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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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१२८ भारत में अंगरेज़ी राज
बंगाल की प्रजा ने अपनी गाढ़ी कमाई के पैसों से संचित
कम्पनी की मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने को अपनी आँखों के
व्यापार सम्बन्धी सामने दुलदुल कर विदेशियों के हाथों में जाते
ज़्यादती हुए देखा। आए दिन के संग्रामों और सैन्य
यात्राओं के कारण देश की कृषि पर मिट्टी छित गई
थी और उद्योग धन्धों का नाश हो रहा था। इस पर देश के एक एक
व्यापार के ऊपर कम्पनी ज़बरदस्ती अपना अधिकार जमाती जा रही
थी। मिसाल के लिए नमक, छालिया, इमारती लकड़ी, तम्बाकू,
सूखी मछली इत्यादि का व्यापार देशवासियों की रोज़ी और सूबे-
दार की आमदनी दोनों का उन दिनों एक ख़ास ज़रिया था। इसी-
लिए इस तरह की कई चीज़ों का व्यापार शुरू से यूरोपनिवासियों
के लिए इस देश में बन्द कर दिया गया था। विदेशी व्यापारियों
के नाम सम्राट की साफ़ आज्ञाएँ इस विषय में मौजूद थीं। फिर
भी प्लासी के फ़ौरन ही बाद अंगरेज़ों ने ये सब व्यापार ज़बरदस्ती
अपने हाथों में ले लिए। मीर जाफ़र ने मसनद पर बैठने के एक
महीने के अन्दर क्लाइव से इस ज़बरदस्ती की शिकायत की। कुछ
देर के लिए कुछ रोक थाम का भी ढोंग रचा गया, किन्तु अन्त
में किसी ने परवा न की। शोरे का ठेका कम्पनी को मिल ही चुका
था। इस सब से राज की आमदनी में बहुत बड़ी कमी होती जा
रही थी और प्रजा के अन्दर दुख, दरिद्रता और बदअमनी ज़ोरों
के साथ बढ़ती जा रही थी। इस पर तारीफ़ यह कि जब कभी
मीर जाफ़र अपने राज के आर्थिक, सैनिक या किसी प्रबन्ध में भी