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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

११० भारत में अंगरेज़ी राज
बल को तोड़ना था। इसलिए रामनारायन पर अभी और मुसीबतों
का आना बाक़ी था।
दूसरा हिन्दू नरेश, जिस पर मीर जाफ़र और क्लाइव की नज़र
[हाशिया: राजा रामरमसिंह] गई, उड़ीसा का राजा रामरमसिंह था ।
[हाशिया: पर हमला] उड़ीसा भी बिहार के समान बंगाल के
सूबेदार के अधीन था। क्लाइव जिस समय
मुर्शिदाबाद में था, मीर जाफ़र ने राजा रामरमसिंह को अपने
प्रान्त की मालगुज़ारी का हिसाब समझाने के बहाने मुर्शिदाबाद
बुलवा भेजा। रामरमसिंह को सन्देह हुआ, उसने खुद न
आकर अपने एक भाई और एक भतीजे को हिसाब की किताबों
सहित मुर्शिदाबाद भेज दिया। ये दोनों मुर्शिदाबाद पहुँचते ही
क़ैद कर लिए गए। राजा रामरमसिंह का सन्देह सच्चा साबित
हुआ। रामरमसिंह साहसी था, वह यह भी समझता था कि
मुर्शिदाबाद के दरबार की असली बाग क्लाइव के हाथों में है।
उसने फ़ौरन मीर जाफ़र के इस व्यवहार की शिकायत करते हुए
क्लाइव को लिखा—"मैंने एक ज़बरदस्त सेना जमा कर ली है,
जिसमें २,००० सवार और ५००० पैदल हैं और यदि नया नवाब
मुझे गिरफ़्तार करने या दबाने के लिए सेना भेजने की ग़लती
करेगा, तो मैं उसके मुक़ाबले के लिए काफ़ी हूँ, किन्तु यदि आप
मध्यस्थ होकर मेरी सलामती का ज़िम्मा लें तो मैं खुद आकर
मीर जाफ़र से मिलने और एक लाख रुपए नज़राना पेश करने के
लिए तैयार हूँ।"

क्लाइव समझ गया कि रामरमसिंह से भिड़ना अभी ठीक
नहीं। क्लाइव के कहने पर रामरमसिंह के दोनों रिश्तेदार तुरन्त
छोड़ दिए गए और उड़ीसा की गद्दी पर रामरमसिंह को बहाल
रक्खा गया।
तीसरा हिन्दू नरेश, जिसके बल को क्लाइव और मीर जाफ़र
[पार्श्व-शीर्षक: राजा युगलसिंह] ने तोड़ने का इरादा किया, पूर्णिया का राजा
[पार्श्व-शीर्षक: पर हमला] युगलसिंह था। सिराजुद्दौला ने अपने रिश्तेदार
शौकत जंग की मृत्यु पर युगलसिंह को उस
प्रान्त का शासक नियुक्त किया था। मीर जाफ़र युगलसिंह
को हटाकर उसकी जगह अपने एक आदमी खुद्दामहुसेन को वहाँ
का नवाब बनाना चाहता था। युगलसिंह मुक़ाबले के लिए तैयार
होगया। कम्पनी और सूबेदार की सेनाओं ने मिल कर पूर्णिया पर
चढ़ाई की। युगलसिंह गिरफ़्तार कर लिया गया और खुद्दामहुसेन
पूर्णिया की गद्दी पर बैठा दिया गया।
इसके बाद मीर जाफ़र ने अपने हाल के मददगार राजा
[पार्श्व-शीर्षक: राजा दुर्लभराम] दुर्लभराम को मिटाना चाहा। राजा दुर्लभराम
[पार्श्व-शीर्षक: पर हमला] मुर्शिदाबाद के दरबार में माल के महकमे का
हाकिम था। मीर जाफ़र के ऊपर उसके अनेक
अहसान थे। सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ साज़िश में उसने अंग्रेज़ों
और मीर जाफ़र को मदद दी थी। किन्तु उसका बल और प्रभाव
दोनों खूब बढ़े हुए थे। इसीलिए उसके नाश की तदबीरें सोची
गईं। वह कमर कस कर मुक़ाबले को तैयार हो गया। अंग्रेज़

