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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

गुरुमुखी में लिखा पहला पत्र : चाची के नाम

13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग़ में अंग्रेज़ों ने बर्बर क़त्लेआम किया।
12 वर्षीय भगतसिंह दूसरे दिन वहाँ गये और रक्त-सनी मिट्टी लेकर घर लौटे, तो
कई सवाल उनके मन में थे। अपनी छोटी बहिन बीबी अमरकौर से उन्होंने अपने मन
की बातें कीं।
21 फ़रवरी, 1921 को महन्त नारायणदास ने ननकाना साहिब में 140 सिखों
को बड़ी बेरहमी से मार डाला। बहुतों को ज़िन्दा ही जला दिया। लाहौर से अपने
गाँव बंगा जाते समय भगतसिंह ने वह स्थान देखा और 5 मार्च को हुई बड़ी कॉन्फ़्रेंस
भी देखी। वे ननकाना साहिब से इस घटना सम्बन्धी एक कैलेण्डर भी लेते गये थे।
इस घटना से पूरे पंजाब के गाँवों में अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़, जिसने महन्त की
मदद की थी, एक ज़ोरदार आन्दोलन उठा। हर गाँव में काली पगड़ियाँ बाँधने और
पंजाबी पढ़ने का रिवाज़ चल पड़ा। भगतसिंह भी इसके प्रभाव में आये। भाई-बहिन
– बीबी अमरकौर और भगतसिंह – ने पंजाबी पढ़नी व लिखनी सीखी। यह पत्र
उसी समय का है, जो 1910 में जेल-यातनाओं से शहीद हुए चाचा स्वर्ण सिंह की
पत्नी चाची हुकमकौर को लिखा गया था। हिज्जे जैसे के तैसे दिये जा रहे हैं। गुरुमुखी
लिपि में लिखा भगतसिंह का यह पहला पत्र है। बाद में पंजाबी में भगतसिंह ने
बहुत-से लेख भी लिखे। – स.
15 नवम्बर, 1921
मेरी परम प्यारी चाची जी,
नमस्ते।
मुझे ख़त लिघ लिघने (लिखने) में देरी हो गयी है। सो उम्मीद है कि आप
माफ़ करोगे। भाइया जी (पिता किशन सिंह) दिल्ली गये हुए हैं। भेभे (बेबे –
माँ) मोराँवाली को गयी हुई हैं। बाक़ी सब राजी-खुशी है। बड़ी चाची जी को मत्था
टेकना। माता जी को मत्था टेकना, कुलबीर, कुलतार सिंह को सति श्री अकाल
या नमस्ते।
आपका आज्ञाकारी
भगतसिंह
76 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

चाची के नाम एक और पत्र
लाहौर, 24 अक्टूबर, 1921
मेरी प्रिय चाची जी,
नमस्ते!
मैं जलसा देखने के लिए लायलपुर गया था। मुझे गाँव आना था, लेकिन बापूजी
ने मना कर दिया था, इसलिए मैं गाँव नहीं आया। मुझे माफ़ करना यदि कोई भूल
हो गयी हो, चाचा जी (स्वर्ण सिंह) का चित्र बन गया है, मुझे साथ ही लाना था,
लेकिन तब तक वह पूरा नहीं हुआ था, इसलिए माफ़ करना। जवाब जल्दी दे देना।
बड़ी चाची जी को माथा टेकना, माता जी को भी माथा टेकना। कुलबीर और
कुलतार (छोटे भाई) को नमस्ते।
आपका पुत्र
भगतसिंह
भगतसिंह ने क़रीब 14 साल की उम्र में अपनी छोटी चाची (चाचा स्वर्ण सिंह
की विधवा हुकम कौर) को लिखा था। पंजाबी भाषा व गुरमुखी लिपि में लिखा यह
पत्र चक न. 105, ज़िला लायलपुर के पते पर भेजा गया था। पता उर्दू में लिखा है
पर ज़िला लायलपुर अंग्रेज़ी अक्षरों में है। – स.
यह जीवन देश को समर्पित : भगतसिंह के छह शुरुआती पत्र / 77

घर को अलविदा : पिता जी के नाम पत्र
1923 में भगतसिंह, नेशनल कॉलेज, लाहौर के विद्यार्थी थे। जन-जागरण के
लिए ड्रामा-क्लब में भी भाग लेते थे। क्रान्तिकारी अध्यापकों और साथियों से नाता
जुड़ गया था। भारत को आज़ादी कैसे मिले, इस बारे में लम्बा-चौड़ा अध्ययन और
बहसें जारी थीं।
घर में दादी जी ने अपने पोते की शादी की बात चलायी। उनके सामने अपना
तर्क न चलते देख भगतसिंह ने पिता जी के नाम यह पत्र लिखा और कानपुर में
गणेशशंकर विद्यार्थी के पास पहुँचकर 'प्रताप' में काम शुरू कर दिया। वहीं
बी.के. दत्त, शिव वर्मा, विजयकुमार सिन्हा जैसे क्रान्तिकारी साथियों से मुलाक़ात हुई।
उनका कानपुर पहुँचना क्रान्ति के रास्ते पर एक बड़ा क़दम बना। – स.
पूज्य पिता जी,
नमस्ते।
मेरी ज़िन्दगी मक़सदे-आला¹ यानी आज़ादी-ए-हिन्द के असूल² के लिए
वक्फ़³ हो चुकी है। इसलिए मेरी ज़िन्दगी में आराम और दुनियावी ख़ाहशात⁴ बायसे
कशिश⁵ नहीं हैं।
आपको याद होगा कि जब मैं छोटा था, तो बापू जी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक़्त
एलान किया था कि मुझे ख़िदमते-वतन⁶ के लिए वक्फ़ दिया गया है। लिहाज़ा
मैं उस वक़्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूँ।
उम्मीद है आप मुझे माफ़ फ़रमायेंगे।
आपका ताबेदार
भगतसिंह

  1. उच्च उद्देश्य 2. सिद्धान्त 3. दान 4. सांसारिक इच्छाएँ 5. आकर्षक 6. देश-सेवा
    78 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

