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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 94, कुल 788 में से

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पृष्ठ 94

कहने का तात्पर्य यह है कि पंजाबी के निकट होने पर भी हिन्दी अभी
पंजाबी-हृदय से काफ़ी दूर है। हाँ, पंजाबी भाषा के हिन्दी लिपि में लिखे जाने पर
और उसके साहित्य बनाने के प्रयत्न में निश्चय ही वह हिन्दी के निकटतर आ
जायेगी।
प्रायः सभी मुख्य तर्कों पर तर्क किया जा चुका है। अब केवल एक बात
कहेंगे। बहुत-से सज्जनों का कथन है कि पंजाबी भाषा में माधुर्य, सौन्दर्य और
भावुकता नहीं है। यह सरासर निराधार है। अभी उस दिन –
लच्छीए जित्थे तू पानी डोलिया ओत्थे उग पये सन्दल दे बूटे
वाले गाने के माधुर्य ने कवीन्द्र रवीन्द्र तक को मोहित कर लिया और वे झट
अंग्रेज़ी में अनुवाद करने लगे – O Lachi, where there spilt water, where there
spilt water....etc...etc...
और बहुत-से और उदाहरण भी दिये जा सकते हैं। निम्न वाक्य क्या किसी
अन्य भाषा की कविताओं से कम है? –
पिपले दे पत्तया वे केही खड़खड़ लायी ऐ।
पत्ते झड़े पुराने हुण रुत्त नवयाँ दी आयी आ॥
और फिर जब पंजाबी अकेला अथवा समूह बैठा हो तो ‘गौहर’ के ये पद
जितना प्रभाव करेंगे, उतना कोई और भाषा क्या करेगी?
लाम लक्खाँ ते करोड़ाँ दे शाह वेखे न मुसाफ़िराँ कोई उधार देंदा,
दिने रातीं जिन्हाँ दे कूच डेरे न उन्हाँ दे थायीं कोई एतबार देंदा।
भौरे बहंदे गुलाँ दी वाशना ते ना सप्पा दे मुहाँ ते कोई प्यार देंदा
गौहर समय सलूक हन ज्यूंदया दे मोयाँ गियाँ नूँ हर कोई विसार देंदा।
और फिर –
जीम ज्यूदियाँ नूँ क्यों मारना एं, जेकर नहीं तूं मोयाँ नूँ जिऔण जोगा
घर आये सवाली नूँ क्यों घूरना एं, जेकर नहीं तू हथ्थीं ख़ैर पौण जोगा
मिले दिलाँ नूँ क्यों बिछोड़ना एं, जेकर नहीं तू बिछड़याँ नू मिलौण जोगा
गौहरा बदीयाँ रख बन्द खाने, जेकर नहीं तू नेकीआँ कमौण जोगा।
और फिर अब तो दर्द, मस्ताना, दीवाना बड़े अच्छे-अच्छे कवि पंजाबी की
कविता का भण्डार बढ़ा रहे हैं।
ऐसी मधुर, ऐसी विमुग्धकारी भाषा तो पंजाबियों ने ही न अपनायी, यही दुख
है। अब भी नहीं अपनाते, समस्या यही है। हरेक अपनी बात के पीछे मज़हबी डण्डा
लिये खड़ा है। इसी अड़ंगे को किस तरह दूर किया जाये, यही पंजाब की भाषा
तथा लिपि विषयक समस्या है, परन्तु आशा केवल इतनी है कि सिक्खों में इस
समय साहित्यिक जागृति पैदा हो रही है। हिन्दुओं में भी है। सभी समझदार लोग
मिलकर-बैठकर निश्चय ही क्यों नहीं कर लेते। यही एक उपाय है इस समस्या
88 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़