११२ भारत में अंगरेज़ी राज
उसके असर को देख कर डर गए। तुरन्त स्वयं वाट्स ने बीच में
पड़कर मीर जाफ़र और दुर्लभराम दोनों में सुलह करवा दी।
इस तमाम छेड़ छाड़ से क्लाइव का मुख्य उद्देश बंगाल के
तमाम पुराने और बड़े बड़े घरानों के बल को तोड़ना, मीर जाफ़र
को समस्त प्रजा में अप्रिय बना देना और सूबेदारी भर में अंगरेज़ों
के बल और उनके प्रभाव की धाक जमा देना था।
राजा रामनारायन पर एक विशाल सेना लेकर दोबारा चढ़ाई
करने की तजवीज़ की गई। अफ़वाह उड़ी या
राजा रामनारायन उड़ाई गई कि अलवर्दी ख़ाँ की बूढ़ी बेवा ने अवध
पर चढ़ाई के नवाब वज़ीर को पत्र लिखा है कि आप आकर
मीर जाफ़र के विरुद्ध रामनारायन को मदद दीजे। क्लाइव और
मीर जाफ़र के लिए केवल चन्द महीने पहले की सन्धि और दोनों
ओर की क़समों को मिट्टी में मिलाकर अब फिर बिहार प्रान्त पर
चढ़ाई करना और रामनारायन को ज़ेर करना ज़रूरी हो गया।
क्लाइव ने इस बहाने से ५०,००० सेना जमा कर ली। मीर जाफ़र
को डर दिखलाकर उससे धन खींचने का भी क्लाइव को यह अपूर्व
अवसर दिखाई दिया। किन्तु मीर जाफ़र की माली हालत इस
समय बहुत ख़राब थी। अव्वल तो मुर्शिदाबाद के ख़ज़ाने की जो
दशा उसने प्लासी से पहले समझ रक्खी थी वह प्लासी के बाद न
निकली। इस ख़ज़ाने की आशा पर ही उसने अंगरेज़ कम्पनी को
अलग और क्लाइव और उसके अनेक साथियों को व्यक्तिगत
हैसियत से अलग बड़ी बड़ी रक़में देने के वादे कर रक्खे थे।

मीर जाफ़र ११३
जिसमें से अधिकांश वह इस समय तक दे भी चुका था। दूसरे
इन्हीं रक़मों के कारण उसकी स्थिति इतनी ख़राब हो गई थी कि
फ़ौज की कई महीने को तनख़्वाहें उसके ज़िम्मे चढ़ गई थीं जिससे
फ़ौज में बदअमनी बढ़ती जा रही थी।
लाचार होकर मीर जाफ़र ने यह प्रार्थना की कि कम्पनी का जो
देना मेरे ज़िम्मे बाक़ी रह गया है, उसमें कुछ
• मीर जाफ़र से धन कमी कर दी जावे। मालूम होता है कि क्लाइव
की वसूली ने उसे इसकी आशा भी दिला रक्खी थी।
इसी उद्देश से मीर जाफ़र ने कई बार बड़ी बड़ी रक़में बतौर
रिशवत क्लाइव की भेंट कीं। इन रक़मों के सम्बन्ध में सन् १७७२
ई० में पार्लिमेण्ट की एक कमेटी के सामने गवाही देते हुए क्लाइव ने
कहा था कि—“नवाब की दरियादिली ने सहज ही में मुझे धनवान
बना दिया है।”*
किन्तु कमी करना तो दूर रहा, ऐन उस मौक़े पर जब कि
बिहार पर चढ़ाई करने की पूरी तैयारी हो गई, क्लाइव ने कम्पनी
की एक एक पाई चुकवाए बिना क़दम उठाने से इनकार कर दिया।
पिछली रक़मों के अलावा और भी नई नई रक़में इस अवसर पर
मीर जाफ़र से तलब की गईं। क्लाइव का बल इस समय तक खूब
बढ़ गया था। उसके पास पचास हज़ार सेना मीर जाफ़र को
कुचलने के लिए मौजूद थी। मीर जाफ़र को तरह तरह के डर

  • "The Nawab's generosity had made his fortune easy."—Clive before
    the Parliamentary Committee in 1777.
    ८

११४ भारत में अंगरेज़ी राज
दिखाए गए। उसे लाचार होकर झुकना पड़ा। इतिहास लेखक
मैलकम लिखता है कि इस अवसर पर :—
'एक रक़म सेना के गैरमामूली ख़र्च के लिए वसूल कर ली गई। जो
ज़मीनें कम्पनी को दी गई थीं उनके परवाने बाक़ायदा जारी कराए गए।
(दरबार से) हुकुम जारी कराए गए कि नवाब के पहले छै महीने के क़र्ज़ों
की तमाम बक़ाया तुरन्त चुका दी जावे। बाक़ी तमाम क़र्ज़ों को चुकाने के
लिए उस समय तक, जब तक कि क़र्ज़ा पूरा न हो जावे, वर्धमान, नदिया
और हुगली तीन ज़िलों की सरकारी मालगुज़ारी कम्पनी के नाम करा ली
गई। क्लाइव ने कम्पनी के डाइरेक्टरों के नाम ८ फ़रवरी सन् १७५८ के पत्र
में लिखा—'इससे अब हमारे क़र्ज़ का चुकाया जाना नवाब के हाथों से
बिलकुल स्वतन्त्र हो गया है x x x ।'"*
हमें याद रखना चाहिये कि इस क़र्ज़ में एक कौड़ी ऐसी न थी
जो कम्पनी ने या किसी अंगरेज़ ने कभी मीर जाफ़र को सचमुच
क़र्ज़ दी हो। यह वह धन था जो मीर जाफ़र ने मसनद के बदले
में अंगरेज़ों को देने का वादा कर लिया था।
क्लाइव और मीर जाफ़र अब ५०००० सेना के साथ पटने की

