भारत में अंग्रेजी राज (पण्डित सुन्दरलाल - ब्रिटिश औपनिवेशिक लूट व षड्यन्त्रों का प्रामाणिक इतिहास)
Bharat Mein Angreji Raj by Pandit Sunderlal
पण्डित सुन्दरलाल (प्रस्तावना: महात्मा गाँधी) द्वारा
राजपूत नरेशों ने अलग अलग ख़ासी वीरता के साथ मुक़ाबला किया।
किन्तु उनमें किसी तरह का ऐक्य या नीतिज्ञता बाक़ी न रह गई थी। इसके
बाद सौ साल के अन्दर मैसूर तक अधिकांश भारत पर मुसलमानों की
हुकूमत क़ायम हो गई।
विदेशी और स्वदेशी
ज़ाहिरा देखने में भारतीय जीवन को एक बार गहरा धक्का पहुँचा।
किन्तु जिन मुसलमानों ने बाहर से आकर भारत पर हमला किया वे फिर
भारत में बस गए और भारत ही के होकर रह गए। भारत पर मुसलमानों
की हुकूमत क़ायम होने से पहले जो लाखों भारतवासी इस्लाम धर्म
स्वीकार कर चुके थे, उनके सबब और उस आदर के सबब जो, जैसा हम
दिखा चुके हैं, अधिकांश भारतवासियों के चित्त में इस्लाम की ओर पैदा
हो चुका था, इन बाहर से आने वाले मुसलमानों को भारत के अन्दर
बसने और मिल जुल जाने में काफ़ी सुगमता हुई। एक नस्ल के अन्दर ही
वे पूरी तरह भारतवासी बन गए। उन्हें देशवासियों के हित में अपना हित
और उनके सुख में अपना सुख दिखाई देने लगा। भारत को उस अन्धकार
मय युग में एक प्रधान राजनैतिक शक्ति की आवश्यकता थी। जिन मुसल-
मानों ने विदेशी रूप में इस देश पर हमला किया था, उन्होंने स्वदेशी और
भारतीय बन कर भारत की इस आवश्यकता को बड़ी सुन्दरता के साथ
पूरा किया।
हम कभी किसी भी व्यक्ति या क़ौम के दूसरे व्यक्ति या क़ौम पर हमला
करने को जायज़ क़रार नहीं देते। किसी भी विदेशी हमला करने वाले के
सामने सिर झुका देना या विदेशी सेना से पराजित हो जाना किसी
७
६८ पुस्तक प्रवेश
भी देश के लिए यशस्कर नहीं कहा जा सकता। किन्तु इसके साथ ही
हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि कोई जाति विशेष किसी देश
विशेष का ठेका लेकर पृथ्वी पर नहीं उतरी। सच यह है कि बहुत दरजे
तक मानव समाज का जातियों या देशों में बटवारा एक कृत्रिम बटवारा
है। मानव समाज एक विशाल कुटुम्ब है, जिसका घर पृथ्वी है। आजकल
के राष्ट्रीयता के भाव भी जो मानव समाज की आजकल की स्थिति में
हर देश के जीवित रहने के लिए एक दरजे तक आवश्यक प्रतीत होते हैं,
वास्तव में एक अनिवार्य रोग ही हैं। इस विषय को अधिक विस्तार देना भी
हमारे इस समय के प्रसङ्ग से बाहर है। फिर भी हम इतना अवश्य कहेंगे
कि कोई मनुष्य किसी देश के अन्दर विदेशी केवल उस समय तक ही कहा
जा सकता है, जब तक कि वह उस देश की सीमाओं से बाहर किसी दूसरे
देश को अपना घर मानता हो, या उस पहले देश से धन बटोर कर दूसरे
देश को ले जाता हो। किन्तु जिस समय कोई मनुष्य किसी देश को अपना
घर बना लेता है, वहीं पर बस जाता है, देशवासियों के सुख में अपना
सुख और दुख में अपना दुख समझने लगता है, तो फिर चाहे वह किसी
भी धर्म का मानने वाला हो, अच्छे आचरण का हो या बुरे आचरण का,
उसे विदेशी नहीं कहा जा सकता।
अंगरेज़ों के आने से पहले तक अधिकांश समय में अफ़ग़ानिस्तान
भारत का एक प्रान्त था। फिर भी यदि अफ़ग़ानिस्तान को भारत से बाहर
मान लिया जाय तो महमूद ग़ज़नवी के हमले भारत पर विदेशी हमले थे।
मुहम्मद बिन क़ासिम का सिन्ध पर हमला निस्सन्देह विदेशी हमला था।
मोहम्मद ग़ोरी का भारत पर हमला भी विदेशी हमला था। किन्तु जो
