भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
बहिर्राम भट्ट सत्य की खोज में दो दफ़े हिन्दू से मुसलमान और
मुसलमान से हिन्दू हुआ । अन्त में उसने कहा—"न मैं हिन्दू हूँ और न
मुसलमान ।”
शेख मोहम्मद
दक्खिन के अन्दर शेख मोहम्मद एक बहुत बड़ा भक्त हुआ है। उसके
अनुयायी रमज़ान के रोज़े भी रखते हैं और एकादशी का व्रत भी, मक्के की
भी यात्रा करते हैं और पण्डरपुर के मन्दिर की भी ।
तुकाराम
सन्त तुकाराम दक्खिन का शायद सब से अधिक सर्वमान्य भक्त था ।
कबीर इत्यादि के समान तुकाराम जात पाँत, मूर्तिपूजा, यज्ञ, हवन और
अन्य कर्मकाण्ड का कट्टर विरोधी और एक हरि की भक्ति का प्रचारक था ।
प्रत्येक प्राणी के रूप में उसे हरि ही दिखाई देता था । इस्लाम और हिन्दू
धर्म को मिलाने का तुकाराम का प्रयत्न उसके एक पद्य से ज़ाहिर है जिसका
भाषान्तर यह है—
जो 'अल्लाह' चाहता है, ऐ मेरे बाबा ! वही होता है ।
सब का बनाने वाला सब का बादशाह है। पशु और मित्र, बग़ीचे
और माल, सब जाते रहेंगे । ऐ बाबा ! मेरा चित्त मेरे 'साहेब'
पर लगा है। वही मेरा बनाने वाला है । मैं मन के घोड़े पर
सवार हूं और आत्मा सवारी करती है। ऐ बाबा ! अल्लाह का
ज़िक्र करो, सब उसी के रूप हैं । तुका कहता है, जो मनुष्य इस
बात को समझे, वही दरवेश है ।
बड़े नामों में सब से पहला नाम 'अल्लाह' है । उसे सदा
१३४ पुस्तक प्रवेश
दोहराते रहो, भूलो नहीं। सचमुच अल्लाह एक है, सचमुच नबी
एक है, वहाँ तू भी एक है, वहाँ तू भी एक है, वहाँ तू भी एक
है ! वहाँ न मैं हूँ और न तू है ! ❀
निस्सन्देह हिन्दूमत, बौद्धमत और इसलाम के मेल से उस समय
भारत के अन्दर उत्तर से दक्खिन तक और पूर्व से पच्छिम तक एक सुन्दर
सार्वजनिक मानव धर्म की नींव रक्खी जा रही थी, जिसका मूल मन्त्र
एकता, प्रेम और सब की सेवा था।
भारतीय कला और मुसलमान
निर्माणकला
जिस तरह धार्मिक विचारों पर उसी तरह भारतीय निर्माणकला
और भारत की चित्रकारी पर भी मुसलमानों के आने का बहुत गहरा और
हितकर प्रभाव पड़ा। प्रोफ़ेसर जदुनाथ सरकार लिखता है कि मुसलमानों
के समय में भारत की निर्माणकला ने साफ़ उन्नति की।
ईसा की आठवीं सदी तक भारतीय शिल्पकला पर बौद्धमत का ख़ास
असर था। आठवीं से तेरहवीं सदी तक इस कला में हिन्दू आदर्शों की
प्रधानता रही, किन्तु फिर भी बौद्धमत का प्रभाव उस पर साफ़
दिखाई देता रहा। हम इस विषय की वैज्ञानिक बारीकियों में पड़ना नहीं
- Tukaram's Abhanga, p. 85, 86, Godbole's edition.
सन्त तुकाराम
[ श्री वासुदेव राव सूबेदार, सागर, की कृपा द्वारा
The provided image is completely blank and contains no visible text, marks, or content to transcribe.
