भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
मुग़लों का समय १६१
देश में हज़ारों कैथलिक, हज़ारों एङ्गलिकन, हज़ारों लूथरेन, हज़ारों प्युरिटेन,
हज़ारों प्रेसबिटेरियन, हज़ारों लेबेटर, हज़ारों एनेबेप्टिस्ट, और हज़ारों
कवेनेण्टर ज़िन्दा जला दिए गए, तलवार के घाट उतारे गए, या यातनाएँ
दे देकर मार डाले गए, और ये सब के सब ईसाई थे, उतने ही कट्टर ईसाई
जितने कि उन पर अत्याचार करने वाले उनके दूसरे देशवासी थे ।
भारत और यूरोप की तुलना
उस समय के भारत और यूरोप की तुलना करते हुए अंग्रेज़ इतिहास
लेखक टॉरेन्स लिखता है—
"दिल्ली के शुरू के सम्राटों के दिनों में, सत्रहवीं सदी के मध्य
तक, सब धर्मों के लोगों के साथ पूरी उदारता का व्यवहार किया
जाता था । ठीक उसी समय यूरोपनिवासी धर्म के नाम पर
अत्याचारों द्वारा अपने महाद्वीप को एक विशाल श्मशान भूमि
बनाने की ज़ोरदार कोशिशों में लगे हुए थे, अपने अपने धर्म की रक्षा
के लिए लोग यूरोप के विविध देशों से भाग भागकर अमरीका
में जा जाकर बस रहे थे । क्या आज उन्हीं लोगों के वंशज,
उनकी क़ब्रें बनाने वाले, भारत पर दोष लगाने का साहस कर
सकते हैं ? क्या वे बेशर्मी के साथ इस बात का दम भर कर
इतिहास को कलङ्कित कर सकते हैं कि उस समय उनकी सभ्यता
भारत की सभ्यता से अधिक सच्ची थी ? यदि उन्हीं के लिखे
इतिहास पर विश्वास करके उन्हीं की गवाही ली जाय, और जो
कट्टर ईसाई उस तमाम समय में धर्म के नाम पर फाँसियाँ खड़ी
११
१६२ पुस्तक प्रवेश
कर रहे थे, बेड़ियाँ कस रहे थे और दूसरी सम्प्रदाय के ईसाइयों
को दण्ड देने के लिए 'ऐक्टस ऑफ़ यूनिफ़ार्मिटी' पास कर रहे
थे, जिनकी उँगलियों से कवेनेएटर सम्प्रदाय के लोगों का ख़ून,
कैथलिक लोगों का ख़ून और प्यूरिटन लोगों का ख़ून लगातार
टपक रहा था, यदि उन्हीं को बुला कर उनकी गवाही ली जाय,
तो वे क्या मुँह दिखला सकेंगे ?'' ꕤ
इस पुस्तक में कई स्थान पर यह दिखलाया गया है कि मुसलमानों
और ख़ास कर मुग़लों के शासनकाल में राज की ऊँची से ऊँची पदवियाँ
हिन्दुओं को मिली हुई थीं। हर सम्राट की ओर से बेशुमार हिन्दू मन्दिरों
को जागीरें और माफ़ियाँ दी गईं। औरङ्गज़ेब मुतास्सिब और अनुदार था,
फिर भी औरङ्गज़ेब के दरबार में भी हिन्दू मन्त्री और उसकी सेना में हिन्दू
सेनापति मौजूद थे। औरङ्गज़ेब की मृत्यु को आज दो सौ साल से ऊपर हो
चुके, किन्तु अभी तक अनेक हिन्दू मन्दिरों के पास, मिसाल के तौर पर
इलाहाबाद के पास अरैल में सोमेश्वरनाथ के मन्दिर के हिन्दू पुजारियों के
- "During the reigns of the earlier Emperors of Delhi, to the middle
of the seventeenth century, complete tolerance was shown to all religions.
Shall they who build the tombs of those who at that very time, were busily
employed in making Europe one mighty charnel-house of persecution, and
in colonising America with fugitives for conscience' sake, rise up in judgment
against India, or load the breath of history with the insolent pretence of
having then enjoyed a truer civilization ? What if they were taken at their
word, and called forth with the Covenanters' blood, and the Catholic's
blood, and the Puritan's blood dripping quick from the orthodox hands
that all that time were building scaffolds, riveting chains, and penning penal
'Acts of Uniformity' ?"—Empire in Asia, How We Cam by It. A book of
Confessions by W. M. Torrens, M. P., Panini Office reprint, pp. 96, 97.
