भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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मानव प्रेम की जो लहरें उस समय भारत के अन्दर काम कर रही थीं वे
अभी तक भारतीय जीवन के समस्त क्षेत्र को पूरी तरह अपने वश में न कर
पाई थीं। निस्सन्देह उस समय इन शक्तियों का ज़ोर था और वह ज़ोर
दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा था। किन्तु दूसरी ओर हिन्दू धर्म और
इसलाम की प्राचीन संकीर्ण प्रवृत्तियाँ भी अभी तक समाप्त न हुई थीं।
रामानन्द ही के चेलों में यदि एक कबीर था तो दूसरा तुलसीदास । दोनों
महान थे, दोनों ईश्वर भक्त थे, दोनों का भारत को गर्व है, दोनों ने अपने
अपने ढङ्ग से भावी भारत की रचना में कम या ज़्यादा भाग भी लिया,
किन्तु एक ने अलग अलग धर्मों की दीवारों को तोड़ कर निःशङ्क भावी
सार्वजनिक मानव धर्म का उपदेश दिया और दूसरे का झुकाव अभी तक
जात पाँत युक्त मध्यमकालीन हिन्दुत्व की ओर था। वल्लभाचार्य इत्यादि
अनेक इस तरह की शक्तियाँ और ख़ास कर शैव और वैष्णव आचार्य समस्त
भारत में मौजूद थे जो राष्ट्र को भविष्य की ओर ले जाने के बजाय उसे
अभी तक भूतकाल की संकीर्णताओं में फँसाए रखने की ओर लगे हुए थे ।
मुसलमानों में भी जब कि एक ओर शरीयत के कर्मकाण्ड की परवा न करने
वाले सूफ़ी और दरवेश मौजूद थे, जो कबीर के समान एक मानवधर्म के प्रचारक
थे, दूसरी ओर इस तरह के अदूरदर्शी मुल्लाओं का भी अभी तक अभाव न
हुआ था जो अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ तीनों को काफ़िर बतलाते
थे। इन्हीं सङ्कीर्ण मुल्लाओं के पूर्वजों ने मनसूर को सूली पर चढ़ाया था
और शम्स तबरेज़ की ख़ाल खिंचवाई थी। निस्सन्देह संसार को किसी भी
दूसरी श्रेणी के लोगों से इतनी हानि न पहुंची जितनी विविध धर्मों के उन
पुरोहितों, पादरियों या मुल्लाओं से जो अपने धर्म के अन्तर्गत सच्चे भावों,
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