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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

८ भारत में अंगरेज़ी राज
था वहाँ की प्रजा को ज़बरदस्ती ईसाई बना लेना वे अपना धर्म
समझते थे। गोआ में उन्हों ने अपनी ग़ैर-ईसाई प्रजा को
पकड़ कर और उन्हें ला-मज़हब कहकर मार डालने और ज़िन्दा
जला देने के लिए एक अदालत क़ायम कर रक्खी थी, जिसे
“इंकिज़िशन” कहते थे। इसीलिए आज तक गोआ की अधिकांश
आबादी ईसाई है। अपनी हिन्दोस्तानी प्रजा की बेहतरी के लिए
पुर्तगालियों ने कभी किसी तरह के यत्न नहीं किये।
१७ वीं सदी के शुरू में पुर्तगालियों का व्यापार बंगाल की
[पुर्तगालियों की] ओर फैलने लगा। बंगाल के किसी हिस्से पर
[सत्ता का अन्त] पुर्तगालियों का राज क़ायम न हुआ, किन्तु
वहाँ भी वही लूट मार, वही ज़्यादतियाँ, वही
ग़ुलाम और बाँदियों का व्यापार चल पड़ा। इस समय तक
मुग़ल साम्राज्य की जड़ें पक्की हो चुकी थीं। शाहजहाँ अब दिल्ली
के तख़्त पर था। बंगाल की हुकूमत दिल्ली सम्राट के अधीन एक
सूबेदार के हाथ में थी। सूबेदार ने अपने अहलकारों के ज़रिए
पुर्तगालियों को उनकी ज़्यादती के विरुद्ध आगाह किया। पुर्त-
गालियों ने सूबेदार की आज्ञाओं की ख़ाक परवा न की। इन बातों की
शिकायत शाहजहाँ के कानों तक पहुँची। उसने तुरंत पुर्तगालियों
के दमन के लिये एक सेना भेजी। पुर्तगाली हरा दिये गये, उनकी
हुगली की कोठियाँ गिरा दी गईं। उनके जहाज़ जला डाले गए
और बचे खुचे पुर्तगाली क़ैद करके आगरे पहुँचा दिये गए। यहीं
से पुर्तगालियों की भारतीय सत्ता का अन्त शुरू होता है।