भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमीर जाफ़र ११७
समय तक पटने पहुँच चुका था और रामनरायन ने अपने विनम्र
व्यवहार से शहज़ादे को प्रसन्न कर लिया था। क्लाइव और मीरन के
पहुँचने पर कहते हैं, मुर्शिदाबाद की सेना और शहज़ादे की सेना
में कुछ लड़ाई भी हुई। मालूम नहीं इस लड़ाई का होना कहाँ तक
सच है। मुर्शिदाबाद की सेना का शहज़ादे की ज़बरदस्त सेना पर
विजय प्राप्त कर सकना बिल्कुल नामुमकिन था। उस समय
के उल्लेखों से ज़ाहिर है कि क्लाइव ने शहज़ादे के सामने अपनी
राजभक्ति का पूरा प्रदर्शन कर शहज़ादे को अपनी ओर करने का
भरसक प्रयत्न किया और अंत में कुछ समझौता हो गया। शहज़ादा
मय अपनी सेना के दिल्ली की ओर लौट गया और मीर जाफ़र का
डर कुछ समय के लिए दूर हो गया।
मुर्शिदाबाद पहुँच कर इस उपकार के बदले में क्लाइव ने मीर
[हाशिया: क्लाइव को] जाफ़र से अपने लिए साम्राज्य के 'उमरा' का
[हाशिया: जागीर] ख़िताब और एक जागीर प्राप्त की। जो ज़मींदारी
कलकत्ते के आस पास कम्पनी को मिली हुई थी
उसके मालकाने के रूप में कम्पनी को हर साल तीन लाख रुपए
नवाब की सरकार में जमा कराने पड़ते थे। अब से यह सब ज़मी-
दारी “क्लाइव की निजी जागीर” बन गई और बजाय मुर्शिदाबाद
की सरकार के क्लाइव ख़ुद इस तीन लाख सालाना का कम्पनी
से हक़दार हो गया। क्लाइव इस समय सचमुच एक हिन्दोस्तानी
नवाब बना हुआ था।
क्लाइव की इस “जागीर” का जिसे अपने असहाय “गधे”