भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
मुग़लों का समय | १४९
ख़ाँ और उसके साथ के दूसरे मुग़लों ने पराजित ईरानियों और अरबों से
इसलाम मत की दीक्षा ली ।
भारत पर मुग़लों का सब से पहला हमला सन् १३९८ ईसवी में तैमूर
का हमला था । महमूद तुग़लक उस समय दिल्ली के तख़्त पर था । किन्तु
सिवाय चन्द रोज़ की लूट खसोट और संहार के जिसमें हिन्दू और मुसलमानों
का कोई फ़र्क़ नहीं किया गया और कोई असर तैमूर के हमले का भारत
पर न रह सका और न तैमूर १५ दिन से ज़्यादा दिल्ली में ठहर सका ।
मुग़लों का दूसरा हमला इस देश के ऊपर सन् १५२६ ईसवी में बाबर
का हमला था । उस समय तक मुग़ल अपनी जन्मभूमि मङ्गोलिया से कहीं
अधिक सभ्य देश ईरान में बरसों रह चुकने के सबब से चङ्गेज़ और तैमूर के
मुक़ाबले में कहीं अधिक सभ्य और सभ्यताप्रेमी बन चुके थे । पानीपत के
मैदान में बाबर ने इब्राहीम लोधी को शिकस्त दी और भारत में मुग़ल
साम्राज्य की नींव रक्खी ।
पानीपत की विजय के बाद ही बाबर ने भारत को अपना घर बना
लिया । हुमायूँ को छोड़कर उसके बाक़ी वंशज भारत ही में पैदा हुए ।
भारत में एक प्रधान शक्ति की ज़रूरत
सम्राट हर्षवर्धन के बाद से यानी ईसा की सातवीं सदी के मध्य से
सोलवीं सदी के शुरू तक क़रीब ९०० साल तक भारत के अन्दर कोई भी
प्रधान राजनैतिक शक्ति ऐसी उत्पन्न होने न पाई थी जो समस्त भारत को
एक शासन के सूत्र में बाँध सकती । ९०० साल के अन्दर भारत अनेक
छोटी बड़ी एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी रियासतों का युद्धक्षेत्र बना हुआ था ।
वह समय भारत के इतिहास में राजनैतिक निर्बलता, अनैक्य और अव्यवस्था
१४२ पुस्तक प्रवेश
का समय था । भारत को उस समय एक ऐसी प्रधान शक्ति की ज़बरदस्त
आवश्यकता थी जो सारे देश के ऊपर एक समान हुकूमत क़ायम कर सके,
देश की बिखरी हुई शक्तियों को एक सूत्र में बाँध सके, और देश व्यापी
शान्ति और सुशासन द्वारा जीवन के विविध क्षेत्रों में देश को अग्रसर होने
का मौक़ा दे सके। इतिहास इस बात का साक्षी है कि ईसा की सोलवीं
सदी से लेकर अठारवीं सदी तक दिल्ली के मुग़ल साम्राज्य ने भारत की इस
कमी को ख़ासी सुन्दरता के साथ पूरा किया। निस्सन्देह राजनीति,
सामाजिक व्यवस्था, उद्योग धन्धे, कला कौशल, समृद्धि, शिक्षा और
सुशासन की दृष्टि से भारत के समस्त इतिहास में मुग़ल साम्राज्य का समय
सबसे अधिक गौरवान्वित समय था ।
मुग़लों द्वारा उसका निर्माण
मुग़लों के समय से पहले प्रियदर्शी सम्राट अशोक और सम्राट समुद्रगुप्त
के साम्राज्य भारत में सब से अधिक विशाल साम्राज्य रह चुके थे। किन्तु
प्रोफ़ेसर जदुनाथ सरकार लिखता है कि मुग़ल साम्राज्य अपनी पराकाष्ठा
के समय अशोक और समुद्रगुप्त दोनों के साम्राज्यों से कहीं बड़ा था।
इसके अलावा अशोक या समुद्रगुप्त के दिनों में साम्राज्य के अन्दर विविध
प्रान्तों का जीवन एक दूसरे से इतना अच्छा गुथा हुआ न था। सबकी
अलग अलग भाषाएँ, अलग अलग शासन पद्धति और अलग अलग
जीवन। किन्तु जदुनाथ सरकार लिखता है—
“इसके विपरीत, अकबर के सिंहासन पर बैठने के समय से
मोहम्मदशाह की मृत्यु के समय तक (१५५६—१७४८), मुग़ल
शासन के इन दो सौ साल ने समस्त उत्तरी भारत और अधि-
मुग़लों का समय १४३
कांश दक्खिन को भी, एक सरकारी भाषा, एक शासन पद्धति,
एक समान सिक्के, और हिन्दू पुरोहितों या निश्चल ग्रामीण
जनता को छोड़ कर बाक़ी समस्त श्रेणियों के लोगों के लिए
एक व्यापक सर्वप्रिय भाषा प्रदान की। जिन प्रान्तों पर मुग़ल
सम्राटों का बराहरास्त शासन था ( यानी जिनके सूबेदार दिल्ली
सम्राट की ओर से नियुक्त किए जाते थे ), उनसे बाहर भी आस
पास के हिन्दू राजा, कम या अधिक, मुग़लों की शासन प्रणाली,
उनकी सरकारी परिभाषाओं, उनके दरबारी शिष्टाचार, और
उनके सिक्कों का उपयोग करते थे ।
“मुग़ल साम्राज्य के अन्दर बीस भारतीय 'सूबे' थे। इन
सब सूबों पर ठीक एक प्रणाली के अनुसार शासन किया जाता
था, सब में एक शासन विधि का पालन किया जाता था, और
विविध सरकारी ओहदों के नाम और उपाधियाँ सब में एक
समान थीं। तमाम सरकारी मिसलों, फ़रमानों, सनदों, माफ़ियों
राहदारी के परवानों, पत्रों, और रसीदों में एक फ़ारसी भाषा