  • "A supply of money was procured for the extraordinary expenses of
    the army; the perwannah, or grant of lands yielded to the Company, was
    passed in all its forms; orders were issued for the immediate discharge of all
    arrears on the first six months of the Nawab's debt, and the revenues of
    Burdwan, Nuddea and Hugli assigned over for payment of the rest :—'So
    that,' says Clive, writing [ 8th February, 1758 ] to the Court of Directors,
    'the discharge of the debt is now become independent of the Nawab. ......' "
    —Malcolm's Life of Clive vol. i, 338

मीर जाफ़र ११५
[ओर बढ़े।] चार महीने से ऊपर यह भारी सेना मैदान में रही,
[राजा रामनारायन] इसका सारा ख़र्च मीर जाफ़र पर पड़ा, किन्तु
[से समझौता] गोली एक भी न चलने पाई। क्लाइव इस समय
मीर जाफ़र को ख़ासा चकमा दे रहा था।
रामनारायन जैसे आदमी को सदा के लिए अपना शत्रु बना लेना
अंगरेज़ों के लिए हितकर न था। क्लाइव का उद्देश इस समय राम-
नारायन पर कम्पनी के बल का सिक्का जमाना, उसे मोर जाफ़र
की ओर से सशंक कर देना, उससे धन वसूल करना और अंत
में स्वयं मध्यस्थ बनकर रामनारायन के हक़ में फ़ैसला करा देना
मालूम होता था।
२३ फ़रवरी सन् १७५८ को पटने में दरबार हुआ। क्लाइव ने
मध्यस्थ का आसन लिया। मीर जाफ़र का बेटा मीरन नाम के
लिए बिहार का नवाब बनाया गया और शासन का तमाम अधि-
कार मीरन के नायब की हैसियत से ज्यों का त्यों राजा रामनारायन
के हाथों में छोड़ दिया गया। इस अनुग्रह के बदले में रामनारायन
से ७ लाख रुपए नक़द वसूल किए गए। इतिहास लेखक और्म
लिखता है कि—"क्लाइव की जो मुराद थी, वह सब पूरी हो
गई।”* कुछ दिनों बाद के एक पत्र में क्लाइव ने रामनारायन को
“अंगरेज़ों का पक्का हितसाधक” लिखा है।
क्लाइव अपने मालिकों को भो नहीं भूला। उन दिनों जितना
शोरा बंगाल में बिकता था, सब पटने से ऊपर के प्रदेश में तैयार

  • Orme, vol. ii, p. 283.

११६ भारत में अंगरेज़ी राज
होता था। क्लाइव ने अब नवाब पर ज़ोर देकर शोरा तैयार कराने
का ठेका कम्पनी के नाम हासिल कर लिया, जिससे कम्पनी का
व्यापार और बढ़ गया।
मई सन् १७५८ ई० में क्लाइव मुर्शिदाबाद लौटा। कुछ दिनों
बाद मीर जाफ़र भी अपनी राजधानी वापस पहुँच गया।
थोड़े दिनों बाद मीर जाफ़र और रामनारायण दोनों पर एक
[हाशिया: शाहज़ादे अली-] और नई आफ़त टूटी। जिस तरह मीरन केवल
[हाशिया: गौहर की बिहार] नाम के लिए बिहार का नवाब बना दिया गया
[हाशिया: यात्रा] था उसी तरह एक अरसे से दिल्ली सम्राट् के
ज्येष्ठ पुत्र को नाम मात्र के लिए बंगाल, बिहार
और उड़ीसा का सूबेदार कहा जाता था। वास्तव में शहज़ादे का
यह खिताब केवल एक मान सूचक खिताब था और मुर्शिदाबाद के
क्रियात्मक सूबेदार सम्राट् के अधीन सूबेदारी के सब फ़र्ज़ अदा
करते थे। इस समय शहज़ादा अलीगोहर अपने खिताब को सार्थक
करने के लिए सेना सहित बंगाल की ओर बढ़ा। इसमें सन्देह
नहीं, बंगाल को हाल को बग़ावत, अंगरेज़ों और मीर जाफ़र के
अन्याय और प्रजा को शोकजनक हालत इन सब की ख़बर सम्राट्
के दरबार तक पहुँच चुकी थी, और शहज़ादे के आने का इन बातों
के साथ अवश्य कुछ न कुछ सम्बन्ध था। जो हो, मीर जाफ़र
शहज़ादे के आने का समाचार पाते हो डर गया, उसने क्लाइव से
मदद चाही। क्लाइव फ़ौरन एक ज़बरदस्त फ़ौज और मीरन को
साथ लेकर मुर्शिदाबाद से पटने की ओर बढ़ा। शहज़ादा उस