भारतीय कला और मुसलमान १३५
चाहते । किन्तु एक दो बातें स्पष्ट हैं । हर देश के लोगों के कला सम्बन्धी
आदर्शों पर बहुत बड़ा असर उस देश की भौगोलिक स्थिति का पड़ता है ।
भारत अभेद्य जङ्गलों, प्रचण्ड ऋतुओं, बड़ी बड़ी नदियों, पहाड़ों और
घनी वनस्पतियों का देश है । यही वजह है कि भारतीय शिल्पकला में
सदा से विशालता, स्थूलता और विस्तार पर अधिक ज़ोर दिया जाता
रहा है । भारत के बनों में बेशुमार तरह तरह की फूल पत्तियाँ इधर से
उधर तक गुथी हुई दिखाई देती हैं, नीचे की ओर या ऊपर की ओर कहीं
भी नज़र डाली जाय, एक गज़ भर ज़मीन सूनी दिखाई नहीं देती ।
यही वजह है कि प्राचीन भारतीय मन्दिरों और प्रासादों की दीवारों
के ऊपर, और कोनों में कहीं एक फुट ज़मीन भी ख़ाली दिखाई नहीं देती ।
पुराने समय के हिन्दू मन्दिरों में नींव के ऊपर नींव, मञ्जिल के ऊपर
मञ्जिल, कङ्गरे के ऊपर कङ्गरा और कलश के ऊपर कलश आकाश तक
पहुँचते हुए दिखाई देते हैं, और इसके साथ साथ कोई कोना या दीवार का
हिस्सा नहीं रहता जो मूर्तियों या चित्रों से न भरा हो । शिल्पकला
विशारदों की राय है कि संसार के किसी भी दूसरे देश की निर्माणकला
विस्तार बाहुल्य और अतिशोभा में हिन्दू निर्माणकला का मुकाबला नहीं
कर सकती ।
इसके ठीक विपरीत अरब एक विशाल रेगिस्तान है, जिसमें दूर दूर
और कहीं कहीं थोड़े से हरे भरे नख़लिस्तान दिखाई देते हैं । इसके ऊपर
अरब की तेज़ गरमी, भोजन और वस्त्र के लिए परिमित और इनी गिनी
सामग्री और रेत के पहाड़ । कुदरती तौर पर मुसलमानों की शुरू की
निर्माणकला में बड़े बड़े भवन, सादी साफ़ दीवारें और ऊँचे मीनार और
१३६ पुस्तक प्रवेश
गुम्बद् अधिक देखने में आते हैं। इसलाम के एक ईश्वरवाद और मूर्तिभञ्ज-
कता ने भी पुराने मूर्तिपूजक धर्मों के मुक़ाबले में मुसलिम कला के इस आदर्श
को अपना एक ख़ास रूप दिया और उसे और अधिक पक्का कर दिया ।
जिस मनुष्य की आँखें प्राचीन हिन्दू मन्दिरों के विस्तार प्रपञ्च से उकता
गई हों उसे एक सीधी सादी मुसलिम मसजिद की साफ़ दीवारों में विश्राम
मिलना क़ुदरती है । इसी तरह जो मनुष्य पुरानी मुसलिम मसजिदों या
प्रासादों की अमिश्रता से ऊब गया हो, उसके लिए हिन्दू निर्माणकला का
बाहुल्य एक दरजे तक अवश्य आकर्षक होगा ।
दो कलाओं का आलिंगन
यह भी स्पष्ट ज़ाहिर है कि इन दोनों आदर्शों के मेल जोल से एक इस
तरह की निर्माणकला को जन्म दिया जा सकता था, जो दोनों की अपेक्षा
सुन्दर और अधिक आकर्षक हो । धार्मिक और जातीय पक्षपात इस तरह
के सम्मिश्रण के रास्ते में बाधक होते हैं, किन्तु फिर भी दो अलग अलग
आदर्शों के मिलने से जाने या अनजाने इस तरह का सम्मिश्रण हुए बिना
नहीं रह सकता । इसके अलावा हम ऊपर दिखला चुके हैं कि मुसलमानों
के भारत आने के समय से ही इस धार्मिक या जातीय पक्षपात के मिटाने
के लिए भी अनेक कोशिशें जारी थीं। जिस तरह धार्मिक विचारों में उसी
तरह निर्माणकला और चित्रकारी के मैदान में भी भारत ने नए आदर्शों को
जन्म देना शुरू किया, जो हिन्दू और मुसलिम दोनों अलग अलग आदर्शों से
उच्चतर थे और जिनके नतीजे भी उन दोनों के नतीजों से अधिक सुन्दर
थे । इन तीनों तरह के आदर्शों को साक्षात करने के लिए हमें एक ओर
दक्खिन के प्राचीन मन्दिरों या जगन्नाथपुरी के मन्दिर, दूसरी ओर अजमेर
[Page Header]
भारतीय कला और मुसलमान १३७
[Body Text]
और दिल्ली इत्यादि की पुरानी मसजिदों, और तीसरी ओर मुग़ल समय के
आगरे और दिल्ली के शाही महलों या भारतीय निर्माणकला के सब से
अधिक सुन्दर नमूने, आगरे के ताज की ओर दृष्टि डाल लेना काफ़ी है।
निस्सन्देह आगरे का ताज संसार की सब से उत्कृष्ट और सब से अधिक
सुन्दर इमारतों में गिना जाता है, भारतीय निर्माणकला के मस्तक पर वह
झूमर का काम देता है, देश की इस पतित अवस्था में भी प्रत्येक भारतवासी
के सच्चे अभिमान और गौरव का पात्र है, और शिल्प के मैदान में इसलाम