II.
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव

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पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या
1924 के दौरान पंजाब में भाषा-विवाद चल रहा था। पंजाबी भाषा की लिपि
के प्रश्न पर उर्दू और हिन्दी के पक्षधरों में बहस जारी थी। भगतसिंह भी इस बहस
पर अपने विचार बनाने लगे थे। पंजाब की भाषा और लिपि की समस्या पर यह लेख
उन्होंने पंजाब हिन्दी साहित्य सम्मेलन के आमन्त्रण पर लिखा था और अव्वल मानकर
सम्मेलन ने इस पर 50/- का ईनाम भी दिया था।
यह लेख सम्मेलन के प्रधानमन्त्री श्री भीमसेन विद्यालंकार ने सुरक्षित रखा और
भगतसिंह के बलिदान के बाद 28 फ़रवरी, 1933 के 'हिन्दी सन्देश' में प्रकाशित
किया। - स.
“किसी समाज अथवा देश को पहचानने के लिए उस समाज अथवा देश के
साहित्य से परिचित होने की परमावश्यकता होती है, क्योंकि समाज के प्राणों की
चेतना उस समाज के साहित्य में भी प्रतिच्छवित हुआ करती है।”
उपरोक्त कथन की सत्यता का इतिहास साक्षी है। जिस देश के साहित्य का
प्रवाह जिस ओर बहा, ठीक उसी ओर वह देश भी अग्रसर होता रहा। किसी भी
जाति के उत्थान के लिए ऊँचे साहित्य की आवश्यकता हुआ करती है। ज्यों-ज्यों
देश का साहित्य ऊँचा होता जाता है, त्यों-त्यों देश भी उन्नति करता जाता है।
देशभक्त, चाहे वे निरे समाज-सुधारक हों अथवा राजनीतिक नेता, सबसे अधिक
ध्यान देश के साहित्य की ओर दिया करते हैं। यदि वे सामाजिक समस्याओं तथा
परिस्थितियों के अनुसार नवीन साहित्य की सृष्टि न करें तो उनके सब प्रयत्न
निष्फल हो जायें और उनके कार्य स्थायी न हो पायें।
शायद गैरीबाल्डी को इतनी जल्दी सेनाएँ न मिल पातीं, यदि मेजिनी ने 30
वर्ष देश में साहित्य तथा साहित्यिक जागृति पैदा करने में ही न लगा दिये होते।
आयरलैण्ड के पुनरुत्थान के साथ गैलिक भाषा के पुनरुत्थान का प्रयत्न भी उसी
वेग से किया गया। शासक लोग आयरिश लोगों को दबाये रखने के लिए उनकी
भाषा का दमन करना इतना आवश्यक समझते थे कि गैलिक भाषा की एक-आध
कविता रखने के कारण छोटे-छोटे बच्चों तक को दण्डित किया जाता था। रूसो,
वाल्टेयर के साहित्य के बिना फ्रांस की राज्यक्रान्ति घटित न हो पाती। यदि
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 81

टालस्टाय, कार्ल मार्क्स तथा मैक्सिम गोर्की इत्यादि ने नवीन साहित्य पैदा करने में
वर्षों व्यतीत न कर दिये होते, तो रूस की क्रान्ति न हो पाती, साम्यवाद का प्रचार
तथा व्यवहार तो दूर रहा।
यही दशा हम सामाजिक तथा धार्मिक सुधारकों में देख पाते हैं। कबीर के
साहित्य के कारण उनके भावों का स्थायी प्रभाव दीख पड़ता है। आज तक उनकी
मधुर तथा सरस कविताओं को सुनकर लोग मुग्ध हो जाते हैं।
ठीक यही बात गुरु नानकदेव जी के विषय में भी कही जा सकती है। सिक्ख
गुरुओं ने अपने मत के प्रचार के साथ जब नवीन सम्प्रदाय स्थापित करना शुरू
किया, उस समय उन्होंने नवीन साहित्य की आवश्यकता भी अनुभव की और इसी
विचार से गुरु अंगददेव जी ने गुरुमुखी लिपि बनायी। शताब्दियों तक निरन्तर युद्ध
और मुसलमानों के आक्रमणों के कारण पंजाब में साहित्य की कमी हो गयी थी।
हिन्दी भाषा का भी लोप-सा हो गया था। इस समय किसी भारतीय लिपि को ही
अपनाने के लिए उन्होंने कश्मीरी लिपि को अपना लिया। तत्पश्चात गुरु अर्जुनदेव
जी तथा भाई गुरुदास जी के प्रयत्न से आदिग्रन्थ का संकलन हुआ। अपनी लिपि
तथा अपना साहित्य बनाकर अपने मत को स्थायी रूप देने में उन्होंने यह बहुत
प्रभावशाली तथा उपयोगी क़दम उठाया था।
उसके बाद ज्यों-ज्यों परिस्थिति बदलती गयी, त्यों-त्यों साहित्य का प्रवाह भी
बदलता गया। गुरुओं के निरन्तर बलिदानों तथा कष्ट-सहन से परिस्थिति बदलती
गयी। जहाँ हम प्रथम गुरु के उपदेश में भक्ति तथा आत्मविस्मृति के भाव सुनते
हैं और निम्नलिखित पद में कमाल आजिज़ी का भाव पाते हैं :
नानक नन्हे हो रहे, जैसी नन्हीं दूब।
और घास जरि जात है, दूब खूब की ख़ूब।।
वहीं पर हम नवें गुरु श्री तेगबहादुर जी के उपदेश में पददलित लोगों की
हमदर्दी तथा उनकी सहायता के भाव पाते हैं :
बाँह जिन्हाँ दी पकड़िये, सिर दीजिये बाँहि न छोड़िये।
गुरु तेगबहादुर बोलया, धरती पै धर्म न छोड़िये।।
उनके बलिदान के बाद हम एकाएक गुरु गोविन्द सिंह जी के उपदेश में क्षात्र
धर्म का भाव पाते हैं। जब उन्होंने देखा कि अब केवल भक्ति-भाव से ही काम
न चलेगा, तो उन्होंने चण्डी की पूजा भी प्रारम्भ की और भक्ति तथा क्षात्र धर्म का
समावेश कर सिक्ख समुदाय को भक्तों तथा योद्धाओं का समूह बना दिया। उनकी
कविता (साहित्य) में हम नवीन भाव देखते हैं।
वे लिखते हैं :
जे तोहि प्रेम खेलण का चाव, सिर धर तली गली मोरी आव।
जे इत मारग पैर धरीजै, सिर दीजै कांण न कीजै।।
82 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