मीर जाफ़र ११७

समय तक पटने पहुँच चुका था और रामनरायन ने अपने विनम्र
व्यवहार से शहज़ादे को प्रसन्न कर लिया था। क्लाइव और मीरन के
पहुँचने पर कहते हैं, मुर्शिदाबाद की सेना और शहज़ादे की सेना
में कुछ लड़ाई भी हुई। मालूम नहीं इस लड़ाई का होना कहाँ तक
सच है। मुर्शिदाबाद की सेना का शहज़ादे की ज़बरदस्त सेना पर
विजय प्राप्त कर सकना बिल्कुल नामुमकिन था। उस समय
के उल्लेखों से ज़ाहिर है कि क्लाइव ने शहज़ादे के सामने अपनी
राजभक्ति का पूरा प्रदर्शन कर शहज़ादे को अपनी ओर करने का
भरसक प्रयत्न किया और अंत में कुछ समझौता हो गया। शहज़ादा
मय अपनी सेना के दिल्ली की ओर लौट गया और मीर जाफ़र का
डर कुछ समय के लिए दूर हो गया।
मुर्शिदाबाद पहुँच कर इस उपकार के बदले में क्लाइव ने मीर
[हाशिया: क्लाइव को] जाफ़र से अपने लिए साम्राज्य के 'उमरा' का
[हाशिया: जागीर] ख़िताब और एक जागीर प्राप्त की। जो ज़मींदारी
कलकत्ते के आस पास कम्पनी को मिली हुई थी
उसके मालकाने के रूप में कम्पनी को हर साल तीन लाख रुपए
नवाब की सरकार में जमा कराने पड़ते थे। अब से यह सब ज़मी-
दारी “क्लाइव की निजी जागीर” बन गई और बजाय मुर्शिदाबाद
की सरकार के क्लाइव ख़ुद इस तीन लाख सालाना का कम्पनी
से हक़दार हो गया। क्लाइव इस समय सचमुच एक हिन्दोस्तानी
नवाब बना हुआ था।
क्लाइव की इस “जागीर” का जिसे अपने असहाय “गधे”

११= भारत में अंगरेज़ी राज
मीर जाफ़र से हथिया लेना उसके लिए कुछ भी कठिन न था,
अंगरेज़ इतिहास लेखक बड़े अभिमान के साथ ज़िक्र करते हैं ।
बंगाल की मसनद के बदले में मीर जाफ़र ने जितना धन
अंगरेज़ों को देने का वादा किया था उसकी एक
सब से धनवान एक पाई वसूल की जा चुकी थी । व्यापार के
अंगरेज़ लिए बंगाल में अनेक नई रियायतें कम्पनी को
नवाब से मिल चुकी थीं और इन बाक़ायदा रियायतों के अलावा
अनेक चीज़ों की तिजारत का ठेका कम्पनी ने ज़बरदस्ती अपने
हाथों में ले रक्खा था । तीनों प्रान्तों में अंगरेज़ों के छल और बल
दोनों का सिक्का जम चुका था । क्लाइव जो कुछ साल पहले एक
निर्धन क्लर्क की हैसियत से भारत आया था, इस समय शायद
संसार में सब से अधिक धनवान अंगरेज़ था । इस तरह बहुत हद
तक अपना मतलब पूरा कर फ़रवरी सन् १७६० में क्लाइव अपनी
जन्मभूमि इंगलिस्तान के लिए रवाना हो गया ।
किन्तु अपनी क़ौम के लिए क्लाइव की इच्छाएँ और उमंगें अभी
बेहद बढ़ी हुई थीं । उसके नीचे लिखे पत्र से
भारत में अंगरेज़ी मालूम होता है कि भारत में अंगरेज़ी राज क़ायम
राज क़ायम करने करने के विषय में उसका दिमाग़ किस तरह
की क्लाइव की काम कर रहा था । ७ जनवरी सन् १७५६ को
योजना इंगलिस्तान के प्रधान मंत्री विलियम पिट के
नाम क्लाइव ने यह पत्र लिखा :—
अंगरेज़ी फ़ौज की कामयाबी के ज़रिये एक महान क्रांति इस देश में की