से पूर्व के भारतीय आदर्शों और बाद के मुसलिम आदर्शों, दोनों के
प्रेमालिंगन का सबसे सुन्दर नमूना है।
शिल्पकला के पण्डित हमें बताते हैं कि ईसा की तेरहवीं सदी से पहले
की भारत की हिन्दू और मुसलमान इमारतें दो साफ़ अलग अलग आदर्शों
के अनुसार बनी हुई दिखाई देती हैं, किन्तु उसके बाद की हिन्दू इमारतों
पर मुसलिम छाप और मुसलिम इमारतों पर हिन्दू छाप भी उतनी ही
साफ़ दिखाई देती हैं और दोनों के सौन्दर्य को बढ़ाती हुई नज़र आती है।
यही वजह है कि भारत की मुसलिम शिल्पकला, मिश्र की मुसलिम शिल्प-
कला, शाम की मुसलिम शिल्पकला, ईरान की मुसलिम शिल्पकला और
टर्की की मुसलिम शिल्पकला, इन सब में बहुत बड़ा अन्तर है।
दिल्ली और आगरे के अलावा राजपूताना और काशमीर इत्यादि में
भी इस मिश्रित कला आदर्श के काफ़ी नमूने अभी तक मौजूद हैं। सोलवीं
सदी के बने हुए वृन्दावन के कुछ वैष्णव मन्दिर, सोनागढ़ के कुछ जैन मन्दिर,
विजयनगर की अनेक इमारतें और सत्रवीं सदी का बना हुआ मदुरा का
तिरूमलाई नायक का प्रसिद्ध महल भी इसी मिश्रित कला आदर्श के नमूने हैं।
१३८ पुस्तक प्रवेश
सोलवीं सदी के क़रीब 'समाधियाँ' या 'छतरियाँ' बनाना हिन्दुओं में
पहली बार शुरू हुआ और निस्सन्देह यह रिवाज हिन्दुओं में मुसलमानों
से पड़ा। इमारतों में महराब का उपयोग, डाट की गोल छत और आज
कल की उद्यान कला ये तीनों भारत ने मुसलमानों ही से सीखीं। वर्तमान
भारत के सुन्दर से सुन्दर बाग़ मुग़ल सम्राटों के समय के बने हुए हैं, जिनमें
जहांगीर के समय का बना हुआ काश्मीर का शालामार बाग़ अभी तक
संसार का सब से सुन्दर बाग़ स्वीकार किया जाता है।
चित्रकला
इसी तरह चित्रकला में भी दो अलग अलग आदर्शों के मेल से
मुग़ल सम्राटों के अधीन भारत ने एक अधिक उच्च और अधिक सुन्दर
चित्रकला को जन्म दिया। हुमायूँ, अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ
के महलों में सैकड़ों हिन्दू चित्रकार केवल अपनी कला को तरक़्क़ी
देने के लिए बड़ी बड़ी तनख़्वाहें पाते थे। शीराज़, तबरेज़ यहाँ तक
कि चीन के बड़े बड़े चित्रकार भी वहाँ पर मौजूद रहते थे और
निस्सन्देह ये सब एक दूसरे की सहायता से अपनी अपनी कला को उन्नति
देते थे। उस समय की फ़ारसी पुस्तकों और दस्तावेज़ों में जयपुर, ग्वालियर,
गुजरात, काश्मीर इत्यादि के रहने वाले मुग़ल दरबार के अनेक हिन्दू और
मुसलमान चित्रकारों के नाम मिलते हैं, जिनमें से कुछ के हाथ के खिंचे हुए
सुन्दर चित्र अभी तक चित्रकला विशारदों को चकित करते रहते हैं। दिल्ली
और आगरे से लेकर जयपुर, जम्मू, चम्बा, काँगड़ा, लाहौर, अमृतसर और
दक्खिन में तंजोर तक उस समय एक सुन्दर भारतीय चित्रकला फैलती
और उन्नति करती हुई दिखाई देती थी। दिल्ली और आगरे में जिन आदर्शों
मुग़लों का समय १३६
को जन्म दिया जाता था, राजपूताना और शेष भारत के हिन्दू दरबारों
में उन्हीं का अनुसरण किया जाता था। प्रोफ़ेसर जदुनाथ सरकार
लिखता है—
"चित्रकला के मैदान में हमारे चित्रकारों ने जो असाधारण
उन्नति मुग़लों के ज़माने में की वह और कभी नहीं की।" ✼
उस समय के अनेक अंगरेज़ यात्री स्वीकार करते हैं कि जहाँगीर के
उदार प्रोत्साहन के प्रताप से जहाँगीर के समय की भारतीय चित्रकला
संसार भर में सब से अधिक उन्नत चित्रकला थी।†
मुग़लों का समय
मुग़लों के हमले
अब हम यह देखना चाहते हैं कि धार्मिक विचारों, शिल्प और चित्र-
कारी से बाहर बाक़ी भारतीय जीवन पर बाहर के मुसलमानों का क्या
असर पड़ा। हम ऊपर लिख चुके हैं कि मोहम्मद ग़ोरी के हमले के समय
से लेकर ३०० साल तक भारत में लगातार संग्रामों और छोटी बड़ी
सल्तनतों का समय था। इसके बाद दिल्ली के मुग़ल साम्राज्य का समय
- . . . the highest genius was displayed by our artists in this field in the Mughal age."—Mughal Administration by J. N. Sarkar, p. 128.
