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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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भारत में यूरोपियन जातियों का प्रवेश ५
के बाद के जीवन पर ख़ासा ज़बरदस्त पड़ा । किन्तु भारत का
जल-मार्ग ढूंढ निकालने की दृष्टि से कोलम्बस का प्रयत्न बिलकुल
निष्फल गया । यह एक ख़ास बात है कि कोलम्बस मरते समय
तक अमरीका ही को हिन्दोस्तान समझता रहा और उसी भ्रम के
सिलसिले में आज तक यूरोपनिवासी अमरीका के पुराने
बाशिन्दों को "इण्डियन्स" या "रेड इण्डियन्स" और अमरीका
के पास के टापुओं को "वेस्ट इण्डीज़" कहते हैं ।
सब से पहला यूरोपनिवासी, जिसे इस प्रयत्न में सफलता प्राप्त
भारत में हुई, पुर्तगाल का रहने वाला वास्को-दे-गामा
पुर्तगालियों का नामक एक नाविक था। वास्को-दे-गामा का जहाज़
प्रवेश अफ़रीका के नीचे से आशा अन्तरीप (केप
आफ़ गुडहोप ) का चक्कर लगाता हुआ २२ मई सन् १४९८ ईसवी
को मलाबार तट पर कालीकट के पास आकर ठहरा * । कालीकट
का राजा उस समय एक हिन्दू था जिसे सामुद्रिक या सामूरी
(ज़ामोरिन) कहते थे । इस राजा ने वास्को-दे-गामा और उसके
ईसाई साथियों का बड़े हर्ष के साथ स्वागत किया और इनकी खूब
ख़ातिरदारी की । पुर्तगालियों की प्रार्थना पर सामूरी ने उन्हें अपने
राज में रहने और व्यापार करने की इजाज़त दे दी । पुर्तगाल से
आना जाना बढ़ता गया ।

  • मौजूदा नहर स्वेज़ सन् १८६९ में खुली । इससे पहले लोग
    इसी चक्कर के रास्ते कई महीने में यूरोप से भारत आते जाते थे ।