भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
सम्राट जहाँगीर से सर टामसरो की भेंट
By the Courtesy of the curator Victoria Memorial.
भारत में अंगरेज़ी राज
पहला अध्याय
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश
अत्यन्त प्राचीन काल से भारतवर्ष मानव जाति की सभ्यता
[हाशिया: चार सौ साल पहले] और उसकी उन्नति का एक विशेष स्रोत रहा है
[हाशिया: भारत और यूरोप] और पृथ्वी की विविध जातियों के विकास में एक
[हाशिया: का सम्बन्ध] महत्वपूर्ण भाग लेता रहा है। आज से दो तीन
सौ साल पहले तक यह देश हर तरह स्वाधीन
था, और ज्ञान, विज्ञान, विद्या-प्रचार, कला-कौशल, शासन-प्रधान
इत्यादि में संसार के समस्त देशों का शिरोमणि था। उस समय
यूरोप का कोई देश सभ्यता के किसी अङ्ग में भी भारत की बराबरी
न कर सकता था। धनधान्य की दृष्टि से भारतवर्ष उस समय
२ भारत में अंगरेज़ी राज
संसार का सब से अधिक धनवान देश माना जाता था। ईसा की
अठारवीं सदी तक यह देश संसार भर के यात्रियों के लिए एक
अपूर्व चमत्कार की जगह, कवियों के लिए उनकी उच्चतम कल्पनाओं
का एक विषय और धन-लोलुप जातियों के लिए उनकी लालसा का
मुख्यतम पदार्थ बना हुआ था। सैकड़ों और हज़ारों वर्षों तक समस्त
यूरोप, बल्कि समस्त संसार के बाज़ारों और मंडियों में अच्छे से
अच्छे रेशमी और सूती कपड़े, ज़ेवर, बरतन और तरह तरह के अन्य
अद्भुत पदार्थ हिन्दोस्तान के बने हुए ही दिखाई पड़ते थे। संसार
के व्यापारियों को उस समय भारतीय धन और भारतीय वैभव के
ही स्वप्न दिखाई देते थे, और इस भारतीय धन का लालच ही यूरोप
निवासियों को इस प्राचीन देश की ओर खींच कर लाया। वास्तव में
बहुत दरजे तक भारत का यह प्राचीन धन-वैभव ही इस देश की
समस्त आपत्तियों का मूल कारण हुआ।
चार सौ साल पहले तक भारत और यूरोप के बीच का
समस्त व्यापार अरब और ईरान के सौदागरों के ज़रिए होता
था। ये साहसी सौदागर भारत के पच्छिमी तट पर भारत के
क़ीमती माल से अपने जहाज़ लादते थे, फिर अरब और ईरान की
खाड़ियों से होकर उस माल को अपने देशों में ले जाते थे, और फिर
वहाँ से अधिकतर खुश्की के रास्ते ऊँटों और गाड़ियों पर लाद कर
उसे यूरोप और अफ़रीका के तमाम देशों में पहुँचाते थे। यूरोप
में व्यापार की सब से बड़ी मंडियाँ उस समय इतालिया (इटली)
देश के वेनिस, जेनोआ आदि बन्दरगाहों में थीं और वहाँ ही से
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ३
जमा होकर भारत, ईरान आदि एशियाई देशों का बना हुआ माल
यूरोप के सब देशों में पहुँचता था। समुद्र के रास्ते यूरोप से
भारतवर्ष आने जाने का मार्ग उस समय किसी को मालूम न था।
न उस समय कोई यूरोपियन जाति इतनी बलवान या इतनी
धनवान थी और न यूरोप से बाहर का कोई ग़ैर-ईसाई मुल्क उस
समय किसी यूरोपियन ईसाई जाति के अधीन था।
ईसा की पन्द्रवीं सदी में कुछ साहसी यूरोपनिवासियों के
दिलों में भारत का जल-मार्ग ढूंढ़ निकालने की
[भारत के जलमार्ग] उत्कण्ठा उत्पन्न हुई, इसके दो ख़ास सबब थे।
[की खोज] एक यह कि स्थल-मार्ग से माल के लाने लेजाने
में अनेक असुविधाएँ झेलनी पड़ती थीं। बीच में कई जगह माल
को उतारना और फिर से लादना पड़ता था। कई कई जगह