† History of Jehangir, by Dr. Beniprasad, M. A., pp. 92-94.
१४० पुस्तक प्रवेश
आया । मुग़ल साम्राज्य के दिनों में ही भारत के अन्दर मुसलमानों की
हुकूमत, उनकी सभ्यता और उनका प्रभाव अपनी पराकाष्ठा को पहुँचा ।
किन्तु मुग़लों के शासन और भारत के ऊपर मुग़ल साम्राज्य के उपकारों या
अपकारों को बयान करने से पहले हम मुग़लों द्वारा संसार के अन्य देशों
की विजय पर भी एक नज़र डालना चाहते हैं ।
ईसा की तेरवीं सदी के शुरू में चङ्गेज़ ख़ाँ ने पूर्वी एशिया से निकल
कर उत्तरी चीन, तातार और शेष अधिकांश एशिया को विजय कर लिया
था । सन् १२२७ ईसवी में चङ्गेज़ ख़ाँ की मृत्यु हुई । इसके ६८ साल के
अन्दर चङ्गेज़ ख़ाँ के उत्तराधिकारियों ने भारत को छोड़ कर बाक़ी क़रीब
क़रीब तमाम एशिया को और यूरोप के एक बहुत बड़े हिस्से को मुग़ल
साम्राज्य में शामिल कर लिया । यूरोप पर उनका हमला सन् १२३८
ईसवी में हुआ । यूरोपियन इतिहास लेखक कहते हैं कि ईसा की आठवीं
सदी से जब कि अरबों ने यूरोप पर हमला किया था उस समय से सन्
१२३८ तक कोई और इतनी भयंकर आपत्ति यूरोप पर न आई थी । कुछ
साल के अन्दर ही तमाम रूस, पोलैण्ड, बलकान, हङ्गेरी यहाँ तक कि
उत्तर में बाल्टिक समुद्र और पच्छिम में जरमनी तक, आधे से ज़्यांदा
यूरोप मुग़लों के अधीन हो गया । रूस के ऊपर दो सौ साल तक मुग़लों
की हुकूमत रही । शुरू के मुग़ल बौद्ध थे । स्वयं चङ्गेज़ ख़ाँ बौद्धमत का
अनुयायी था और साथ ही अपने देश मङ्गोलिया के कुछ प्राचीन धार्मिक
विचारों अश्वपूजा इत्यादि को भी मानता था । इन्हीं मुग़लों ने अधिकांश
एशिया और यूरोप को विजय किया । बौद्ध मुग़लों ने मुसलिम ईरान और
मुसलिम इराक़ को फ़तह किया और उसके बाद चङ्गेज़ ख़ाँ के पौत्र हुलाकू
मुग़लों का समय | १४९
ख़ाँ और उसके साथ के दूसरे मुग़लों ने पराजित ईरानियों और अरबों से
इसलाम मत की दीक्षा ली ।
भारत पर मुग़लों का सब से पहला हमला सन् १३९८ ईसवी में तैमूर
का हमला था । महमूद तुग़लक उस समय दिल्ली के तख़्त पर था । किन्तु
सिवाय चन्द रोज़ की लूट खसोट और संहार के जिसमें हिन्दू और मुसलमानों
का कोई फ़र्क़ नहीं किया गया और कोई असर तैमूर के हमले का भारत
पर न रह सका और न तैमूर १५ दिन से ज़्यादा दिल्ली में ठहर सका ।
मुग़लों का दूसरा हमला इस देश के ऊपर सन् १५२६ ईसवी में बाबर
का हमला था । उस समय तक मुग़ल अपनी जन्मभूमि मङ्गोलिया से कहीं
अधिक सभ्य देश ईरान में बरसों रह चुकने के सबब से चङ्गेज़ और तैमूर के
मुक़ाबले में कहीं अधिक सभ्य और सभ्यताप्रेमी बन चुके थे । पानीपत के
मैदान में बाबर ने इब्राहीम लोधी को शिकस्त दी और भारत में मुग़ल
साम्राज्य की नींव रक्खी ।
पानीपत की विजय के बाद ही बाबर ने भारत को अपना घर बना
लिया । हुमायूँ को छोड़कर उसके बाक़ी वंशज भारत ही में पैदा हुए ।
भारत में एक प्रधान शक्ति की ज़रूरत
सम्राट हर्षवर्धन के बाद से यानी ईसा की सातवीं सदी के मध्य से
सोलवीं सदी के शुरू तक क़रीब ९०० साल तक भारत के अन्दर कोई भी
प्रधान राजनैतिक शक्ति ऐसी उत्पन्न होने न पाई थी जो समस्त भारत को
एक शासन के सूत्र में बाँध सकती । ९०० साल के अन्दर भारत अनेक
छोटी बड़ी एक दूसरे की प्रतिस्पर्धी रियासतों का युद्धक्षेत्र बना हुआ था ।
वह समय भारत के इतिहास में राजनैतिक निर्बलता, अनैक्य और अव्यवस्था
१४२ पुस्तक प्रवेश
का समय था । भारत को उस समय एक ऐसी प्रधान शक्ति की ज़बरदस्त
आवश्यकता थी जो सारे देश के ऊपर एक समान हुकूमत क़ायम कर सके,
देश की बिखरी हुई शक्तियों को एक सूत्र में बाँध सके, और देश व्यापी
