भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
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उन दिनों गुजरात "समस्त ईरान, तातार, टर्की, शाम, बारबरी, अरब,
ईथियोपिया (अबीसीनिया, अफ्रीका) और अन्य कई देशों" को अपने यहाँ
के बने हुए "रेशमी और सूती कपड़े" मुहय्या करता था। उस समय के
यात्री लिखते हैं कि स्वयं भारत के अन्दर कपड़े की खपत उस समय मामूली
न थी। क़रीब क़रीब सब ऊपर की और बीच की श्रेणी के लोग रेशम
पहनते थे और बड़े बड़े चोगे पहनते थे।
ख़ास कर रेशम के धंधे ने सम्राट अकबर के समय में अपूर्व उन्नति
की। अबुलफ़ज़ल लिखता है कि अकबर ने ख़ुद रेशम के धंधे का परिश्रम
के साथ अध्ययन किया, चीन और अन्य देशों से कारीगर बुला कर नौकर
रक्खे और लाहौर, आगरा, फ़तहपुर, अहमदाबाद इत्यादि में राज के ख़र्च
पर बड़े बड़े कारख़ाने खुलवाए। अकबर के समय में जब कि गेहूँ आजकल
के वज़न के हिसाब से एक रुपए का एक मन बारह सेर आता था, चार आने
में एक सुन्दर ख़ालिस ऊन का कम्बल ख़रीदा जा सकता था। अबुलफ़ज़ल
लिखता है कि लाहौर के अन्दर उस समय शाल बनाने के एक हज़ार सर-
कारी कारख़ाने थे, काशमीर और अन्य स्थानों में अलग रहे। आगरे और
लाहौर में दरियों और क़ालीनों के अनेक सरकारी कारख़ाने थे।
सौ सवा सौ साल पहले तक के ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रतिनिधि बार
बार अपने पत्रों में इंगलिस्तान लिखकर भेजते थे कि इङ्गलिस्तान के बने
हुए कपड़ों की भारतीय कपड़ों के मुक़ाबले में भारत में कोई खपत नहीं हो
सकती।
पुर्तगाली यात्री पिरार्ड लिखता है कि सत्रवीं सदी के शुरू में बङ्गाल
के अन्दर जो अत्यन्त घना बसा हुआ देश था, सूती वस्त्रों का धंधा घर