मुसलमानों का यहाँ बस जाना ६६
मुसलमान ईरान या अफ़ग़ानिस्तान से आकर एक बार भारत में बस गए,
उनकी हुकूमत किसी तरह विदेशी हुकूमत नहीं कही जा सकती । तेरहवीं
सदी के अन्त से लेकर सोलवीं सदी के शुरू तक ढाई सौ साल का समय
लगातार संग्रामों का समय था। इसके बाद भारत पर केवल मुग़लों का
हमला बाक़ी रह जाता है । जिस बाबर ने तुर्किस्तान से आकर भारत पर
हमला किया वह विदेशी था। पानीपत के मैदान में सन् १५२६ ईसवी में
स्वदेशी और भारतीय इब्राहीम लोधी ने विदेशी बाबर का मुक़ाबला
किया । इब्राहीम लोधी हार गया । बाबर हिन्दोस्तान में बस गया । मुग़ल
साम्राज्य भारत में क़ायम हो गया ।
मुग़ल साम्राज्य से भारत को क्या लाभ हुआ या क्या हानि हुई, यह एक
दूसरे स्थान का विषय है । यहाँ पर हमें केवल यह दिखाना है कि जिस तरह
इस्लाम एक बार भारत में आकर भारत की अनेक सम्प्रदायों में से एक
सम्प्रदाय बन गया, उसी तरह मुसलमान हमलेआवर एक बार भारत में
बस कर अन्य भारतवासियों के समान भारतबासी बन गए । भारत पर
मुसलमानों के शासन के समय की बेशुमार मिसालें इस बात की मिलती
हैं जब कि भारत के मुसलमान शासकों ने बाहर से हमला करने वाले
मुसलमानों का वीरता के साथ मुक़ाबला किया, या स्वयं भारत की सीमा
से बाहर निकल कर बाहर के मुसलमान देशों को विजय किया, उन्हें अपने
भारतीय साम्राज्य का एक अंग बनाया और कभी कभी भारत के हिन्दू
नरेशों को वहाँ का शासक नियुक्त किया ।
अपने धार्मिक विचारों के सबब से भी कोई मनुष्य किसी देश में विदेशी
नहीं कहा जा सकता । धार्मिक आज़ादी हर सभ्य देश का एक आवश्यक
१०० पुस्तक प्रवेश
गुण है, और भारत ने अपने पिछले हज़ारों साल के इतिहास में इस गुण
को अन्य देशों की अपेक्षा ख़ासी सुन्दरता के साथ निबाहा है।
यदि स्वदेशी और विदेशी की इस परिभाषा को स्वीकार न किया जाय
तो भारत, इंगलिस्तान, जरमनी, फ़्रान्स या संसार का कोई भी देश इस
समय ऐसा नहीं है, जो पूरी तरह विदेशियों से बसा हुआ न हो। फिर न
इंगलिस्तान के एङ्गलो सेक्सन वहां के असली बाशिन्दे माने जा सकते हैं
और न जर्मनी या हिन्दोस्तान के 'आर्य' जिन्हें अपने देशों का इस समय
ख़ासा गर्व है। सच यह है कि जिस बाबर ने पानीपत में इब्राहीम लोधी
को परास्त किया वह बाबर विदेशी था, किन्तु जिस बाबर ने दिल्ली में अपना
साम्राज्य क़ायम करके तातार और ईरान से अपना सम्बन्ध सदा के लिए
तोड़ कर भारत को अपना देश बना लिया वह बाबर भारतवासी था। बाद
के मुग़ल सम्राटों में से किसी सम्राट की किसी नीति विशेष का कोई नतीजा
चाहे भारत के लिए हितकर रहा हो या अहितकर, चाहे सम्राट अकबर के
समान उनमें से किसी ने हिन्दू और मुसलमानों को एक दृष्टि से देखा हो,
या चाहे औरङ्गज़ेब के समान किसी तरह के भी भेद भाव द्वारा अपने शासन
को बदनाम किया हो, फिर भी वे सब सम्राट भारतवासी थे और उनका
साम्राज्य स्वाधीन भारतीय साम्राज्य था।
मानव धर्म
हम फिर भारत की उस समय की धार्मिक लहरों की ओर आते हैं।
रामानुज के धार्मिक विचारों और उसके भक्तिमार्ग को दक्खिन से
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गोस्वामी तुलसीदास
[ श्री बहादुर सिंह जी सिंघी, कलकत्ता, की कृपा द्वारा, नवाब मुर्शिदाबाद
के यहां की एक फ़ारसी हस्त लिखित रामायण के समकालीन चित्र से ]
