भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 99, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंढोंग प्रतीत होती है, एक आडम्बर दीख पड़ता है। बकवास मालूम देती है। क्या
तुम उसका प्रचार करना चाहते हो? अगर हाँ, तो उसका अनुसरण करना होगा, जो
कहता था, "He who loveth Humanity loveth God — " "God is love and love
is God" — जो राजद्रोह के अपराध में फाँसी चढ़ा, उसकी तरह वीरतापूर्वक
विश्वप्रेम का प्रचार करने को तैयार हो? जिस दिन तुम सच्चे प्रचारक बनोगे इस
अद्वितीय सिद्धान्त के, उस दिन तुम्हें माँ के सच्चे सुपुत्र गुरु गोविन्द सिंह की तरह
कर्मक्षेत्र में उतरना पड़ेगा। उस विश्वप्रेम के सच्चे अनुगामी — सच्चे पक्षपाती की
तरह — सब सपूत हैं एक पिता के, कहने वाले उस महापुरुष की तरह, अपने चारों
— आँखों के तारों, लख्ते-जिगरों को जाति के भेंट कर माता के पूछने पर सरलता
से उत्तर देने वाले की तरह तुम्हें धैर्य दिखाना होगा। क्या तुम अपने प्रिय से प्रिय
को — जिसकी स्मृति-मात्र से हृदय धड़कने लगता हो, जिसे तुम हर समय अपने
हृदय में छिपाये रखने के इच्छुक हो — को अपनी आँखों के सामने बलिवेदी पर
चढ़ता देख, अकथनीय कष्ट सहता देख धैर्य रख सकोगे? क्या उसके सामने ही
तुम जीते-जी अग्नि-चिता पर प्रसन्नतापूर्वक चढ़ सकोगे; और हँसते हुए संसार की
ओर करुणाभरी दृष्टि से देखते हुए विदा हो सकोगे? यदि हाँ, तो आओ परीक्षा हो
जायेगी, समय आ गया है। यदि हृदय में कुछ भी झिझक है तो खुदा के वास्ते इस
आडम्बर को छोड़ दो।
जब तक ‘काला-गोरा’, ‘सभ्य-असभ्य’, ‘शासक-शासित’, ‘धनी-निर्धन’,
‘छूत-अछूत’ आदि शब्दों का प्रयोग होता है तब तक कहाँ विश्वबन्धुता और
विश्वप्रेम? यह उपदेश स्वतन्त्र जातियाँ कर सकती हैं। भारत जैसी गुलाम जाति
इसका नाम नहीं ले सकती।
फिर उसका प्रचार कैसे होगा? तुम्हें शक्ति एकत्र करनी होगी। शक्ति एकत्र
करने के लिए अपनी एकत्रित शक्ति ख़र्च कर देनी पड़ेगी। राणाप्रताप की तरह
आयुपर्यन्त ठोकरें खानी होंगी, तब कहीं उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो सकोगे। देखते नहीं
विश्वबन्धुता का सच्चा प्रचारक था मेजिनी जो बीस वर्ष स्वयं ही एक जगह बन्द
रहता है। लेनिन था उसका पक्षपाती — कितना रुधिर उन्होंने बहा दिया था।
आदर्शवादी ब्रूटस था विश्वप्रेमी — जिसने अपनी जन्मभूमि के लिए अपने परमप्रिय
‘सीज़र’ को अपने हाथों क़त्ल कर डाला था और पीछे स्वयं भी आत्महत्या कर
ली थी। सानन्द युद्धों में प्रवीण रहने वाला गैरीबाल्डी था, जिसे विश्वप्रेमी होने का
श्रेय प्राप्त हो सकता है।
विश्वप्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी, कट्टर अराजकतावादी
कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नहीं समझते — वही वीर सावरकर।
विश्वप्रेम की तरंग में आकर घास पर चलते-चलते रुक जाते कि कोमल घास
पैरों तले मसली जायेगी।
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 93