भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 50 (47)
अवसरवाद का जन्म
क़ानून के दायरे में रहकर काम करने की सम्भावना ने ही दूसरे इण्टरनेशनल
के समय में मज़दूर पार्टियों के भीतर अवसरवाद को जन्म दिया।
(लेनिन, कोलैप्स ऑफ़ II इंट. ने.)¹
ग़ैर-क़ानूनी काम :
“किसी देश में जहाँ बुर्जुआ वर्ग या प्रतिक्रान्तिकारी सामाजिक जनवाद सत्ता
में है, कम्युनिस्ट पार्टी को अपने क़ानूनी और ग़ैर-क़ानूनी कामों के बीच एक
तालमेल रखना अवश्य सीख लेना चाहिए, तथा क़ानूनी काम को हमेशा और
निश्चित रूप से ग़ैर-क़ानूनी पार्टी के प्रभावी नियन्त्रण में ही रहना चाहिए।
– बुख़ारिन ²
दूसरे इण्टरनेशनल के लक्ष्य के साथ विश्वासघात :
समाजवाद और श्रम के इस विराट संगठन को ऐसी शान्तिकालीन गतिविधियों
के लिए अनुकूलित कर दिया गया, और जब संकट आया, तो बहुत से नेता और
जनसमुदायों के भारी हिस्से अपनेआप को इस नयी स्थिति के अनुरूप बनाने में
असमर्थ हो गये...। यही वह अपरिहार्य स्थिति है जो बहुत हद तक दूसरे
इण्टरनेशनल के विश्वासघात का कारण है।
मार्क्स टु लेनिन, पृष्ठ 140 (मॉरिस हिलक्विट)
“द सिनिक्स वर्ड बुक” (1906)³
एम्ब्रोस प्रियर्स लिखता है :
- लेनिन की पुस्तक, द्वितीय इंटरनेशनल का पतन
- निकोलाई हवानोविच बुख़ारिन (1888-1938) – रूसी सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी
के सदस्य। राज्य, सर्वहारा अधिनायकत्व, राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के अधिकार तथा ऐसे
ही अन्य प्रश्नों पर लेनिन विरोधी दृष्टिकोण अपनाते रहे। अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति के बाद
बार-बार लेनिनवादी पार्टी नीति का विरोध किया। 1937 में अपनी पार्टी विरोधी गतिविधियों
के कारण पार्टी से निकाले गये। - व्यंग्यात्मक परिभाषाओं की पुस्तक, जो बाद में डेविल्स डिक्शनरी के नाम से प्रकाशित
हुई। एम्ब्रोस बियर्स (1842-1914) अमेरिकी पत्रकार, कथाकार और व्यंग्यकार थे।
598 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
“ग्रेप शॉट¹ – (संज्ञा) – एक तर्क जिसे भविष्य अमेरिकी समाजवाद की
माँगों के जवाब में तैयार कर रहा है।”
<u>पृष्ठ 51 (48)</u>
धर्म, स्थापित व्यवस्था का समर्थक :
दासता :
1835 में, प्रेस्बिटेरियन चर्च की जनरल असेम्बली ने प्रस्ताव पारित किया
कि : “दासता पुराने और नये दोनों ही टेस्टामेण्टों में स्वीकृत है, और इसे
ईश्वरीय सत्ता ने वर्जित नहीं किया है।”
द चार्ल्सटन बैप्टिस्ट एसोसिएशन ने 1835 में निम्नलिखित फ़रमान जारी
किया :
“मालिकों द्वारा अपने गुलामों के समय का इस्तेमाल करने के अधिकार को
सभी चीज़ों के सृष्टा ने स्पष्टतः मान्यता दे रखी है, जो अपनी मर्जी से जिस भी
चीज़ पर चाहे सम्पत्ति का अधिकार लागू कर सकता है।”
वर्जीनिया के मेथॉडिस्ट कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर रेवरण्ड ई. डी. साइमन,
डॉक्टर ऑफ़ डिवाइनिटी, ने लिखा :
“होली रिट (ईसाई धर्मशास्त्र – स.) के अवतरणों में साफ़ तौर पर गुलामों
