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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 788 में से

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पृष्ठ 88

टालस्टाय, कार्ल मार्क्स तथा मैक्सिम गोर्की इत्यादि ने नवीन साहित्य पैदा करने में
वर्षों व्यतीत न कर दिये होते, तो रूस की क्रान्ति न हो पाती, साम्यवाद का प्रचार
तथा व्यवहार तो दूर रहा।
यही दशा हम सामाजिक तथा धार्मिक सुधारकों में देख पाते हैं। कबीर के
साहित्य के कारण उनके भावों का स्थायी प्रभाव दीख पड़ता है। आज तक उनकी
मधुर तथा सरस कविताओं को सुनकर लोग मुग्ध हो जाते हैं।
ठीक यही बात गुरु नानकदेव जी के विषय में भी कही जा सकती है। सिक्ख
गुरुओं ने अपने मत के प्रचार के साथ जब नवीन सम्प्रदाय स्थापित करना शुरू
किया, उस समय उन्होंने नवीन साहित्य की आवश्यकता भी अनुभव की और इसी
विचार से गुरु अंगददेव जी ने गुरुमुखी लिपि बनायी। शताब्दियों तक निरन्तर युद्ध
और मुसलमानों के आक्रमणों के कारण पंजाब में साहित्य की कमी हो गयी थी।
हिन्दी भाषा का भी लोप-सा हो गया था। इस समय किसी भारतीय लिपि को ही
अपनाने के लिए उन्होंने कश्मीरी लिपि को अपना लिया। तत्पश्चात गुरु अर्जुनदेव
जी तथा भाई गुरुदास जी के प्रयत्न से आदिग्रन्थ का संकलन हुआ। अपनी लिपि
तथा अपना साहित्य बनाकर अपने मत को स्थायी रूप देने में उन्होंने यह बहुत
प्रभावशाली तथा उपयोगी क़दम उठाया था।
उसके बाद ज्यों-ज्यों परिस्थिति बदलती गयी, त्यों-त्यों साहित्य का प्रवाह भी
बदलता गया। गुरुओं के निरन्तर बलिदानों तथा कष्ट-सहन से परिस्थिति बदलती
गयी। जहाँ हम प्रथम गुरु के उपदेश में भक्ति तथा आत्मविस्मृति के भाव सुनते
हैं और निम्नलिखित पद में कमाल आजिज़ी का भाव पाते हैं :
नानक नन्हे हो रहे, जैसी नन्हीं दूब।
और घास जरि जात है, दूब खूब की ख़ूब।।
वहीं पर हम नवें गुरु श्री तेगबहादुर जी के उपदेश में पददलित लोगों की
हमदर्दी तथा उनकी सहायता के भाव पाते हैं :
बाँह जिन्हाँ दी पकड़िये, सिर दीजिये बाँहि न छोड़िये।
गुरु तेगबहादुर बोलया, धरती पै धर्म न छोड़िये।।
उनके बलिदान के बाद हम एकाएक गुरु गोविन्द सिंह जी के उपदेश में क्षात्र
धर्म का भाव पाते हैं। जब उन्होंने देखा कि अब केवल भक्ति-भाव से ही काम
न चलेगा, तो उन्होंने चण्डी की पूजा भी प्रारम्भ की और भक्ति तथा क्षात्र धर्म का
समावेश कर सिक्ख समुदाय को भक्तों तथा योद्धाओं का समूह बना दिया। उनकी
कविता (साहित्य) में हम नवीन भाव देखते हैं।
वे लिखते हैं :
जे तोहि प्रेम खेलण का चाव, सिर धर तली गली मोरी आव।
जे इत मारग पैर धरीजै, सिर दीजै कांण न कीजै।।
82 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़