पुलों पर, सड़कों पर और मंडियों में चुङ्गी देनी होती थी। सड़कें
कहीं अच्छी थीं तो कहीं ख़राब और कहीं बिलकुल न थीं। मार्ग में
डाकुओं और जंगली जानवरों का भय रहता था। देर अधिक
लगती थी और लागत इतनी आ जाती थी कि विशेष कर यूरोप
के उत्तर और पच्छिम के हिस्सों तक पहुँचते पहुँचते माल के दाम
बहुत बढ़ जाते थे। दूसरा यह कि यूरोप के अंदर एशियाई माल
का समस्त व्यापार उन दिनों प्रायः इतालिया के सौदागरों के हाथों
में था, जिनकी कमाई को देख देख कर उत्तर और पच्छिम की यूरो-
पियन जातियों की स्पर्धा और उनको धन-लोलुपता और अधिक
भड़कती थी।
४ भारत में अंग्रेज़ी राज
सब से पहले स्पेन, पुर्तगाल, हॉलैण्ड (ओलन्दाज़), इङ्गलिस्तान
और फ्रांस इन पाँच देशों के लोगों ने एक दूसरे के बाद जल-मार्ग
से भारत पहुँचने के प्रयत्न शुरू किए। ये प्रयत्न सौ साल से
ऊपर तक जारी रहे। भूगोल का ज्ञान और दिशाओं का बोध भी
उन दिनों यूरोपनिवासियों को आज जैसा न था। भारत पहुँचने
के लिए कोई वीर अपना जहाज़ लेकर उत्तर की ओर बढ़ा चला
जाता था, कोई उत्तर-पूरब की ओर, कोई उत्तर-पच्छिम की ओर,
कोई पच्छिम की ओर और कोई दक्खिन की ओर। नतीजा यह
हुआ कि इनमें से अधिकांश प्रयत्न निष्फल गए, जिनमें बहुत सी
जानें गईं, अनेक जहाज़ बरबाद हुए और काफी धन नष्ट हुआ।
फिर भी इन कष्टों और विपत्तियों में साहसी यूरोपनिवासियों ने
हिम्मत न हारी और स्पेन, पुर्तगाल, हॉलैण्ड, इङ्गलिस्तान तथा
फ्रांस के नाविकों के दरमियान भारत का जल-मार्ग ढूंढ़ निकालने
के लिए लाग डाट बराबर बढ़ती गई।
सब से पहला यूरोपियन नाविक, जिसने इस बात का बीड़ा
[हाशिया: भारत की खोज] उठाया, इतालिया का रहने वाला सुप्रसिद्ध
[हाशिया: में कोलम्बस] कोलम्बस था। स्पेन के राजा ने कोलम्बस को
बड़ी मदद दी। भारत पहुँचने के लिए वह
यूरोप से ठीक पच्छिम की ओर बढ़ा चला गया। उसका जहाज़
सन् १४९२ ई० में अमरीका के किनारे जा लगा। अमरीका महाद्वीप
का पता लगाने और उससे आजकल के यूरोप का सम्बन्ध जोड़ने
का श्रेय कोलम्बस को प्राप्त हुआ, जिसका प्रभाव यूरोप और संसार
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कालीकट-नरेश सामुरी से वास्को-डे-गामा की भेंट
[ From Major Basu's Rise of the Christian Power in India. 2nd edition. ]
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ५
के बाद के जीवन पर ख़ासा ज़बरदस्त पड़ा । किन्तु भारत का
जल-मार्ग ढूंढ निकालने की दृष्टि से कोलम्बस का प्रयत्न बिलकुल
निष्फल गया । यह एक ख़ास बात है कि कोलम्बस मरते समय
तक अमरीका ही को हिन्दोस्तान समझता रहा और उसी भ्रम के
सिलसिले में आज तक यूरोपनिवासी अमरीका के पुराने
बाशिन्दों को "इण्डियन्स" या "रेड इण्डियन्स" और अमरीका
के पास के टापुओं को "वेस्ट इण्डीज़" कहते हैं ।
सब से पहला यूरोपनिवासी, जिसे इस प्रयत्न में सफलता प्राप्त
भारत में हुई, पुर्तगाल का रहने वाला वास्को-दे-गामा
पुर्तगालियों का नामक एक नाविक था। वास्को-दे-गामा का जहाज़
प्रवेश अफ़रीका के नीचे से आशा अन्तरीप (केप
आफ़ गुडहोप ) का चक्कर लगाता हुआ २२ मई सन् १४९८ ईसवी
को मलाबार तट पर कालीकट के पास आकर ठहरा * । कालीकट