के ऊपर सम्पत्याधिकार और इस अधिकार से सम्बन्धित रोज़मर्रा की बातों का
उल्लेख किया गया है। तब, कुल मिलाकर, बात यही है, चाहे हम स्वयं ईश्वर द्वारा
स्थापित यहूदी नीति को देखें, या सभी युगों में मानवजाति के एक समान विचार
और व्यवहार को लें, या न्यू टेस्टामेण्ट और नैतिक नियम के विधि-निषेध सम्बन्धी
निर्देशों को देखें; हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि दासता अनैतिक नहीं है। जब
यह बात सिद्ध हो चुकी है कि अफ्रीकी दास क़ानूनी तौर पर ख़रीदकर बँधुआ
बनाये जाते थे, तब उनके बच्चों को बँधुआ बनाकर रखने की बात भी अपरिहार्यतः
सिद्ध ही हो जाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अमेरिका में जो दासता मौजूद
है, उसकी स्थापना सही थी।”
पूँजीवाद का समर्थन :
हेनरी वॉन डाईक² “एस्से इन एप्लीकेशन” (1905) में लिखता है :
“बाइबिल की शिक्षा है कि ईश्वर दुनिया का मालिक है। वह अपनी शुभंकर
इच्छा से, सामान्य नियमों के अनुरूप, प्रत्येक आदमी को उसका भाग देता है।”
- बन्दूक़ के छर्रे
- हेनरी वॉन डाईक (1852-1933) : अमेरिकी धार्मिक विचारक और लेखक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 599
पृष्ठ 52 (49)
संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में आँकड़े :
सैन्य-संख्या 50,000 थी }
अब यह 300,000 है।
धनकुबेरों के पास 67 अरब की सम्पदा है।
व्यवसायों में लगे कुल व्यक्तियों में से
केवल 9/10 प्रतिशत ही धनिकतन्त्र में शामिल हैं।
फिर भी उनके पास कुल सम्पदा का 70 प्रतिशत है।
व्यवसायों में लगे कुल व्यक्तियों में से
29 प्रतिशत मध्यम वर्ग से सम्बन्धित हैं
उनके पास कुल सम्पदा का 25 प्रतिशत है = 24 अरब
व्यवसायों में लगे लोगों में से शेष 70 प्रतिशत
सर्वहारा वर्ग से सम्बन्धित हैं और उनके पास
कुल सम्पदा का सिर्फ़ 4 प्रतिशत अर्थात 4 अरब है।
लूसियन सैनियल के अनुसार, 1900 में
व्यवसाय में लगे कुल लोगों में से
= 250,251 धनिकतन्त्र से सम्बन्धित थे
= 8,429,845 मध्यम वर्ग से सम्बन्धित थे
= 20,395,137 सर्वहारा वर्ग से सम्बन्धित थे।
– आयरन हील¹
रायफ़लें :
“तुम कहते हो कि संसद और राजकीय पदों पर तुम्हारा बहुमत होगा, लेकिन
“तुम्हारे पास रायफ़लें कितनी हैं? क्या तुम्हें मालूम है कि पर्याप्त सीसा तुम्हें कहाँ
से मिल सकता है? जहाँ तक बारूद की बात है, रासायनिक मिश्रण, यान्त्रिक
मिश्रणों से बेहतर होते हैं, ये बात मेरी मान लो।”
– आयरन हील, पृष्ठ 198²
- और 2. जैक लण्डन का उपन्यास
600 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 53 (50)
सत्ता...¹
एक समाजवादी नेता ने धनिकतन्त्र की एक मीटिंग को सम्बोधित किया और
उन पर समाज के कुप्रबन्ध का दोष लगाया और इस प्रकार पीड़ित मानवता के
सम्मुख उपस्थित सभी विकरालताओँ और दुख-तकलीफ़ों की सारी की सारी
ज़िम्मेदारी उन्हीं पर थोप दी। बाद में एक पूँजीपति (मि. विक्सन) उठ खड़ा हुआ
और उसे इस प्रकार सम्बोधित किया :²
“इस पर हमारा जवाब यह है। हमारे पास तुम्हारे ऊपर बरबाद करने के लिए
