भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 101, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंयुवक!
भगतसिंह का यह लेख ‘साप्ताहिक मतवाला’ (वर्ष : 2, अंक सं. 38, 16 मई,
1925) में बलवन्त सिंह के नाम से छपा था। केवल 17 वर्ष कुछ महीने की उम्र
में हिन्दी में लिखा यह लेख भगतसिंह की भाषा के ओज और लालित्य की एक
मिसाल है। इस लेख की चर्चा ‘मतवाला’ के सम्पादकीय कर्म से जुड़े आचार्य
शिवपूजन सहाय की डायरी में भी मिलती है। लेख से पूर्व यहाँ ‘आलोचना’ में
प्रकाशित डायरी के उस अंश को भी उद्धृत किया जा रहा है। – स.
आचार्य शिवपूजन सहाय की डायरी के अंश (पृष्ठ 28)
23 मार्च
सन्ध्या समय सम्मेलन भवन के रंगमंच पर देशभक्त भगतसिंह की स्मृति में
सभा हुई। भगतसिंह ने ‘मतवाला’ (कलकत्ता) में एक लेख लिखा था; जिसको
सँवार-सुधारकर मैंने छापा था और उसे पुस्तक भण्डार द्वारा प्रकाशित
‘युवक-साहित्य’ में संगृहीत भी मैंने ही किया था। वह लेख बलवन्त सिंह के नाम
से लिखा था। क्रान्तिकारी लेख प्रायः गुमनाम लिखते थे। यह रहस्य किसी को ज्ञात
नहीं। वह लेख युवक-विषयक था। वह लाहौर से उन्होंने भेजा था। असली नाम
की जगह ‘बलवन्त सिंह’ ही छापने को लिखा था।
आलोचना – 67 / वर्ष 32 / अक्टूबर-दिसम्बर, 1983
युवावस्था मानव-जीवन का वसन्तकाल है। उसे पाकर मनुष्य मतवाला हो
जाता है। हज़ारों बोतल का नशा छा जाता है। विधाता की दी हुई सारी शक्तियाँ
सहस्त्र-धारा होकर फूट पड़ती हैं। मदान्ध मातंग की तरह निरंकुश, वर्षाकालीन
शोणभद्र की तरह दुर्द्धर्ष, प्रलयकालीन प्रबल प्रभंजन की तरह प्रचण्ड, नवागत
वसन्त की प्रथम मल्लिका कलिका की तरह कोमल, ज्वालामुखी की तरह
उच्छृंखल और भैरवी-संगीत की तरह मधुर युवावस्था है। उज्ज्वल प्रभात की शोभा,
स्निग्ध सन्ध्या की छटा, शरच्चन्द्रिका की माधुरी ग्रीष्म-मध्याह्न का उत्ताप और
भाद्रपदी अमावस्या के अर्द्धरात्र की भीषणता युवावस्था में सन्निहित है। जैसे
क्रान्तिकारी के जेब में बमगोला, षड्यन्त्री की असटी में भरा-भराया तमंचा,
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 95