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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 192

१६० पुस्तक प्रवेश
निस्सन्देह धार्मिक उदारता ही भारतीय मुग़ल साम्राज्य की आधार
शिला थी। सम्राट बाबर ने अपने बेटे हुमायूँ के नाम अपने अन्तिम
आदेश में इस धार्मिक उदारता की नींव रक्खी। हुमायूँ ने ईमानदारी के
साथ उस पर अमल किया। सम्राट अकबर ने इस उदारता को उस अलौ-
किक पराकाष्ठा तक पहुँचाया जो संसार के धार्मिक इतिहास में सदा के
लिए एक सीमा चिन्ह रहेगी। जहाँगीर और शाहजहाँ ने आश्चर्यजनक
सफलता के साथ उसका पालन किया।
उस समय का ईसाई यूरोप
हमें याद रखना चाहिए कि यह ठीक वह समय था जब कि यूरोप के
अन्दर धर्म के नाम पर अत्याचार और ज़बरदस्तियाँ एक आए दिन की
मामूली घटना थी। आयरलैण्ड में उस समय न किसी रोमन कैथलिक को
अपने पूर्वजों की जागीर मिल सकती थी, न कोई कैथलिक फ़ौज का अफ़सर
हो सकता था और न जजी की बेञ्च पर बैठ सकता था। फ़्रान्स में ह्यूगेनाट
सम्प्रदाय के एक एक आदमी को देश से समुद्र पार निर्वासित कर दिया
गया था। स्वीडन में सिवाय लूथर की सम्प्रदाय के और किसी ईसाई को
जूरी का मेम्बर होने का अधिकार न था। स्पेन में प्रोटेस्टेण्ट सम्प्रदाय के
लोगों के मरने के समय किसी पादरी को उनकी अन्त्येष्टि क्रिया करने की
इजाज़त न थी। इतना ही नहीं, बल्कि यूरोप के एक एक देश में उस समय
‘ऐक्टस् ऑफ़ यूनिफ़ॉर्मिटी’ पास हो रहे थे जिसका अर्थ यह था कि सिवाय
ईसाई मत की उस सम्प्रदाय विशेष के मानने वालों के, जिस सम्प्रदाय के
कि वहाँ के शासक होते थे, किसी दूसरी सम्प्रदाय के लोग देश में सुख
चैन से न रहने पाएँ। इन्हीं अत्याचारी क़ानूनों के फलस्वरूप यूरोप के हर