और फिर -
सूरा सो पहिचानिये, जो लड़ै दीन के हेत।
पुर्ज़ा-पुर्ज़ा कट मरै, कभूँ न छाँडै खेत॥
और फिर एकाएक खड्ग की पूजा प्रारम्भ हो जाती है।
खग खण्ड विहण्ड, खल दल खण्ड अति रन मण्ड प्रखण्ड।
भुज दण्ड अखण्ड, तेज प्रचण्ड जोति अभण्ड भानुप्रभं।।
उन्हीं भावों को लेकर बाबा बन्दा आदि मुसलमानों के विरुद्ध निरन्तर युद्ध
करते रहे, परन्तु उसके बाद हम देखते हैं कि जब सिक्ख सम्प्रदाय केवल अराजकों
का एक समूह रह जाता है और जब वे गैर-क़ानूनी (Outlaw) घोषित कर दिये जाते
हैं, तब उन्हें निरन्तर जंगलों में ही रहना पड़ता है। अब इस समय नवीन साहित्य
की सृष्टि नहीं हो सकी। उनमें नवीन भाव नहीं भरे जा सके। उनमें क्षात्र-वृत्ति थी,
वीरत्व तथा बलिदान का भाव था और मुसलमान शासकों के विरुद्ध युद्ध करते रहने
का भाव था, परन्तु उसके बाद क्या करना होगा, यह वे भली-भाँति नहीं समझे।
तभी तो उन वीर योद्धाओं के समूह (मिसलें) आपस में भिड़ गये। यहीं पर
सामयिक भावों की त्रुटि बुरी तरह अखरती है। यदि बाद में रणजीत सिंह जैसा वीर
योद्धा और चालाक शासक न निकल आता, तो सिक्खों को एकत्रित करने के लिए
कोई उच्च आदर्श अथवा भाव शेष न रह गया था।
इन सबके साथ एक बात और भी ख़ास ध्यान देने योग्य है। संस्कृत का सारा
साहित्य हिन्दू समाज को पुनर्जीवित न कर सका, इसीलिए सामयिक भाषा में नवीन
साहित्य की सृष्टि की गयी। उस सामयिक भाव के साहित्य ने अपना जो प्रभाव
दिखाया वही हम आज तक अनुभव करते हैं। एक अच्छे समझदार व्यक्ति के लिए
क्लिष्ट संस्कृत के मन्त्र तथा पुरानी अरबी की आयतें इतनी प्रभावकारी नहीं हो
सकतीं जितनी कि उसकी अपनी साधारण भाषा की साधारण बातें।
ऊपर पंजाबी भाषा तथा साहित्य के विकास का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया
है। अब हम वर्तमान अवस्था पर आते हैं। लगभग एक ही समय पर बंगाल में स्वामी
विवेकानन्द तथा पंजाब में स्वामी रामतीर्थ पैदा हुए, दोनों एक ही ढर्रे के महापुरुष
थे। दोनों विदेशों में भारतीय तत्त्वज्ञान की धाक जमाकर स्वयं भी जगत-प्रसिद्ध हो
गये, परन्तु स्वामी विवेकानन्द का मिशन बंगाल में एक स्थायी संस्था बन गया,
पर पंजाब में स्वामी रामतीर्थ का स्मारक तक नहीं दीख पड़ता। उन दोनों के विचारों
में भारी अन्तर रहने पर भी तह में हम एक गहरी समता देखते हैं। जहाँ स्वामी
विवेकानन्द कर्मयोग का प्रचार कर रहे थे, वहाँ स्वामी रामतीर्थ भी मस्तानावार गाया
करते थे :
हम रूखे टुकड़े खायेंगे, भारत पर वारे जायेंगे।
हम सूखे चने चबायेंगे, भारत की बात बनायेंगे।
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 83

हम नंगे उमर बितायेंगे, भारत पर जान मिटायेंगे।
वे कई बार अमेरिका में अस्त होते सूर्य को देखकर आँसू बहाते हुए कहा करते
थे – “तुम अब मेरे प्यारे भारत में उदय होने जा रहे हो। मेरे इन आँसुओं को भारत
के सलिल सुन्दर खेतों में ओस की बूँदों के रूप में रख देना।” इतना महान देश
तथा ईश्वर-भक्त हमारे प्रान्त में पैदा हुआ हो, परन्तु उसका स्मारक तक न दीख
पड़े, इसका कारण साहित्यिक फिसड्डीपन के अतिरिक्त क्या हो सकता है?
यह बात हम पद-पद पर अनुभव करते हैं। बंगाल के महापुरुष श्री देवेन्द्र
ठाकुर तथा श्री केशवचन्द्र सेन की टक्कर के पंजाब में भी कई महापुरुष हुए हैं,
परन्तु उनकी वह कद्र नहीं और मरने के बाद वे जल्द ही भुला दिये गये, जैसे
ज्ञान सिंह जी इत्यादि। इन सबकी तह में हम देखते हैं कि एक ही मुख्य कारण
है, और वह है साहित्यिक रुचि-जागृति का सर्वथा अभाव।
यह तो निश्चय ही है कि साहित्य के बिना कोई देश अथवा जाति उन्नति नहीं
कर सकती, परन्तु साहित्य के लिए सबसे पहले भाषा की आवश्यकता होती है और
पंजाब में वह नहीं है। इतने दिनों से यह त्रुटि अनुभव करते रहने पर भी अभी तक
भाषा का कोई निर्णय न हो पाया। उसका मुख्य कारण है हमारे प्रान्त के दुर्भाग्य
से भाषा को मज़हबी समस्या बना देना। अन्य प्रान्तों में हम देखते हैं कि मुसलमानों
में प्रान्तीय भाषा को खूब अपना लिया है। बंगाल के साहित्य-क्षेत्र में कवि
नज़र-उल-इस्लाम एक चमकते सितारे हैं। हिन्दी कवियों में लतीफ़ हुसैन ‘नटवर’
उल्लेखनीय हैं। इसी तरह गुजरात में भी हैं, परन्तु दुर्भाग्य है पंजाब का। यहाँ पर
मुसलमानों का प्रश्न तो अलग रहा, हिन्दू-सिक्ख भी इस बात पर न मिल सके।
पंजाब की भाषा अन्य प्रान्तों की तरह पंजाबी ही होनी चाहिए थी, फिर क्यों
नहीं हुई, यह प्रश्न अनायास ही उठता है, परन्तु यहाँ के मुसलमानों ने उर्दू को
अपनाया। मुसलमानों में भारतीयता का सर्वथा अभाव है, इसीलिए वे समस्त भारत
में भारतीयता का महत्त्व न समझकर अरबी लिपि तथा फारसी भाषा का प्रचार
करना चाहते हैं। समस्त भारत की एक भाषा और वह भी हिन्दी होने का महत्त्व
उनकी समझ में नहीं आता। इसलिए वे तो अपनी उर्दू की रट लगाते रहे और एक
ओर बैठ गये।
फिर सिक्खों की बारी आयी। उनका सारा साहित्य गुरुमुखी लिपि में है। भाषा
में अच्छी-खासी हिन्दी है, परन्तु मुख्य पंजाबी भाषा है। इसलिए सिक्खों ने गुरुमुखी
लिपि में लिखी जाने वाली पंजाबी भाषा को ही अपना लिया। वे उसे किसी तरह
छोड़ न सकते थे। वे उसे मज़हबी भाषा बनाकर उससे चिपट गये।
इधर आर्यसमाज का आविर्भाव हुआ। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने समस्त
भारतवर्ष में हिन्दी प्रचार करने का भाव रखा। हिन्दी भाषा आर्यसमाज का एक
धार्मिक अंग बन गयी। धार्मिक अंग बन जाने से एक लाभ तो हुआ कि सिक्खों
84 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