शान्ति और सुशासन द्वारा जीवन के विविध क्षेत्रों में देश को अग्रसर होने
का मौक़ा दे सके। इतिहास इस बात का साक्षी है कि ईसा की सोलवीं
सदी से लेकर अठारवीं सदी तक दिल्ली के मुग़ल साम्राज्य ने भारत की इस
कमी को ख़ासी सुन्दरता के साथ पूरा किया। निस्सन्देह राजनीति,
सामाजिक व्यवस्था, उद्योग धन्धे, कला कौशल, समृद्धि, शिक्षा और
सुशासन की दृष्टि से भारत के समस्त इतिहास में मुग़ल साम्राज्य का समय
सबसे अधिक गौरवान्वित समय था ।
मुग़लों द्वारा उसका निर्माण
मुग़लों के समय से पहले प्रियदर्शी सम्राट अशोक और सम्राट समुद्रगुप्त
के साम्राज्य भारत में सब से अधिक विशाल साम्राज्य रह चुके थे। किन्तु
प्रोफ़ेसर जदुनाथ सरकार लिखता है कि मुग़ल साम्राज्य अपनी पराकाष्ठा
के समय अशोक और समुद्रगुप्त दोनों के साम्राज्यों से कहीं बड़ा था।
इसके अलावा अशोक या समुद्रगुप्त के दिनों में साम्राज्य के अन्दर विविध
प्रान्तों का जीवन एक दूसरे से इतना अच्छा गुथा हुआ न था। सबकी
अलग अलग भाषाएँ, अलग अलग शासन पद्धति और अलग अलग
जीवन। किन्तु जदुनाथ सरकार लिखता है—
“इसके विपरीत, अकबर के सिंहासन पर बैठने के समय से
मोहम्मदशाह की मृत्यु के समय तक (१५५६—१७४८), मुग़ल
शासन के इन दो सौ साल ने समस्त उत्तरी भारत और अधि-
मुग़लों का समय १४३
कांश दक्खिन को भी, एक सरकारी भाषा, एक शासन पद्धति,
एक समान सिक्के, और हिन्दू पुरोहितों या निश्चल ग्रामीण
जनता को छोड़ कर बाक़ी समस्त श्रेणियों के लोगों के लिए
एक व्यापक सर्वप्रिय भाषा प्रदान की। जिन प्रान्तों पर मुग़ल
सम्राटों का बराहरास्त शासन था ( यानी जिनके सूबेदार दिल्ली
सम्राट की ओर से नियुक्त किए जाते थे ), उनसे बाहर भी आस
पास के हिन्दू राजा, कम या अधिक, मुग़लों की शासन प्रणाली,
उनकी सरकारी परिभाषाओं, उनके दरबारी शिष्टाचार, और
उनके सिक्कों का उपयोग करते थे ।
“मुग़ल साम्राज्य के अन्दर बीस भारतीय 'सूबे' थे। इन
सब सूबों पर ठीक एक प्रणाली के अनुसार शासन किया जाता
था, सब में एक शासन विधि का पालन किया जाता था, और
विविध सरकारी ओहदों के नाम और उपाधियाँ सब में एक
समान थीं। तमाम सरकारी मिसलों, फ़रमानों, सनदों, माफ़ियों
राहदारी के परवानों, पत्रों, और रसीदों में एक फ़ारसी भाषा
का उपयोग किया जाता था। साम्राज्य भर में एक समान वज़न,
एक से मूल्य, एक नाम और एक सी धातु के सिक्के प्रचलित थे,
केवल जिस शहर की टकसाल का कोई सिक्का बना होता था उस
शहर का नाम उस पर और खुदा होता था। सरकारी कर्मचारियों
और सिपाहियों का अक्सर एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में तबादला
होता रहता था। इस तरह एक प्रान्त के रहने वाले दूसरे प्रान्त
में पहुँच कर उसे क़रीब क़रीब अपने घर की तरह समझने लगते
१४४ पुस्तक प्रवेश
थे। सौदागर और यात्री निहायत आसानी से एक शहर से दूसरे
शहर और एक सूबे से दूसरे सूबे आ जा सकते थे, और एक
साम्राज्य की छाया में सब लोग इस विशाल देश की एकता को
अनुभव करते थे।” ❀
इतिहास कला
मुसलमानों के आने से पहले का हिन्दुओं का लिखा हुआ ऐतिहासिक
साहित्य अव्वल तो है ही बहुत कम, और जो है भी उसमें तिथियों का
क़रीब क़रीब अभाव है। इसके विपरीत अरबों के लिखे हुए इतिहासों,
यात्रा वृत्तान्तों और जीवन चरित्रों में सदा ठीक ठीक तिथि दर्ज होती है।
- " . . . . On the other hand, the two hundred years of Mughal rule,
from the accession of Akbar to the death of Mohammad Shah (1556-1749),