मानव धर्म १०१
उत्तर में लाकर उनके प्रचार करने का कार्य रामानन्द ने किया। रामानन्द
ने विष्णु के स्थान पर राम की भक्ति का उपदेश दिया और हर जाति
के लोगों को अपनी सम्प्रदाय में शामिल किया। मैकॉलिफ़ लिखता है
कि—"इसमें कोई सन्देह नहीं कि बनारस में विद्वान मुसलमानों
के साथ रामानन्द की भेंट हुई।" रामानन्द के शिष्यों और अनुयाइयों
में अनेक मुसलमान भी थे। दो नाम उसके शिष्यों में सबसे अधिक
प्रसिद्ध हैं, एक तुलसीदास और दूसरा कबीर। गोस्वामी तुलसीदास की
रामायन सारे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। तुलसीदास का मोहावरा अवधी है।
फिर भी संस्कृत, फ़ारसी, और अरबी तीनों के शब्द भण्डारों से अपनी
पुस्तक को अलंकृत कर एक ऐसी सरल और सर्वप्रिय हिन्दोस्तानी भाषा को
रचने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को प्राप्त है जिसमें ऊँचे से ऊँचा साहित्य
लिखा जा सका। हिन्दोस्तानी ज़बान के बनाने वालों में गोस्वामी तुलसी-
दास का नाम सदा के लिए स्मरणीय रहेगा।
कबीर
निस्सन्देह कबीर की शुमार भारत के महान से महान तत्वदर्शियों,
धर्माचार्यों और समाज सुधारकों में की जानी चाहिए। कबीर एक अत्यन्त
स्वतन्त्र विचार का महापुरुष था। वह मत मतान्तरों के भेद और हर तरह
के कर्मकाण्ड और रूढ़ियों का कट्टर विरोधी था। हिन्दुओं और मुसलमानों
की एकता का इस देश के अन्दर वह सब से पहला प्रचारक और सब से
महान समर्थक था। उसका जन्म सन् १३६८ ईसवी में हुआ और मृत्यु
सन् १४१८ ईसवी में। कहा जाता है कि कबीर किसी विधवा ब्राह्मणी के
गर्भ से उत्पन्न हुआ था। बनारस के एक मुसलमान जुलाहे नीरू और
१०२ पुस्तक प्रवेश
उसकी स्त्री ने कबीर का पालन पोषण किया। बनारस में रह कर कबीर
हिन्दू और मुसलमान दोनों मतों के सिद्धान्तों से पूरी तरह परिचित हो
गया। मोहसिन फ़ानी लिखता है कि कबीर ने लड़कपन ही में अनेक हिन्दू
और मुसलमान विद्वानों और सन्तों से भेंट की। बहुत दिनों वह जौनपुर,
झूँसी इत्यादि में शेख़ तक़ी और अन्य मुसलमान सूफ़ियों और पीरों के
के साथ रहा, जिनका ज़िक्र कबीर साहब ने अपनी 'रमैनी में किया है।
इसके बाद कबीर ने बनारस में अपना सत्सङ्ग शुरू कर दिया। कबीर के
विचार इतने स्वतन्त्र थे कि शुरू में मुसलमान मौलवी और हिन्दू पण्डित
दोनों उससे बेहद नाराज़ हुए। इन लोगों, ने हर तरह से कबीर को कष्ट
पहुँचाने और दिक़ करने की कोशिश की। अन्त में हिन्दू और मुसलमान
दोनों जातियों में से कबीर के हज़ारों अनुयायी हो गए। जीवन भर कबीर
ने अपने पिता का काम यानी कपड़े बुनने का धन्धा नहीं छोड़ा। हिन्दुओं
में यह एक बात सदा से प्रसिद्ध रही है कि काशी में मरने से मनुष्य को
मुक्ति प्राप्त होती है। इसके विपरीत कहा जाता है कि गोरखपुर से १५ मील
पच्छिम में मगहर में मरने वाले को गधे की योनि में जन्म लेना पड़ता है।
कबीर ने अन्त समय निकट आने पर जान बूझ कर इस प्राचीन अन्ध-
विश्वास की अवहेलना प्रकट करने के लिए काशी से मगहर के लिए प्रस्थान
किया और मगहर ही में अपने हज़ारों हिन्दू और मुसलमान अनुयाइयों
की मौजूदगी में चोला छोड़ा। कहा जाता है कि कबीर के मरने के बाद
उसके कुछ हिन्दू और मुसलमान अनुयाइयों में झगड़ा हुआ, हिन्दू उसे
हिन्दू कहते थे और उसके शरीर को जलाना चाहते थे, मुसलमान उसे