की कट्टरता से पंजाब की रक्षा हो गयी और आर्यसमाजियों की कट्टरता से हिन्दी
भाषा ने अपना स्थान बना लिया।
आर्यसमाज के प्रारम्भ के दिनों में सिक्खों तथा आर्यसमाजियों की धार्मिक
सभाएँ एक ही स्थान पर होती थीं। तब उनमें कोई भिन्न भेदभाव न था, परन्तु पीछे
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के किन्हीं दो-एक वाक्यों के कारण आपस में मनोमालिन्य बहुत
बढ़ गया और एक-दूसरे से घृणा होने लगी। इसी प्रवाह में बहकर सिक्ख लोग
हिन्दी भाषा को भी घृणा की दृष्टि से देखने लगे। औरों ने इसकी ओर किंचित भी
ध्यान न दिया।
बाद में, कहते हैं कि आर्यसमाजी नेता महात्मा हंसराज जी ने लोगों से कुछ
परामर्श किया था कि यदि वह हिन्दी लिपि को अपना लें, तो हिन्दी लिपि में
लिखी जाने वाली पंजाबी भाषा यूनिवर्सिटी में मंजूर करवा लेंगे, परन्तु दुर्भाग्यवश
वे लोग संकीर्णता के कारण और साहित्यिक जागृति के न रहने के कारण इस बात
के महत्त्व को समझ ही न सके और वैसा न हो सका। खैर! तो इस समय पंजाब
में तीन मत हैं। पहला मुसलमानों का उर्दू सम्बन्धी कट्टर पक्षपात, दूसरा
आर्यसमाजियों तथा कुछ हिन्दुओं का हिन्दी सम्बन्धी, तीसरा पंजाबी का।
इस समय हम एक-एक भाषा के सम्बन्ध में कुछ विचार करें, तो अनुचित
न होगा। सबसे पहले हम मुसलमानों का विचार रखेंगे। वे उर्दू के कट्टर पक्षपाती
हैं। इस समय पंजाब में इसी भाषा का ज़ोर भी है। कोर्ट की भाषा भी यही है, और
फिर मुसलमान सज्जनों का कहना यह है कि उर्दू लिपि में ज़्यादा बात थोड़े स्थान
में लिखी जा सकती है। यह सब ठीक है, परन्तु हमारे सामने इस समय सबसे मुख्य
प्रश्न भारत को एक राष्ट्र बनाना है। एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा होना
आवश्यक है, परन्तु यह एकदम हो नहीं सकता। उसके लिए क़दम-क़दम चलना
पड़ता है। यदि हम अभी भारत की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम
लिपि तो एक बना देनी चाहिए। उर्दू लिपि तो सर्वांगसम्पूर्ण नहीं कहला सकती,
और फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसका आधार फारसी भाषा पर है। उर्दू
कवियों की उड़ान, चाहे वे हिन्दी (भारतीय) ही क्यों न हों, ईरान के साकी और
अरब की खजूरों को जा पहुँचती है। काजी नज़र-उल-इस्लाम की कविता में तो
धूरजटी, विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार-बार है, परन्तु हमारे पंजाबी
हिन्दी-उर्दू कवि उस ओर ध्यान तक भी न दे सके। क्या यह दुख की बात नहीं?
इसका मुख्य कारण भारतीयता और भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता है। उनमें
भारतीयता आ ही नहीं पाती, तो फिर उनके रचित साहित्य से हम कहाँ तक
भारतीय बन सकते हैं? केवल उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थी भारत के पुरातन साहित्य
का ज्ञान नहीं हासिल कर सकते। यह नहीं कि उर्दू जैसी साहित्यिक भाषा में उन
ग्रन्थों का अनुवाद नहीं हो सकता, परन्तु उसमें ठीक वैसा ही अनुवाद हो सकता
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 85

है, जैसाकि एक ईरानी को भारतीय साहित्य सम्बन्धी ज्ञानोपार्जन के लिए आवश्यक
हो।
हम अपने उपरोक्त कथन के समर्थन में केवल इतना ही कहेंगे कि जब
साधारण आर्य और स्वराज्य आदि शब्दों को आर्या और स्वराजिया लिखा और पढ़ा
जाता है तो गूढ़ तत्त्वज्ञान सम्बन्धी विषयों की चर्चा ही क्या? अभी उस दिन श्री
लाला हरदयाल जी एम.ए. की उर्दू पुस्तक 'क़ौमें किस तरह ज़िन्दा रह सकती हैं?'
का अनुवाद करते हुए सरकारी अनुवादक ने ऋषि नचिकेता को उर्दू में लिखा होने
से नीची कुतिया समझकर 'ए बिच ऑफ़ लो ओरिजिन' अनुवाद किया था। इसमें
न तो लाला हरदयाल जी का अपराध था, न अनुवादक महोदय का। इसमें क़सूर
था उर्दू लिपि का और उर्दू भाषा की हिन्दी भाषा तथा साहित्य से विभिन्नता का।
शेष भारत में भारतीय भाषाएँ और लिपियाँ प्रचलित हैं। ऐसी अवस्था में पंजाब
में उर्दू का प्रचार कर क्या हम भारत से एकदम अलग-थलग हो जावें? नहीं। और
फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उर्दू के कट्टर पक्षपाती मुसलमान लेखकों की
उर्दू में फ़ारसी का ही आधिक्य रहता है। 'ज़मींदार' और 'सियासत' आदि
मुसलमान-समाचारपत्रों में तो अरबी का ज़ोर रहता है, जिसे एक साधारण व्यक्ति
समझ भी नहीं सकता। ऐसी दशा में उसका प्रचार कैसे किया जा सकता है? हम
तो चाहते हैं कि मुसलमान भाई भी अपने मज़हब पर पक्के रहते हुए ठीक वैसे
ही भारतीय बन जायें जैसेकि कमाल टर्क (तुर्क) हैं। भारतोद्धार तभी हो सकेगा।
हमें भाषा आदि के प्रश्नों को मार्मिक समस्या न बनाकर खूब विशाल दृष्टिकोण
से देखना चाहिए।
इसके बाद हम हिन्दी-पंजाबी भाषाओं की समस्या पर विचार करेंगे। बहुत-से
आदर्शवादी सज्जन समस्त जगत को एक राष्ट्र, विश्व राष्ट्र बना हुआ देखना चाहते
हैं। यह आदर्श बहुत सुन्दर है। हमको भी इसी आदर्श को सामने रखना चाहिए। उस
पर पूर्णतया आज व्यवहार नहीं किया जा सकता, परन्तु हमारा हर एक क़दम, हमारा
हर एक कार्य इस संसार की समस्त जातियों, देशों तथा राष्ट्रों को एक सुदृढ़ सूत्र
में बाँधकर सुख-वृद्धि करने के विचार से उठना चाहिए। उससे पहले हमको अपने
देश में यही आदर्श क़ायम करना होगा। समस्त देश में एक भाषा, एक लिपि, एक
साहित्य, एक आदर्श और एक राष्ट्र बनाना पड़ेगा, परन्तु समस्त एकताओं से पहले
एक भाषा का होना ज़रूरी है, ताकि हम एक-दूसरे को भली-भाँति समझ सकें।
एक पंजाबी और एक मद्रासी इकट्ठा बैठकर केवल एक-दूसरे का मुँह ही न ताका
करें, बल्कि एक-दूसरे के विचार तथा भाव जानने का प्रयत्न करें, परन्तु यह परायी
भाषा अंग्रेज़ी में नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की अपनी भाषा हिन्दी में। यह आदर्श भी,
पूरा होते-होते अभी कई वर्ष लगेंगे। उसके प्रयत्न में हमें सबसे पहले साहित्यिक
जागृति पैदा करनी चाहिए। केवल गिनती के कुछेक व्यक्तियों में नहीं, बल्कि
86 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सर्वसाधारण में। सर्वसाधारण में साहित्यिक जागृति पैदा करने के लिए उनकी अपनी
ही भाषा आवश्यक है। इसी तर्क के आधार पर हम कहते हैं कि पंजाब में पंजाबी
भाषा ही आपको सफल बना सकती है।
अभी तक पंजाबी साहित्यिक भाषा नहीं बन सकी है और समस्त पंजाब की
एक भाषा भी वह नहीं है। गुरुमुखी लिपि में लिखी जाने वाली मध्य पंजाब की
बोलचाल की भाषा को ही इस समय तक पंजाबी कहा जाता है। वह न तो अभी
तक विशेष रूप से प्रचलित ही हो पायी है और न ही साहित्यिक तथा वैज्ञानिक
ही बन पायी है। उसकी ओर पहले तो किसी ने ध्यान ही नहीं दिया, परन्तु अब
जो सज्जन उस ओर ध्यान भी दे रहे हैं उन्हें लिपि की अपूर्णता बेतरह अखरती
है। संयुक्त अक्षरों का अभाव और हलन्त न लिख सकने आदि के कारण उसमें
भी ठीक-ठीक सब शब्द नहीं लिखे जा सकते, और तो और, पूर्ण शब्द भी नहीं
लिखा जा सकता। यह लिपि तो उर्दू से भी अधिक अपूर्ण है और जब हमारे सामने
वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर निर्भर सर्वांगसम्पूर्ण हिन्दी लिपि विद्यमान है, फिर उसे
अपनाने में हिचक क्या? गुरुमुखी लिपि तो हिन्दी अक्षरों का ही बिगड़ा हुआ रूप
है। आरम्भ में ही