मुग़लों का समय १६३
पास, औरंगज़ेब के दस्तख़ती परवाने मौजूद हैं जिनमें उन मन्दिरों को राज
की ओर से जागीरें दी गई हैं।
अमन और ख़ुशहाली के लिहाज़ से मुग़ल साम्राज्य का समय भारत
के इतिहास में निस्सन्देह स्वर्ण युग था। असंख्य यूरोपियन और एशियाई
यात्रियों की गवाहियाँ और उस समय के ऐतिहासिक उल्लेख इस विषय में
नक़ल किए जा सकते हैं। धन धान्य, और सुख सम्पत्ति की जो रेल पेल
भारत के अन्दर सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल में देखने में आती थी वह
संसार के इतिहास में शायद ही कभी किसी दूसरे देश को नसीब हुई हो।
इतिहास लेखक मोरलैण्ड लिखता है कि विदेशी व्यापारी और यात्री
उन दिनों इस बात को देख कर चकित रह जाते थे कि भारत के नगरों में
लोगों के माल की रक्षा का कितना सुन्दर प्रबन्ध था। अनेक यात्री इस
बात की गवाही देते हैं कि अव्वल तो चोरियाँ होती ही बहुत कम थीं,
और यदि किसी नगर में चोरी हो जाती थी और माल बरामद न हो पाता
था तो नगर के कोतवाल को अपने पास से माल की क़ीमत भर देनी
पड़ती थी।*
हुमायूँ के दो शासनकालों के बीच के कुछ साल तक दिल्ली में शेरशाह
का शासन रहा। किन्तु फ्रेडरिक आगस्टस लिखता है कि “शेरशाह का
चन्दरोज़ा शासन भी हिन्दोस्तान की उन्नति के लिए अहितकर साबित न
हुआ, सड़कों के ऊपर आने जाने, माल के लाने ले जाने और व्यापारियों
की रक्षा का उसने इतना सुन्दर प्रबन्ध कर दिया कि जितना पहले न था।”†
- India at the Death of Akbar, by Moreland, pp. 38, 39.
† The Emperor Akbar, etc., by Frederick Augustus, p. 277.
१६४ पुस्तक प्रवेश
सम्राट जहाँगीर ने तख्त पर बैठते ही सब से पहले जो आज्ञाएँ जारी
कीं उनमें से एक यह थी कि साम्राज्य भर में सड़कों और सड़कों के ऊपर
सरकारी कुओं, सरायों आदि की मरम्मत की जाय और यात्रियों की
हिफ़ाज़त का पूरा प्रबन्ध किया जाय, और दूसरी यह थी कि कोई भी
राजकर्मचारी या ज़मींदार किसी वजह से भी किसी किसान की ज़मीन से
उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ उसे बेदख़ल न करे, ✻ तीसरी यह थी कि किसी
व्यापारी का माल चुङ्गी इत्यादि के लिए चौकियों और सड़कों पर खोल कर
न देखा जाय । जहाँगीर ने साम्राज्य भर में अनेक मुसाफ़िरखाने, मदरसे
और अस्पताल, तालाब, कुएँ और पुल बनवाए, तमाम बड़े बड़े नगरों में
राज के ख़र्च पर हकीम और वैद्य नियुक्त किए, शराब और तम्बाकू का बनना
और पिया जाना क़ानूनन् बन्द किया । संसार के किसी भी देश में उस
समय राज की ओर से प्रजा की शिक्षा का बाज़ाब्ता इन्तज़ाम न था ।
मुग़ल सम्राटों ने इस कमी को पूरा करने के लिए साम्राज्य भर में हज़ारों
विद्वान पण्डितों और मौलवियों को पाठशालाएँ और मकतब जारी रखने
के लिए माफ़ियाँ और वज़ीफ़े अता किए ।† अनेक अंगरेज़ यात्री स्वीकार
करते हैं कि मुग़ल सम्राटों के उदार प्रोत्साहन के प्रताप से उस समय के
भारत में शिक्षितों की संख्या आबादी के हिसाब से संसार भर में सब से
अधिक थी ।
उद्योग धन्धों में भारत उस समय न केवल अपनी समस्त आवश्य-
कताओं को ही पूरा करता था, बल्कि शेष अधिकांश संसार की मण्डियों
- India at the Death of Akbar, by Moreland, p. 46 and 129.
† History of Jehangir, by Beniprasad, M. A., D. Sc., Ph. D., pp. 92-94.