मीर जाफ़र ११६

जा चुकी है। उस क्रांति के बाद एक सन्धि की गई है जिससे कम्पनी को बड़े
ज़बरदस्त फ़ायदे हुए हैं। मुझे मालूम है कि इन सब बातों की तरफ़ एक
दर्जे तक (अंगरेज़) क़ौम का ध्यान आकर्षित हो चुका है। किन्तु मौक़ा मिलने
पर अभी बहुत कुछ और किया जा सकता है, बशर्ते कि कम्पनी इस तरह के
प्रयत्नों में लगी रहे जो उसके आज कल के इतने बड़े इलाक़े और आगे की
ज़बरदस्त सम्भावनाओं दोनों के अनुरूप हों। मैंने कम्पनी को अत्यन्त ज़ोरदार
शब्दों में इस बात की ज़रूरत दर्शा दी है कि उन्हें इतनी सेना हिन्दोस्तान
भेज देनी चाहिये और बराबर हिन्दोस्तान में रखनी चाहिये, जिससे वे अपने
धन और इलाक़े को बढ़ाने के सब से पहले मौक़े से फ़ायदा उठा सकें।
दो साल की मेहनत और तजरुबे से मैंने इस देश की हुकूमत के विषय
में और यहाँ के लोगों के स्वभाव के विषय में जो परिपक्व ज्ञान प्राप्त किया
है उससे मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि इस तरह का मौक़ा जल्दी ही
फिर आने वाला है। मौजूदा सूबेदार × × × बूढ़ा है और उसका नौजवान
बेटा इतना ज़ालिम और निकम्मा है और अंगरेज़ों का इतना खुला दुशमन
है कि इस नवाब के बाद उसे मसनद पर बैठने देना क़रीब क़रीब ख़तरनाक
होगा। केवल दो हज़ार यूरोपियनों की छोटी सी सेना हमें इन दोनों की ओर
से बेखटके कर देगी और यदि इनमें से कोई हमारे साथ झगड़ा करने की
हिम्मत करेगा तो इस सेना द्वारा हुकूमत की बाग़ हम अपने हाथों में ले सकेंगे।
"हिन्दोस्तान के लोगों को अपने राजाओं के साथ किसी तरह का प्रेम
नहीं है, इसलिए इस तरह का काम कर डालने में हमें और भी कम कठि-
नाई होगी × × ×
"किन्तु मुमकिन है, इतना बड़ा राज एक तिजारती कम्पनी के लिए बहुत

१२० भारत में अंग्रेज़ी राज
ज़्यादा हो जावे और मुझे डर है कि बिना अंगरेज़ क़ौम की सहायता के अकेली
कम्पनी इतने बड़े राज को क़ायम नहीं रख सकती × × × खूब सोचने की
बात है कि यह तमाम नक़्शा बिना अपनी मातृभूमि पर ख़र्च का बोझ डाले पूरा
किया जा सकता है, जबकि अमरीका में अपना राज क़ायम करने के लिए
इंगलिस्तान को बेहद ख़र्च बरदाश्त करना पड़ा था। इंगलिस्तान से एक छोटी
सी सेना इसलिए काफ़ी होगी क्योंकि हम जब जितने काले सिपाही चाहें
यहाँ जमा कर सकते हैं × × × मैं केवल इतना और कहूँगा कि मैंने सिवाय
आपके और किसी को यह बात नहीं लिखी; और मैं आपको भी कष्ट न देता
यदि मुझे इस बात का विश्वास न होता कि क़ौम के फ़ायदे की जो तज़वीज़
भी आपके सामने रक्खी जायगी, आप उसका अच्छी तरह स्वागत करेंगे। "*

  • "The great revolution that has been effected here by the success of
    the English arms, and the vast advantages gained to the Company by a
    treaty concluded in consequence thereof, have, I observe, in some measure
    engaged the public attention; but more may yet in time be done, if the
    Company will exert themselves in the manner the importance of their present
    possessions and future prospects deserves. I have represented to them in
    the strongest terms the expediency of sending out and keeping up constantly
    such a force as will enable them to embrace the first opportunity of further
    aggrandising themselves; and I dare pronounce, from a through knowledge
    of the Country Government, and of the genius of the peoples acquired from
    two years' application and experiences, that such an opportunity will soon
    occur. The reigning Soubah . . . is advanced in years; and his son is
    so cruel, worthless a young fellow, and so apparently an enemy to the
    English, that it will be almost unsafe trusting him with the succession. So
    small a body as two thousand Europeans will secure us against any appre-
    hensions from either the one or the other; and in case of their daring to be
    troublesome, enable the company to take the sovereignty upon themselves.
    "There will be less difficulty in bringing about such an event, as the
    natives themselves have no attachment whatever to particular princes. . .