का राजा उस समय एक हिन्दू था जिसे सामुद्रिक या सामूरी
(ज़ामोरिन) कहते थे । इस राजा ने वास्को-दे-गामा और उसके
ईसाई साथियों का बड़े हर्ष के साथ स्वागत किया और इनकी खूब
ख़ातिरदारी की । पुर्तगालियों की प्रार्थना पर सामूरी ने उन्हें अपने
राज में रहने और व्यापार करने की इजाज़त दे दी । पुर्तगाल से
आना जाना बढ़ता गया ।
- मौजूदा नहर स्वेज़ सन् १८६९ में खुली । इससे पहले लोग
इसी चक्कर के रास्ते कई महीने में यूरोप से भारत आते जाते थे ।
६ भारत में अंगरेज़ी राज
सन् १५०० ई० में पुर्तगालियों ने अपने व्यापार के लिए काली-
कट में एक कोठी बनाई। तीन साल बाद उन्होंने सामूरी की इजाज़त
से अपनी कोठी की क़िलेबन्दी कर ली और एक फ़ौजी अफ़सर
अल्बुकर्क को उसका क़िलेदार नियुक्त किया। अल्बुकर्क ने किनारे
किनारे उत्तर की ओर बढ़कर सन् १५०६ में गोआ नगर पर क़बज़ा
कर लिया। भोले भारतवासी उस समय तक इन विदेशियों के
वास्तविक चरित्र या इनके इरादों से बिल्कुल अपरिचित थे। होते
होते सन् १५१० ईसवी में पुर्तगालियों का कालीकट के राजा के
साथ कुछ झगड़ा हो गया, जिसमें पुर्तगालियों ने कालीकट के
राजमहल को आग लगा दी और नगर को लूट लिया। केवल बारह
साल पहले इन परदेसियों पर अनुग्रह करने का भोले और उदार
सामूरी को यह फल मिला।
राज-शासन की दृष्टि से भारतवर्ष उस समय अनेक छोटी बड़ी
रियासतों में बँटा हुआ था, जो एक दूसरे के
उस समय का साथ बहुत कम संबन्ध रखती थीं। कोई एक
भारत प्रधान शक्ति इन रियासतों को वश में रखने या
देश को एक सूत्र में बाँधने वाली न थी। पुराने हिन्दू साम्राज्य
बहुत समय पहले टुकड़े टुकड़े हो चुके थे और दिल्ली का मुग़ल
साम्राज्य अभी तक क़ायम न हुआ था। मालूम होता है कि इस
बात का विच्चार तक कि भारत 'एक देश' है उस समय किसी के
दिल में मौजूद न था। इसके सिवा भारतबासी उस समय तोप,
बन्दूक़ आदि आग्नेय अस्त्रों का बनाना जानते हुए भी आमतौर पर
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ७
इनके उपयोग को मानबधर्म के विरुद्ध समझते थे और पुर्तगाल-
निवासी इन हथियारों के इस्तेमाल में होशियार थे। इस सबसे
बढ़कर भारतवासी राजनीति में अत्यन्त भोले थे। नतीजा यह हुआ
कि सौ सवा सौ साल के अंदर पुर्तगालियों ने भारतीय व्यापार
से इतना अधिक धन कमाया कि उसे देख अन्य यूरोपनिवासी दंग
रह गए और इसी समय के अंदर पुर्तगाली मङ्गलोर, कच्चिन, लङ्का,
दिव, गोआ, बम्बई के टापू और नेगापट्टन के मालिक बन बैठे।
पुर्तगालियों के उस समय के व्यापार की दो बातें ख़ास तौर
पुर्तगालियों का पर जानने योग्य हैं। एक यह कि इन लोगों के
व्यवहार कुछ जहाज़ भारत के पूर्वी और पच्छिमी तटों
के बराबर बराबर घूमते रहते थे और किसी
भी भारतीय जहाज़ को पार्स से निकलते हुए देखकर उसे पकड़
कर लूट लेते थे। अपने जहाज़ों में बैठकर ये लोग किनारे की
आबादियों पर भी धावा कर देते थे, उन्हें लूट लेते थे और कभी
कभी मौक़ा पाकर वहाँ के पुरुष स्त्रियों को ग़ुलाम बनाकर पकड़ ले
जाते थे। दूसरे ये लोग अफ़रीका और अन्य देशों से अपने जहाज़ों
में ग़ुलाम भर भर कर लाते थे और भारत के बाज़ारों में, विशेष
कर उन स्थानों में जो उनके अधीन थे, अत्यन्त सस्ते दामों पर
