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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

१७४ पुस्तक प्रवेश
सदी के मध्य में सुप्रसिद्ध सम्राट अकबर के रूप में आकर खिला । प्रसिद्ध
अंगरेज़ विद्वान एच० जी० वेल्स सम्राट अकबर के विषय में लिखता है—
“हर इस तरह के पक्षपात से शून्य—जो समाज के टुकड़े
टुकड़े करके मतभेद पैदा करते हैं, दूसरे धर्मों के लोगों की ओर
उदार, हिन्दू या द्रविड़ समस्त जातियों के लोगों की ओर
समदर्शी, वह एक इस तरह का मनुष्य था जो साफ़ साफ़ अपने
साम्राज्य भर की परस्पर विरोधी जातियों और श्रेणियों को मिलाकर
एक प्रबल, और समृद्ध राष्ट्र बना देने के लिए पैदा हुआ था ।”*
एक दूसरे स्थान पर एच० जी० वेल्स लिखता है—
“एक सच्चे नीतिज्ञ के समान उसमें समन्वय की
स्वाभाविक प्रवृत्ति मौजूद थी। उसने निश्चय किया कि मेरा साम्राज्य
न मुसलिम होगा न मुग़ल, न राजपूत होगा न आर्य, न द्रविड़
होगा न हिन्दू, न उच्च जातियों का होगा न नीच जातियों का,
मेरा साम्राज्य भारतीय साम्राज्य होगा ।”†
अकबर भारत की उन राष्ट्रीय लहरों का केवल मूर्तिमान फल था जो

  • Free from all those prejudices which separate society and create
    dissensions, tolerant to men of other beliefs, impartial to men of other races,
    whether Hindoo or Dravidian, he was a man obviously marked out to weld
    the conflicting elements of his kingdom into a strong and prosperous whole.
    "—The Outline of History, by H. G. Wells, London, p 455.
    † "His instinct was the true statesman's instinct for synthesis. His
    Empire was to be neither a Moslem nor a Mughal one, nor was it to be
    Rajput or Ariyan or Dravidian, or Hindoo or high or low caste, it was to be
    Indian."—Ibid, p. 454.