मीर जाफ़र १२१
बंगाल के बल्कि आमतौर पर भारत के अन्दर अंगरेज़ों की उस
समय की योजनाओं का यह ख़ासा सुन्दर और सच्चा चित्र है।
इस पत्र से यह भी साबित है कि अंगरेज़ इस समय बंगाल में
मीर जाफ़र और मीरन दोनों के खिलाफ़ दूसरी बग़ावत खड़ी करने
का फ़ैसला कर चुके थे।
मीरन एक समझदार युवक था। अंगरेज़ों की चालों और
[मीरन की दूर-] नीयत को वह इस समय तक ख़ासा पहचान गया
[दर्शिता] था। मीर जाफ़र भी इन लोगों की दोस्ती से
बेज़ार हो चला था। ख़ासकर मीरन अपने बाप
को अक्सर सलाह दिया करता था कि किसी तरह इन लोगों
के पंजे से निकलने की कोशिश की जावे। यही वजह थी कि क्लाइव
"मसनद पर मीरन को बैठने देना ख़तरनाक" समझता था।
क्लाइव के बाद "ब्लैक होल" के क़िस्से का गढ़ने वाला मश-
हूर गप्पी हॉलवेल कलकत्ते का गवर्नर नियुक्त हुआ। पाँच महीने
बाद जुलाई सन् १७६० में हेनरी वन्सीटार्ट ने उसकी जगह ली।
"But so large a sovereignty may possibly be an object too extensive for
a mercantile company: and it is to be feared they are not of themselves able,
without the nation's assistance, to maintain so wide a dominion. . . . It
is well worthy consideration, that this project may be brought about without
draining the mother country, as has been too much the case with our posses-
sions in America. A small force from home will be sufficient, as we always
make sure of any number we please of black troops, . . . I shall only
further remark, that I have communicated it to no other person but yourself;
nor should I have troubled you, Sir, but from a conviction that you will
give a favourable reception to any proposal intended for the public good."
—Malcolm's Life of Clive, vol. ii, pp. 119 et seq.

१२२ भारत में अंगरेज़ी राज
केलो (Caillaud) बंगाल में कम्पनी की सेनाओं का प्रधान सेना-
पति नियुक्त हुआ ।
सन् १७५६ के अन्त में शहज़ादे अलीगौहर ने दूसरी बार
[पार्श्व टिप्पणी: सम्राट शाह आलम] बिहार पर चढ़ाई की । इस बीच बंगाल की
[पार्श्व टिप्पणी: की बंग यात्रा] अफ़सोसनाक हालत की और अनेक शिकायतें
मुग़ल दरबार तक पहुँच चुकी थीं । इसके सिवा
नाम को तो बंगाल अभी तक सम्राट के अधीन था, किन्तु आए
दिन की बग़ावतों के सबब बंगाल से दिल्ली खिराज जाना कई
साल से बन्द था । इन शिकायतों को दूर करना और शाही खिराज
वसूल करना शाहज़ादे की इस चढ़ाई का उद्देश था ।
शहज़ादे की सेना ने अभी बिहार प्रान्त में क़दम रक्खा ही था
कि शहज़ादे को सम्राट आलमगीर दूसरे की मृत्यु का समाचार
मिला । शाहज़ादा अलीगौहर अब दिल्ली से बाहर होते हुए भी,
शाहआलम दूसरे के नाम से सम्राट ऐलान हुआ और भारत-
सम्राट ही की हैसियत से उसने अब बिहार में प्रवेश किया । शाह
आलम अब मुग़ल साम्राज्य का अनन्य अधिपति था । उसकी
फ़रमांबरदारी हर सूबेदार, तमाम प्रजा और यूरोपियन व्यापारियों
सब पर वाजिब थी । किन्तु अंगरेज़ों की नीति उसकी तरफ़ कुछ
अजीब रही । एक तरफ़ उन्होंने मीर जाफ़र और मीरन दोनों
पर इस बात के लिए ज़ोर दिया कि आप लोग अपनी सेना सहित
पटने पहुँचकर सम्राट का मुक़ाबला कीजिए और सम्राट की सेना
के बिहार में प्रवेश करते ही करनल केलो फ़ौरन अपनी सेना सहित

मीर जाफ़र १२३
कलकत्ते से मुर्शिदाबाद की ओर बढ़ा और वहाँ से मीरन के अधीन
नवाब की कुछ सेना साथ लेकर १८ जनवरी सन् १७६० को सम्राट
की सेना के मुक़ाबले के लिए पटने की ओर रवाना हुआ। दूसरी
ओर अंगरेज़ों ने मीर जाफ़र और मीरन दोनों से ऊपर ऊपर शाह
आलम से गुप्त बातचीत शुरू कर दी।
अंगरेज़ों का शाह आलम से लड़ने के लिए तैयार हो जाना
[सम्राट के खिलाफ़] इतिहास लेखक मिल के शब्दों में "खुली बग़ावत
[खुली बग़ावत] थी।"* गवर्नर हॉलवेल यह भी लिखता है—
"शाह आलम ने अंगरेज़ों की सब शर्तें मंज़ूर
कर लेने की रज़ामन्दी प्रकट की।"† मालूम नहीं वे क्या शर्तें थीं
और बाद को उनका क्या हुआ।
करनल केलो ने अपने पत्रों में इस बात की शिकायत की है कि
मीरन ने सम्राट के विरुद्ध केलो का उस तरह साथ नहीं दिया जिस
तरह केलो चाहता था। निस्सन्देह मीर जाफ़र और मीरन दोनों सम्राट
से लड़ने के खिलाफ़ थे किन्तु केलों उन्हें लड़ाना चाहता था। इस
पर अंगरेज़ों और उन दोनों में ख़ासा मतभेद हो गया। अंगरेज़ों
और मीरन में पहले से भी भीतर ही भीतर वैमनस्य बढ़ रहा था।
मुर्शिदाबाद की सेना के पहुँचने से पहले ही "अंगरेज़ों का पक्का
हितसाधक" रामनारायन अपनी सेना लेकर शाह आलम के मुक़ा-
बले के लिए पटने से बाहर निकला। इस मामले में वह पूरी तरह

