भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 97, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंवर्तमान दशा को देखकर कौन कह सकता है कि ऐसा समय भी आ सकता
है, जिस समय किसी के भय से नहीं, परन्तु अपने हृदय की प्रेरणा से ही मनुष्य
पाप-कर्म नहीं करेंगे। यदि उस दिन भी हमें किसी कल्पित स्वर्ग की लिप्सा
होगी तो हम कह देंगे कि स्वर्ग कोई वस्तु है ही नहीं! क्या वह समय आ सकता
है! यह है एक समस्या – एक बड़ी समस्या है। इसका उत्तर देना कोई सुगम
कार्य नहीं है। परन्तु मैं पूछता हूँ कि क्या लोग उस समय को लाना चाहते हैं? वे
लोग जो ‘विश्वबन्धुता’ (Universal brotherhood या Cosmopolitanism) का
घोर नाद किया करते हैं; क्या वास्तव में उसे लाने के इच्छुक हैं? ‘हाँ’ कह देने
से ही काम नहीं चलेगा। कांग्रेस का प्रस्ताव नहीं है। प्रश्न गम्भीरतापूर्वक विचार
करने योग्य है। क्या लोग उसके लिए बलिदान देने को तैयार हैं? उस कल्पित
भविष्य के लिए हमें घोर वर्तमान देना होगा। उस कल्पित शान्ति के लिए हमें
अशान्ति फैलानी होगी। उस हवाई क़िले के लिए हमें सर्वस्व देना होगा। उस
शान्तिपूर्ण राज्य की स्थापना के लिए हमें घोर अराजकता फैलानी होगी। उस
अत्याचार रहित संसार को अपनी ओर खींचने के लिए अत्याचार करने होंगे। उस
सुखमय जीवन के लिए – नहीं, नहीं, उसकी आशा-मात्र के लिए मर मिटना
होगा। क्या लोग उसके लिए तैयार हैं?
हमें प्रचार करना होगा समता-समानता का। अत्याचार करना होगा उन पर जो
उससे इन्कारी हों। अराजकता फैलानी होगी उन राज्य-साम्राज्यों के स्थान पर जो
शक्तिमद से अन्धे होकर करोड़ों की पीड़ा का कारण हो रहे हैं। क्या लोग उसके
लिए तैयार हैं?
हमें समस्त संसार को उस सिद्धान्त के स्वागत के लिए तैयार करना होगा। उस
आशामयी खेती के लिए हमें खेतों में से सबकुछ उखाड़ फेंकना होगा। काँटेदार
झाड़ियों को उखाड़कर ज्वाला की शान्ति के लिए मटियामेट कर देना होगा। रोड़ा,
कंकड़ पीस डालना होगा? हमें घोर परिश्रम करना होगा। गिरे हुओं का उत्थान करना
होगा। ‘पस्ती’ वालों को उन्नति का मार्ग दिखाना होगा। मिथ्या शक्तिवादियों को
घसीटकर अपने साथ खड़े होने को विवश करना होगा। अहंकारियों का अहंकार
तोड़ उन्हें नम्रता प्रदान करनी होगी। निर्बलों को बल, पराधीनों को स्वाधीनता,
अशिक्षितों को शिक्षा, निराशावादियों को आशा की आभा, भूखों को रोटी, बेघरों को
घर, नास्तिकों को विश्वास, अन्धविश्वासियों को विचार-स्वतन्त्रता देनी होगी। क्या
लोग इतना काम करेंगे। ऐ विश्वबन्धुता विश्वबन्धुता चिल्लाने वाले! क्या तुम उसके
लिए तैयार हो? यदि नहीं तो आज से इस ढोंग को छोड़ दो। हमें उस विश्वप्रेम
की देवी के चरणों पर तुम्हारा भी बलिदान देना होगा, क्योंकि तुम मिथ्यावादी हो।
अगर तैयार हो तो आ जाओ कर्मक्षेत्र में अभी परीक्षा हो जायेगी। घर में बैठे हुए,
कोनों में दुबके हुए कर्मक्षेत्र के भयंकर दृश्य की कल्पना-मात्र से काँपते हुए,
विचार-यात्रा का पहला पड़ाव / 91