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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 788 में से

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पृष्ठ 91

की कट्टरता से पंजाब की रक्षा हो गयी और आर्यसमाजियों की कट्टरता से हिन्दी
भाषा ने अपना स्थान बना लिया।
आर्यसमाज के प्रारम्भ के दिनों में सिक्खों तथा आर्यसमाजियों की धार्मिक
सभाएँ एक ही स्थान पर होती थीं। तब उनमें कोई भिन्न भेदभाव न था, परन्तु पीछे
‘सत्यार्थ प्रकाश’ के किन्हीं दो-एक वाक्यों के कारण आपस में मनोमालिन्य बहुत
बढ़ गया और एक-दूसरे से घृणा होने लगी। इसी प्रवाह में बहकर सिक्ख लोग
हिन्दी भाषा को भी घृणा की दृष्टि से देखने लगे। औरों ने इसकी ओर किंचित भी
ध्यान न दिया।
बाद में, कहते हैं कि आर्यसमाजी नेता महात्मा हंसराज जी ने लोगों से कुछ
परामर्श किया था कि यदि वह हिन्दी लिपि को अपना लें, तो हिन्दी लिपि में
लिखी जाने वाली पंजाबी भाषा यूनिवर्सिटी में मंजूर करवा लेंगे, परन्तु दुर्भाग्यवश
वे लोग संकीर्णता के कारण और साहित्यिक जागृति के न रहने के कारण इस बात
के महत्त्व को समझ ही न सके और वैसा न हो सका। खैर! तो इस समय पंजाब
में तीन मत हैं। पहला मुसलमानों का उर्दू सम्बन्धी कट्टर पक्षपात, दूसरा
आर्यसमाजियों तथा कुछ हिन्दुओं का हिन्दी सम्बन्धी, तीसरा पंजाबी का।
इस समय हम एक-एक भाषा के सम्बन्ध में कुछ विचार करें, तो अनुचित
न होगा। सबसे पहले हम मुसलमानों का विचार रखेंगे। वे उर्दू के कट्टर पक्षपाती
हैं। इस समय पंजाब में इसी भाषा का ज़ोर भी है। कोर्ट की भाषा भी यही है, और
फिर मुसलमान सज्जनों का कहना यह है कि उर्दू लिपि में ज़्यादा बात थोड़े स्थान
में लिखी जा सकती है। यह सब ठीक है, परन्तु हमारे सामने इस समय सबसे मुख्य
प्रश्न भारत को एक राष्ट्र बनाना है। एक राष्ट्र बनाने के लिए एक भाषा होना
आवश्यक है, परन्तु यह एकदम हो नहीं सकता। उसके लिए क़दम-क़दम चलना
पड़ता है। यदि हम अभी भारत की एक भाषा नहीं बना सकते तो कम से कम
लिपि तो एक बना देनी चाहिए। उर्दू लिपि तो सर्वांगसम्पूर्ण नहीं कहला सकती,
और फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उसका आधार फारसी भाषा पर है। उर्दू
कवियों की उड़ान, चाहे वे हिन्दी (भारतीय) ही क्यों न हों, ईरान के साकी और
अरब की खजूरों को जा पहुँचती है। काजी नज़र-उल-इस्लाम की कविता में तो
धूरजटी, विश्वामित्र और दुर्वासा की चर्चा बार-बार है, परन्तु हमारे पंजाबी
हिन्दी-उर्दू कवि उस ओर ध्यान तक भी न दे सके। क्या यह दुख की बात नहीं?
इसका मुख्य कारण भारतीयता और भारतीय साहित्य से उनकी अनभिज्ञता है। उनमें
भारतीयता आ ही नहीं पाती, तो फिर उनके रचित साहित्य से हम कहाँ तक
भारतीय बन सकते हैं? केवल उर्दू पढ़ने वाले विद्यार्थी भारत के पुरातन साहित्य
का ज्ञान नहीं हासिल कर सकते। यह नहीं कि उर्दू जैसी साहित्यिक भाषा में उन
ग्रन्थों का अनुवाद नहीं हो सकता, परन्तु उसमें ठीक वैसा ही अनुवाद हो सकता
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 85