कहने का तात्पर्य यह है कि पंजाबी के निकट होने पर भी हिन्दी अभी
पंजाबी-हृदय से काफ़ी दूर है। हाँ, पंजाबी भाषा के हिन्दी लिपि में लिखे जाने पर
और उसके साहित्य बनाने के प्रयत्न में निश्चय ही वह हिन्दी के निकटतर आ
जायेगी।
प्रायः सभी मुख्य तर्कों पर तर्क किया जा चुका है। अब केवल एक बात
कहेंगे। बहुत-से सज्जनों का कथन है कि पंजाबी भाषा में माधुर्य, सौन्दर्य और
भावुकता नहीं है। यह सरासर निराधार है। अभी उस दिन –
लच्छीए जित्थे तू पानी डोलिया ओत्थे उग पये सन्दल दे बूटे
वाले गाने के माधुर्य ने कवीन्द्र रवीन्द्र तक को मोहित कर लिया और वे झट
अंग्रेज़ी में अनुवाद करने लगे – O Lachi, where there spilt water, where there
spilt water....etc...etc...
और बहुत-से और उदाहरण भी दिये जा सकते हैं। निम्न वाक्य क्या किसी
अन्य भाषा की कविताओं से कम है? –
पिपले दे पत्तया वे केही खड़खड़ लायी ऐ।
पत्ते झड़े पुराने हुण रुत्त नवयाँ दी आयी आ॥
और फिर जब पंजाबी अकेला अथवा समूह बैठा हो तो ‘गौहर’ के ये पद
जितना प्रभाव करेंगे, उतना कोई और भाषा क्या करेगी?
लाम लक्खाँ ते करोड़ाँ दे शाह वेखे न मुसाफ़िराँ कोई उधार देंदा,
दिने रातीं जिन्हाँ दे कूच डेरे न उन्हाँ दे थायीं कोई एतबार देंदा।
भौरे बहंदे गुलाँ दी वाशना ते ना सप्पा दे मुहाँ ते कोई प्यार देंदा
गौहर समय सलूक हन ज्यूंदया दे मोयाँ गियाँ नूँ हर कोई विसार देंदा।
और फिर –
जीम ज्यूदियाँ नूँ क्यों मारना एं, जेकर नहीं तूं मोयाँ नूँ जिऔण जोगा
घर आये सवाली नूँ क्यों घूरना एं, जेकर नहीं तू हथ्थीं ख़ैर पौण जोगा
मिले दिलाँ नूँ क्यों बिछोड़ना एं, जेकर नहीं तू बिछड़याँ नू मिलौण जोगा
गौहरा बदीयाँ रख बन्द खाने, जेकर नहीं तू नेकीआँ कमौण जोगा।
और फिर अब तो दर्द, मस्ताना, दीवाना बड़े अच्छे-अच्छे कवि पंजाबी की
कविता का भण्डार बढ़ा रहे हैं।
ऐसी मधुर, ऐसी विमुग्धकारी भाषा तो पंजाबियों ने ही न अपनायी, यही दुख
है। अब भी नहीं अपनाते, समस्या यही है। हरेक अपनी बात के पीछे मज़हबी डण्डा
लिये खड़ा है। इसी अड़ंगे को किस तरह दूर किया जाये, यही पंजाब की भाषा
तथा लिपि विषयक समस्या है, परन्तु आशा केवल इतनी है कि सिक्खों में इस
समय साहित्यिक जागृति पैदा हो रही है। हिन्दुओं में भी है। सभी समझदार लोग
मिलकर-बैठकर निश्चय ही क्यों नहीं कर लेते। यही एक उपाय है इस समस्या
88 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

को हल करने का। मज़हबी विचार से ऊपर उठकर इस प्रश्न पर गौर किया जा
सकता है, वैसे ही किया जाये, और फिर अमृतसर के ‘प्रेम’ जैसे पत्र की भाषा
को ज़रा साहित्यिक बनाते हुए पंजाब यूनिवर्सिटी में पंजाबी भाषा को मंजूर करा देना
चाहिए। इस तरह सब बखेड़ा तय हो जाता है। इस बखेड़े के तय होते ही पंजाब
में इतना सुन्दर और ऊँचा साहित्य पैदा होगा कि यह भी भारत की उत्तम भाषाओं
में गिनी जाने लगेगी।
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 89