मुग़लों का समय १६५
में भी अधिकतर भारत का बना हुआ माल ही दिखाई देता था। आज से
क़रीब सवा सौ साल पहले तक यानी उन्नीसवीं सदी के शुरू तक भारत के
बने हुए जहाज़ उस समय के इङ्गलिस्तान और अन्य यूरोपियन देशों के बने
हुए जहाज़ों से कहीं अधिक सुन्दर, कहीं अधिक मज़बूत और कहीं अधिक
टिकाऊ होते थे। ❀
ईसा की पन्द्रवीं सदी में यूरोपियन यात्री काउण्टी लिखता है कि
जितने बड़े जहाज़ भारत में बनते थे उतने यूरोप में कहीं देखने को न
मिलते थे। मुग़ल साम्राज्य के शुरू के दिनों में जो अङ्गरेज़ भारत आए
उन्होंने और भी अधिक बड़े बड़े सुन्दर और मज़बूत भारतीय जहाज़ों का
हाल अपने यात्रा वृत्तान्तों में लिखा है। मुग़ल साम्राज्य के दिनों में चीन
और जापान से लेकर अफ़रीका के दखिन तक जितने जहाज़ आते जाते थे,
उनमें से अधिकांश भारत के और ख़ास कर गुजरात के बने हुए होते थे।
बङ्गाल से सिन्ध तक का सारा व्यापार केवल भारतीय जहाज़ों द्वारा किया
जाता था। मुसाफ़िरों के आने जाने के लिए जितने बड़े जहाज़ भारत में
बनते थे उतने और कहीं न बनते थे। पूरब में मेक्सिको ( अमरीका ) तक
और पच्छिम में इङ्गलिस्तान तक भारत का बना हुआ माल भारतीय
जहाज़ों में लद कर दूसरे देशों को जाता था। हज के लिए जाने वाले भार-
तीय मुसलमान भारतीय जहाज़ों ही में भारत से अरब तक आते जाते थे।†
बारबोसा लिखता है कि सत्रवीं सदी के शुरू में गुजरात के बने हुए
रेशम के कपड़े अफ़रीका और पगू तक जाते थे। वारथेमा लिखता है कि
- Prosperous British India, by William Digby, pp. 86, 88.
† India at the Death of Akbar, pp. 67-71.
१६६ पुस्तक प्रवेश
उन दिनों गुजरात "समस्त ईरान, तातार, टर्की, शाम, बारबरी, अरब,
ईथियोपिया (अबीसीनिया, अफ्रीका) और अन्य कई देशों" को अपने यहाँ
के बने हुए "रेशमी और सूती कपड़े" मुहय्या करता था। उस समय के
यात्री लिखते हैं कि स्वयं भारत के अन्दर कपड़े की खपत उस समय मामूली
न थी। क़रीब क़रीब सब ऊपर की और बीच की श्रेणी के लोग रेशम
पहनते थे और बड़े बड़े चोगे पहनते थे।
ख़ास कर रेशम के धंधे ने सम्राट अकबर के समय में अपूर्व उन्नति
की। अबुलफ़ज़ल लिखता है कि अकबर ने ख़ुद रेशम के धंधे का परिश्रम
के साथ अध्ययन किया, चीन और अन्य देशों से कारीगर बुला कर नौकर
रक्खे और लाहौर, आगरा, फ़तहपुर, अहमदाबाद इत्यादि में राज के ख़र्च
पर बड़े बड़े कारख़ाने खुलवाए। अकबर के समय में जब कि गेहूँ आजकल
के वज़न के हिसाब से एक रुपए का एक मन बारह सेर आता था, चार आने
में एक सुन्दर ख़ालिस ऊन का कम्बल ख़रीदा जा सकता था। अबुलफ़ज़ल
लिखता है कि लाहौर के अन्दर उस समय शाल बनाने के एक हज़ार सर-
कारी कारख़ाने थे, काशमीर और अन्य स्थानों में अलग रहे। आगरे और
लाहौर में दरियों और क़ालीनों के अनेक सरकारी कारख़ाने थे।
सौ सवा सौ साल पहले तक के ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रतिनिधि बार
बार अपने पत्रों में इंगलिस्तान लिखकर भेजते थे कि इङ्गलिस्तान के बने
हुए कपड़ों की भारतीय कपड़ों के मुक़ाबले में भारत में कोई खपत नहीं हो
सकती।
पुर्तगाली यात्री पिरार्ड लिखता है कि सत्रवीं सदी के शुरू में बङ्गाल
के अन्दर जो अत्यन्त घना बसा हुआ देश था, सूती वस्त्रों का धंधा घर
भर फैला हुआ था और “आशा अन्तरीप ( अफ़रीका ) से लेकर चीन तक
हर स्त्री और पुरुष सिर से पाँव तक कपड़े पहनता है और ये सब कपड़े
भारतीय करघों के बने हुए होते थे।” अरब के सौदागर मिश्र में और
यूरोप में भारत के बने हुए कपड़े ले जाकर बेचते थे। लङ्का, बरमा, मलाका,
चीन, जापान, फ़िलिप्पाइन और मेक्सिको में उन दिनों भारत के कपड़ों
