भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 368, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ें११= भारत में अंगरेज़ी राज
मीर जाफ़र से हथिया लेना उसके लिए कुछ भी कठिन न था,
अंगरेज़ इतिहास लेखक बड़े अभिमान के साथ ज़िक्र करते हैं ।
बंगाल की मसनद के बदले में मीर जाफ़र ने जितना धन
अंगरेज़ों को देने का वादा किया था उसकी एक
सब से धनवान एक पाई वसूल की जा चुकी थी । व्यापार के
अंगरेज़ लिए बंगाल में अनेक नई रियायतें कम्पनी को
नवाब से मिल चुकी थीं और इन बाक़ायदा रियायतों के अलावा
अनेक चीज़ों की तिजारत का ठेका कम्पनी ने ज़बरदस्ती अपने
हाथों में ले रक्खा था । तीनों प्रान्तों में अंगरेज़ों के छल और बल
दोनों का सिक्का जम चुका था । क्लाइव जो कुछ साल पहले एक
निर्धन क्लर्क की हैसियत से भारत आया था, इस समय शायद
संसार में सब से अधिक धनवान अंगरेज़ था । इस तरह बहुत हद
तक अपना मतलब पूरा कर फ़रवरी सन् १७६० में क्लाइव अपनी
जन्मभूमि इंगलिस्तान के लिए रवाना हो गया ।
किन्तु अपनी क़ौम के लिए क्लाइव की इच्छाएँ और उमंगें अभी
बेहद बढ़ी हुई थीं । उसके नीचे लिखे पत्र से
भारत में अंगरेज़ी मालूम होता है कि भारत में अंगरेज़ी राज क़ायम
राज क़ायम करने करने के विषय में उसका दिमाग़ किस तरह
की क्लाइव की काम कर रहा था । ७ जनवरी सन् १७५६ को
योजना इंगलिस्तान के प्रधान मंत्री विलियम पिट के
नाम क्लाइव ने यह पत्र लिखा :—
अंगरेज़ी फ़ौज की कामयाबी के ज़रिये एक महान क्रांति इस देश में की