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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 788 में से

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पृष्ठ 90

हम नंगे उमर बितायेंगे, भारत पर जान मिटायेंगे।
वे कई बार अमेरिका में अस्त होते सूर्य को देखकर आँसू बहाते हुए कहा करते
थे – “तुम अब मेरे प्यारे भारत में उदय होने जा रहे हो। मेरे इन आँसुओं को भारत
के सलिल सुन्दर खेतों में ओस की बूँदों के रूप में रख देना।” इतना महान देश
तथा ईश्वर-भक्त हमारे प्रान्त में पैदा हुआ हो, परन्तु उसका स्मारक तक न दीख
पड़े, इसका कारण साहित्यिक फिसड्डीपन के अतिरिक्त क्या हो सकता है?
यह बात हम पद-पद पर अनुभव करते हैं। बंगाल के महापुरुष श्री देवेन्द्र
ठाकुर तथा श्री केशवचन्द्र सेन की टक्कर के पंजाब में भी कई महापुरुष हुए हैं,
परन्तु उनकी वह कद्र नहीं और मरने के बाद वे जल्द ही भुला दिये गये, जैसे
ज्ञान सिंह जी इत्यादि। इन सबकी तह में हम देखते हैं कि एक ही मुख्य कारण
है, और वह है साहित्यिक रुचि-जागृति का सर्वथा अभाव।
यह तो निश्चय ही है कि साहित्य के बिना कोई देश अथवा जाति उन्नति नहीं
कर सकती, परन्तु साहित्य के लिए सबसे पहले भाषा की आवश्यकता होती है और
पंजाब में वह नहीं है। इतने दिनों से यह त्रुटि अनुभव करते रहने पर भी अभी तक
भाषा का कोई निर्णय न हो पाया। उसका मुख्य कारण है हमारे प्रान्त के दुर्भाग्य
से भाषा को मज़हबी समस्या बना देना। अन्य प्रान्तों में हम देखते हैं कि मुसलमानों
में प्रान्तीय भाषा को खूब अपना लिया है। बंगाल के साहित्य-क्षेत्र में कवि
नज़र-उल-इस्लाम एक चमकते सितारे हैं। हिन्दी कवियों में लतीफ़ हुसैन ‘नटवर’
उल्लेखनीय हैं। इसी तरह गुजरात में भी हैं, परन्तु दुर्भाग्य है पंजाब का। यहाँ पर
मुसलमानों का प्रश्न तो अलग रहा, हिन्दू-सिक्ख भी इस बात पर न मिल सके।
पंजाब की भाषा अन्य प्रान्तों की तरह पंजाबी ही होनी चाहिए थी, फिर क्यों
नहीं हुई, यह प्रश्न अनायास ही उठता है, परन्तु यहाँ के मुसलमानों ने उर्दू को
अपनाया। मुसलमानों में भारतीयता का सर्वथा अभाव है, इसीलिए वे समस्त भारत
में भारतीयता का महत्त्व न समझकर अरबी लिपि तथा फारसी भाषा का प्रचार
करना चाहते हैं। समस्त भारत की एक भाषा और वह भी हिन्दी होने का महत्त्व
उनकी समझ में नहीं आता। इसलिए वे तो अपनी उर्दू की रट लगाते रहे और एक
ओर बैठ गये।
फिर सिक्खों की बारी आयी। उनका सारा साहित्य गुरुमुखी लिपि में है। भाषा
में अच्छी-खासी हिन्दी है, परन्तु मुख्य पंजाबी भाषा है। इसलिए सिक्खों ने गुरुमुखी
लिपि में लिखी जाने वाली पंजाबी भाषा को ही अपना लिया। वे उसे किसी तरह
छोड़ न सकते थे। वे उसे मज़हबी भाषा बनाकर उससे चिपट गये।
इधर आर्यसमाज का आविर्भाव हुआ। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने समस्त
भारतवर्ष में हिन्दी प्रचार करने का भाव रखा। हिन्दी भाषा आर्यसमाज का एक
धार्मिक अंग बन गयी। धार्मिक अंग बन जाने से एक लाभ तो हुआ कि सिक्खों
84 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़