की बेहद खपत थी। इस पुस्तक के अन्दर ‘भारतीय उद्योग धंधों का नाश’
शीर्षक अध्याय में हमने अङ्गरेज़ों के आने से पहले की भारतीय उद्योग धंधों
की अवस्था को बयान किया है।
उस समय के इतिहास और यूरोपियन और अन्य यात्रियों के वृत्तान्तों
से यह भी पता चलता है कि मुग़ल समय का भारत न केवल उस समय
के यूरोपियन देशों से ही कहीं अधिक घना बसा हुआ था, बल्कि इस समय
के भारत से भी उस समय के भारत की आबादी कम से कम ख़ास ख़ास
प्रान्तों में कहीं अधिक घनी थी। कलकत्ता, बम्बई और कराची का उस
समय निशान न था। किन्तु आगरा, कन्नौज, विजयनगर, गोलकुण्डा,
१६८ पुस्तक प्रवेश
की आबादी उस समय "इतनी अधिक थी की जिस पर विश्वास करना
कठिन है।" विजयनगर के हिन्दू राजाओं के पास बीस लाख फ़ौज तैयार
रहती थी। इतनी ही घनी आबादी दखन, गुजरात, पञ्जाब और बाक़ी
उत्तर भारत की बताई जाती है। आगरे शहर से लिखा है कि किसी भी
समय दो लाख सशस्त्र योधा जमा किए जा सकते थे । बङ्गाल की राजधानी
गौड़ के मकानों की संख्या बारह लाख थी, जिसका अर्थ यह है कि उस
समय के गौड़ की आबादी इस समय के लन्दन की आबादी से बहुत कम
न थी । सूरत से लाहौर तक, लाहौर से आगरे तक और आगरे से गौड़ तक
जिन घने बसे हुए ग्रामों और नगरों से होकर यूरोपियन यात्रियों को जाना
पड़ता था उन्हें देख कर वे चकित रह जाते थे । निस्सन्देह आबादी और
ख़ुशहाली दोनों के लिहाज़ से मुग़ल समय का भारत, केवल एक चीन को
छोड़ कर, संसार के अन्य समस्त देशों से कहीं अधिक बढ़ा चढ़ा था ।
देशी भाषाओं की उन्नति
मुग़लों और उन दूसरे मुसलमानों के ऊपर भी जो बाहर से आकर
भारत में बसे भारतीय जीवन, भारतीय रहन सहन, और भारतीय विचारों
की छाप लगे बग़ैर न रह सकी । यहाँ तक कि भारत के मुसलमान दूसरे
देशों के मुसलमानों से अलग बिल्कुल भारतीय मुसलमान बन गए । भारत
वासियों से मुग़लों ने पान खाना सीखा । हिन्दोस्तानी भाषा को जिसे वे
पहले ज़बानेहिन्दवी कहते थे, उन्होंने अपनी भाषा बनाया । बाबर और
उसके साथी आरम्भ में ईरानी ज़बान बोलते थे । थोड़े ही दिनों में उन्होंने
अपने घरों में, दफ़्तरों में और दरबारों में हिन्दोस्तानी बोलनी शुरू की,
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मुग़लों का समय १६६
हिन्दोस्तानी उनकी मातृभाषा बन गई, किन्तु उनका साहित्य और सरकारी
पत्र व्यवहार फ़ारसी में जारी रहा । सन् १७२० के क़रीब उन्होंने साहित्य
के लिए भी हिन्दोस्तानी ही को अपनाना शुरू कर दिया । क़ुदरती तौर पर
इस हिन्दोस्तानी में फ़ारसी और तुरकी के अधिक शब्द आ गए, और शाही
दरबार में यह भाषा इस्तेमाल होने और दिन प्रति दिन मंजने लगी । इसी
से मुग़ल शासन के दिनों में उर्दू की नींव रखी गई । अन्तिम सम्राट
बहादुरशाह उर्दू का सुन्दर कवि था ।
दूसरी भारतीय भाषाओं ने भी मुग़ल समय में अपूर्व उन्नति की ।
जदुनाथ सरकार लिखता है—
“अकबर ही के अधीन हिन्दी में तुलसीदास और बङ्गला
में वैष्णव लेखकों के प्रताप एक ज़बरदस्त हिन्दू साहित्य देश की
भाषाओं में पैदा हुआ । सम्राट अकबर ही ने इस देश में एक
सच्चे राष्ट्रीय दरबार को जन्म दिया और अकबर के अधीन
भारतीय मस्तिष्क का बहुत बड़ा उत्थान हुआ ।”*
मुग़ल साम्राज्य से पहले भी बङ्गाल और दक्खिन के मुसलमान
शासकों के अधीन वहाँ के देशी साहित्य ने बहुत उन्नति की थी । दिनेश-
चन्द्र सेन, जिसकी पुस्तक बङ्गला भाषा और बङ्गला साहित्य के इतिहास
पर अत्यन्त प्रामाणिक मानी जाती है, लिखता है—
“बङ्गला भाषा को साहित्य के पद तक पहुंचाने में कई
प्रभावों ने काम किया है, जिनमें निस्सन्देह एक सब से अधिक
महत्वपूर्ण प्रभाव मुसलमानों का बङ्गाल विजय करना था । यदि
- Mughal Administration, p. 146.