मुसलमान मान कर दफ़न करना चाहते थे।
मानव धर्म १०३
कबीर हिन्दुओं के वर्णाश्रम धर्म या जातिभेद का कट्टर विरोधी था ।
वेदों, शास्त्रों या कुरान में से किसी को भी वह निर्भ्रान्त या हर बात में
प्रमाण न मानता था । सूफ़ियों के समान प्रेम, इश्क़ या भक्ति उसका
मुख्य धर्म था । अपनी रमैनी, शब्दों और साखियों के ज़रिए उसने हिन्दू
और मुसलमान दोनों को एक समान धर्म का उपदेश दिया, निर्भीकता
के साथ दोनों मतों की रूढ़ियों का एक समान खण्डन किया, और प्राणि-
मात्र के साथ प्रेम और एक ईश्वर की भक्ति का सबको एक समान उपदेश
दिया ।
कबीर ने हिन्दू मत और इस्लाम दोनों में से सामान्य सच्चाइयों को
एक समान ग्रहण किया । संस्कृत और फ़ारसी, उर्दू और हिन्दी, चारों
भाषाओं के शब्दों का अपने पद्यों में उसने एक समान उपयोग किया ।
हिन्दू और मुसलमान धर्मों की झूठी पृथकता पर दुख प्रकट करते
हुए, दोनों को एक सार्वजनिक धर्म दर्शाते हुए और दोनों को प्राणिमात्र
पर दया का उपदेश देते हुए, कबीर कहता है—
भाई रे दुइ जगदीश कहाँ ते आया, कहु कौने बौराया ।
अल्लाह राम करीमा केशव, हरि हजरत नाम धराया ॥
गहना एक कनक ते गहना, यामैं भाव न दूजा ।
कहन सुनन को दुइ कर थापे, एक निमाज एक पूजा ॥
वही महादेब बही महम्मद, ब्रह्मा आदम कहिए ।
को हिन्दू को तुरक कहावै, एक जिमी पर रहिए ॥
वेद कितेब पढ़े वै कुतुबा, वै मुलना वै पांडे ।
बेगर बेगर नाम धराए, एक मिट्टी के भांडे ॥
१०४ पुस्तक प्रवेश
कहहिं कबीर वै दूनों भूले, रामहिं किनहु न पाया।
वै खस्सी वै गाय कटावें, बादिहि जन्म गमाया॥
अर्थ—हे भाई दो ईश्वर कहाँ से आगए ! तुम्हें किसने बहका दिया ?
अल्लाह और राम, करीम और केशव, हरि और हज़रत, एक ही स्वर्ण के
बने आभूषणों के अलग अलग नाम हैं। इनमें दुई का भाव नहीं है।
कहने सुनने को तुमने दो दो नाम रख लिए हैं—एक नमाज़ और एक
पूजा। वही महादेव है और वही मोहम्मद, वही ब्रह्मा है और वही आदम ।
हिन्दू और मुसलमान में कोई भेद नहीं, दोनों एक ज़मीन पर रहते हैं।
एक वेद पढ़ते हैं और दूसरे कुरान पढ़ते हैं। एक मौलाना कहलाते हैं और
दूसरे पण्डित। ये सब अलग अलग नाम धर लिए हैं वास्तव में सब एक ही
मिट्टी के बरतन हैं। कबीर कहता है, ये दोनों भूले हुए हैं। इनमें से किसी
ने राम को नहीं पाया। एक बकरा काटते हैं और दूसरे गाय काटते हैं—
दोनों वृथा जन्म खोते हैं।
कबीर कहता है—
हिन्दू कहूँ तो मैं नहीं, मुसलमान भी नाहिं ।
पाँच तत्त का पूतला, गैबी खेले माहिं ॥
अर्थ—मैं न हिन्दू हूँ और न मुसलमान, मैं पञ्च तत्त्वों का बना हुआ
पुतला हूँ जिसके अन्दर ग़ैबी (आत्मा) क्रीड़ा करता है।
कबीर के उपदेशों पर मुसलमान सूफ़ी फ़क़ीरों के उपदेशों का प्रभाव
बिलकुल साफ़ दिखाई देता है। हिन्दुओं में कबीर से पहले का कोई ऐसा
महात्मा न था जिसका वह अनुसरण करता; इसलिए उसके लिए मुसलमानों
का अनुसरण स्वाभाविक और अनिवार्य था। फ़रीदुद्दीन अत्तार के पन्दनामे
मानव धर्म १०५
और जलालुद्दीन रूमी और शेख़सादी शीराज़ी की कविताओं से कबीर
निस्सन्देह भली भाँति परिचित था । कबीर के पद्यों में इन महापुरुषों और
दूसरे सूफ़ीयों के उपदेशों की बार बार झलक आती है । कबीर का नीचे
लिखा पद्य —
जब तू आयो जगत में, जगत हँसे तू रोय ।
अब तो ऐसी कर चलो, तू हाँसे जग रोय ॥
शेख़सादी के इस मशहूर पद्य का साफ़ भाषान्तर है—
