सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 727 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 195

मुग़लों का समय १६३
पास, औरंगज़ेब के दस्तख़ती परवाने मौजूद हैं जिनमें उन मन्दिरों को राज
की ओर से जागीरें दी गई हैं।
अमन और ख़ुशहाली के लिहाज़ से मुग़ल साम्राज्य का समय भारत
के इतिहास में निस्सन्देह स्वर्ण युग था। असंख्य यूरोपियन और एशियाई
यात्रियों की गवाहियाँ और उस समय के ऐतिहासिक उल्लेख इस विषय में
नक़ल किए जा सकते हैं। धन धान्य, और सुख सम्पत्ति की जो रेल पेल
भारत के अन्दर सम्राट शाहजहाँ के शासनकाल में देखने में आती थी वह
संसार के इतिहास में शायद ही कभी किसी दूसरे देश को नसीब हुई हो।
इतिहास लेखक मोरलैण्ड लिखता है कि विदेशी व्यापारी और यात्री
उन दिनों इस बात को देख कर चकित रह जाते थे कि भारत के नगरों में
लोगों के माल की रक्षा का कितना सुन्दर प्रबन्ध था। अनेक यात्री इस
बात की गवाही देते हैं कि अव्वल तो चोरियाँ होती ही बहुत कम थीं,
और यदि किसी नगर में चोरी हो जाती थी और माल बरामद न हो पाता
था तो नगर के कोतवाल को अपने पास से माल की क़ीमत भर देनी
पड़ती थी।*
हुमायूँ के दो शासनकालों के बीच के कुछ साल तक दिल्ली में शेरशाह
का शासन रहा। किन्तु फ्रेडरिक आगस्टस लिखता है कि “शेरशाह का
चन्दरोज़ा शासन भी हिन्दोस्तान की उन्नति के लिए अहितकर साबित न
हुआ, सड़कों के ऊपर आने जाने, माल के लाने ले जाने और व्यापारियों
की रक्षा का उसने इतना सुन्दर प्रबन्ध कर दिया कि जितना पहले न था।”†

  • India at the Death of Akbar, by Moreland, pp. 38, 39.
    † The Emperor Akbar, etc., by Frederick Augustus, p. 277.