१७० पुस्तक प्रवेश
हिन्दू राजा स्वाधीन बने रहते तो बङ्गला भाषा को राजाओं के
दरबारों तक पहुंचने का मुश्किल से ही मौक़ा मिल सकता था ।”*
बङ्गाल के मुसलमान शासकों ने विद्वान पण्डितों को नियुक्त करके,
रामायण और महाभारत का संस्कृत से बङ्गला में अनुवाद कराया । बङ्गाल
के मुसलमान शासक नसीरशाह ने चौदवीं सदी के शुरू में महाभारत का
बङ्गला में अनुवाद कराया । मैथिल कवि विद्यापति ने इस विषय में नसीर-
शाह और सुलतान गयासुद्दीन की ख़ूब प्रशंसा की है । राजा कंस के
उत्तराधिकारी ने इसलाम मत स्वीकार किया । कंस के दरबार में मुसलमानों
का प्रभाव बहुत अधिक था । रामायण के अनुवादक कृत्तिवास को उस
दरबार से पूरी सहायता मिलती थी । सम्राट हुसेनशाह ने मलधर वसु द्वारा
भागवत का बङ्गला में अनुवाद कराया और इसके इनाम में मलधर वसु को
गुनराज ख़ाँ का ख़िताब दिया । हुसेनशाह के सेनापति परङ्गल ख़ाँ ने
महाभारत का एक दूसरा बङ्गला अनुवाद कवीन्द्र परमेश्वर से कराया ।
परङ्गल ख़ाँ के बेटे चट्टग्राम के शासक छोटे ख़ाँ ने श्रीकरण नंदी से महाभारत
के अश्वमेध पर्व का अनुवाद कराया । एक मुसलमान अलाउल ने मलिक
मोहम्मद जायसी की हिन्दी पुस्तक पद्मावत का बङ्गला में अनुवाद किया ।
अलाउल ने कुछ फ़ारसी किताबों का भी बङ्गला में अनुवाद किया ।
दिनेशचन्द्र सेन लिखता है—
“इस तरह की मिसालें बेहद मिलती हैं जिनमें कि
मुसलमान सम्राटों और सरदारों ने संस्कृत और फ़ारसी के ग्रन्थों
- Dinesh Chandra Sen History of Bengali Language and Literature,
p. 10.
मुग़लों का समय १७१
का अपनी ओर से बङ्गला में अनुवाद कराया, और दूसरों को
इस तरह के कामों में मदद दी × × × जब कि बङ्गाल के बलवान
मुसलमान बादशाहों ने देश की भाषा को अपने दरबारों में यह
उच्च स्थान प्रदान किया तो कुदरती तौर पर हिन्दू राजाओं ने
उनका अनुसरण किया × × × इस तरह हिन्दू राजाओं के
दरबारों में बङ्गाली कवियों की नियुक्ति का रिवाज मुसलमान
बादशाहों की देखा देखी शुरू हुआ ।”*
बङ्गाल के मुसलमान बादशाहों के समान दक्खिन के बहमनी बाद-
शाहों ने भी वहाँ के साहित्य और कलाकौशल को खूब उन्नति दी।
आदिलशाही बादशाहों के दफ़्तरों में मराठी भाषा का उपयोग किया जाता
था और मराठों को माल और सेना विभाग के उच्च पदों पर नियुक्त किया
जाता था। क़ुतुबशाह दक्खिनी ख़ुद मराठी भाषा का सुन्दर कवि था और
साहित्य का बड़ा प्रेमी था। मराठी भाषा में हिन्दी और फ़ारसी दोनों
भाषाओं के शब्दों ने खूब प्रवेश किया।
हिन्दी, उर्दू, बङ्गला और मराठी के अलावा और उन्हीं के समान
पञ्जाबी और सिन्धी भाषाओं और उनके साहित्य ने भी मुसलमानों के
समय में भारत में अपूर्व उन्नति की। वास्तव में वह समय प्राचीन संस्कृत
के स्थान पर देशी भाषाओं के उत्थान का समय था। हिन्दुओं और
मुसलमानों का जीवन इस विषय में इतना गुथा हुआ था कि मिश्रबन्धुओं
ने अपनी पुस्तक में अनेक मुसलमान हिन्दी कवियों की और दिल्ली के
- History of Bengali Language and Literature, by Didesh Chandra
Sen, pp. 13, 14.