बेच डालते थे।
भारत के जिन हिस्सों पर पुर्तगालियों का क़ब्ज़ा हो गया था,
वहाँ की प्रजा के साथ इन लोगों का व्यवहार अत्यन्त अनुदार
था। ये लोग कट्टर ईसाई थे और जिस देश पर इनका राज होता
८ भारत में अंगरेज़ी राज
था वहाँ की प्रजा को ज़बरदस्ती ईसाई बना लेना वे अपना धर्म
समझते थे। गोआ में उन्हों ने अपनी ग़ैर-ईसाई प्रजा को
पकड़ कर और उन्हें ला-मज़हब कहकर मार डालने और ज़िन्दा
जला देने के लिए एक अदालत क़ायम कर रक्खी थी, जिसे
“इंकिज़िशन” कहते थे। इसीलिए आज तक गोआ की अधिकांश
आबादी ईसाई है। अपनी हिन्दोस्तानी प्रजा की बेहतरी के लिए
पुर्तगालियों ने कभी किसी तरह के यत्न नहीं किये।
१७ वीं सदी के शुरू में पुर्तगालियों का व्यापार बंगाल की
[पुर्तगालियों की] ओर फैलने लगा। बंगाल के किसी हिस्से पर
[सत्ता का अन्त] पुर्तगालियों का राज क़ायम न हुआ, किन्तु
वहाँ भी वही लूट मार, वही ज़्यादतियाँ, वही
ग़ुलाम और बाँदियों का व्यापार चल पड़ा। इस समय तक
मुग़ल साम्राज्य की जड़ें पक्की हो चुकी थीं। शाहजहाँ अब दिल्ली
के तख़्त पर था। बंगाल की हुकूमत दिल्ली सम्राट के अधीन एक
सूबेदार के हाथ में थी। सूबेदार ने अपने अहलकारों के ज़रिए
पुर्तगालियों को उनकी ज़्यादती के विरुद्ध आगाह किया। पुर्त-
गालियों ने सूबेदार की आज्ञाओं की ख़ाक परवा न की। इन बातों की
शिकायत शाहजहाँ के कानों तक पहुँची। उसने तुरंत पुर्तगालियों
के दमन के लिये एक सेना भेजी। पुर्तगाली हरा दिये गये, उनकी
हुगली की कोठियाँ गिरा दी गईं। उनके जहाज़ जला डाले गए
और बचे खुचे पुर्तगाली क़ैद करके आगरे पहुँचा दिये गए। यहीं
से पुर्तगालियों की भारतीय सत्ता का अन्त शुरू होता है।
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ६
भारत से पुर्तगालियों की सत्ता के इतनी जल्दी मिट जाने का
एक सबब यह भी बताया जाता है कि बहुत अधिक धनाढ्य हो
जाने से ये लोग भोग विलास में पड़ गए थे। एक पुर्तगाली लेखक
लिखता है:—
“पुर्तगालनिवासियों ने एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में सलीब
(क्रॉस) लेकर भारतवर्ष में प्रवेश किया, किन्तु जब उन्हें यहाँ बहुत अधिक
सोना नज़र आया तो उन्होंने सलीब को अलग रखकर उस हाथ से अपनी
जेबें भरनी शुरू कर दीं और जब उनकी जेबें इतनी भारी हो गईं कि वे उन्हें
एक हाथ से न सँभाल सके तो उन्होंने तलवार भी फेंक दी। इस हालत में
जो लोग उनके बाद आए वे आसानी से उन पर हावी हो सके।*”
पुर्तगालियों के क़रीब सौ साल पीछे १६ वीं सदी के अंत में,
एक दूसरे यूरोपियन देश हॉलैण्ड के रहने वाले, जिन्हें “डच” कहते
हैं भारत पहुँचे। इन लोगों ने आसानी से पुर्तगालियों के रहे सहे
जहाज़ आदि जलाकर उनकी बाक़ी सत्ता अपने हाथों में ले ली।
आज दिन पुर्तगालियों का राज हिन्दोस्तान के अंदर केवल गोआ
और दो एक छोटे छोटे टापुओं पर बाक़ी रह गया है।
यूरोप में डच लोगों ने भारत के धन वैभव का ज़िक्र पहले
पहल पुर्तगालियों से सुना। उनके दिल में भी
भारत में भारत पहुंच कर धन कमाने की अभिलाषा पैदा
डच जाति हुई। जल-मार्ग से भारत आने के उन्होंने अनेक
- Alfonzo-de-Souza, Governor of Portuguese India, 1545.
