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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 788 में से

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पृष्ठ 98

सत्यप्रकाश से ‘बाज’ रहने के लिए इस महान सिद्धान्त की आड़ मत लो। यदि
सचमुच उस कल्पित समय को लाने की चेष्टा है तो आओ। पहला काम पतित
भारत का उत्थान करना होगा। गुलामियों की ज़ंजीरों को काटना होगा। अत्याचार का
सर्वनाश करना होगा। पराधीनता को मिट्टी में मिला देना होगा क्योंकि यह अपनी
कमज़ोरी के कारण उस मनुष्य-जाति को, जिसकी सृष्टि परमपिता ने अपने ही
अनुरूप की थी, न्यायपथ से भ्रष्ट करने का प्रलोभन हो रहा है।
यदि उपरोक्त कथन की सत्यता को मानते हुए भी तुम जेल के डर से
या फाँसी के डर से इस मार्ग में आने से झिझकते हो तो आज से इस ढोंग को
छोड़ दो।
अगर इस भय से कि क्रान्ति के पीछे घोर अराजकता फैल जायेगी या घोर
रक्तपात होगा, एकदम अशान्ति होगी – तुम इस मार्ग में नहीं आते तो भी तुम भीरु
हो, कायर हो, बुज़दिल हो, इस आडम्बर को छोड़ दो।
अशान्ति फैलती है तो फैलने दो, परतन्त्रता भी तो न होगी। अराजकता फैलती
है तो फैलने दो, पराधीनता का भी तो सर्वनाश हो जायेगा। आहा! उस कशमकश
में कमज़ोर पिस जायेंगे। रोज़-रोज़ का रोना बन्द हो जायेगा। निर्बल न रहेंगे, बलवानों
में मैत्री होगी। बलिष्ठ लोगों में घनिष्टता होगी। उनमें प्रेम होगा, संसार में विश्वप्रेम
का प्रचार हो सकेगा।
हाँ! हाँ!! निर्बलों को एकबारगी पिस जाना होगा। वे समस्त संसार के अपराधी
हैं। उन्होंने ही घोर अशान्ति फैला रखी है। सब बलवान बनें, नहीं तो उस चक्की
में पिसकर मलीदा हो जायेंगे।
आये! कौन माता का लाल सच्चे हृदय से विश्वबन्धुता का इच्छुक है। कौन
है समस्त संसार के लिए अपना सुख बलिदान करने वाला?
कोई गुलाम जाति इस उच्चतम सिद्धान्त का नाम तक लेने की अधिकारिणी
नहीं है। एक गुलाम मनुष्य के मुख से निकलकर इसका महत्त्व ही जाता रहता है।
एक अपमानित मनुष्य, पद-दलित मनुष्य, पैरों तले रौंदे जाने वाला मनुष्य यदि कहे
– मैं विश्वबन्धुता का अनुगामी हूँ, Universal brotherhood का पक्षपाती हूँ,
इसलिए इन अत्याचारों का प्रतिकार नहीं करता – तो उसका कथन क्या मूल्य रख
सकता है? कौन सुनेगा उसके इस कायरतापूर्ण वाक्य को? हाँ – तुममें शक्ति हो,
तुममें बल हो, चाहो तो बड़े-बड़ों को पैरों तले रौंद सको, एक इशारे से बड़े-बड़े
अभिमानियों को मिट्टी में मिला सको, तख़्तो-ताज वालों को ख़ाक में सुला सको,
उनको धूलि में मिला सको, और फिर तुम यह वाक्य कहते हुए कि ‘हम विश्वप्रेमी
हैं’ ऐसा न करो, तो तुम्हारी बात वज़नदार होगी – फिर तुम्हारा एक-एक वाक्य
प्रभावशाली होगा। फिर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ भी महत्त्वपूर्ण हो जायेगा।
आज तुम गुलाम हो, पराधीन हो, परतन्त्र हो, बन्दी हो, तुम्हारी यही बात आज
92 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़