विश्वप्रेम
बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लिखा गया भगतसिंह का यह लेख कलकत्ता
से प्रकाशित साप्ताहिक ‘मतवाला’ (वर्ष : 2, अंक सं. 13-14) के दो अंकों में
छपा था। इन अंकों की तारीखें क्रमशः 15 नवम्बर, 1924 एवं 22 नवम्बर, 1924
थीं। — स.
“वसुधैव कुटुम्बकम्!” जिस कवि सम्राट की यह अमूल्य कल्पना है, जिस
विश्वप्रेम के अनुभवी का यह हृदयोद्गार है, उसकी महत्ता का वर्णन करना
मनुष्य-शक्ति से सर्वथा बाहर है।
‘विश्वबन्धुता!’ इसका अर्थ मैं तो समस्त संसार में समानता (साम्यवाद,
World wide Equality in the true sense) के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझता।
कैसा उच्च है यह विचार! सभी अपने हों। कोई भी पराया न हो। कैसा सुखमय
होगा वह समय, जब संसार से परायापन सर्वथा नष्ट हो जायेगा; जिस दिन यह
सिद्धान्त समस्त संसार में व्यावहारिक रूप में परिणत होगा, उस दिन संसार को
उन्नति के शिखर पर कह सकेंगे। जिस दिन प्रत्येक मनुष्य इस भाव को हृदयंगम
कर लेगा, उस दिन — उस दिन संसार कैसा होगा? ज़रा कल्पना करो तो!
उस दिन इतनी शक्ति होगी कि ‘शान्ति शान्ति’ की पुकार भी शान्ति भंग न
कर सकेगी। उस दिन भूख लगने पर रोटी के लिए किसी को भी चिल्ल-पों मचाने
की आवश्यकता नहीं हुआ करेगी। व्यापार उस दिन उन्नति के शिखर पर होगा,
परन्तु फ़्रांस और जर्मनी में व्यापार के नाम पर घोर युद्ध न हुआ करेंगे। उस दिन
अमेरिका और जापान दोनों होंगे, परन्तु उनमें पूर्वी और पश्चिमीपन न होगा।
काले-गोरे उस दिन भी होंगे परन्तु अमेरिकावासी वहाँ के काले निवासी (Red
Indians) को जीते-जी जला न सकेंगे। शान्ति होगी परन्तु पीनलकोड की
आवश्यकता न होगी। अंग्रेज़ भी होंगे और भारतवासी भी, परन्तु उस समय उनमें
गुलाम और शासक का भाव न होगा। उस दिन महात्मा टालस्टाय के Resist not
the evil (बुराइयों का प्रतिकार मत करो) वाले सिद्धान्त की उच्च ध्वनि न लगाने
पर भी संसार में बुराइयाँ नज़र न आयेंगी। उस समय होगी पूर्ण स्वतन्त्रता। कैसा होगा
वह समय? ज़रा कल्पना करो!
90 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

वर्तमान दशा को देखकर कौन कह सकता है कि ऐसा समय भी आ सकता
है, जिस समय किसी के भय से नहीं, परन्तु अपने हृदय की प्रेरणा से ही मनुष्य
पाप-कर्म नहीं करेंगे। यदि उस दिन भी हमें किसी कल्पित स्वर्ग की लिप्सा
होगी तो हम कह देंगे कि स्वर्ग कोई वस्तु है ही नहीं! क्या वह समय आ सकता
है! यह है एक समस्या – एक बड़ी समस्या है। इसका उत्तर देना कोई सुगम
कार्य नहीं है। परन्तु मैं पूछता हूँ कि क्या लोग उस समय को लाना चाहते हैं? वे
लोग जो ‘विश्वबन्धुता’ (Universal brotherhood या Cosmopolitanism) का
घोर नाद किया करते हैं; क्या वास्तव में उसे लाने के इच्छुक हैं? ‘हाँ’ कह देने
से ही काम नहीं चलेगा। कांग्रेस का प्रस्ताव नहीं है। प्रश्न गम्भीरतापूर्वक विचार
करने योग्य है। क्या लोग उसके लिए बलिदान देने को तैयार हैं? उस कल्पित
भविष्य के लिए हमें घोर वर्तमान देना होगा। उस कल्पित शान्ति के लिए हमें
अशान्ति फैलानी होगी। उस हवाई क़िले के लिए हमें सर्वस्व देना होगा। उस
शान्तिपूर्ण राज्य की स्थापना के लिए हमें घोर अराजकता फैलानी होगी। उस
अत्याचार रहित संसार को अपनी ओर खींचने के लिए अत्याचार करने होंगे। उस
सुखमय जीवन के लिए – नहीं, नहीं, उसकी आशा-मात्र के लिए मर मिटना
होगा। क्या लोग उसके लिए तैयार हैं?
हमें प्रचार करना होगा समता-समानता का। अत्याचार करना होगा उन पर जो
उससे इन्कारी हों। अराजकता फैलानी होगी उन राज्य-साम्राज्यों के स्थान पर जो
शक्तिमद से अन्धे होकर करोड़ों की पीड़ा का कारण हो रहे हैं। क्या लोग उसके
लिए तैयार हैं?
हमें समस्त संसार को उस सिद्धान्त के स्वागत के लिए तैयार करना होगा। उस
आशामयी खेती के लिए हमें खेतों में से सबकुछ उखाड़ फेंकना होगा। काँटेदार
झाड़ियों को उखाड़कर ज्वाला की शान्ति के लिए मटियामेट कर देना होगा। रोड़ा,
कंकड़ पीस डालना होगा? हमें घोर परिश्रम करना होगा। गिरे हुओं का उत्थान करना
होगा। ‘पस्ती’ वालों को उन्नति का मार्ग दिखाना होगा। मिथ्या शक्तिवादियों को
घसीटकर अपने साथ खड़े होने को विवश करना होगा। अहंकारियों का अहंकार
तोड़ उन्हें नम्रता प्रदान करनी होगी। निर्बलों को बल, पराधीनों को स्वाधीनता,
अशिक्षितों को शिक्षा, निराशावादियों को आशा की आभा, भूखों को रोटी, बेघरों को
घर, नास्तिकों को विश्वास, अन्धविश्वासियों को विचार-स्वतन्त्रता देनी होगी। क्या
लोग इतना काम करेंगे। ऐ विश्वबन्धुता विश्वबन्धुता चिल्लाने वाले! क्या तुम उसके
लिए तैयार हो? यदि नहीं तो आज से इस ढोंग को छोड़ दो। हमें उस विश्वप्रेम
की देवी के चरणों पर तुम्हारा भी बलिदान देना होगा, क्योंकि तुम मिथ्यावादी हो।
अगर तैयार हो तो आ जाओ कर्मक्षेत्र में अभी परीक्षा हो जायेगी। घर में बैठे हुए,
कोनों में दुबके हुए कर्मक्षेत्र के भयंकर दृश्य की कल्पना-मात्र से काँपते हुए,
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 91