का उपयोग किया जाता था। साम्राज्य भर में एक समान वज़न,
एक से मूल्य, एक नाम और एक सी धातु के सिक्के प्रचलित थे,
केवल जिस शहर की टकसाल का कोई सिक्का बना होता था उस
शहर का नाम उस पर और खुदा होता था। सरकारी कर्मचारियों
और सिपाहियों का अक्सर एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में तबादला
होता रहता था। इस तरह एक प्रान्त के रहने वाले दूसरे प्रान्त
में पहुँच कर उसे क़रीब क़रीब अपने घर की तरह समझने लगते
१४४ पुस्तक प्रवेश
थे। सौदागर और यात्री निहायत आसानी से एक शहर से दूसरे
शहर और एक सूबे से दूसरे सूबे आ जा सकते थे, और एक
साम्राज्य की छाया में सब लोग इस विशाल देश की एकता को
अनुभव करते थे।” ❀
इतिहास कला
मुसलमानों के आने से पहले का हिन्दुओं का लिखा हुआ ऐतिहासिक
साहित्य अव्वल तो है ही बहुत कम, और जो है भी उसमें तिथियों का
क़रीब क़रीब अभाव है। इसके विपरीत अरबों के लिखे हुए इतिहासों,
यात्रा वृत्तान्तों और जीवन चरित्रों में सदा ठीक ठीक तिथि दर्ज होती है।
- " . . . . On the other hand, the two hundred years of Mughal rule,
from the accession of Akbar to the death of Mohammad Shah (1556-1749),
gave to the whole of Northern India and much of the Deccan also, oneness
of the official language, administrative system and coinage and also a popular,
lingua franca for all classes except the Hindoo priests and the stationary
village folk. Even outside the territory directly administered by the Mughal
Emperors, their administrative system, official nomenclature, court etiquette
and monetary type were borrowed, more or less, by the neighbouring
Hindoo Rajas.
"All the twenty Indian subahs of the Mughal Empire were governed
by means of exactly the same administrative machinery, with exactly the
same procedure and official titles. Persian was the one language used in all
office records, farmans, sanads, landgrants, passes, despatches and receipts.
The same monetary standard prevailed throughout the Empire, with coins
having the same names, the same purity and the same denominations, and
differing only in the name of the mint-town. Officials and soldiers were
frequently transferred from one province to another. Thus, the native of
one province felt himself almost at home in another province; traders and
travellers passed most easily from city to city, subah to subah, and all realised
the imperial oneness of this vast country."—Mughal Administration, by
Jadunath Sarkar, pp. 129, 130.
मुग़लों का समय १४२
प्रोफेसर जदुनाथ सरकार का कहना है कि भारतवासियों को दूसरा लाभ
[जो मुसलमानों से पहुँचा वह इस देश के अन्दर ऐतिहासिक साहित्य का
प्रारम्भ था।
दूसरे देशों से सम्बन्ध
बौद्धमत के बाद से बाहर के देशों के साथ भारत का सम्बन्ध भी कम
होता जा रहा था । तिजारत गिरती जा रही थी । मुग़लों के शासन काल
में भारत का सम्बन्ध बाहर के अन्य देशों के साथ फिर से क़ायम हुआ ।
मुग़ल साम्राज्य के क़रीब क़रीब आख़िर तक अफ़ग़ानिस्तान दिल्ली के
सम्राट् के अधीन था, और अफ़ग़ानिस्तान के ज़रिए बुख़ारा, समरकन्द,
बलख़, खुरासान, ख़्वारज़िम और ईरान से हज़ारों यात्री और व्यापारी
भारत आते जाते थे । सम्राट् जहांगीर के दिनों में तिजारती माल से लदे
हुए चौदह हज़ार ऊँट हर साल केवल बोलन दर्रे से होकर भारत आते
जाते थे । इसी तरह पच्छिम में ठट्ठा, भड़ोच, सूरत, चाल, राजापुर, गोश्रा
और कारवार, और पूरब में मछलीपट्टन और दूसरे बन्दरगाहों से हज़ारों
जहाज़ हर साल अरब, ईरान, टरकी, मिश्र, अफ़्रीका, लङ्का, सुमात्रा, जावा,
स्याम और चीन आते जाते रहते थे । जदुनाथ सरकार इसे भारत के ऊपर
मुग़ल साम्राज्य का तीसरा उपकार बताता है ।
धार्मिक और सामाजिक एकता
चौथा उपकार प्रोफेसर सरकार की राय में भारत की उन धार्मिक
और सामाजिक लहरों का और अधिक ज़ोरों के साथ फैलना था, जिनका