gave to the whole of Northern India and much of the Deccan also, oneness
of the official language, administrative system and coinage and also a popular,
lingua franca for all classes except the Hindoo priests and the stationary
village folk. Even outside the territory directly administered by the Mughal
Emperors, their administrative system, official nomenclature, court etiquette
and monetary type were borrowed, more or less, by the neighbouring
Hindoo Rajas.
"All the twenty Indian subahs of the Mughal Empire were governed
by means of exactly the same administrative machinery, with exactly the
same procedure and official titles. Persian was the one language used in all
office records, farmans, sanads, landgrants, passes, despatches and receipts.
The same monetary standard prevailed throughout the Empire, with coins
having the same names, the same purity and the same denominations, and
differing only in the name of the mint-town. Officials and soldiers were
frequently transferred from one province to another. Thus, the native of
one province felt himself almost at home in another province; traders and
travellers passed most easily from city to city, subah to subah, and all realised
the imperial oneness of this vast country."—Mughal Administration, by
Jadunath Sarkar, pp. 129, 130.
मुग़लों का समय १४२
प्रोफेसर जदुनाथ सरकार का कहना है कि भारतवासियों को दूसरा लाभ
[जो मुसलमानों से पहुँचा वह इस देश के अन्दर ऐतिहासिक साहित्य का
प्रारम्भ था।
दूसरे देशों से सम्बन्ध
बौद्धमत के बाद से बाहर के देशों के साथ भारत का सम्बन्ध भी कम
होता जा रहा था । तिजारत गिरती जा रही थी । मुग़लों के शासन काल
में भारत का सम्बन्ध बाहर के अन्य देशों के साथ फिर से क़ायम हुआ ।
मुग़ल साम्राज्य के क़रीब क़रीब आख़िर तक अफ़ग़ानिस्तान दिल्ली के
सम्राट् के अधीन था, और अफ़ग़ानिस्तान के ज़रिए बुख़ारा, समरकन्द,
बलख़, खुरासान, ख़्वारज़िम और ईरान से हज़ारों यात्री और व्यापारी
भारत आते जाते थे । सम्राट् जहांगीर के दिनों में तिजारती माल से लदे
हुए चौदह हज़ार ऊँट हर साल केवल बोलन दर्रे से होकर भारत आते
जाते थे । इसी तरह पच्छिम में ठट्ठा, भड़ोच, सूरत, चाल, राजापुर, गोश्रा
और कारवार, और पूरब में मछलीपट्टन और दूसरे बन्दरगाहों से हज़ारों
जहाज़ हर साल अरब, ईरान, टरकी, मिश्र, अफ़्रीका, लङ्का, सुमात्रा, जावा,
स्याम और चीन आते जाते रहते थे । जदुनाथ सरकार इसे भारत के ऊपर
मुग़ल साम्राज्य का तीसरा उपकार बताता है ।
धार्मिक और सामाजिक एकता
चौथा उपकार प्रोफेसर सरकार की राय में भारत की उन धार्मिक
और सामाजिक लहरों का और अधिक ज़ोरों के साथ फैलना था, जिनका
हम ऊपर विस्तार के साथ ज़िक्र कर चुके हैं । पाँचवाँ शिल्पकला और
चित्रकारी की अपूर्व उन्नति और उसका विस्तार ।
१०
१५६ पुस्तक प्रवेश
युद्ध विद्या, सैनिक व्यवस्था और क़िलेबन्दी के कामों ने भी जो उन्नति
मुग़लों के समय में की उतनी पहले कभी न की थी। बन्दूक़ों और तोपों
का रिवाज तमाम भारत में अधिकतर मग़लों ही के समय से फैला।
विशेष कर उत्तर भारत के रहन सहन और वेश भूषा में मुसलमानों
का साफ़ प्रभाव दिखाई देता है। हिन्दी, बङ्गला और मराठी भाषाओं में
इस समय तक असंख्य फ़ारसी, अरबी और तुरकी शब्द भरे हुए हैं। उत्तर
भारत में यदि किसी हलवाई की दूकान पर मिठाइयों के नाम गिने जायँ