  • "To oppose him was undisguised rebellion." Mill, vol. iii. p. 202.
    † Ibid.

१२४ भारत में अंगरेज़ो राज
अंगरेज़ों के हाथों में खेल गया। सम्राट की सेना ने उसे हरा दिया।
और ज़ख़्मी करके पीछे हटा दिया और पटने का मोहासरा शुरू कर
दिया। १५ फ़रवरी को केलो और मीरन की सेनाएँ पटने पहुँचीं
सम्राट और अंगरेज़ों में गुप्त पत्र-व्यवहार जारी था। सम्राट की
सेना मोहासरे से हट गई। २२ फ़रवरी को दिल्ली और बंगाल की
सेनाओं में थोड़ी सी लड़ाई हुई जिसमें मीरन के कुछ चोट आई।
न जाने अंगरेज़ों ने सम्राट को क्या समझाया कि सम्राट की सेना
अब खुद बखुद वहाँ से मुड़कर मुर्शिदाबाद की ओर बढ़ी। मीरन
सम्राट की सेना का पीछा करने के खिलाफ़ था, किन्तु केलो ने
२६ फ़रवरी सन् १७६० को उसे पटना छोड़ने पर मजबूर किया।
निस्सन्देह मीरन और मीर जाफ़र दोनों को एक दर्जे तक मजबूरन्
अंगरेज़ों के इशारे पर चलना पड़ता था। चार अप्रैल को केलो
और मीरन की सेना मीर जाफ़र की सेना से आ मिली। ६ अप्रैल
को जब कि दिल्लो और बंगाल की सेनाएँ एक दूसरे के अत्यन्त
निकट आ गईं, केलो ने मीर जाफ़र पर फिर ज़ोर दिया कि आप
सम्राट की सेना पर हमला कीजिए, किन्तु मीर जाफ़र और मीरन
ने मंजूर न किया। तीन दिन के अन्दर सम्राट् की सेना फिर उसी
रास्ते बिहार की ओर लौट गई।
कम्पनी के डाइरेक्टरों के एक सरकारी पत्र में लिखा है कि
कुछ अंगरेज़ों ही ने कर्नल केलो पर यह इलज़ाम लगाया था कि
इस मौक़े पर केलो ने गुप्त तरीक़े से सम्राट को मरवा डालने का भी
उद्योग किया था, किन्तु वह सफल न हो सका।

मीर जाफ़र १२५
कर्नल केलो स्वयं मीर जाफ़र और मीरन की सेनाओं के साथ
[शाह आलम की] उन्हीं के ख़ेमों में ठहरा रहा और कप्तान नॉक्स
[अनिश्चितता] को उसने कुछ सेना सहित पटने की ओर भेजा।
यह सब वृत्तान्त हम ने कर्नल केलो के बयान के
आधार पर दिया है। मीरन और मीर जाफ़र दोनों को इस प्रकार
नज़रबन्द रखने का एक सबब यह भी था कि अंगरेज़ों को डर था
कि कहीं मीरन और मीर जाफ़र अंगरेज़ों के खिलाफ़ सम्राट से न
मिल जावें, और सम्राट से अपनी बातचीत का अंगरेज़ उन्हें पता
तक लगने देना न चाहते थे। सम्राट की सेना के सामने या तो पहले
से कोई निश्चित कार्यक्रम न था और या शाह आलम को राजधानी
के ख़ाली होने के कारण दिल्ली लौटने की जल्दी थी। जो कुछ रहा
हो, दो बार पटने पर चढ़ाई करके कप्तान नॉक्स के पहुँचते ही न
जाने सम्राट और अंगरेज़ों में क्या बातचीत हुई कि सम्राट की सेना
शहर का मोहासरा छोड़कर दिल्ली की ओर लौट गई।
कहा जाता है कि पूर्णिया का नबाब ख़ुद्दामहुसैन, जिसे मीर
[मीरन की हत्या] जाफ़र ने दो साल पहले युगलसिंह की जगह
वहाँ का नवाब नियुक्त किया था, अब अपनी
सेना सहित मीर जाफ़र के ख़िलाफ़ सम्राट की सहायता के लिए
आ रहा था। केलो और मीरन उसके मुक़ाबले के लिए बढ़े। मीरन
पूर्णिया के नवाब से लड़ना न चाहता था, किन्तु अंगरेज़ मीरन
को पूर्णिया के नवाब से लड़ाकर पूर्णिया के नवाब का भी नाश
करना चाहते थे। कम्पनी की सेना और पूर्णिया की सेना में कुछ

