भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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के वादे देकर इस साज़िश में शामिल किया जावे और इस समय
उनसे रुपए वसूल कर लिए जावें। मीर क़ासिम से बात करने के
लिए गवर्नर वन्सीटार्ट और राजा दुर्लभराम से बात करने के लिए
हॉलवेल नियुक्त हुए। उसी रात को अलग अलग वन्सीटार्ट की
मीर क़ासिम से और हॉलवेल की राजा दुर्लभराम से बातचीत
हुई। अगले दिन गुप्त सभा में आकर वन्सीटार्ट और हॉलवेल दोनों
ने अपनी अपनी सफलता का हाल सुनाया। क़रीब दस दिन
शर्तों को तय करने इत्यादि में खर्च हुए। इतिहास लेखक मालेसन
लिखता है कि २७ सितम्बर को कलकत्ते की अंगरेज़ कौन्सिल और
मीर क़ासिम में एक गुप्त सन्धि हो गई, जिसमें यह तय हुआ कि
मीर क़ासिम को मुर्शिदाबाद दरबार का वज़ीर आज़म बना दिया
जाय, सूबेदारी के तमाम अधिकार मीर क़ासिम को दिला दिए
जावें और मीर जाफ़र को केवल 'सूबेदार' की सूखी उपाधि और
व्यक्तिगत ख़र्च के लिए एक सालाना रक़म बतौर पेन्शन ज़िन्दगी
भर मिलती रहे, अंगरेज़ों और मीर क़ासिम में स्थाई मित्रता
रहे, मीर क़ासिम को जब ज़रूरत हो अंगरेज़ अपनी सेना से उसकी
मदद करें, इसके बदले में मीर क़ासिम बर्धमान, मेदिनीपुर और
चट्टग्राम तीनों ज़िले हमेशा के लिए कम्पनी के नाम कर दे, जो
जवाहरात मीर जाफ़र ने कम्पनी के पास गिरवी रक्खे थे उन्हें मीर
क़ासिम नक़द रुपया देकर छुड़वा ले, सम्राट शाह आलम के साथ
अंगरेज़ या मीर क़ासिम बिना एक दूसरे से सलाह किए कोई
समझौता न करें, बंगाल, बिहार और उड़ीसा तीनों प्रान्तों