याद दारी के वक़्ते ज़ादने तो,
हमा ख़न्दाँ बुवन्दो तू गिरियाँ ।
आँचुनाज़ी के बाद मुर्दने तो,
हमा गिरियाँ शवन्दो तू ख़न्दाँ ॥
इसी तरह की और भी अनेक मिसालें कबीर के पद्यों से दी जा
सकती हैं । कबीर के पद्यों में फ़ारसी और अरबी के शब्द और सूफ़ीयों की
उपमाएँ और उनके अलङ्कार इधर से उधर तक भरे पड़े हैं । अहमदशाह
ने कबीर के बीजक में हबीब, महबूब, आशिक़, माशूक़, मुसाफ़िर, मुक़ाम,
हाल, जमाल, जलाल, साक़ी, शराब, क़हर, मेहर, ग़ैबत, हुज़ूर, हैरत,
नासूत, मलकूत, जबरूत, लाहूत, हाहूत, हक़ इत्यादि, इस तरह के दो सौ
से ऊपर अरबी और फ़ारसी के शब्द चुने हैं, जिन्हें कबीर ने ठीक उन्हीं
माइनों में उपयोग किया है जिनमें सूफ़ियों ने, और जिनसे साफ़ मालूम
होता है कि कबीर अपने विचारों और उपदेशों के लिए मुसलमान
सूफ़ीयों का किस दरजे आभारी था ।
कबीर ने संस्कृत की निस्बत भाषा में अपने पद्यों को लिखना पसन्द
१०६ पुस्तक प्रवेश
किया। उसका उद्देश आम जनता तक अपने विचारों को फैलाना था।
कबीर ने अपनी साखी में एक जगह पर लिखा है—
संसकिरत है कूप जल, भाषा बहता नीर।
अर्थ—संस्कृत कुएँ का पानी है, किन्तु भाषा (हिन्दी) बहती हुई नदी
के समान है।
कबीर के पद्यों में कहीं संस्कृत भरी हिन्दी और कहीं फ़ारसी भरी उर्दू,
दोनों मिलती हैं। कबीर ने ईश्वर के लिए जगह जगह—राम, हरी, गोविन्द,
ब्रह्म, समरथ, साईं, सत्पुरुष, रँगरेजवा, बेचूँ (अनिर्वचनीय), अल्लाह और
ख़ुदा—सब शब्दों का उपयोग किया है; किन्तु ईश्वर के लिए उसका सब
से प्यारा नाम “साहेब” है। कबीर को इस बात का दावा है कि उसने
“तुममें और मुझमें” प्राणिमात्र में, और सब पदार्थों में व्यापक “ज़ाते
पाक” का साक्षात दर्शन किया था। सूफ़ीयों के समान ही कबीर ने स्थान
स्थान पर ख़ुदा को ‘नूर’ बतलाया है और हर चीज़ को ख़ुदा माना है।
रमैनी में बद्रुद्दीन शहीद, इब्न सीना और जिली के अनेक पद्यों का बिल-
कुल तरजुमा सा दिखाई देता है। सूफ़ीयों ही के समान कबीर ने गुरु को
गोविन्द बतलाया है और अपनी साखी में लिखा है—
हरि के रूठे ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर।
अर्थ—यदि हरि नाराज़ हो जाय तब भी कुछ बचत हो सकती है,
किन्तु यदि गुरु नाराज़ हो जाय तब फिर कोई बचत नहीं। कबीर का यह
पद्य मौलाना रूम के एक पद्य का तरजुमा मालूम होता है।
कबीर ने गुरु को ‘सिकलीगर’ लिखा है। कबीर प्रेम का परम विश्वासी
मानव धर्म १०७
था । वह लिखता है कि—एक प्रेम समस्त संसार में व्यापक है । ईश्वर की
खोज के विषय में वह लिखता है—
मोको कहाँ ढूंढ़े बन्दे, मैं तो तेरे पास में ।
ना मैं देवल ना मैं मसजिद, ना काबे कैलास में ॥
खोजी होय तो तुरते मिलिहौं, पल भर की तालास में ।
कहैं कबीर सुनो भई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में ॥
अर्थ—ऐ बन्दे ! तू मुझे कहाँ ढूँढ़ता है ? मैं तेरे पास हूं । मैं न मन्दिर
में हूँ न मसजिद में, न काबे में हूँ न कैलाश में । यदि तू सच्चा खोजी है
तो मैं तुरन्त एक पल भर की खोज में तुझे मिल जाऊँगा । कबीर कहता
है—हे साधो ! सुनो, साहेब सब के प्राणों का प्राण है ।
सूफ़ियों की तरह कबीर ने लोगों को इश्क़ की शराब पीने की दावत
दी है । अभ्यास द्वारा ब्रह्मत्व की ओर रूह की यात्रा को कबीर ने ठीक
