भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
पृष्ठ 181, कुल 727 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुग़लों का समय १४६
की शक्ल में लिया जाता था, किसान को बड़ा फ़ायदा रहता
था, क्योंकि लगान की अदायगी हर साल की असली पैदावार
पर निर्भर होती थी । इसके ख़िलाफ़ आज कल का लगान रुपयों
की शक्ल में नियत होता है जिसका उस साल की पैदावार के
साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता ।”
हर मुग़ल सम्राट की तरफ़ से तमाम सूबों के कर्मचारियों और सामन्त
नरेशों के नाम बार बार इस मज़मून की आज्ञाएँ निकलती रहती थीं कि
किसी किसान के साथ लगान की वसूली में या किसी मामले में किसी
तरह की ज़बरदस्ती न की जाय और कोई नाजायज़ रक़म या 'अबवाब'
किसी से वसूल न की जाय ।
इतिहास लेखक फ्रेडरिक आगस्टस लिखता है कि—
“जब कभी सम्राट की सेना ग्रामों में से होकर निकलती थी
और उनके कूच की वजह से किसान के माल को हानि पहुँचती
थी या उसकी बरबादी होती थी, तो विश्वस्त आदमी इस बात के
लिए नियुक्त किए जाते थे कि वे उस हानि या बरबादी के मूल्य
का ठीक ठीक तख़मीना लगाएँ । तख़मीना लगाने के बाद ये
लोग या तो उस रक़म को किसान के सरकारी लगान में से कम
कर देते थे या व्यर्थ की शिकायतों और बहसों से बचने के लिए
उसी समय किसानों के दावे के अनुसार उन्हें रक़म अदा कर
देते थे ।”*
- The Emperor Akbar, etc., by Frederick Augustus, translated by A. S
Beveridge, pp. 273-77