तो उनमें बालूशाही, गुलाब जामुन, बरफ़ी, हलवा, कलाकन्द, खुरमा
इत्यादि अधिकांश नाम मुसलमानी हैं और इनमें से अधिकांश मिठाइयाँ
मुग़ल समय की ईजाद हैं। यहाँ तक कि हिन्दुओं के विवाह जैसे संस्कार
में भी सेहरा, और जामा जैसी चीज़ों का अभी तक उपयोग किया जाता है।
भारत की प्राचीन ग्राम पञ्चायतों और उनके अधिकारों में मुग़लों ने
किसी तरह का भी हस्तक्षेप नहीं किया। जदुनाथ सरकार लिखता है—
“उन्होंने बुद्धिमत्ता के साथ ग्राम शासन की पुरानी पद्धति
को और लगान वसूल करने के पुराने हिन्दुओं के तरीक़े को
ज्यों का त्यों जारी रक्खा, यहाँ तक कि लगान के मोहकमें
में अधिकतर केवल हिन्दू ही नौकर रक्खे जाते थे, नतीजा यह
हुआ कि राजधानी के अन्दर राजकुल के बदल जाने से हमारे
करोड़ों ग्रामवासियों के जीवन पर किसी तरह का अहितकर
प्रभाव न पड़ता था।”*
• Ibid, p. 139.
मुग़लों का समय १४७
मुग़लों की प्रजा पाळकता
किसानों को और रैय्यत को मुग़ल सम्राटों के समय में ख़ास सहायता
दी जाती थी और उनकी हर तरह रक्षा की जाती थी। जिस समय कोई
नया सूबेदार नियुक्त किया जाता था तो उसे और बातों के साथ साथ यह
आदेश दिया जाता था—
“रय्यत को इस बात के लिए प्रोत्साहन देना कि वे खेती
को उन्नति दें और अपने पूरे दिल से खेती बाड़ी को बढ़ाएँ। कोई
चीज़ उनसे ज़बरदस्ती न छीनना। याद रखना कि रय्यत
ही राज की आमदनी का एक मात्र स्थाई ज़रिया है। × × ×
“× × × इस बात का ख़याल रखना कि बलवान
निर्बलों पर अत्याचार न करें।”*
इसी तरह जब किसी प्रान्त के लिए नया सूबेदार नियुक्त होता था तो
सम्राट का वज़ीर, जिसे दीवाने आला कहते थे, उसे जो हिदायतें करता
था, उनमें से एक यह होती थी—
“ख़याल रखना कि बलवान निर्बलों पर अत्याचार न करें।
तमाम अत्याचारियों को दबा कर रखना।”†
- “Encourage the ryots to extend the cultivation and carry on
agriculture with all their hearts. Do not screw anything out of them.
Remember that the ryots are permanent that is the only permanent source
of income to the State.
“ . . . . . See that the strong may not oppress the weak.”—Ibid,
p. 85, 86.
† Ibid, p. 81.
१४८ पुस्तक प्रवेश
हर प्रान्त में सूबेदार या नाज़िम के अलावा एक दीवान होता था ।
सूबेदार का काम फ़ौज का इन्तज़ाम, शासन प्रबन्ध और न्याय करना होता
था । दीवान का काम लगान वसूल करना । हर दीवान की नियुक्ति की
सनद में लिखा होता था कि उसका सब से मुख्य काम "खेती के काम को
और ग्रामों की आबादी को बढ़ाना" है । लगान की वसूली में खेतिहर के
साथ किसी तरह की ज़बरदस्ती की इजाज़त न थी । एक हिदायत हर सनद
में यह होती थी कि—
"यदि किसी आमिल के इलाक़े में कई साल की लगान
की बक़ाया चली आती है, तो तुम उस रक़म को किसानों से
बहुत आसान क़िस्तों में वसूल करना, यानी बक़ाया का केवल
पाँच फ़ीसदी हर फ़सल के मौके पर वसूल करना ।"*
इसी तरह फ़ौजदारों, थानेदारों, करोड़ियों, तहसीलदारों इत्यादि सब
को हिदायत होती थी कि किसानों को किसी तरह का कष्ट न पहुँचाएँ ।
उस समय के किसानों की हालत
जदुनाथ सरकार, मुग़ल साम्राज्य के दिनों के भारतीय किसानों की
उस समय के फ़्रांस और आयरलैण्ड के किसानों से तुलना करते हुए,
लिखता है—
"किन्तु फ़र्क़ यह था कि अंगरेज़ों के आने से पहले (मुग़ल-
भारत में) किसी किसान को लगान अदा न करने के क़सूर
में ज़मीन से बेदख़ल न किया जाता था, कोई किसान भूखा न
था ।" x x x बटाई की प्रथा के अनुसार चूँकि लगान पैदावार
- Ibid, p. 88.