हम ऊपर विस्तार के साथ ज़िक्र कर चुके हैं । पाँचवाँ शिल्पकला और
चित्रकारी की अपूर्व उन्नति और उसका विस्तार ।
१०
१५६ पुस्तक प्रवेश
युद्ध विद्या, सैनिक व्यवस्था और क़िलेबन्दी के कामों ने भी जो उन्नति
मुग़लों के समय में की उतनी पहले कभी न की थी। बन्दूक़ों और तोपों
का रिवाज तमाम भारत में अधिकतर मग़लों ही के समय से फैला।
विशेष कर उत्तर भारत के रहन सहन और वेश भूषा में मुसलमानों
का साफ़ प्रभाव दिखाई देता है। हिन्दी, बङ्गला और मराठी भाषाओं में
इस समय तक असंख्य फ़ारसी, अरबी और तुरकी शब्द भरे हुए हैं। उत्तर
भारत में यदि किसी हलवाई की दूकान पर मिठाइयों के नाम गिने जायँ
तो उनमें बालूशाही, गुलाब जामुन, बरफ़ी, हलवा, कलाकन्द, खुरमा
इत्यादि अधिकांश नाम मुसलमानी हैं और इनमें से अधिकांश मिठाइयाँ
मुग़ल समय की ईजाद हैं। यहाँ तक कि हिन्दुओं के विवाह जैसे संस्कार
में भी सेहरा, और जामा जैसी चीज़ों का अभी तक उपयोग किया जाता है।
भारत की प्राचीन ग्राम पञ्चायतों और उनके अधिकारों में मुग़लों ने
किसी तरह का भी हस्तक्षेप नहीं किया। जदुनाथ सरकार लिखता है—
“उन्होंने बुद्धिमत्ता के साथ ग्राम शासन की पुरानी पद्धति
को और लगान वसूल करने के पुराने हिन्दुओं के तरीक़े को
ज्यों का त्यों जारी रक्खा, यहाँ तक कि लगान के मोहकमें
में अधिकतर केवल हिन्दू ही नौकर रक्खे जाते थे, नतीजा यह
हुआ कि राजधानी के अन्दर राजकुल के बदल जाने से हमारे
करोड़ों ग्रामवासियों के जीवन पर किसी तरह का अहितकर
प्रभाव न पड़ता था।”*
• Ibid, p. 139.
मुग़लों का समय १४७
मुग़लों की प्रजा पाळकता
किसानों को और रैय्यत को मुग़ल सम्राटों के समय में ख़ास सहायता
दी जाती थी और उनकी हर तरह रक्षा की जाती थी। जिस समय कोई
नया सूबेदार नियुक्त किया जाता था तो उसे और बातों के साथ साथ यह
आदेश दिया जाता था—
“रय्यत को इस बात के लिए प्रोत्साहन देना कि वे खेती
को उन्नति दें और अपने पूरे दिल से खेती बाड़ी को बढ़ाएँ। कोई
चीज़ उनसे ज़बरदस्ती न छीनना। याद रखना कि रय्यत
ही राज की आमदनी का एक मात्र स्थाई ज़रिया है। × × ×
“× × × इस बात का ख़याल रखना कि बलवान
निर्बलों पर अत्याचार न करें।”*
इसी तरह जब किसी प्रान्त के लिए नया सूबेदार नियुक्त होता था तो
सम्राट का वज़ीर, जिसे दीवाने आला कहते थे, उसे जो हिदायतें करता
था, उनमें से एक यह होती थी—
“ख़याल रखना कि बलवान निर्बलों पर अत्याचार न करें।
तमाम अत्याचारियों को दबा कर रखना।”†
- “Encourage the ryots to extend the cultivation and carry on
agriculture with all their hearts. Do not screw anything out of them.
Remember that the ryots are permanent that is the only permanent source
of income to the State.
“ . . . . . See that the strong may not oppress the weak.”—Ibid,
p. 85, 86.
† Ibid, p. 81.
१४८ पुस्तक प्रवेश
हर प्रान्त में सूबेदार या नाज़िम के अलावा एक दीवान होता था ।
सूबेदार का काम फ़ौज का इन्तज़ाम, शासन प्रबन्ध और न्याय करना होता
था । दीवान का काम लगान वसूल करना । हर दीवान की नियुक्ति की
सनद में लिखा होता था कि उसका सब से मुख्य काम "खेती के काम को
और ग्रामों की आबादी को बढ़ाना" है । लगान की वसूली में खेतिहर के
साथ किसी तरह की ज़बरदस्ती की इजाज़त न थी । एक हिदायत हर सनद
में यह होती थी कि—
"यदि किसी आमिल के इलाक़े में कई साल की लगान
की बक़ाया चली आती है, तो तुम उस रक़म को किसानों से
बहुत आसान क़िस्तों में वसूल करना, यानी बक़ाया का केवल
पाँच फ़ीसदी हर फ़सल के मौके पर वसूल करना ।"*
इसी तरह फ़ौजदारों, थानेदारों, करोड़ियों, तहसीलदारों इत्यादि सब
को हिदायत होती थी कि किसानों को किसी तरह का कष्ट न पहुँचाएँ ।
उस समय के किसानों की हालत
जदुनाथ सरकार, मुग़ल साम्राज्य के दिनों के भारतीय किसानों की
उस समय के फ़्रांस और आयरलैण्ड के किसानों से तुलना करते हुए,
लिखता है—
"किन्तु फ़र्क़ यह था कि अंगरेज़ों के आने से पहले (मुग़ल-
भारत में) किसी किसान को लगान अदा न करने के क़सूर
में ज़मीन से बेदख़ल न किया जाता था, कोई किसान भूखा न
था ।" x x x बटाई की प्रथा के अनुसार चूँकि लगान पैदावार
- Ibid, p. 88.