१० भारत में अंगरेज़ी राज
निष्फल प्रयत्न किये । अन्त में सन् १५६८ ईसवी तक इनके जहाज़
अफ़रीका के नीचे से जावा होकर भारत पहुंचने लगे ।
डच जाति के लिखे हुए इतिहास से मालूम होता है कि भारत
के नरेशों ने इनका वैसा ही अच्छा स्वागत किया, जैसा शुरू में
पुर्तगालियों का किया था। पुर्तगालियों से इनकी लाग डाट थी ।
जिस तरह पुर्तगालियों ने अरब सौदागरों की रोज़ी छीनी थी,
उसी तरह डच अब पुर्तगालियों की रोज़ी छीनने या कम से कम
उसमें हिस्सा बटाने के लिये उत्सुक थे। इन लोगों ने भारतवासियों
से पुर्तगालियों की ख़ूब बुराइयाँ कीं । मुग़ल सम्राट ने इन्हें अब
व्यापार के लिये कोठियाँ बनाने और अपनी रक्षा के लिये क़िले-
बंदी करने की इजाज़त दे दी ।
सब से पहले पुलीकट और सद्रास नामक स्थानों पर इन्होंने
अपनी कोठियाँ बनाईं और क़िले खड़े किये । पुलीकट मौजूदा
मद्रास के उत्तर में और सद्रास मद्रास के दक्खिन में है । बढ़ते बढ़ते
सन् १६६३ ईसवी में उनकी एक कोठी आगरे में थी, जिसमें जौ
सड़ाकर उससे शराब तैयार की जाती थी। इसी तरह की उनकी
कोठियाँ सूरत, अहमदाबाद और पटने में मौजूद थीं। धीरे धीरे
बंगाल में भी उनका व्यापार बढ़ने लगा और सन् १६७५ में
उन्होंने चुंचड़ा (चिनसुरा) में एक कोठी क़ायम की ।
जब तक डच लोगों की निगाह केवल व्यापार पर रही, उन्होंने
भारत से ख़ूब धन कमाया, किन्तु इसके बाद उनमें भारत के अंदर
अपना राज क़ायम करने की इच्छा उत्पन्न हुई । इसी बीच अंगरेज़
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ११
जाति भी भारत पहुंच गई और इस देश को अपने अधीन करने के
लिये हर तरह के उपाय करने लगी। डच जाति को अधिक चतुर
अंगरेज़ों के साथ टक्कर लेनी पड़ी। प्लासी की लड़ाई के दो साल बाद
अगस्त सन् १७५६ ईसवी में डच लोगों के सात जंगी जहाज़ एका-
एक चुंचड़ा के नीचे आ धमके। अंगरेज़ों का प्रभाव उस समय
ख़ासा जम चुका था। अंगरेज़ों ने उन्हें चुंचड़ा तक पहुंचने भी न
दिया और बंगाल के नवाब की सहायता से पूरी तरह शिकस्त
देकर पीछे हटा दिया। उसी समय से डच लोगों का भारतीय
व्यापार घटने लगा। अंत में सन् १८०५ ईसवी में अंगरेज़ों ने
चुंचड़ा और मलाका के बदले में उन्हें सुमात्रा का टापू देकर डच
जाति के अंतिम चिन्ह को इस देश से मिटा दिया।
१६वीं सदी के शुरू में पुर्तगालियों की हिन्दोस्तानी तिजारत बढ़ने
भारत पर अंगरेज़ों से पुर्तगाल की राजधानी लिसबन का महत्व
की दृष्टि और उसका वैभव यूरोप में दिनों दिन बढ़ता जा
रहा था। इङ्गलिस्तान के रहने वालों को इससे
ईर्षा होना स्वाभाविक था। इङ्गलिस्तान में उस समय ब्रिस्टल का
बंदरगाह तिजारत की दृष्टि से सबसे आगे था। हर यूरोपियन
क़ौम के लोग उन दिनों दूसरी क़ौम के माल से लदे जहाज़ों को
पकड़ कर लूट लेना अपने लिये एक जायज़ व्यापार समझते थे।
भारत और एशियाई समुद्रों में भी इन लोगों ने इस तरह की लूट
का बाज़ार ख़ूब गरम कर रक्खा था। ब्रिस्टल के नाविक अनेक
पुश्तों से बड़े मशहूर समुद्री डाकू गिने जाते थे। सबसे पहले
