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भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)

Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal

पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished727 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

१४८ पुस्तक प्रवेश
हर प्रान्त में सूबेदार या नाज़िम के अलावा एक दीवान होता था ।
सूबेदार का काम फ़ौज का इन्तज़ाम, शासन प्रबन्ध और न्याय करना होता
था । दीवान का काम लगान वसूल करना । हर दीवान की नियुक्ति की
सनद में लिखा होता था कि उसका सब से मुख्य काम "खेती के काम को
और ग्रामों की आबादी को बढ़ाना" है । लगान की वसूली में खेतिहर के
साथ किसी तरह की ज़बरदस्ती की इजाज़त न थी । एक हिदायत हर सनद
में यह होती थी कि—
"यदि किसी आमिल के इलाक़े में कई साल की लगान
की बक़ाया चली आती है, तो तुम उस रक़म को किसानों से
बहुत आसान क़िस्तों में वसूल करना, यानी बक़ाया का केवल
पाँच फ़ीसदी हर फ़सल के मौके पर वसूल करना ।"*
इसी तरह फ़ौजदारों, थानेदारों, करोड़ियों, तहसीलदारों इत्यादि सब
को हिदायत होती थी कि किसानों को किसी तरह का कष्ट न पहुँचाएँ ।
उस समय के किसानों की हालत
जदुनाथ सरकार, मुग़ल साम्राज्य के दिनों के भारतीय किसानों की
उस समय के फ़्रांस और आयरलैण्ड के किसानों से तुलना करते हुए,
लिखता है—
"किन्तु फ़र्क़ यह था कि अंगरेज़ों के आने से पहले (मुग़ल-
भारत में) किसी किसान को लगान अदा न करने के क़सूर
में ज़मीन से बेदख़ल न किया जाता था, कोई किसान भूखा न
था ।" x x x बटाई की प्रथा के अनुसार चूँकि लगान पैदावार

  • Ibid, p. 88.