सत्यप्रकाश से ‘बाज’ रहने के लिए इस महान सिद्धान्त की आड़ मत लो। यदि
सचमुच उस कल्पित समय को लाने की चेष्टा है तो आओ। पहला काम पतित
भारत का उत्थान करना होगा। गुलामियों की ज़ंजीरों को काटना होगा। अत्याचार का
सर्वनाश करना होगा। पराधीनता को मिट्टी में मिला देना होगा क्योंकि यह अपनी
कमज़ोरी के कारण उस मनुष्य-जाति को, जिसकी सृष्टि परमपिता ने अपने ही
अनुरूप की थी, न्यायपथ से भ्रष्ट करने का प्रलोभन हो रहा है।
यदि उपरोक्त कथन की सत्यता को मानते हुए भी तुम जेल के डर से
या फाँसी के डर से इस मार्ग में आने से झिझकते हो तो आज से इस ढोंग को
छोड़ दो।
अगर इस भय से कि क्रान्ति के पीछे घोर अराजकता फैल जायेगी या घोर
रक्तपात होगा, एकदम अशान्ति होगी – तुम इस मार्ग में नहीं आते तो भी तुम भीरु
हो, कायर हो, बुज़दिल हो, इस आडम्बर को छोड़ दो।
अशान्ति फैलती है तो फैलने दो, परतन्त्रता भी तो न होगी। अराजकता फैलती
है तो फैलने दो, पराधीनता का भी तो सर्वनाश हो जायेगा। आहा! उस कशमकश
में कमज़ोर पिस जायेंगे। रोज़-रोज़ का रोना बन्द हो जायेगा। निर्बल न रहेंगे, बलवानों
में मैत्री होगी। बलिष्ठ लोगों में घनिष्टता होगी। उनमें प्रेम होगा, संसार में विश्वप्रेम
का प्रचार हो सकेगा।
हाँ! हाँ!! निर्बलों को एकबारगी पिस जाना होगा। वे समस्त संसार के अपराधी
हैं। उन्होंने ही घोर अशान्ति फैला रखी है। सब बलवान बनें, नहीं तो उस चक्की
में पिसकर मलीदा हो जायेंगे।
आये! कौन माता का लाल सच्चे हृदय से विश्वबन्धुता का इच्छुक है। कौन
है समस्त संसार के लिए अपना सुख बलिदान करने वाला?
कोई गुलाम जाति इस उच्चतम सिद्धान्त का नाम तक लेने की अधिकारिणी
नहीं है। एक गुलाम मनुष्य के मुख से निकलकर इसका महत्त्व ही जाता रहता है।
एक अपमानित मनुष्य, पद-दलित मनुष्य, पैरों तले रौंदे जाने वाला मनुष्य यदि कहे
– मैं विश्वबन्धुता का अनुगामी हूँ, Universal brotherhood का पक्षपाती हूँ,
इसलिए इन अत्याचारों का प्रतिकार नहीं करता – तो उसका कथन क्या मूल्य रख
सकता है? कौन सुनेगा उसके इस कायरतापूर्ण वाक्य को? हाँ – तुममें शक्ति हो,
तुममें बल हो, चाहो तो बड़े-बड़ों को पैरों तले रौंद सको, एक इशारे से बड़े-बड़े
अभिमानियों को मिट्टी में मिला सको, तख़्तो-ताज वालों को ख़ाक में सुला सको,
उनको धूलि में मिला सको, और फिर तुम यह वाक्य कहते हुए कि ‘हम विश्वप्रेमी
हैं’ ऐसा न करो, तो तुम्हारी बात वज़नदार होगी – फिर तुम्हारा एक-एक वाक्य
प्रभावशाली होगा। फिर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ भी महत्त्वपूर्ण हो जायेगा।
आज तुम गुलाम हो, पराधीन हो, परतन्त्र हो, बन्दी हो, तुम्हारी यही बात आज
92 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

ढोंग प्रतीत होती है, एक आडम्बर दीख पड़ता है। बकवास मालूम देती है। क्या
तुम उसका प्रचार करना चाहते हो? अगर हाँ, तो उसका अनुसरण करना होगा, जो
कहता था, "He who loveth Humanity loveth God — " "God is love and love
is God" — जो राजद्रोह के अपराध में फाँसी चढ़ा, उसकी तरह वीरतापूर्वक
विश्वप्रेम का प्रचार करने को तैयार हो? जिस दिन तुम सच्चे प्रचारक बनोगे इस
अद्वितीय सिद्धान्त के, उस दिन तुम्हें माँ के सच्चे सुपुत्र गुरु गोविन्द सिंह की तरह
कर्मक्षेत्र में उतरना पड़ेगा। उस विश्वप्रेम के सच्चे अनुगामी — सच्चे पक्षपाती की
तरह — सब सपूत हैं एक पिता के, कहने वाले उस महापुरुष की तरह, अपने चारों
— आँखों के तारों, लख्ते-जिगरों को जाति के भेंट कर माता के पूछने पर सरलता
से उत्तर देने वाले की तरह तुम्हें धैर्य दिखाना होगा। क्या तुम अपने प्रिय से प्रिय
को — जिसकी स्मृति-मात्र से हृदय धड़कने लगता हो, जिसे तुम हर समय अपने
हृदय में छिपाये रखने के इच्छुक हो — को अपनी आँखों के सामने बलिवेदी पर
चढ़ता देख, अकथनीय कष्ट सहता देख धैर्य रख सकोगे? क्या उसके सामने ही
तुम जीते-जी अग्नि-चिता पर प्रसन्नतापूर्वक चढ़ सकोगे; और हँसते हुए संसार की
ओर करुणाभरी दृष्टि से देखते हुए विदा हो सकोगे? यदि हाँ, तो आओ परीक्षा हो
जायेगी, समय आ गया है। यदि हृदय में कुछ भी झिझक है तो खुदा के वास्ते इस
आडम्बर को छोड़ दो।
जब तक ‘काला-गोरा’, ‘सभ्य-असभ्य’, ‘शासक-शासित’, ‘धनी-निर्धन’,
‘छूत-अछूत’ आदि शब्दों का प्रयोग होता है तब तक कहाँ विश्वबन्धुता और
विश्वप्रेम? यह उपदेश स्वतन्त्र जातियाँ कर सकती हैं। भारत जैसी गुलाम जाति
इसका नाम नहीं ले सकती।
फिर उसका प्रचार कैसे होगा? तुम्हें शक्ति एकत्र करनी होगी। शक्ति एकत्र
करने के लिए अपनी एकत्रित शक्ति ख़र्च कर देनी पड़ेगी। राणाप्रताप की तरह
आयुपर्यन्त ठोकरें खानी होंगी, तब कहीं उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकोगे। देखते नहीं
विश्वबन्धुता का सच्चा प्रचारक था मेजिनी जो बीस वर्ष स्वयं ही एक जगह बन्द
रहता है। लेनिन था उसका पक्षपाती — कितना रुधिर उन्होंने बहा दिया था।
आदर्शवादी ब्रूटस था विश्वप्रेमी — जिसने अपनी जन्मभूमि के लिए अपने परमप्रिय
‘सीज़र’ को अपने हाथों क़त्ल कर डाला था और पीछे स्वयं भी आत्महत्या कर
ली थी। सानन्द युद्धों में प्रवीण रहने वाला गैरीबाल्डी था, जिसे विश्वप्रेमी होने का
श्रेय प्राप्त हो सकता है।
विश्वप्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी, कट्टर अराजकतावादी
कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नहीं समझते — वही वीर सावरकर।
विश्वप्रेम की तरंग में आकर घास पर चलते-चलते रुक जाते कि कोमल घास
पैरों तले मसली जायेगी।
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 93