१२ भारत में अंगरेज़ी राज
ब्रिस्टल ही के एक सौदागर ने इङ्गलिस्तान के बादशाह आठवें
हेनरी को भारत के मार्ग की खोज कराने की सलाह दी।
पचास साल से कुछ ऊपर तक इङ्गलिस्तान के बड़े बड़े नाविक
उत्तर-पच्छिम से होकर भारत पहुँचने के निष्फल प्रयत्न करते रहे।
सन् १५७८ में जब किइङ्गलिस्तान का एक मशहूर नाविक सर फ़्रैंसिस
ड्रेक भारत से लिसबन जाने वाले एक पुर्तगाली जहाज़ को पकड़ कर
लूट रहा था, उस लूट में उसे कुछ नक़शे मिले जिनसे अंगरेज़ों को
पहली बार भारत के उस समय के जल-मार्ग का कुछ पता चला।
सन् १६०० ई० में इङ्गलिस्तान की रानी एलिज़ेबेथ ने सुप्रसिद्ध
“ईस्ट इण्डिया कम्पनी” की रचना की। यह
ईस्ट इण्डिया कम्पनी उन अंगरेज़ व्यापारियों की एक मंडली
कम्पनी थी, जो हिन्दोस्तान के साथ तिजारत करने की
इच्छा रखते थे। यह बात याद रखने योग्य है कि जो फ़रमान रानी
एलिज़ेबेथ ने इस मौक़े पर जारी किया, उसमें इस कम्पनी को इस
तरह के साहसी लोगों की मंडली (Society of Adventurers)
कहा गया है जो लूट, सट्टे आदि के लिये निकलते हैं और जो अपने
धन कमाने के उपायों में सच झूठ, ईमानदारी बेईमानी अथवा
न्याय अन्याय का अधिक ख़याल नहीं रखते। कम्पनी के डाइरेक्टरों
ने शुरू ही में इस बात का फ़ैसला कर लिया था कि हम “किसी
ज़िम्मेदारी की जगह किसी शरीफ़ आदमी को नियुक्त न करेंगे*।”
- “Not to employ any gentleman in any place of charge.”—Bruce's Annals
of the Hon'ble East India Company, vol. i, p. 128.
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १३
और मलका के नाम अपनी दरख़्वास्त में लिख दिया था कि—"हमें
अपना व्यापार अपने ही जैसे आदमियों द्वारा चलाने की इजाज़त
होनी चाहिये, क्योंकि यदि लोगों को इस बात का संदेह भी हो
गया कि हम शरीफ़ आदमियों को अपने यहाँ नौकर रक्खेंगे, तो
मुमकिन है हमारे बहुत से साहसिक पत्तीदार अपनी पत्तियाँ वापस
ले लें *।” यही भारत के अंदर इस अंगरेज़ कम्पनी के ढाई सौ
साल के कारनामों और उसकी समस्त नीति की कुंजी है। इन ढाई
सौ साल के अंदर कम्पनी के मेम्बरों, मुलाज़िमों आदि में बिरले ही
ऐसे हुए होंगे, जिन्हें 'शरीफ़' कहा जा सके।
नक़्शे मिलने के तीस साल बाद यानी सन् १६०८ ईस्वी में
पहला अंगरेज़ी जहाज़ हिन्दोस्तान पहुँचा। इस
भारत में पहला जहाज़ का नाम 'हेक्टर' था। 'हेक्टर' प्राचीन
अंगरेज़ यूनान के एक वीर योद्धा का नाम था। अंगरेज़ी
में हेक्टर शब्द का अर्थ 'हेकड़ीबाज़' या 'झगड़ालू' है। यह
जहाज़ सूरत के बन्दरगाह में आकर लगा। सूरत उस समय
भारतीय व्यापार का एक विशेष केन्द्र था। जहाज़ का कप्तान
हॉकिन्स पहला अंगरेज़ था जिसने समुद्र के रास्ते आकर
भारत की भूमि पर क़दम रखा। इङ्गलिस्तान के बादशाह जेम्स
अव्वल की ओर से दिल्ली के मुग़ल सम्राट के नाम हॉकिन्स
अपने साथ एक पत्र लाया, जो उसने आगरे पहुँच कर सम्राट
जहाँगीर के सामने पेश किया। यह बात केवल तीन सौ साल पहले
- Ibid.