मुग़लों का समय १४६
की शक्ल में लिया जाता था, किसान को बड़ा फ़ायदा रहता
था, क्योंकि लगान की अदायगी हर साल की असली पैदावार
पर निर्भर होती थी । इसके ख़िलाफ़ आज कल का लगान रुपयों
की शक्ल में नियत होता है जिसका उस साल की पैदावार के
साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता ।”
हर मुग़ल सम्राट की तरफ़ से तमाम सूबों के कर्मचारियों और सामन्त
नरेशों के नाम बार बार इस मज़मून की आज्ञाएँ निकलती रहती थीं कि
किसी किसान के साथ लगान की वसूली में या किसी मामले में किसी
तरह की ज़बरदस्ती न की जाय और कोई नाजायज़ रक़म या 'अबवाब'
किसी से वसूल न की जाय ।
इतिहास लेखक फ्रेडरिक आगस्टस लिखता है कि—
“जब कभी सम्राट की सेना ग्रामों में से होकर निकलती थी
और उनके कूच की वजह से किसान के माल को हानि पहुँचती
थी या उसकी बरबादी होती थी, तो विश्वस्त आदमी इस बात के
लिए नियुक्त किए जाते थे कि वे उस हानि या बरबादी के मूल्य
का ठीक ठीक तख़मीना लगाएँ । तख़मीना लगाने के बाद ये
लोग या तो उस रक़म को किसान के सरकारी लगान में से कम
कर देते थे या व्यर्थ की शिकायतों और बहसों से बचने के लिए
उसी समय किसानों के दावे के अनुसार उन्हें रक़म अदा कर
देते थे ।”*
- The Emperor Akbar, etc., by Frederick Augustus, translated by A. S
Beveridge, pp. 273-77
१५० पुस्तक प्रवेश
औरंगज़ेब का एलान
सन् १६७३ में सम्राट् औरंगज़ेब ने अपने साम्राज्य भर में एक एलान
प्रकाशित किया, जिसमें ५४ चीज़ों की एक सूची दी गई थी और लिखा
था कि इनमें से किसी के ऊपर प्रजा से किसी तरह का महसूल आदि न
लिया जाय । इसी एलान में सम्राट् ने राज कर्मचारियों और ज़मींदारों को
आज्ञा दी कि किसी किसान से किसी तरह की भी 'भेंट या बेगार' न ली
जाय । इन ५४ चीज़ों में मछली, तेल, घी, दूध, दही, उपले, तरकारियाँ,
घास, ईंधन, मिट्टी के बरतन, ऊँट, गाड़ियाँ, चरागाह, सड़कों की रहदारी
का महसूल, नदियों के घाटों का महसूल, रुई, गन्ना, रस, कपड़े की छपाई,
इत्यादि भी शामिल थीं। इसी एलान में लिखा था कि गंगा या अन्य
तीर्थों में नहाने वालों से या अपने मुर्दों की अस्थियाँ गंगा में ले जाने वाले
हिन्दुओं से किसी तरह का महसूल न लिया जाय ।
इस तरह की आज्ञाएँ सम्राट अकबर के समय से लेकर बराबर निकलती
रहती थीं । हर नए सम्राट को अपने तख़्त पर बैठने के समय या कभी कभी
अपने शासन काल में एक से अधिक बार उन्हें इसलिए दोहराते रहना या
कभी कभी बदलना पड़ता था ताकि कोई सामन्त या कर्मचारी इस विषय
में असावधान न हो जाय । जदुनाथ सरकार लिखता है—
“उस समय के इतिहासों और पत्रों से ज़ाहिर है कि मुग़ल
साम्राज्य के अधिराज की नीति सदा यही होती थी कि रय्यत पर
किसी तरह का अत्याचार न होने पाए । यह बात साबित की
जा सकती है कि यह नीति केवल एक शुभ कामना ही न थी,
बल्कि यही उस समय की सच्ची हालत थी । शाहजहाँ और
मुग़लों का समय १५१
औरंगज़ेब के समय की अनेक ऐसी घटनाएँ उस समय के इतिहास
में मिलती हैं, जिनमें कि ज्योंही माल के मोहकमे के किसी
कर्मचारी, या किसी प्रान्त के सूबेदार की सख़्ती या ज़बरदस्ती की
कोई शिकायत प्रजा की ओर से सम्राट के कानों तक पहुँची,
तुरन्त उस राजकर्मचारी को या उस सूबेदार तक को बरख़ास्त
कर दिया गया।”*
ऊपर के लेखक ने एक फ़ारसी दस्तावेज़ से मिसाल के तौर पर एक
घटना नक़ल की है, जिससे "साफ़ पता चलता है कि शाहजहाँ किसानों के
साथ इन्साफ़ करने, बल्कि उदारता का व्यवहार करने के लिए कितना
उत्सुक था।"
शाहजहाँ और किसान
एक दिन शाहजहाँ साम्राज्य के माल के काग़ज़ात का मुआयना कर
रहा था। उसने देखा कि किसी गाँव की उस साल की मालगुज़ारी पिछले
वर्षों की मालगुज़ारी से कई हज़ार अधिक दर्ज है। तुरन्त माल के मोहकमे