उन्हीं शब्दों में बयान किया है जिन शब्दों में कबीर से पाँच सौ साल पहले
मनसूर ने बयान किया था । अपनी पुस्तक 'दस मुक़ामी रेख्ता' में कबीर ने
हज़रत मोहम्मद के मेराज के क़िस्से को अपने ढङ्ग से बयान किया है ।
वास्तव में कबीर ने भारत का ध्यान एक ऐसे सार्वजनिक धर्म की ओर
दिलाया जो न हिन्दू था, न मुसलमान । इसीलिए उसने हिन्दू और
मुसलमान दोनों के अलग अलग कर्मकाण्डों, दोनों के मतभेदों, दोनों के
धार्मिक ग्रन्थों की निष्भ्रान्तता इत्यादि की अत्यन्त कड़े से कड़े शब्दों में
निर्भीकता के साथ आलोचना की है । ब्राह्मणों के प्रभुत्व, जात पाँत और
छुआछूत का वह कट्टर विरोधी था ही । राम शब्द को उसने ईश्वर के अर्थों
१०८ पुस्तक प्रवेश
में उपयोग किया है, किन्तु उसने साफ़ लिखा है कि उसका राम दशरथ का
पुत्र राम नहीं है । वह लिखता है—
सिरजनहार न ब्याही सीता, जल पषाण नहिं बन्धा ।
यानी—सिरजनहार ने सीता से विवाह नहीं किया था और न उसने
समुद्र के ऊपर पत्थरों का पुल बाँधा ।
कबीर ने अनेक स्थान पर दसों अवतारों का खण्डन किया है । वह
ईश्वर के विषय में कहता है —
दशरथ कुल अवतरि नहिं आया, नहिं लङ्का के राव सताया ।
नहीं देवकी गर्भहि आया, नहीं यशोदा गोद खेलाया ।
पृथ्वी रवन धवन नहिं करिया, पैठि पताल नाहिं बलि छलिया ।
नहिं बलिराज सो माँडल रारी, नहिं हरनाकुश वधल पछारी ।
बगह रूप धरणि नहिं धरिया, छत्री मारि निछत्री नहिं करिया ।
नहिं गोवर्धन कर गहि धरिया, नहिं ग्वालन सँग बन बन फिरिया ।
गण्डकि शालिग्राम नहिं कूला, मच्छ कच्छ होय नहिं जल डोला ।
द्वारावती शरीर नहिं छाँड़ा, ले जगन्नाथ पिण्ड नहिं गाड़ा ।
जात पाँत और छुयाछूत के विषय में कबीर ने कहा है—
गुप्त प्रकट है एकै दूधा, का को कहिए ब्राह्मण शूद्रा ।
झूठे गर्भ भूलो मति कोई, हिन्दू तुरुक झूठ कुल दोई ।
और के छिये लेत हो छींछा, तुमसों कहहु कौन है नीचा ।
कबीर ने आवागमन के मोटे रूप का जिस तरह आम हिन्दू
मानते हैं खण्डन किया है; इस विषय में उसके विचार काफ़ी गूढ़ और
गहरे हैं ।
मानव धर्म १०६
सारांश यह कि कबीर ने क़ुरान और मोहम्मद साहब में अन्धविश्वास,
हज़, रोज़े और नमाज़ इत्यादि का मज़ाक़ उड़ाते हुए मुसलमानों को
समस्त रूढ़ियाँ छोड़ देने का उपदेश दिया है, हिन्दुओं को उसने उतने ही
ज़ोर के साथ जात पाँत, मूर्तिपूजा, अवतार, और छुआछूत और वेद और
शास्त्रों में अन्धविश्वास छोड़ देने की सलाह दी है, दोनों को उसने प्राणि-
मात्र पर दया रखने, सबको एक ख़ुदा की औलाद और भाई भाई समझने,
अहङ्कार त्यागने और सब की सेवा करने का उपदेश दिया । कबीर के नीचे
लिखे पद्य इस विषय में याद रखने योग्य हैं—
पूरब दिशा हरो को बासा, पच्छिम अलह मुकामा ।
दिल में खोजि दिलहि माँ खोजो, इहै करीमा रामा ॥
जेते औरत मर्द उपानी, सो सब रूप तुम्हारा ।
कबीर पोंगरा अलह राम का, सो गुरु पीर हमारा ॥
हिन्दू तुरुक की एक राह है, सतगुरु सोइ लखाई ।
'कहहिं कबीर सुनो हो सन्तो, राम न कहूँ खुदाई ॥
हिन्दू कहें राम मोंहि प्यारा, तुरुक कहें रहिमाना ।
आपस में दोउ लरि लरि मूए, मर्म न काहू जाना ॥
यानी— लोग कहते हैं हरि पूरब में रहता है और अल्लाह पच्छिम में,
लेकिन कबीर कहता है अपने दिल के अन्दर खोजो, वहीं करीम हैं और
वहीं राम हैं ।
११० पुस्तक प्रवेश
जितने पुरुष और स्त्री रचे गए हैं सब तुम्हारा ही रूप हैं, कबीर अल्लाह