१७२ पुस्तक प्रवेश
मुन्शी श्रीराम ने अपनी पुस्तक में उर्दू के अनेक हिन्दू कवियों की सूची दी
है। हिन्दी, मराठी, बङ्गला इत्यादि समस्त भारतीय भाषाओं पर मुसलिम
शासन, फ़ारसी और तुरकी शब्दों और मोहावरों का अभी तक अमिट
प्रभाव मौजूद है।
साहित्य और विज्ञान की उन्नति
विज्ञान के मैदान में भी भारत की वैद्यक, गणित और ज्योतिष ने
आरम्भ के दिनों में अरब विचारों और अरब पुस्तकों द्वारा यूनानी वैज्ञानिक
विचारों से अपने ज्ञान कोष को ख़ासी उन्नति दी। सत्रवीं सदी के अन्त
या अठारवीं सदी के शुरू में महाराजा जयसिंह ने हिन्दू पञ्चाङ्ग का सुधार
करने के लिये जयपुर, मथुरा, देहली और बनारस में मान मन्दिर बनवाए
और अरबी ग्रन्थ 'अलमजस्ती' का संस्कृत में अनुवाद कराया। भारतीय
वैद्यक ने अनेक नई चीज़ें, ख़ासकर तेज़ाबों और कीमिया के क्षेत्र में, अरबों
से सीखीं। कई तरह के नए धंधे मसलन काग़ज़ बनाना, क़लई करना,
चीनी मिट्टी के बरतन और कई तरह के धातों के काम भारत में मुसलमानों
के समय से प्रचलित हुए। इसी तरह वस्त्रों, भोजन, सङ्गीत, रहन सहन
इत्यादि में भी मुसलमानों के समय में भारतीय जीवन में गहरे और बहु-
मूल्य परिवर्तन हुए।
वास्तव में जैसा हम ऊपर लिख चुके हैं, भारत के अन्दर उस समय
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक नई समन्वयात्मक सभ्यता का विकास हो रहा
था, जो न हिन्दू थी न मुसलमान, न वैदिक थी न बौद्ध, बल्कि जो शुद्ध
भारतीय थी, इन सब अलग अलग सभ्यताओं के मेल से बनी थी और जो
मुग़लों का समय १७३
प्राचीन भारतीय सभ्यताओं या अरब और ईरान की विदेशी सभ्यताओं
दोनों के सर्वोच्च गुण लिए हुए, उन सब से ऊँची थी । हिन्दू अपने प्राचीन
जात पाँत के भेदों, अनेक तरह के देवी देवताओं की पूजा, आडम्बरयुक्त
कर्मकाण्ड, पुरोहितों के प्रभुत्व, असंख्य अन्धविश्वासों और सदियों की
सङ्कीर्णता को तिलाञ्जलि दे, मानव समता, एक ईश्वरवाद और प्रेम और
सदाचार के महत्व की ओर बढ़ते हुए दिखाई दे रहे थे । भारत का इसलाम
अरब के प्रारम्भिक इसलाम से भिन्न एक नई ही सुन्दर वस्तु बन रहा था
और मुसलमान सूफ़ी हिन्दुओं के अनेक उच्च दार्शनिक सिद्धान्तों और योग
प्राणायाम जैसी विधियों को अपना कर उन्हें इसलाम का एक अङ्ग बना रहे
थे । कबीर, दादू, नानक और बाबा फ़रीद जैसे सैकड़ों हिन्दू और
मुसलमान फ़क़ीर महात्मा अलग अलग धर्मों और सम्प्रदायों की बनावटी
और हानिकर दीवारों को तोड़ कर मनुष्य मात्र को प्रेम का और एक
सार्वजनिक उच्चतम सच्चे मानव धर्म का उपदेश दे रहे थे । शिल्प, विज्ञान,
कला कौशल, साहित्य और सामाजिक रहन सहन में नए और उच्चतर
आदर्शों का प्रादुर्भाव हो रहा था । भारत की विविध प्रान्तीय भाषाएँ पहली
बार अपने अन्दर उच्च और स्फूर्तिदायक साहित्य को जन्म दे रही थीं ।
समस्त देश सुख चैन और ख़ुशहाली की ओर बढ़ रहा था । एक देश और
एक राष्ट्र के भाव मानव प्रेम के रंग में रङ्ग कर समस्त भारत को एक समान
उच्चतर और पवित्रतर जीवन की ओर ले जा रहे थे ।
सम्राट अकबर
लगातार कई सौ साल से बढ़ते हुए और लहलहाते हुए इस राष्ट्रीय
वृक्ष का सब से सुन्दर, सब से महान और सब से गौरवान्वित पुष्प सोलवीं
१७४ पुस्तक प्रवेश
सदी के मध्य में सुप्रसिद्ध सम्राट अकबर के रूप में आकर खिला । प्रसिद्ध
अंगरेज़ विद्वान एच० जी० वेल्स सम्राट अकबर के विषय में लिखता है—
“हर इस तरह के पक्षपात से शून्य—जो समाज के टुकड़े
टुकड़े करके मतभेद पैदा करते हैं, दूसरे धर्मों के लोगों की ओर
उदार, हिन्दू या द्रविड़ समस्त जातियों के लोगों की ओर
समदर्शी, वह एक इस तरह का मनुष्य था जो साफ़ साफ़ अपने
साम्राज्य भर की परस्पर विरोधी जातियों और श्रेणियों को मिलाकर
एक प्रबल, और समृद्ध राष्ट्र बना देने के लिए पैदा हुआ था ।”*
एक दूसरे स्थान पर एच० जी० वेल्स लिखता है—
“एक सच्चे नीतिज्ञ के समान उसमें समन्वय की
स्वाभाविक प्रवृत्ति मौजूद थी। उसने निश्चय किया कि मेरा साम्राज्य
न मुसलिम होगा न मुग़ल, न राजपूत होगा न आर्य, न द्रविड़
होगा न हिन्दू, न उच्च जातियों का होगा न नीच जातियों का,
मेरा साम्राज्य भारतीय साम्राज्य होगा ।”†
अकबर भारत की उन राष्ट्रीय लहरों का केवल मूर्तिमान फल था जो
- Free from all those prejudices which separate society and create
dissensions, tolerant to men of other beliefs, impartial to men of other races,
whether Hindoo or Dravidian, he was a man obviously marked out to weld
the conflicting elements of his kingdom into a strong and prosperous whole.