के प्रधान अफ़सर दीवाने आला सादुल्ला ख़ाँ को तलब किया गया। सम्राट
ने दीवान से मालगुज़ारी के बढ़ने की वजह पूछी। तहक़ीक़ात कराने पर
मालूम हुआ कि उस साल गाँव के पास की नदी कुछ पीछे को हट गई
- "The policy of the supreme head of the Mughal Government not to
commit any exaction on the ryot is manifest from the contemporary histories
and letters, and can be proved to have been a reality and not merely a pious
wish. Several instances are recorded in the reigns of Shah Jahan and
Aurangzeb in which harsh and exacting revenue collectors and even pro-
vincial viceroys were dismissed on the complaints of their subjects reaching
the Emperor's ears. "-Ibid, p. 108
१२२ पुस्तक प्रवेश
थी जिससे गाँव की ज़मीन बढ़ गई थी । इसीलिए लगान बढ़ाया गया
था । सम्राट ने फिर दरियाफ़्त किया कि जो ज़मीन बढ़ी है, वह मामूली
ज़मीन के पास की है या माफ़ी की ज़मीन के पास की । मालूम हुआ कि
पास की ज़मीन माफ़ी की ज़मीन है। यह बात सुनते ही शाहजहाँ गुस्से
में भर कर चिल्ला पड़ा—
"उस जगह के यतीमों, बेवाओं और ग़रीबों की आाहोज़ारी
पर वहाँ की ज़मीन का पानी सूख गया है । यह उनको ख़ुदा की
एक देन थी, तुमने उसे राज के लिए छीनने का साहस किया !
यदि ख़ुदा के बन्दों के लिए दया का भाव मुझे न रोकता तो मैं
उस दूसरे शैतान को यानी उस ज़ालिम फ़ौजदार को, जिसने इस
नई ज़मीन से लगान वसूल किया है, फाँसी का हुकुम देता ।
अब उसे केवल बरख़ास्त कर देना उसके लिए काफ़ी सज़ा होगी,
ताकि दूसरे लोग भी आगाह हो जायें, और इस तरह की
बेइन्साफ़ी के बदकार न करें । हुकुम जारी कर दो कि तुरन्त
जितना ज़्यादा लगान वसूल किया गया है वह सब जिन किसानों
से लिया गया है, उन्हें फ़ौरन वापस कर दिया जाय ।"*
सन् १६६२ में उड़ीसा प्रान्त के दीवान मोहम्मद हाशिम ने कुछ नए
'करोड़ी' (लगान वसूल करने वाले कर्मचारी) इसलिए नियुक्त किए क्योंकि
इन लोगों ने पुराने करोड़ियों की निस्बत अपने इलाक़ों से अधिक लगान
वसूल करके भेजने का वादा किया था । तुरन्त समाचार मिलते ही मोहम्मद
हाशिम को बरखास्त कर दिया गया ।
- India Office Library, Persian Manuscript, No. 370, interleaf facing folio 68.
मुग़लों का समय १५३
'अबवाब' की वसूली के ख़िलाफ़ आज्ञाएँ फ़ीरोज़शाह तुग़लक़ (सन्
१३७२) के समय से सम्राट् अकबर (१५६०) के समय तक और उसके
बाद क़रीब क़रीब हर मुग़ल सम्राट् के समय में बराबर जारी होती रहती थीं।
मुग़ल सम्राट् अपनी विशाल प्रजा के सुख दुख से बेख़बर भी न रहते
थे। मुग़ल समय में 'वाक़े नवीसों', 'सवाने नवीसों', 'अख़बार नवीसों',
'ख़फ़िया नवीसों' इत्यादि का एक ज़बरदस्त मोहकमा था, जिसके ज़रिए
साम्राज्य के कोने कोने की ख़बरें दिल्ली सम्राट् के कानों तक पहुँचती
रहती थीं।
निस्सन्देह किसानों के सुख और उनकी समृद्धि का भारत के लिखे हुए
इतिहास में किसी समय भी इतना अच्छा और व्यवस्थित प्रबन्ध न था
जितना मुग़ल सम्राटों के समय में। यही वजह है कि उस समय के अनेक
यूरोपियन और अन्य यात्री भारतीय ग्रामों की खुशहाली की मुक्तकण्ठ से
प्रशंसा करते हैं और लिखते हैं कि संसार के अन्य किसी भी देश में उस
समय किसानों की हालत इतनी अच्छी न थी। *
कोतवाल के कर्त्तव्य
मुग़ल साम्राज्य के अन्दर हर शहर में अन्य कर्मचारियों के अलावा एक
कोतवाल होता था, जिसके कामों में से एक काम यह भी होता था—
“कोतवाल का यह काम है कि शराब का खिंचना बिलकुल
बन्द कर दे। वह इसके लिए ज़िम्मेदार होता है कि शहर में कोई
वेश्या न रहे × × ×”†
- e. g. Bengal in 1756-57, by S. C. Hill, vol. i.