का और राम का बेटा है, वही कबीर का गुरु और पीर है ।
हिन्दू और तुरुक की एक ही राह है, जो सत्गुरु ने बताई है, कबीर
कहता है, सुनो भाई सन्तो ! राम और ख़ुदा में कोई भेद नहीं है ।
हिन्दू राम कहते हैं, मुसलमान रहीम कहते हैं । आपस में दोनों लड़
लड़ कर मरते हैं, मर्म को कोई नहीं जानता ।
कबीर पहला भारतवासी था, जिसने हिन्दू और मुसलमान दोनों के
लिए बल्कि समस्त मानव जाति के लिए एक सामान्य धर्म का निर्भीकता
के साथ प्रतिपादन किया । उसके अनुयाइयों में हज़ारों हिन्दू और मुसल-
मान शामिल थे । अभी तक कबीरचौरा (काशी) में कबीर के हिन्दू
अनुयायी और मगहर में कबीर के मुसलमान अनुयायी हर साल जमा होकर
कबीर की याद में अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हैं । कबीरपन्थियों की
संख्या इस समय शायद् दस लाख से अधिक नहीं है, किन्तु कबीर का
प्रभाव इससे कहीं अधिक है, और पञ्जाब, गुजरात, बङ्गाल और दक्खिन
तक फैला हुआ है। मुग़ल साम्राज्य के दिनों कबीर के विचार बराबर
फैलते गए, यहाँ तक कि दूरदर्शी सम्राट अकबर ने 'दीने इलाही' के रूप में
उन्हें सर्वस्वीकृत कराने की कोशिश की । वास्तव में कबीर ही अकबर का
मानसिक पिता था । विधि ने या देश के भीतर तथा बाहर की परिस्थिति
ने कबीर और अकबर को पूरी तरह सफल न होने दिया, किन्तु भारत की
अन्तरात्मा भीतर से पुकार रही है—यदि सत्य है तो यही है, और यदि
भविष्य के लिए कोई मार्ग है तो केवल यही है ।
कबीर के विचारों की मौलिकता और महानता के कारण कबीर के
समय से फिर एक बार उत्तर ने धार्मिक विचारों के क्षेत्र में शेष भारत का
नेतृत्व हाथ में लिया और कबीर ही के विचार अनेक सन्तों और महात्माओं
द्वारा एक बार उत्तर से दक्खिन तक समस्त भारत में फैलने लगे।
पञ्जाब के मुसलमान फ़क़ीर
जिस तरह शुरू की सदियों में दक्खिन भारत, उसी तरह पन्द्रवीं सदी
में समस्त पञ्जाब के नगर और गाँव मुसलमान सूफ़ियों और फ़क़ीरों से
भरे हुए थे। पानीपत, सरहिन्द, पाकपट्टन, मुलतान और उच्च में
अनेक प्रसिद्ध सूफ़ी शेख़ों ने अपनी ज़िन्दगियाँ गुज़ारीं, जिनमें बाबा फ़रीद,
अला उलहक़, जलालुद्दीन बुख़ारी, मख़दूम जहानियाँ, शेख़ इस्माइल
बुख़ारी, दाता गञ्जबख़्श इत्यादि के नाम अपनी सच्चाई और ईश्वरभक्ति के
लिए देश भर में प्रसिद्ध थे। जो ज़बरदस्त क्रान्ति इन महात्माओं ने देश-
वासियों के विचारों में उत्पन्न की, उसी का फल या फूल गुरु नानक का वह
सुन्दर प्रयत्न था जो उस महापुरुष ने ठीक कबीर ही के समान और उसी
की सरणी पर हिन्दू और मुसलमान धर्मों को मिलाने के लिए किया।
नानक
' गुरु नानक का जन्म सन् १४६६ ईसवी में वैशाख शुक्ला तृतीया को
हुआ था। उसने फ़ारसी और संस्कृत दोनों की शिक्षा पाई थी। नानक
नाम उन दिनों हिन्दू और मुसलमान दोनों का नाम होता था। कुछ
दिनों उसने नबाब दौलत ख़ाँ लोधी के यहाँ नौकरी की। तीस साल की
आयु में उसने फ़क़ीरी ली। अपने मुसलमान शिष्य मरदाना के साथ
उसने भारत, लङ्का, ईरान, अरब इत्यादि की यात्रा की। लिखा है कि
पानीपत के शेख़ शरफ़, मुलतान के पीरों, बाबा फ़रीद के उत्तराधिकारी
११२ पुस्तक प्रवेश
शेख़ बह्म ( इब्राहीम ) इत्यादि सूफ़ियों के साथ उसने बहुत दिनों तक
धर्म चर्चा किया । कबीर के समान नानक के मरने पर भी उसके हिन्दू
