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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 788 में से

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पृष्ठ 92

है, जैसाकि एक ईरानी को भारतीय साहित्य सम्बन्धी ज्ञानोपार्जन के लिए आवश्यक
हो।
हम अपने उपरोक्त कथन के समर्थन में केवल इतना ही कहेंगे कि जब
साधारण आर्य और स्वराज्य आदि शब्दों को आर्या और स्वराजिया लिखा और पढ़ा
जाता है तो गूढ़ तत्त्वज्ञान सम्बन्धी विषयों की चर्चा ही क्या? अभी उस दिन श्री
लाला हरदयाल जी एम.ए. की उर्दू पुस्तक 'क़ौमें किस तरह ज़िन्दा रह सकती हैं?'
का अनुवाद करते हुए सरकारी अनुवादक ने ऋषि नचिकेता को उर्दू में लिखा होने
से नीची कुतिया समझकर 'ए बिच ऑफ़ लो ओरिजिन' अनुवाद किया था। इसमें
न तो लाला हरदयाल जी का अपराध था, न अनुवादक महोदय का। इसमें क़सूर
था उर्दू लिपि का और उर्दू भाषा की हिन्दी भाषा तथा साहित्य से विभिन्नता का।
शेष भारत में भारतीय भाषाएँ और लिपियाँ प्रचलित हैं। ऐसी अवस्था में पंजाब
में उर्दू का प्रचार कर क्या हम भारत से एकदम अलग-थलग हो जावें? नहीं। और
फिर सबसे बड़ी बात तो यह है कि उर्दू के कट्टर पक्षपाती मुसलमान लेखकों की
उर्दू में फ़ारसी का ही आधिक्य रहता है। 'ज़मींदार' और 'सियासत' आदि
मुसलमान-समाचारपत्रों में तो अरबी का ज़ोर रहता है, जिसे एक साधारण व्यक्ति
समझ भी नहीं सकता। ऐसी दशा में उसका प्रचार कैसे किया जा सकता है? हम
तो चाहते हैं कि मुसलमान भाई भी अपने मज़हब पर पक्के रहते हुए ठीक वैसे
ही भारतीय बन जायें जैसेकि कमाल टर्क (तुर्क) हैं। भारतोद्धार तभी हो सकेगा।
हमें भाषा आदि के प्रश्नों को मार्मिक समस्या न बनाकर खूब विशाल दृष्टिकोण
से देखना चाहिए।
इसके बाद हम हिन्दी-पंजाबी भाषाओं की समस्या पर विचार करेंगे। बहुत-से
आदर्शवादी सज्जन समस्त जगत को एक राष्ट्र, विश्व राष्ट्र बना हुआ देखना चाहते
हैं। यह आदर्श बहुत सुन्दर है। हमको भी इसी आदर्श को सामने रखना चाहिए। उस
पर पूर्णतया आज व्यवहार नहीं किया जा सकता, परन्तु हमारा हर एक क़दम, हमारा
हर एक कार्य इस संसार की समस्त जातियों, देशों तथा राष्ट्रों को एक सुदृढ़ सूत्र
में बाँधकर सुख-वृद्धि करने के विचार से उठना चाहिए। उससे पहले हमको अपने
देश में यही आदर्श क़ायम करना होगा। समस्त देश में एक भाषा, एक लिपि, एक
साहित्य, एक आदर्श और एक राष्ट्र बनाना पड़ेगा, परन्तु समस्त एकताओं से पहले
एक भाषा का होना ज़रूरी है, ताकि हम एक-दूसरे को भली-भाँति समझ सकें।
एक पंजाबी और एक मद्रासी इकट्ठा बैठकर केवल एक-दूसरे का मुँह ही न ताका
करें, बल्कि एक-दूसरे के विचार तथा भाव जानने का प्रयत्न करें, परन्तु यह परायी
भाषा अंग्रेज़ी में नहीं, बल्कि हिन्दुस्तान की अपनी भाषा हिन्दी में। यह आदर्श भी,
पूरा होते-होते अभी कई वर्ष लगेंगे। उसके प्रयत्न में हमें सबसे पहले साहित्यिक
जागृति पैदा करनी चाहिए। केवल गिनती के कुछेक व्यक्तियों में नहीं, बल्कि
86 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़