शब्द नहीं हैं। जब तुम अपने गर्वीले मज़बूत हाथ हमारे महलों और वैभव की ओर
बढ़ाओगे, तब हम तुम्हें दिखा देंगे कि हमारी क्या ताक़त है। बमगोलों की
गड़गड़ाहट और मशीनगनों की तड़तड़ाहट से हम अपना जवाब देंगे। हम तुम
क्रान्तिवादियों को अपनी एड़ियों तले पीस डालेंगे, और तुम्हारे चेहरों को कुचल
डालेंगे। यह दुनिया हमारी है। हम इसके मालिक हैं और यह हमारी ही रहेगी। जहाँ
तक श्रम की बात है, यह तो जब से इतिहास शुरू हुआ तभी से धूल चाटता रहा
है, और मैंने इतिहास को ठीक से पढ़ा है। और यह तब तक धूल चाटता रहेगा जब
तक हमारे और हमारे उत्तराधिकारियों के हाथ में सत्ता रहेगी।
“एक शब्द है – सत्ता। यह सभी शब्दों का राजा है। ईश्वर नहीं, धन-वैभव
नहीं, बल्कि सत्ता। अपनी ज़बान पर रख लो और तब तक रखे रहो जब तक कि
यह उसे झनझनाने न लगे।”
“मुझे उत्तर मिल गया”, अर्नेस्ट (उस समाजवादी नेता)³ ने निर्विकार भाव
से कहा। “एकमात्र यही उत्तर दिया भी जा सकता था। सत्ता। हम मज़दूर वर्ग
के लोग इसी का तो प्रचार करते हैं। हम जानते हैं और अपने कटु अनुभव से
भलीभाँति जानते हैं, कि सत्य की, न्याय की, मानवता की, कोई भी अपील
कभी तुम्हें छू नहीं सकती। तुम्हारे दिल भी तुम्हारी उन एड़ियों की तरह ही
कठोर हैं जिनसे तुम ग़रीबों के चेहरे कुचलते हो। इसीलिए तो हमने सत्ता का
प्रचार किया है। लेकिन, चुनाव के दिन हमारे मतपत्रों की ताक़त तुमसे तुम्हारी
सरकार छीन ले जायेगी...।”
“अगर चुनाव के दिन तुम्हें बहुमत, भारी बहुमत मिल ही जाये, तो भी
उससे क्या फ़र्क पड़ने वाला है”, मि. विक्सन तपाक से बोला।
- शीर्षक का शेष हिस्सा फटा हुआ है
- भगतसिंह के शब्द
- कोष्ठक में भगतसिंह के शब्द
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 601
“मान लो यदि मतपेटिकाओं में तुम्हारी जीत के बावजूद हम तुम्हें सत्ता सौंपने
से इन्कार कर दें तो?” [पृष्ठ 54 (51) पर जारी]
“हमने उस पर भी सोच रखा है”, अर्नेस्ट ने जवाब दिया। “और इसका जवाब
हम तुम्हें गोलियों से देंगे। सत्ता, तुम्हीं ने इसे शब्दों का राजा कहा है। बहुत अच्छा!
सत्ता, देखेंगे इसे। और जिस दिन हम चुनाव में विजय हासिल कर लेंगे, और तुम
हमारी इस संवैधानिक और शान्तिपूर्ण ढंग से हासिल की गयी सत्ता को हमें सौंपने
से इन्कार कर दोगे, तो तुम्हारे इस सवाल के जवाब में कि हम क्या करेंगे – उस
दिन, मैं बता दूँ, कि हम तुम्हें इसका जवाब देंगे, हम बमगोलों की गड़गड़ाहट और
मशीनगनों की तड़तड़ाहट से अपना जवाब देंगे।
“तुम हमसे बच नहीं सकते। यह सही है कि तुमने इतिहास को ठीक से पढ़ा
है। यह सही है कि श्रम इतिहास के आरम्भ से ही धूल चाटता आ रहा है। और
यह भी सही है कि जब तक तुम्हारे और तुम्हारे उत्तराधिकारियों के हाथ में सत्ता
रहेगी, तब तक श्रम धूल ही चाटता रहेगा। मैं तुमसे सहमत हूँ। तुमने जो कुछ कहा
है उन सारी बातों से मैं सहमत हूँ। सत्ता ही निर्णायक होगी, जैसाकि हमेशा होता
आया है; यही तो वर्गों का संघर्ष है। जैसे तुम्हारे वर्ग ने पुराने सामन्ती तन्त्र को ध्वस्त
