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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 384

१३२ भारत में अंगरेजी राज
जावे। ईस्ट इंडिया कम्पनी इस उद्देश से नहीं बनी थी। न इंगलि-
स्तान के उद्योग धन्धों की उस समय यह हालत थी कि इंगलिस्तान
का बना हुआ कोई माल हिन्दोस्तान में लाकर बेचने का किसी को
स्वप्न में भी गुमान हो सकता। भारत से इंगलिस्तान की तिजारत
का अर्थ उस समय केवल यह था कि भारत के उन्नत उद्योग धन्धों
और यहाँ की आंतरिक तिजारत में किसी तरह भाग लिया जावे
और जिस तरह हो, व्यापार द्वारा या लूट द्वारा, यहाँ से माल और
धन लाद कर इंगलिस्तान भेजा जावे।
मीर जाफ़र पर किसी तरह का भी झूठा सच्चा दोष नहीं
[मीर जाफ़र से] लगाया जा सका, किन्तु अंगरेज़ कम्पनी के लिए
[नई माँगें] अपनी धन और धरती की प्यास को बुझाना
ज़रूरी था। कम्पनी की ओर से नई माँगें मीर
जाफ़र के सामने पेश की गईं। इन माँगों के विषय में इतिहास
लेखक मिल लिखता है :—
“मीर जाफ़र की हालत शुरू से ही शोकजनक थी। ख़ज़ाना लुट
चुका था, देश लुट चुका था, बड़े बड़े अनिवार्य ख़र्च उसके सामने थे और
by giving to the Company the sole right of such districts, as lay most con-
venient for our management . . . it is to be supposed, that such a
proposal would meet with all the difficulties that could possibly be thrown
in our way. . . .
“ . . . There seems now to offer such an opportunity of securing to
ourselves all we could wish in this respect, as likely may never happen again ;
an opportunity that will give us both power and right.
“ Another principal motive, that urges us to think of changing our