१४ भारत में अंगरेज़ी राज
की है। उस समय के इङ्गलिस्तान के बादशाह जेम्स अव्वल के राज
और भारत के मुग़ल साम्राज्य की—क्षेत्रफल, आबादी, धन, वैभव,
तिजारत, कला कौशल, दस्तकारी, खुशहाली, शासन-प्रबन्ध, विद्या,
बल—किसी बात में भी किसी प्रकार की तुलना नहीं की जा सकती।
जहाँगीर के दरबार में उस समय किसी को इस बात का गुमान
भी न हो सकता था कि दूरवर्ती पच्छिम की एक छोटी सी निर्बल,
असभ्य या अर्द्धसभ्य जाति का जो दूत उस समय दरबार में
दोज़ानू होकर ज़मीन चूम रहा था उसी के वंशज एक रोज़ मुग़ल
साम्राज्य के अङ्ग भङ्ग हो जाने पर हिन्दोस्तान के ऊपर शासन
करने लगेंगे। जहाँगीर ने हॉकिन्स की खूब ख़ातिर की। किन्तु
पुर्तगाली पहले से दरबार में मौजूद थे, उन्होंने जहाँगीर से अंगरेज़ों
की खूब बुराइयाँ कीं। सन् १६१२ ईसवी में अंगरेज़ों ने सूरत के
पास कुछ पुर्तगाली जहाज़ों पर हमला करके उन्हें गिरफ़्तार कर
लिया। उसी समय से सूरत में पुर्तगालियों का प्रभाव घटने और
अंगरेज़ों का प्रभाव बढ़ने लगा।
६ फ़रवरी सन् १६१३ को जहाँगीर ने एक शाही फ़रमान के
जहाँगीर और ज़रीये अंगरेज़ों को अपनी तिजारत के लिये सूरत
अंगरेज़ में एक कोठी बनाने की इजाज़त दे दी और यह
भी इजाज़त दे दी कि मुग़ल दरबार में इङ्गलिस्तान
का एक एलची रहा करे।
- इङ्गलिस्तान के बादशाह ने सर टॉमस रो को मुग़ल दरबार में
अपना पहला एलची नियुक्त करके भेजा। सर टॉमस रो सन् १६१५
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १५
ईसवी में भारत पहुँचा और अपनी नम्रता और सौजन्य द्वारा उसने
अंगरेज़ी तिजारत के लिये सम्राट से अनेक नई रियायतें हासिल
कर लीं ।
मिसाल के तौर पर सन् १६१६ में अंगरेज़ों को कालीकट और
मछलीपट्टन में कोठियाँ बनाने की इजाज़त मिल गई । उस समय
भारत में रहने वाले अंगरेज़ चूंकि भारत सम्राट की प्रजा थे, इसलिये
यदि उनमें कोई झगड़ा होता था तो देशी अदालतों में ही उसकी
सुनाई होती थी और वहीं से उन्हें दंड आदि दिये जाते थे। सन्
१६२४ ईसवी में अंगरेज़ों की प्रार्थना पर जहाँगीर ने एक शाही
फ़रमान इस मज़मून का जारी कर दिया कि आइन्दा अपनी कोठी
के अंदर रहने वाले कम्पनी के किसी मुलाज़िम के क़सूर करने पर
अंगरेज़ उसे स्वयं दंड दे सकते हैं। इस घटना की आलोचना करते
हुए एक विद्वान अंगरेज़ इतिहास लेखक टोरेन्स लिखता है :—
“बादशाह न्यायशील और बुद्धिमान था । वह उनकी आवश्यकताओं को
समझता था। जो उन्होंने माँगा उसने मंज़ूर कर लिया। उसे यह स्वप्न में भी
नज़र न आ सकता था कि एक दिन अंगरेज़ इसी छोटी सी जड़ से बढ़ते बढ़ते
बादशाह की प्रजा और उसके उत्तराधिकारियों तक को दंड देने का दावा करने
लगेंगे और यदि उनका विरोध किया जायगा तो प्रजा का संहार कर डालेंगे
और बादशाह के उत्तराधिकारी को बाग़ी कह कर आजीवन क़ैद कर लेंगे* ।”
- "The Padishah, being a just man and wise, understood their needs, and
yielded what they asked, little dreaming that the time would come, when, from
such root of title, they would claim jurisdiction over his subjects and succes-