१२६ भारत में अंग्रेज़ी राज
लड़ाई हुई, किन्तु केलो का बयान है कि मीरन ने इस काम में
अंगरेज़ों को मदद न दी, इसीलिए अंगरेज़ पूर्णिया के नवाब पर
विजय प्राप्त न कर सके। दो जुलाई तक केलो और मीरन की सेनाएँ
साथ साथ नवाब पूर्णिया की सेना के पीछे पीछे चलती रहीं।
खुद्दामहुसेन पर दोबारा अकेले हमला करने की केलो की हिम्मत न
थी और मीरन इस में केलो का साथ देने को किसी तरह राज़ी न
था। केलो और मीरन में वैमनस्य बढ़ा। २ जुलाई की आधी रात
को मीर ज़ाफ़र का बेटा और मुर्शिदाबाद का युवराज मीरन एका-
एक अपने बिछौने पर मरा हुआ पाया गया। कह दिया गया कि
मीरन पर बिजली गिर पड़ी। सुप्रसिद्ध अंगरेज़ विद्वान एडमंड
बर्क ने पार्लिमेण्ट के सामने बड़ी सुन्दरता के साथ दिखलाया कि
यह कैसी विचित्र बिजली थी। जिस ख़ेमे के नीचे मीरन सो रहा
था उस पर या उसके कपड़े पर बिजली का ज़रा सा भी असर नहीं
हुआ और उसके नीचे सोया हुआ मीरन मर गया। बिजली के
गिरने की आम तौर पर बड़ी ज़बरदस्त आवाज़ होती है जो मीलों
तक सुनाई देती है। किन्तु जो बिजली मीरन पर गिरी उससे ख़ेमे
के चारों ओर सोए हुए लाखों सिपाहियों और दूसरे आदमियों में
से किसी एक की भी आँख न खुली। मीरन उस समय सचमुच
अंगरेज़ों के पहलू में एक काँटा था। इसमें कोई सन्देह नहीं हो
सकता कि मीरन को मार डाला गया और इस हत्या में कर्नल
केलो का ख़ास हाथ था। इस हत्या के ठीक एक महीने बाद हॉल-
वेल ने नये गवरनर वन्सीटार्ट को लिखा :—

मीर जाफ़र और मीरन
[ From the "History of Murshidabad", by Major Walsh

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मीर जाफ़र १२७
"दरबार में एक दल खड़ा हो गया था जिसके नेता नवाब का बेटा
मीरन और राजा राजवल्लभ थे। ये लोग अंगरेज़ों के जुए को अपने कंधों पर
से हटाने के लिए रोज़ तदबीरें सोचा करते थे और लगातार नवाब पर
ज़ोर देते रहते थे कि जब तक यह न हो सकेगा, तब तक नवाब की हुकूमत
केवल एक नाम की हुकूमत रहेगी।"*
समस्त सेना को पटने लौटा लाया गया और पटने लौट आने
तक मीरन की मृत्यु को उसकी सेना से छिपाकर रक्खा गया।
बंगाल और वहाँ की प्रजा की हालत इस समय अत्यन्त शोक
जनक थी। मुसलमान इतिहास लेखक मौ०
बंगाल की बदरुद्दीन अहमद उस समय की हालत को बयान
दर्दनाक हालत करते हुए लिखता है :—
"कम्पनी और उसके ख़ास ख़ास मुलाज़िमों से अलग अलग जो बड़े
बड़े वादे कर लिए गए थे, उन्हें पूरा करने में नाज़िम (मीर जाफ़र) के ख़जाने
का एक एक सिक्का दिया जा चुका था। बंगाल दिवालिया हो चुका था और
तेज़ी के साथ अराजकता की ओर बढ़ा चला जा रहा था। शाहज़ादे की चढ़ाई
से वहाँ की हालत और भी ख़राब हो गई थी, उससे नाज़िम की पूरी बेबसी
ज़ाहिर हो गई थी और कम्पनी को पता चल गया था कि बाहर के हमलों से
अपने इलाक़े की रक्षा करने के लिए नाज़िम हर तरह हमीं पर निर्भर है।"†

  • "A party was soon raised at the Durbar, headed by the Nawab's son,
    Miran, and Raja Rajebullab, who were daily planning schemes to shake off
    their dependence on the English, and continually urging to the Nawab, that
    until this was effected his government was a name only":—First Report, 1772,
    Appendix 9, p. 225.
    † Calendar of Persian correspondence, vol. iii, p. viii.