"—The Outline of History, by H. G. Wells, London, p 455.
† "His instinct was the true statesman's instinct for synthesis. His
Empire was to be neither a Moslem nor a Mughal one, nor was it to be
Rajput or Ariyan or Dravidian, or Hindoo or high or low caste, it was to be
Indian."—Ibid, p. 454.
دربار نو رتن اکبری
दरबार नौरतन
[...] of the curator [...]
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मुग़लों का समय १७५
अकबर के सैकड़ों साल पहले से भारत में चल रही थीं और जो अकबर के
बाद तक भी अपना काम करती रहीं। धार्मिक विषय में अकबर ने कबीर के
ज्वलन्त उपदेशों से शिक्षा और प्रोत्साहन लिया। सम्राट हर्ष अकबर से
कई सौ साल पहले प्रयाग में शिव, बुद्ध, और सूर्य तीनों के मन्दिरों में
जाकर बारी बारी पूजा किया करता था। बंगाल में सम्राट हुसेनशाह द्वारा
'सत्यपीर' की पूजा का प्रचार जिसे हज़ारों हिन्दू और मुसलमान एक समान
मानते थे, अकबर के धार्मिक विचारों का एक प्रारम्भिक रूप था। फिर
भी अकबर का व्यक्तित्व और उसका लक्ष्य दोनों निराले और अत्यन्त
महान थे।
धार्मिक क्षेत्र में अपने 'अल्लाह उपनिषद्' और 'दीने इलाही' द्वारा
उसने एक सरल सार्वजनिक धर्म की नींव रखने की कोशिश की। सामाजिक
जीवन में उसने हज़ारों साल की उस प्रथा को, जिसके अनुसार हर विजेता
अपने युद्ध के क़ैदियों को गुलाम बना लिया करता था, सन् १५७३ में
क़ानूनन् बन्द कर दिया। बलात् वैधव्य, बालविवाह, बहुविवाह, धर्म के नाम
पर पशुबलि और सतो को प्रथा को उसने यथाशक्ति बन्द करने का प्रयत्न
किया। किन्तु उसने अपने किसी सुधार को भी तलवार के ज़ोर से चलाने
की चेष्ट नहीं की। .फ्रेडरिक आगस्टस लिखता है कि अकबर प्रति दिन
ग़रीबों में जितना भोजन वस्त्र इत्यादि तक़सीम किया करता था और
अपनी तीर्थ यात्राओं में जितना दान दिया करता था उसमें साम्राज्य की
आय का एक ख़ासा हिस्सा ख़र्च हो जाता था। स्त्री जाति की स्वतन्त्रता
का वह सच्चा पक्षपाती था। उसके हिन्दू मुसलिम विवाहों ने हिन्दू
मुसलिम सम्मिश्रण को और भी अधिक पक्की नींव पर क़ायम करने की
१७६ पुस्तक प्रवेश
चेष्टा की। अकबर ने एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र को अपनी आँखों के सामने
साक्षात करने का प्रयत्न किया। वास्तव में उसने एक नए भारत की रचना
करना चाहा। अकबर के स्वप्न सर्वथा पूरे न हो सके, किन्तु "उदारता और
खोज की जिस महान प्रवृत्ति" को उसने जन्म दिया वह अभी तक क़ायम
है और इसमें सन्देह नहीं कि जिस भारतीय राष्ट्रीयता को इस समय भारत
में जन्म देने का प्रयत्न किया जा रहा है उसका सब से पहला प्रवर्त्तक और
प्रचारक सम्राट अकबर ही था।
फ़्रेडरिक आगस्टस लिखता है—
"बहैसियत एक सेनापति के अकबर महान था, बहैसियत
राजनीतिज्ञ के वह नए समाज का निर्माणकर्ता था और सच्चे
मानवधर्म के एक क्रियात्मक व्याख्याता की हैसियत से आज तक
कोई उससे बढ़कर नहीं हुआ।" *
उस समय की हिन्दू मुसलिम संकीर्णता
सम्राट अकबर के बाद उसके दोनों उत्तराधिकारियों, जहाँगीर और
शाहजहाँ, ने एक दूसरे के बाद इसी नीति का अनुसरण किया और इसी
राष्ट्रीय प्रगति को बड़ी सुन्दरता के साथ जारी रखा। प्रगति और उसका
बल बढ़ता गया, यहाँ तक कि जैसा हम ऊपर लिख चुके हैं, शाहजहाँ का
समय भारतीय इतिहास में सबसे अधिक समृद्ध समय और अनेक अर्थों में
भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग था। किन्तु एकता, समता, उदारता और
- "Akbar was great as a general, as a statesman creative and down to
the present day he is unsurpassed as a practical exponent of genuine
humanity."—The Emperor Akbar. etc., by Frederick Augustus. p. 296.