१६ भारत में अंग्रेज़ी राज
इसके बाद शाहजहाँ का समय आया । सन् १६३४ ई० में पुर्त-
शाहजहाँ और गालियों को बंगाल से निकालने के बाद शाहजहाँ
अंगरेज़ ने अंगरेज़ों को बंगाल में तिजारत करने की
इजाज़त दे दी। सन् १६३६ ई० में अंगरेज़ों ने
मद्रास में अपनी एक कोठी क़ायम की । उन दिनों बंगाल में
अंगरेज़ों को अन्य देशी व्यापारियों की तरह अपने माल पर चुंगी
देनी पड़ती थी और उनके जहाज़ शाही फ़रमान के अनुसार हुगली
के बहुत नीचे पिपली नामक स्थान पर रुक जाते थे । हुगली तक
जहाज़ लाने की उन्हें इजाज़त न थी ।
सन् १६४० ई० में शाहजहाँ की एक लड़की किसी तरह जल
गई । उसके इलाज करने वालों में एक अंगरेज़ डॉक्टर भी था ।
शाहज़ादी अच्छी हो गई । जब इलाज करने वालों को इनाम व
इकराम देने का समय आया, तो अंगरेज़ डॉक्टर की प्रार्थना पर
शाहजहाँ ने बंगाल भर के अंदर अंगरेज़ों के माल पर चुंगी माफ़ कर
दी और उन्हें उस प्रान्त में कोठियाँ बनाने तथा उनके जहाज़ों को
हुगली तक आने की इजाज़त दे दी । इसी फ़रमान के अनुसार
१६४० ई० में कलकत्ते की कोठी बनी । शाहशुजा उस समय बंगाल
का सूबेदार था, उसने सम्राट के फ़रमान के अनुसार 'परदेसी'
अंगरेज़ों को अपना कारबार जमाने में हर तरह की मदद दी ।
sons, and, as the penalty of resistance, decimate the one, and imprison the
other for life as guilty of rebellion. "-Torrens' Empire in Asia, pp. 10, 11.
Allahabad.
भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश १७
इसके बाद औरंगज़ेब का समय आया। बम्बई का टापू, जहाँ
पर उस समय केवल एक छोटी सी पुर्तगाली बस्ती
बम्बई का टापू थी, सन् १६६१ ई० में इङ्गलिस्तान के बादशाह
को पुर्तगालियों से दहेज़ में मिला और सन् १६८८ ईसवी में
ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने उसे अपने बादशाह से ख़रीद लिया। सन्
१६६४ ईसवी के निकट शिवाजी का बल बढ़ने लगा। सूरत के
अंगरेज़ कोठीवालों ने औरंगज़ेब से वादा किया कि हम शिवाजी
के ख़िलाफ़ आपको मदद देंगे और मुग़ल साम्राज्य की ओर से
सूरत की रक्षा करेंगे। इससे खुश होकर औरंगज़ेब ने उनके साथ
कई तरह की नई रिआयतें कर दीं।
किन्तु शुरू के इन अंगरेज़ व्यापारियों का सदाचार और व्यवहार
अत्यन्त गिरा हुआ था। किसी भी दूसरी क़ौम
अंगरेज़ व्यापारियों के माल से लदे जहाज़ को पकड़ कर लूट लेना
का चरित्र इनके लिये एक मामूली बात थी। स्वयं अपने
अंगरेज़ भाइयों और अन्य यूरोपियनों के साथ इनके सुलूक की
यह हालत थी कि जो मनुष्य इनसे सस्ता माल बेचता था या
किसी और तरह उससे इनके व्यापार में बाधा पड़ती थी, उसे ये
मौक़ा पाकर पकड़ लेते थे और या तो कोड़े मार मार कर मार
डालते थे और या अपनी कोठी में बंद करके भूखों मार देते थे ।*
- “ . . . they made it a rule to whip to death or starve to death those
of, whom they wished to get rid, . . . to murder private traders.”—Mill,
Wilson's note, vol. i., Chap. ii.
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