75 दिन अनशन करके स्वर्गधाम को सिधारने वाला वीर मैकस्वेनी इस मार्ग
का पथिक होने का श्रेय प्राप्त कर सकता है जो कहता था – "It is the love of
the country that inspires us and not the hate of the enemy and the desire
for full satisfaction for the past."
विश्वप्रेम की देवी का उपासक था ‘गीता रहस्य’ का लेखक पूज्य लोकमान्य
तिलक। और देखोगे? वह सूखा सुकड़ा-सा ‘लँगोटबन्द’ जो सज़ा का हुक्म सुनाये
जाने पर स्वर्गीय हँसी के साथ कह सकता था – मुझे जो दण्ड दिया गया वह
अत्यन्त हलका है और मेरे साथ जैसा विनम्र व्यवहार किया गया है उससे अधिक
की आशा मैं नहीं कर सकता था, जिसके मर्मस्पर्शी कथन का तुम्हारे पत्थर के
हृदयों पर कुछ प्रभाव नहीं होना – महात्मा है इस सिद्धान्त का पक्षपाती।
अरे! रावण और बाली को मार गिराने वाले रामचन्द्र ने अपने विश्वप्रेम का
परिचय दिया था भीलनी के जूठे-कूठे बेरों को खाकर। चचेरे भाइयों में घोर युद्ध
करवा देने वाले, संसार से अन्याय को सर्वथा उठा देने वाले कृष्ण ने परिचय दिया
अपने विश्वप्रेम का – सुदामा के कच्चे चावलों को फाँक जाने में।
तुम भी विश्वप्रेम का दम भरते हो! पहिले पैरों पर खड़ा होना सीखो। स्वतन्त्र
जातियों में अभिमान के साथ सिर ऊँचा करके खड़े होने के योग्य बनो। जब तक
तुम्हारे साथ कामागाटामारू जहाज़ जैसे दुर्व्यवहार होते रहेंगे, जब तक डैम काला
मैन कहलाओगे, जब तक तुम्हारे देश में जलियाँवाले बाग़ जैसे भीषण हत्याकाण्ड
होते रहेंगे, जब तक वीराँगनाओं का अपमान होगा और तुम्हारी ओर से कोई प्रतिकार
न होगा; तब तक तुम्हारा यह ढोंग कुछ मानी नहीं रखता। कैसी शान्ति, कैसा सुख
और कैसा विश्वप्रेम?
यदि वास्तव में चाहते हो कि संसारव्यापी सुख-शान्ति और विश्वप्रेम का प्रचार
करो तो पहिले अपमानों का प्रतिकार करना सीखो। माँ के बन्धन काटने के लिए
कट मरो। बन्दी माँ को स्वतन्त्र करने के लिए आजन्म कालेपानी में ठोकरें खाने
को तैयार हो जाओ। सिसकती माँ को जीवित रखने के लिए मरने को तत्पर हो
जाओ। तब हमारा देश स्वतन्त्र होगा। हम बलवान होंगे। हम छाती ठोंककर विश्वप्रेम
का प्रचार कर सकेंगे। संसार को शान्ति-पथ पर चलने को बाध्य कर सकेंगे।
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युवक!
भगतसिंह का यह लेख ‘साप्ताहिक मतवाला’ (वर्ष : 2, अंक सं. 38, 16 मई,
1925) में बलवन्त सिंह के नाम से छपा था। केवल 17 वर्ष कुछ महीने की उम्र
में हिन्दी में लिखा यह लेख भगतसिंह की भाषा के ओज और लालित्य की एक
मिसाल है। इस लेख की चर्चा ‘मतवाला’ के सम्पादकीय कर्म से जुड़े आचार्य
शिवपूजन सहाय की डायरी में भी मिलती है। लेख से पूर्व यहाँ ‘आलोचना’ में
प्रकाशित डायरी के उस अंश को भी उद्धृत किया जा रहा है। – स.
आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी के अंश (पृष्ठ 28)
23 मार्च
सन्ध्या समय सम्मेलन भवन के रंगमंच पर देशभक्त भगतसिंह की स्मृति में
सभा हुई। भगतसिंह ने ‘मतवाला’ (कलकत्ता) में एक लेख लिखा था; जिसको
सँवार-सुधारकर मैंने छापा था और उसे पुस्तक भण्डार द्वारा प्रकाशित
‘युवक-साहित्य’ में संगृहीत भी मैंने ही किया था। वह लेख बलवन्त सिंह के नाम
से लिखा था। क्रान्तिकारी लेख प्रायः गुमनाम लिखते थे। यह रहस्य किसी को ज्ञात
नहीं। वह लेख युवक-विषयक था। वह लाहौर से उन्होंने भेजा था। असली नाम
की जगह ‘बलवन्त सिंह’ ही छापने को लिखा था।
आलोचना – 67 / वर्ष 32 / अक्टूबर-दिसम्बर, 1983
युवावस्था मानव-जीवन का वसन्तकाल है। उसे पाकर मनुष्य मतवाला हो
जाता है। हज़ारों बोतल का नशा छा जाता है। विधाता की दी हुई सारी शक्तियाँ
सहस्त्र-धारा होकर फूट पड़ती हैं। मदान्ध मातंग की तरह निरंकुश, वर्षाकालीन
शोणभद्र की तरह दुर्द्धर्ष, प्रलयकालीन प्रबल प्रभंजन की तरह प्रचण्ड, नवागत
वसन्त की प्रथम मल्लिका कलिका की तरह कोमल, ज्वालामुखी की तरह
उच्छृंखल और भैरवी-संगीत की तरह मधुर युवावस्था है। उज्ज्वल प्रभात की शोभा,
स्निग्ध सन्ध्या की छटा, शरच्चन्द्रिका की माधुरी ग्रीष्म-मध्याह्न का उत्ताप और
भाद्रपदी अमावस्या के अर्द्धरात्र की भीषणता युवावस्था में सन्निहित है। जैसे
क्रान्तिकारी के जेब में बमगोला, षड्यन्त्री की असटी में भरा-भराया तमंचा,
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 95