† Manucci, vol ii, pp. 420, 421.
१५४ पुस्तक प्रवेश
यह बयान एक विद्वान् यूरोपियन यात्री का है, जिसने औरङ्गज़ेब के
समय में स्वयं मुग़ल साम्राज्य की हालत को देखा था। हर कोतवाल की
सनद में लिखा होता था कि तुम्हारी यह ज़िम्मेदारी है कि तुम्हारे शहर में
कोई चोरी न होने पाए, शहर के लोग सुरक्षित रहें, और अमन के साथ
अपने व्यापार आदिक कर सकें।
हर इलाके के लिए एक, 'मुहतसिब' होता था, जिसका ख़ास काम यह
होता था कि शहर की हर गली में जाकर शराब बनने और बिकने के स्थानों,
जुआख़ानों आदि को ज़बरदस्ती बन्द कर दे। शायद हिन्दू साधुओं की
प्रथा का ख़याल करते हुए सूखे मादक द्रव्यों जैसे गाँजा, भाँग इत्यादि की
इतनी कड़ी मनाही न थी। मुहतसिब की हिदायतों में लिखा होता था कि
“शहरों के अन्दर शराब इत्यादि मादक द्रव्यों के बिकने की इजाज़त न
दो और न 'तवायफ़ों' को शहरों के अन्दर रहने दो।”*
शराब बन्दी
इतिहास लेखक मोरलैण्ड लिखता है कि सम्राट अकबर ने साम्राज्य
भर के शहर कोतवालों को यह आज्ञा दे दी थी कि बिना किसी के घर में
ज़बरदस्ती घुसे, शराब का बनना जहाँ तक सम्भव हो बन्द करा दिया जाय,
इसके बाद सम्राट जहाँगीर ने शराब का बनाना क़ानूनन बन्द कर दिया,
किन्तु शाहजहाँ के समय में इस आज्ञा का बहुत अधिक कड़ाई के साथ
पालन कराया गया।† औरङ्गज़ेब के समय में भी यह कड़ाई जारी रही।
- Mughal Administration, by Jadunath Sarkar, p. 41.
† India at the Death of Akbar, by Moreland, p. 159.
मुग़लों का समय १२४
किन्तु बाद के निर्बल सम्राटों के समय में इस शाही आज्ञा पर ठीक ठीक
अमल न हो सका ।
न्याय शासन
अब हम मुग़ल समय के न्यायशासन को थोड़े से शब्दों में बयान
करते हैं । अत्यन्त प्राचीन काल से भारत के हर गांव में एक ग्राम पञ्चायत
होती थी जिसके पञ्चों का चुनना ग्रामवासियों के हाथों में होता था । इस
ग्राम पञ्चायत को अपने गाँव के सब म्युनिसिपल अधिकार प्राप्त होते थे,
और इनके अलावा गाँव वालों की जान माल की रक्षा और आस पास की
सड़कों पर यात्रियों और व्यापारियों की हिफ़ाज़त का काम भी इन्हीं के
सुपुर्द होता था । हर पञ्चायत के मातहत चौकीदार होते थे, जो पञ्चायत से
तनख़्वाह पाते थे और जिन पर राज को किसी तरह का अधिकार न
होता था । अपने यहाँ के दीवानी और फ़ौजदारी के मुक़द्दमों को तय करने
और अपराधियों को दण्ड देने का भी इस पञ्चायत को अधिकार होता था ।
यह पञ्चायत ही गाँव के बालकों और बालिकाओं की शिक्षा का प्रबन्ध
करती थी, जिसका अधिक ज़िक्र हमने इस पुस्तक में एक दूसरे स्थान पर
किया है । अधिकांश नगरों और ख़ास कर छोटे नगरों में भी इसी तरह की
पञ्चायतें थीं जिन्हें इसी तरह के विस्तृत अधिकार प्राप्त थे ।
मुग़ल सम्राटों ने इन हज़ारों भारतीय ग्राम पञ्चायतों के प्राचीन
अधिकारों में किसी तरह का भी दख़ल नहीं दिया, उन्होंने उन्हें ज्यों का
त्यों क़ायम रक्खा, जिसका मतलब यह है कि अंगरेज़ों के आने से पहले
सिवाय राज का लगान अदा कर देने के भारतीय ग्रामवासियों को स्वराज्य
के अन्य क़रीब क़रीब सब अधिकार प्राप्त थे ।
१४६ पुस्तक प्रवेश
इन पञ्चायतों को मामूली पुलिस के काम में मदद देने के लिए हर
ज़िले में एक फ़ौजदार होता था, जिसका काम केवल बड़ी बड़ी डकैतियों,
उपद्रवों आदि में पञ्चायतों की मदद करना होता था। न्यायशासन में
पञ्चायतों को सहायता देने और उनके काम को पूरा करने के लिए हर इलाक़े
में फ़ौजदारी के मुक़दमों को तय करने के लिए एक 'क़ाज़ी' और दीवानी के
मुक़दमों के लिए एक 'सद्र' होता था। साम्राज्य भर के क़ाज़ियों का अफ़-
सर एक 'क़ाज़िउलकुज़्ज़ात' होता था, जो राजधानी में रहता था। इसी
तरह तमाम सद्रों के ऊपर एक 'सद्रुस्सुदूर' होता था। हर नए क़ाज़ी की
नियुक्ति के समय राज की ओर से उसे नीचे लिखी हिदायत की जाती थी—
