भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 89, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर फिर -
सूरा सो पहिचानिये, जो लड़ै दीन के हेत।
पुर्ज़ा-पुर्ज़ा कट मरै, कभूँ न छाँडै खेत॥
और फिर एकाएक खड्ग की पूजा प्रारम्भ हो जाती है।
खग खण्ड विहण्ड, खल दल खण्ड अति रन मण्ड प्रखण्ड।
भुज दण्ड अखण्ड, तेज प्रचण्ड जोति अभण्ड भानुप्रभं।।
उन्हीं भावों को लेकर बाबा बन्दा आदि मुसलमानों के विरुद्ध निरन्तर युद्ध
करते रहे, परन्तु उसके बाद हम देखते हैं कि जब सिक्ख सम्प्रदाय केवल अराजकों
का एक समूह रह जाता है और जब वे गैर-क़ानूनी (Outlaw) घोषित कर दिये जाते
हैं, तब उन्हें निरन्तर जंगलों में ही रहना पड़ता है। अब इस समय नवीन साहित्य
की सृष्टि नहीं हो सकी। उनमें नवीन भाव नहीं भरे जा सके। उनमें क्षात्र-वृत्ति थी,
वीरत्व तथा बलिदान का भाव था और मुसलमान शासकों के विरुद्ध युद्ध करते रहने
का भाव था, परन्तु उसके बाद क्या करना होगा, यह वे भली-भाँति नहीं समझे।
तभी तो उन वीर योद्धाओं के समूह (मिसलें) आपस में भिड़ गये। यहीं पर
सामयिक भावों की त्रुटि बुरी तरह अखरती है। यदि बाद में रणजीत सिंह जैसा वीर
योद्धा और चालाक शासक न निकल आता, तो सिक्खों को एकत्रित करने के लिए
कोई उच्च आदर्श अथवा भाव शेष न रह गया था।
इन सबके साथ एक बात और भी ख़ास ध्यान देने योग्य है। संस्कृत का सारा
साहित्य हिन्दू समाज को पुनर्जीवित न कर सका, इसीलिए सामयिक भाषा में नवीन
साहित्य की सृष्टि की गयी। उस सामयिक भाव के साहित्य ने अपना जो प्रभाव
दिखाया वही हम आज तक अनुभव करते हैं। एक अच्छे समझदार व्यक्ति के लिए
क्लिष्ट संस्कृत के मन्त्र तथा पुरानी अरबी की आयतें इतनी प्रभावकारी नहीं हो
सकतीं जितनी कि उसकी अपनी साधारण भाषा की साधारण बातें।
ऊपर पंजाबी भाषा तथा साहित्य के विकास का संक्षिप्त इतिहास लिखा गया
है। अब हम वर्तमान अवस्था पर आते हैं। लगभग एक ही समय पर बंगाल में स्वामी
विवेकानन्द तथा पंजाब में स्वामी रामतीर्थ पैदा हुए, दोनों एक ही ढर्रे के महापुरुष
थे। दोनों विदेशों में भारतीय तत्त्वज्ञान की धाक जमाकर स्वयं भी जगत-प्रसिद्ध हो
गये, परन्तु स्वामी विवेकानन्द का मिशन बंगाल में एक स्थायी संस्था बन गया,
पर पंजाब में स्वामी रामतीर्थ का स्मारक तक नहीं दीख पड़ता। उन दोनों के विचारों
में भारी अन्तर रहने पर भी तह में हम एक गहरी समता देखते हैं। जहाँ स्वामी
विवेकानन्द कर्मयोग का प्रचार कर रहे थे, वहाँ स्वामी रामतीर्थ भी मस्तानावार गाया
करते थे :
हम रूखे टुकड़े खायेंगे, भारत पर वारे जायेंगे।
हम सूखे चने चबायेंगे, भारत की बात बनायेंगे।
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 83