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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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मीर जाफ़र १२६

किसी तरह का सुधार करना चाहता था तो उसे फ़ौरन रोक दिया
जाता था। मीर जाफ़र भी मसनद पर बैठने के चन्द महीने के
अन्दर अपनी बेबसी को समझने लगा था और अनुभव करने लगा
था कि अंगरेज़ों की नई मित्रता ने मुझे और मेरे देश दोनों को चुप-
चाप नाग के लपेटों की तरह जकड़ लिया है। सिराजुद्दौला के
साथ उसके विश्वासघात का फल अब मीर जाफ़र और उसकी
प्रजा दोनों को भोगना पड़ रहा था।
सिराजुद्दौला की हत्या को अभी तीन साल भी पूरे न हुए थे।
[हाशिया: बंगाल में दूसरी बग़ावत की तय्यारी] मीर जाफ़र ने जो सन्धि अंगरेज़ों के साथ की
थी उसकी तमाम शर्तों को वह अक्षरशः पूरा कर
चुका था। सन्धि से बाहर भी अनेक बेजा माँगें
पै दर पै मीर जाफ़र के सामने पेश की जा चुकी थीं और ज़बरदस्ती
पूरी कराई जा चुकी थीं। देश और प्रजा की यह हालत थी। इस
स्थिति में अपने सच्चे मित्र मीर जाफ़र को लात मार कर उसकी
जगह किसी और ऐसे मनुष्य को मसनद पर बैठाने के लिए,
जिसके द्वारा बंगाल को और अधिक सफलता के साथ चूसा जा
सके, अंगरेज़ों ने अब उस दूसरी बग़ावत के लिए तदबीरें शुरू
कर दीं जिसका इशारा ऊपर क्लाइव के एक पत्र में आ चुका है।
मीर जाफ़र एक बहुत बड़ी रक़म कम्पनी के नए गवर्नर
हॉलवेल को नक़द भेंट कर चुका था। फिर भी हॉलवेल पहले दिन
से इस दूसरी बग़ावत की धुन में था। मई सन् १७६० में गवर्नर
हॉलवेल और कर्नल केलो के बीच इस नए षड्यन्त्र के सम्बन्ध में
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