“सदा इन्साफ़ करना, ईमानदार रहना और किसी की रू
रियायत न करना। मुक़दमे या तो अदालत की जगह और या
सरकारी दफ़्तर में हमेशा दोनों फ़रीक़ की मौजूदगी में करना।
“जिस जगह तुम्हारी नियुक्ति हो वहाँ के किसी आदमी से
किसी तरह का उपहार स्वीकार न करना, और न किसी के जलसे
इत्यादि में जाना।
“अपने फ़ैसले, दस्तावेज़ इत्यादि बड़ी सावधानी से
लिखना ताकि कोई विद्वान उनमें नुक्स निकाल कर तुम्हें
शरमिन्दा न करे।
“ग़रीबी (फ़क्र) को ही अपने लिए गौरव (फ़ख्र) जानना।”*
केवल सुचरित्र और विद्वान लोगों को ही क़ाज़ी और सद्र की पदवियों
- Mughal Administration, by Jadunath Sarkar, p. 37.
मुग़लों का समय १५७
पर नियुक्त किया जाता था। इतिहास लेखक फ़्रेडरिक आगस्टस इस बात
की गवाही देता है कि भारतीय मुग़ल साम्राज्य के “अधिकांश मुलाज़िम
और कर्मचारी ईमानदार और योग्य होते थे ।”*
मुक़दमों का फ़ैसला करने में देश के प्राचीन रस्मोरिवाज और धर्म-
शास्त्रों का पूरा ख़्याल रखा जाता था। सम्राट अकबर ने अनेक योग्य
ब्राह्मणों को न्यायाधीश के अधिकार प्रदान किए और आज्ञा दे दी कि
न्यायालयों में मनुस्मृति और अन्य हिन्दू धर्मशास्त्रों की आज्ञाओं का
पालन किया जाय। हर सम्राट सप्ताह में कम से कम एक दिन (प्रायः मङ्गल
या बुध का दिन) ख़ास ख़ास मुक़दमों और अपीलों को सुनने में व्यय
करता था। प्रजा के हर छोटे से छोटे मनुष्य को अपनी शिकायत लेकर
सम्राट तक जाने का अधिकार होता था। सम्राट जहाँगीर ने, जो अपने
इन्साफ़ के लिए मशहूर था, आगरे में अपने क़िले की दीवार के ऊपर से
एक सोने की ज़ञ्जीर लटका रक्खी थी जो ज़मीन तक लटकती थी। किसी
भी छोटे से छोटे फ़रियादी को उस ज़ञ्जीर को खींचने और अपनी अर्ज़दाश्त
उसमें बाँध देने का अधिकार होता था और तुरन्त उसे सम्राट के सामने
लाकर पेश कर दिया जाता था।
धार्मिक उदारता
धार्मिक उदारता के विषय में अकेले औरङ्गज़ेब को छोड़ कर भारतीय
मुग़ल सम्राटों का समय वास्तव में आदर्श समय था। बाबर, हुमायूँ,
- "... the mass of the employees were both scrupulous and
capable." — The Emperor Akbar, A Contribution Towards the History of
India in the 16th Century, by Frederick Augustus, Count of Noer, translated
by Annette S. Beveridge, 1890, p. 293.
१५८ पुस्तक प्रवेश
र, जहाँगीर, शाहजहाँ और उनके अधिकांश उत्तराधिकारियों के समय
में हिन्दू और मुसलमानों के साथ राज की ओर से एक समान व्यवहार
किया जाता था, दोनों धर्मों को एक समान आदर की दृष्टि से देखा जाता
था और किसी के साथ किसी तरह का भी पक्षपात न किया जाता था।
अंगरेज़ एलची सर टॉमस रो ने सन् १६१६ ईसवी में सम्राट जहाँगीर के
शासन काल में उस समय की हालत को देखते हुए लिखा था—
"तैमूरलङ्ग की सन्तान अपने साथ मोहम्मद का मज़हब
भारत में लाई, किन्तु उन्होंने अपनी विजय के बल किसी को
ज़बरदस्ती उस मज़हब में शामिल नहीं किया, और धर्म के मामले
में सबको आज़ाद छोड़ दिया।"*
औरंगज़ेब और उसके उत्तराधिकारियों के समय की (१६८८-१७२३)
बंगाल की हालत को बयान करते हुए एक दूसरा अंगरेज़ कप्तान अलेक्ज़ेण्डर
हैमिल्टन लिखता है—
"यहाँ पर एक सौ से ऊपर मत मतान्तरों के लोग हैं,
किन्तु वे अपने उसूलों या उपासना विधियों के विषय में कभी
नहीं लड़ते झगड़ते। हर शख़्स को आज़ादी है कि अपने तरीक़े
के अनुसार ईश्वर की सेवा और पूजा करे। मज़हब के नाम पर
दूसरे को किसी तरह की यातनाएँ देने का यहाँ कोई नाम भी
नहीं जानता x x x
- "Tamerlain's offspring brought in the knowledge of Mohammad,
but imposed it on none by the law of conquest, leaving consciences at
liberty."—A General Collection of the Best and Most Interesting Voyages etc.,
edited by John Pinkerton, London 1811, vol viii. p. 46.