और मुसलमान शिष्यों में झगड़ा हुआ । अन्त में हिन्दुओं ने उसकी स्मृति
में एक समाधि बनाईं और मुसलमानों ने एक अलग क़ब्र, किन्तु दोनों
इमारतें रावी की बाढ़ में आकर बह गईं ।
नानक का धर्म भी एकता और प्रेम का धर्म था, उसकी सम्प्रदाय में
भी हिन्दु और मुसलमान दोनों शामिल हुए । नानक मक्के पहुँचा । वहाँ
पर मोहम्मद साहय के समान उसने एक .ख़ुदा का प्रतिपादन किया और
अपने को उसका 'ख़लीफ़ा' बताया—
ला इलाह इल्लल्लाह, गोविन्द नानक ख़लफ़ल्लाह ।*
यानी अल्लाह केवल एक है,वही गोविन्द है,नानक उसका ख़लीफ़ा है ।
नानक के पदों में भी संस्कृत, फ़ारसी और अरबी तीनों भाषाओं के
पदों की भरमार है। दोनों धर्मों की पृथकता को मिथ्या बताते हुए उसने
लिखा—
बन्दे इक .ख़ुदाय दे, हिन्दू मूसलमान,
दावा राम रसूल कर, लड़दे बेईमान ।
ना हम हिन्दू ना मूसलमान,
दोनों बिच्च बसे शैतान ।
एकै, एकी, एक सुभान,
- गुरु नानक की जन्मसाखी, न० ३६, पाकनामा ।
बंगाल में कम्पनी का छल-प्रपंच, प्लासी, बक्सर एवं द्वैध शासन की लूट
मानव धर्म ११३
गुरु जी कहिया सुन अब्दुर्रहमान ।
दावा भूलो ताँ इक्क पिछान ।
हिन्दू जपते राम राम, मूसलमान खुदाय,
इको राम रहीम है, मन में देखो लाय ।
यानी—हिन्दू मुसलमान दोनों एक ख़ुदा के बन्दे हैं, किन्तु दोनों
बेईमान, एक राम का और दूसरा रसूल का, झूठा दावा करके लड़ते हैं ।
हम न हिन्दू हैं और न मुसलमान, इन दोनों के दिलों में शैतान
बसा है। गुरु नानक कहते हैं, ऐ अब्दुर्रहमान ! सुनो, ईश्वर एक ही है,
मत मतान्तरों की हठ छोड़ दो, तब उस एक ईश्वर को पहचान सकोगे ।
हिन्दू राम राम जपते हैं, मुसलमान ख़ुदा कहते हैं, किन्तु यदि अपनी
आत्मा के अन्दर ध्यान से देखोगे तो मालूम होगा कि राम और रहीम
एक ही हैं।
एक दूसरे स्थान पर—
तग्ग न हिन्दू पाइया, तग्ग न मूसलमान ।
दोए भूले राह ते, ग़ालिब भया शतान ॥
जित दर लख्ख मोहम्मदाँ, लख ब्रह्मा बिश्न महेश ।
लख लख राम वडीरिएँ, लख राहें लख वैश ।
यानी— मार्ग न हिन्दू को मिला और न मुसलमान को—दोनों मार्ग
से भटक गए, दोनों पर शैतान ग़ालिब हो गया ।
११४ पुस्तक प्रवेश
मालिक के दर पर लाखों मोहम्मद, ब्रह्मा, विष्णु, महेश और राम खड़े
लाखों तरीक़े से स्तुति करते रहते हैं ।
मोहम्मद साहब की तरह नानक ने भी ईश्वर की इच्छा पर अपने
आपको पूरी तरह छोड़ देने का उपदेश दिया ।
गङ्गास्नान, तीर्थयात्रा, जप, पूजा पाठ इत्यादि को नानक ने फ़जूल
बताया, अठारह पुराण और चारों वेदों को निरर्थक बतलाया, प्रतिमा पूजा
का विरोध किया, कबीर के समान राम के अवतार का खण्डन किया, और
जाति भेद को मिथ्या और हानिकर बताया ।
ऊँच नीच के विचार के विरुद्ध नानक ने कहा है—
ज़ोर न कीजे किसी पर, उत्तम मधम न कोय,
हिन्दू मुसलमान नूं, दोहाँ नसीहत होय ।
नीचाँ अन्दर नीच ज़ात, नीचे हाँ अत नीच,
जित्थे नीच सम्हालिए, उत्थे नज़र तेरी बख़्शीश ।
नीचाँ अन्दर नीच ज़ात, सतगुरु रहे बोलाय ।
यानी—किसी पर ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिए, कोई ऊँच नीच नहीं
है । हिन्दू और मुसलमान दोनों को यही नसीहत है ।
ईश्वर की बख़्शीश उन्हीं को मिलेगी जो नीचों से भी नीच को, और
सब से अति नीच को अपनाते हैं ।
सद्गुरु उन्हें बुलाते हैं, जो नीच से भी नीच जाति के समझे जाते हैं ।
मुसलमानों को उपदेश देते हुए नानक ने कहा—