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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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२ भारत में अंगरेज़ी राज
संसार का सब से अधिक धनवान देश माना जाता था। ईसा की
अठारवीं सदी तक यह देश संसार भर के यात्रियों के लिए एक
अपूर्व चमत्कार की जगह, कवियों के लिए उनकी उच्चतम कल्पनाओं
का एक विषय और धन-लोलुप जातियों के लिए उनकी लालसा का
मुख्यतम पदार्थ बना हुआ था। सैकड़ों और हज़ारों वर्षों तक समस्त
यूरोप, बल्कि समस्त संसार के बाज़ारों और मंडियों में अच्छे से
अच्छे रेशमी और सूती कपड़े, ज़ेवर, बरतन और तरह तरह के अन्य
अद्भुत पदार्थ हिन्दोस्तान के बने हुए ही दिखाई पड़ते थे। संसार
के व्यापारियों को उस समय भारतीय धन और भारतीय वैभव के
ही स्वप्न दिखाई देते थे, और इस भारतीय धन का लालच ही यूरोप
निवासियों को इस प्राचीन देश की ओर खींच कर लाया। वास्तव में
बहुत दरजे तक भारत का यह प्राचीन धन-वैभव ही इस देश की
समस्त आपत्तियों का मूल कारण हुआ।
चार सौ साल पहले तक भारत और यूरोप के बीच का
समस्त व्यापार अरब और ईरान के सौदागरों के ज़रिए होता
था। ये साहसी सौदागर भारत के पच्छिमी तट पर भारत के
क़ीमती माल से अपने जहाज़ लादते थे, फिर अरब और ईरान की
खाड़ियों से होकर उस माल को अपने देशों में ले जाते थे, और फिर
वहाँ से अधिकतर खुश्की के रास्ते ऊँटों और गाड़ियों पर लाद कर
उसे यूरोप और अफ़रीका के तमाम देशों में पहुँचाते थे। यूरोप
में व्यापार की सब से बड़ी मंडियाँ उस समय इतालिया (इटली)
देश के वेनिस, जेनोआ आदि बन्दरगाहों में थीं और वहाँ ही से