मुग़लों का समय १२६
"बङ्गाल के शासकों का मज़हब इसलाम है, किन्तु हर
मुसलमान पीछे वहाँ सौ से ऊपर हिन्दू हैं और तमाम सरकारी
नौकरियाँ और ओहदे बिना किसी भेद भाव के दोनों मज़हब के
लोगों को दिए जाते हैं।"*
डॉक्टर बेनीप्रसाद ने अपनी पुस्तक जहाँगीर के इतिहास में लिखा है
कि भारतीय मुग़ल सम्राटों के दरबारों में हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों
के मुख्य मुख्य त्योहार एक समान उत्साह और वैभव के साथ मनाए जाते
थे। दशहरे के दिन सम्राट के हाथी और घोड़े सज धज कर जुलूस में निकाले
जाते थे। रक्षाबन्धन के दिन ब्राह्मण लोग और हिन्दू सामन्त सरदार
सम्राट की कलाई में आकर राखी बाँधते थे, दीपावली की रात को महल में
रोशनी होती थी और जुआ तक खिलता था। शिवरात्रि को महलों के
अन्दर ख़ास रौनक़ दिखाई देती थी। ठीक इसी तरह मुसलमानों की ईद
और शबबरात भी उतने ही उत्साह के साथ मनाई जाती थी।* हर सम्राट
की सालगिरह साल में दो बार मनाई जाती थी, एक मुसलमान चाँद की
तारीख़ों के अनुसार और दूसरे हिन्दू तिथियों के अनुसार।
- There are above one hundred different sects . . . but they never
have any hot disputes about their doctrine or way of worship. Every one
is free to serve and worship God in their own way, and persecutions for
religion's sake are not known among them."
Further, "The religion of Bengal is established, is Mohammadan, yet
for one Mommadan there are above one hundred pagans and the public
offices and posts are filled promiscuously with men of both persuasions."--
Ibid, pp. 321, 415. - History of Jehangir, by Beniprasad, M. A., D. Sc., Ph. D., p. 100.
१६० पुस्तक प्रवेश
निस्सन्देह धार्मिक उदारता ही भारतीय मुग़ल साम्राज्य की आधार
शिला थी। सम्राट बाबर ने अपने बेटे हुमायूँ के नाम अपने अन्तिम
आदेश में इस धार्मिक उदारता की नींव रक्खी। हुमायूँ ने ईमानदारी के
साथ उस पर अमल किया। सम्राट अकबर ने इस उदारता को उस अलौ-
किक पराकाष्ठा तक पहुँचाया जो संसार के धार्मिक इतिहास में सदा के
लिए एक सीमा चिन्ह रहेगी। जहाँगीर और शाहजहाँ ने आश्चर्यजनक
सफलता के साथ उसका पालन किया।
उस समय का ईसाई यूरोप
हमें याद रखना चाहिए कि यह ठीक वह समय था जब कि यूरोप के
अन्दर धर्म के नाम पर अत्याचार और ज़बरदस्तियाँ एक आए दिन की
मामूली घटना थी। आयरलैण्ड में उस समय न किसी रोमन कैथलिक को
अपने पूर्वजों की जागीर मिल सकती थी, न कोई कैथलिक फ़ौज का अफ़सर
हो सकता था और न जजी की बेञ्च पर बैठ सकता था। फ़्रान्स में ह्यूगेनाट
सम्प्रदाय के एक एक आदमी को देश से समुद्र पार निर्वासित कर दिया
गया था। स्वीडन में सिवाय लूथर की सम्प्रदाय के और किसी ईसाई को
जूरी का मेम्बर होने का अधिकार न था। स्पेन में प्रोटेस्टेण्ट सम्प्रदाय के
लोगों के मरने के समय किसी पादरी को उनकी अन्त्येष्टि क्रिया करने की
इजाज़त न थी। इतना ही नहीं, बल्कि यूरोप के एक एक देश में उस समय
‘ऐक्टस् ऑफ़ यूनिफ़ॉर्मिटी’ पास हो रहे थे जिसका अर्थ यह था कि सिवाय
ईसाई मत की उस सम्प्रदाय विशेष के मानने वालों के, जिस सम्प्रदाय के
कि वहाँ के शासक होते थे, किसी दूसरी सम्प्रदाय के लोग देश में सुख
चैन से न रहने पाएँ। इन्हीं अत्याचारी क़ानूनों के फलस्वरूप यूरोप के हर