मुग़लों का समय १४६
की शक्ल में लिया जाता था, किसान को बड़ा फ़ायदा रहता
था, क्योंकि लगान की अदायगी हर साल की असली पैदावार
पर निर्भर होती थी । इसके ख़िलाफ़ आज कल का लगान रुपयों
की शक्ल में नियत होता है जिसका उस साल की पैदावार के
साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता ।”
हर मुग़ल सम्राट की तरफ़ से तमाम सूबों के कर्मचारियों और सामन्त
नरेशों के नाम बार बार इस मज़मून की आज्ञाएँ निकलती रहती थीं कि
किसी किसान के साथ लगान की वसूली में या किसी मामले में किसी
तरह की ज़बरदस्ती न की जाय और कोई नाजायज़ रक़म या 'अबवाब'
किसी से वसूल न की जाय ।
इतिहास लेखक फ्रेडरिक आगस्टस लिखता है कि—
“जब कभी सम्राट की सेना ग्रामों में से होकर निकलती थी
और उनके कूच की वजह से किसान के माल को हानि पहुँचती
थी या उसकी बरबादी होती थी, तो विश्वस्त आदमी इस बात के
लिए नियुक्त किए जाते थे कि वे उस हानि या बरबादी के मूल्य
का ठीक ठीक तख़मीना लगाएँ । तख़मीना लगाने के बाद ये
लोग या तो उस रक़म को किसान के सरकारी लगान में से कम
कर देते थे या व्यर्थ की शिकायतों और बहसों से बचने के लिए
उसी समय किसानों के दावे के अनुसार उन्हें रक़म अदा कर
देते थे ।”*
- The Emperor Akbar, etc., by Frederick Augustus, translated by A. S
Beveridge, pp. 273-77
१५० पुस्तक प्रवेश
औरंगज़ेब का एलान
सन् १६७३ में सम्राट् औरंगज़ेब ने अपने साम्राज्य भर में एक एलान
प्रकाशित किया, जिसमें ५४ चीज़ों की एक सूची दी गई थी और लिखा
था कि इनमें से किसी के ऊपर प्रजा से किसी तरह का महसूल आदि न
लिया जाय । इसी एलान में सम्राट् ने राज कर्मचारियों और ज़मींदारों को
आज्ञा दी कि किसी किसान से किसी तरह की भी 'भेंट या बेगार' न ली
जाय । इन ५४ चीज़ों में मछली, तेल, घी, दूध, दही, उपले, तरकारियाँ,
घास, ईंधन, मिट्टी के बरतन, ऊँट, गाड़ियाँ, चरागाह, सड़कों की रहदारी
का महसूल, नदियों के घाटों का महसूल, रुई, गन्ना, रस, कपड़े की छपाई,
इत्यादि भी शामिल थीं। इसी एलान में लिखा था कि गंगा या अन्य
तीर्थों में नहाने वालों से या अपने मुर्दों की अस्थियाँ गंगा में ले जाने वाले
हिन्दुओं से किसी तरह का महसूल न लिया जाय ।
इस तरह की आज्ञाएँ सम्राट अकबर के समय से लेकर बराबर निकलती
रहती थीं । हर नए सम्राट को अपने तख़्त पर बैठने के समय या कभी कभी
अपने शासन काल में एक से अधिक बार उन्हें इसलिए दोहराते रहना या
कभी कभी बदलना पड़ता था ताकि कोई सामन्त या कर्मचारी इस विषय
में असावधान न हो जाय । जदुनाथ सरकार लिखता है—
“उस समय के इतिहासों और पत्रों से ज़ाहिर है कि मुग़ल
साम्राज्य के अधिराज की नीति सदा यही होती थी कि रय्यत पर
किसी तरह का अत्याचार न होने पाए । यह बात साबित की
जा सकती है कि यह नीति केवल एक शुभ कामना ही न थी,
बल्कि यही उस समय की सच्ची हालत थी । शाहजहाँ और