मुग़लों का समय १७७
मानव प्रेम की जो लहरें उस समय भारत के अन्दर काम कर रही थीं वे
अभी तक भारतीय जीवन के समस्त क्षेत्र को पूरी तरह अपने वश में न कर
पाई थीं। निस्सन्देह उस समय इन शक्तियों का ज़ोर था और वह ज़ोर
दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा था। किन्तु दूसरी ओर हिन्दू धर्म और
इसलाम की प्राचीन संकीर्ण प्रवृत्तियाँ भी अभी तक समाप्त न हुई थीं।
रामानन्द ही के चेलों में यदि एक कबीर था तो दूसरा तुलसीदास । दोनों
महान थे, दोनों ईश्वर भक्त थे, दोनों का भारत को गर्व है, दोनों ने अपने
अपने ढङ्ग से भावी भारत की रचना में कम या ज़्यादा भाग भी लिया,
किन्तु एक ने अलग अलग धर्मों की दीवारों को तोड़ कर निःशङ्क भावी
सार्वजनिक मानव धर्म का उपदेश दिया और दूसरे का झुकाव अभी तक
जात पाँत युक्त मध्यमकालीन हिन्दुत्व की ओर था। वल्लभाचार्य इत्यादि
अनेक इस तरह की शक्तियाँ और ख़ास कर शैव और वैष्णव आचार्य समस्त
भारत में मौजूद थे जो राष्ट्र को भविष्य की ओर ले जाने के बजाय उसे
अभी तक भूतकाल की संकीर्णताओं में फँसाए रखने की ओर लगे हुए थे ।
मुसलमानों में भी जब कि एक ओर शरीयत के कर्मकाण्ड की परवा न करने
वाले सूफ़ी और दरवेश मौजूद थे, जो कबीर के समान एक मानवधर्म के प्रचारक
थे, दूसरी ओर इस तरह के अदूरदर्शी मुल्लाओं का भी अभी तक अभाव न
हुआ था जो अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ तीनों को काफ़िर बतलाते
थे। इन्हीं सङ्कीर्ण मुल्लाओं के पूर्वजों ने मनसूर को सूली पर चढ़ाया था
और शम्स तबरेज़ की ख़ाल खिंचवाई थी। निस्सन्देह संसार को किसी भी
दूसरी श्रेणी के लोगों से इतनी हानि न पहुंची जितनी विविध धर्मों के उन
पुरोहितों, पादरियों या मुल्लाओं से जो अपने धर्म के अन्तर्गत सच्चे भावों,
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सदाचार और मानव प्रेम की अवहेलना कर कर्मकाण्ड और रूढ़ियों में जन
सामान्य को फँसाए रखना और विविध मतों और सम्प्रदायों को एक दूसरे
से पृथक करने वाली, मानव समाज के टुकड़े करने वाली, कृत्रिम दीवारों
को बनाए रखना अपना सबसे बड़ा कर्तव्य समझते हैं। दुर्भाग्यवश अलग
अलग मतों के पुरोहितों या मुल्लाओं का व्यक्तिगत हित भी इसी में होता
है। जिस समय भारत में कबीर और अकबर जैसों की चलाई हुई लहरें
इन सङ्कीर्ण प्रवृत्तियों को सदा के लिए अन्त करने वाली ही थीं, ठीक उस
समय, आज से पौने तीन सौ साल पहले, वह दुर्घटना हुई जिसने इस
समस्त राष्ट्रीय प्रगति को उलट पुलट कर दिया।
दाराशिकोह और औरङ्गज़ेब
शाहजहाँ का बड़ा लड़का दाराशिकोह अपने पिता, पितामह और
प्रपितामह के समान भारत की इस राष्ट्रीय प्रगति का सच्चा प्रतिनिधि, उसका
भक्त और अनुयाई था। दाराशिकोह प्रसिद्ध हिन्दू सन्त बाबालाल का
शिष्य था। दाराशिकोह की फ़ारसी पुस्तक 'नादिरुन्निकात', जिसमें दारा ने
अपने गुरु बाबालाल के साथ अपने वार्तालाप को बयान किया है, वेदान्त
के ऊपर फ़ारसी के सर्वोत्तम ग्रन्थों में गिनी जाती है। दारा के लिए ईश्वर
का सबसे प्यारा नाम 'प्रभु' था, जो उसकी मोहर तक में खुदा हुआ था।
दारा के छोटे भाई औरङ्गज़ेब ने दारा को हटा कर पिता की गद्दी पर बैठना
चाहा। देश की समस्त उन्नत शक्तियाँ स्वभावतः दारा की ओर थीं। विशेष
कर समस्त हिन्दू समाज दारा के पक्ष में था। दारा को शिकस्त देने के
लिए औरङ्गज़ेब को कट्टर मुल्लाओं और इसलाम की सङ्कीर्ण प्रवृत्तियों को
अपनी ओर करना पड़ा। देश की उन्नति में बाधा डालने वाली इन