गवर्नर वन्सीटार्ट और राजा दुर्लभराम से बात करने के लिए
हॉलवेल नियुक्त हुए। उसी रात को अलग अलग वन्सीटार्ट की
मीर क़ासिम से और हॉलवेल की राजा दुर्लभराम से बातचीत
हुई। अगले दिन गुप्त सभा में आकर वन्सीटार्ट और हॉलवेल दोनों
ने अपनी अपनी सफलता का हाल सुनाया। क़रीब दस दिन
शर्तों को तय करने इत्यादि में खर्च हुए। इतिहास लेखक मालेसन
लिखता है कि २७ सितम्बर को कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल और
मीर क़ासिम में एक गुप्त सन्धि हो गई, जिसमें यह तय हुआ कि
मीर क़ासिम को मुर्शिदाबाद दरबार का वज़ीर आज़म बना दिया
जाय, सूबेदारी के तमाम अधिकार मीर क़ासिम को दिला दिए
जावें और मीर जाफ़र को केवल 'सूबेदार' की सूखी उपाधि और
व्यक्तिगत ख़र्च के लिए एक सालाना रक़म बतौर पेन्शन ज़िन्दगी
भर मिलती रहे, अंगरेज़ों और मीर क़ासिम में स्थाई मित्रता
रहे, मीर क़ासिम को जब ज़रूरत हो अंगरेज़ अपनी सेना से उसकी
मदद करें, इसके बदले में मीर क़ासिम बर्धमान, मेदिनीपुर और
चट्टग्राम तीनों ज़िले हमेशा के लिए कम्पनी के नाम कर दे, जो
जवाहरात मीर जाफ़र ने कम्पनी के पास गिरवी रक्खे थे उन्हें मीर
क़ासिम नक़द रुपया देकर छुड़वा ले, सम्राट शाह आलम के साथ
अंगरेज़ या मीर क़ासिम बिना एक दूसरे से सलाह किए कोई
समझौता न करें, बंगाल, बिहार और उड़ीसा तीनों प्रान्तों

में से किसी में सम्राट के पैर न जमने दिए जावें, श्रीहट्ट ज़िले में
चूना ख़रीदने के लिए अंगरेज़ों को विशेष सुविधाएँ दी जावें । मीर
क़ासिम अधिकार मिलते ही इस उपकार के बदले में वन्सीटार्ट को
पाँच लाख रुपए, हॉलवेल को दो लाख सत्तर हज़ार और इसी
तरह कौन्सिल के अन्य सदस्यों में से किसी को ढाई लाख, किसी
को दो लाख इत्यादि कुल मिलाकर बीस लाख रुपए दे और इनके
अलावा पाँच लाख रुपए कम्पनी को बतौर क़र्ज़ दे । गवर्नर
वन्सीटार्ट उसकी कौन्सिल के अन्य सदस्यों और मीर क़ासिम,
सब के इस सन्धिपत्र पर दस्तख़त हो गए। यह वही मीर क़ासिम
था जिसे मीर जाफ़र ने अपना विश्वस्त प्रतिनिधि बनाकर अंगरेज़ों
के पास बातचीत के लिए भेजा था ।
३० सितम्बर को सौदा पक्का करके मीर क़ासिम कलकत्ते से
[मीर जाफ़र के] मुर्शिदाबाद के लिए रवाना हुआ । २ अक्तूबर
[महल पर रात को] को मीर जाफ़र पर दबाव डालने के लिए गवर्नर
[अचानक हमला] वन्सीटार्ट और उसके कुछ साथी कलकत्ते से
चले। मुर्शिदाबाद भागीरथी के एक ओर और
क़ासिम बाज़ार की कोठी दूसरी ओर थी । १५, १६ और १८ अक्तूबर
को वन्सीटार्ट और मीर जाफ़र में बातचीत हुई। मीर जाफ़र अंगरेज़ों
की नई तजवीज़ें और मीर क़ासिम के इरादों का हाल सुनकर घबरा
गया । उसने मीर क़ासिम के हाथों में शासन के अधिकार सौंपने
से इनकार कर दिया। मीर क़ासिम और अंगरेज़ों के लिए अब
पीछे हट सकना असम्भव था । २० अक्तूबर को सबेरे सूर्य निकलने

१३६ भारत में अंग्रेज़ी राज
से कुछ घंटे पहले कम्पनी की सेना ने अचानक मीर जाफ़र को
महल में सोते हुए जा घेरा। मीर जाफ़र की उस समय की
मानसिक स्थिति को मालेसन ने बड़े सुन्दर शब्दों में चित्रित करने
का यत्न किया है। वह लिखता है :—
“निस्सन्देह उस दिन प्रभात की महत्वपूर्ण घड़ी में बूढ़े नवाब को तीन
मीरजाफ़र का साल से कुछ अधिक पहले के उस दिन की अवश्य
दुःख और पश्चात्ताप याद आई होगी, जब कि प्लासी के मैदान में, इन्हीं
अंग्रेज़ों के साथ गुप्त समझौता करके उस मसनद के
लिए, जिसे अब उसका एक दूसरा सम्बन्धी उसी तरह के उपायों द्वारा उसके
हाथों से छीन रहा था, उसने अपने स्वामी और आत्मीय सिराजुद्दौला के साथ
विश्वासघात किया था। मीर जाफ़र अवश्य इस समय सोचता होगा कि—
‘जिस सत्ता को मैंने इतने नीच और कलंकित उपाय से प्राप्त किया था उससे
मुझे क्या लाभ पहुँचा ? मैंने सिराजुद्दौला से उसका महल छीना ! उस महल
में तीन साल तक नवाबी की ! किन्तु इन तीन साल के अंदर जो यातनाएं
मुझे सहनी पड़ीं उनके सामने मेरे जीवन के पहले ५८ साल के तमाम कष्ट
फीके हैं ! वे लोग, जिनके हाथ मैंने अपना मुल्क बेचा था, आज मुझे डर
दिखला रहे हैं ! यदि प्लासी में मैं अपने उस बालक सम्बन्धी के साथ
वफ़ादार रहा होता, जिसने अत्यन्त हसरत भरे शब्दों में मुझसे अपनी
पगड़ी की लाज रखने की प्रार्थना की थी तो इस समय मेरी स्थिति क्या
होती ? निस्सन्देह जो गुस्ताख़ विदेशी प्लासी से अब तक मुझ पर हुकुम
चलाते रहे और जो अब मुझे मसनद से उतारने की धमकी दे रहे हैं, यदि
प्लासी के मैदान में मैंने उनके नाश के मुख्य साधन बनने का यश प्राप्त कर