किया, ठीक वैसे ही मेरा वर्ग, मज़दूर वर्ग, तुम्हारे वर्ग को ध्वस्त कर डालेगा। अगर
तुम अपने प्राणिविज्ञान और अपने समाज विज्ञान को भी उतनी ही स्पष्टता से पढ़ो,
जितनी स्पष्टता से तुम इतिहास पढ़ते हो, तो तुम देखोगे कि मैंने जिस हश्र का वर्णन
किया है वह अपरिहार्य है। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इसमें एक वर्ष लगेगा,
दस वर्ष लगेंगे या हज़ार वर्ष लगेंगे – यह तय है कि तुम्हारा वर्ग मिट्टी में मिल
जायेगा। और यह सत्ता के जरिये ही होगा। हम मेहनतकश इस शब्द को इतना रट
चुके हैं कि हमारे दिमाग़ इससे झनझना रहे हैं। सत्ता। यह एक राजोचित शब्द है।”
– जैक लण्डन कृत आयरन हील (पृष्ठ 88)
पृष्ठ 55 (52)
आँकड़े¹
इंग्लैण्ड :
1922 – बेरोज़गारों की संख्या = 1,135,000
1926 – यह 1¼ से 1½ मिलियन के बीच
अर्थात 1,250,000 से 1,500,000 के बीच रही है।
- स्रोत का पता नहीं
602 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अंग्रेज़ मज़दूर नेताओं का विश्वासघात
1911 से 1913 तक के वर्ष आमतौर पर खदान मज़दूर, रेलकर्मियों और परिवहन
मज़दूरों के बेमिसाल वर्ग-संघर्षों का समय था। अगस्त 1911 में, रेलवे की राष्ट्रीय,
दूसरे शब्दों में, आम हड़ताल, फूट पड़ी थी। उन दिनों ब्रिटेन के ऊपर क्रान्ति की एक
धुँधली छाया मँडरा रही थी। लेकिन नेतागण ने इस आन्दोलन को पंगु कर डालने के
लिए अपनी पूरी ताक़त लगा दी। उनका इरादा "देशभक्ति" का था; यह हरकत
अगादिर की उस घटना के समय की जा रही थी, जिसने जर्मनी के साथ युद्ध का
ख़तरा उपस्थित कर दिया था। जैसाकि आज भलीभाँति मालूम है, प्रधानमन्त्री ने
मज़दूर-नेताओं को एक गुप्त बैठक में बुलाया और उनसे पितृभूमि की रक्षा की अपील
की। और नेताओं ने, बुर्जुआ वर्ग को मज़बूत करने के लिए अपने बूतेभर सब कुछ
दिया, और इस प्रकार साम्राज्यवादी नरसंहार के लिए रास्ता साफ़ किया।
(पृष्ठ 3) ह्वेयर इज़ ब्रिटेन गोइंग?$^1$
त्रात्स्की$^2$
<u>पृष्ठ 56 (53)</u>
विश्वासघात :
केवल 1920, यानी 'काले शुक्रवार' के बाद ही, आन्दोलन सीमाओं में वापस
लौटा, जब ख़ानकर्मियों, रेलकर्मियों और परिवहनकर्मियों के त्रिपक्षीय संश्रय के
नेताओं ने आम हड़ताल के साथ विश्वासघात कर दिया।
(पृष्ठ 3)$^3$
सुधार के लिए क्रान्ति का ख़तरा ज़रूरी है :
...ब्रिटिश बुर्जुआ वर्ग ने यह समझ लिया था कि ऐसे उपाय (सुधार) के जरिये
क्रान्ति को टाला जा सकता है। अतः इससे निष्कर्ष निकलता है कि सुधारों तक
- त्रात्स्की की कृति ह्वेयेर इज़ ब्रिटेन गोइंग?
- लिओन त्रात्स्की : लेव दवीदोविच त्रात्स्की (1879-1940) – लेनिनवाद के घोर
विरोधी। रूसी सामाजिक-जनवादी मज़दूर पार्टी (बोल्शेविक) की छठी कांग्रेस में (1917)
बोल्शेविक पार्टी के सदस्य बन गये। अक्टूबर क्रान्ति में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी। क्रान्ति के
बाद कई सरकारी पदों पर रहे। 1923 में पार्टी की आम नीति और समाजवाद के निर्माण
के लेनिन के कार्यक्रम के ख़िलाफ़ गुटबाज़ी भरा संघर्ष चलाया तथा इस बात का प्रचार
किया कि सोवियत संघ में समाजवाद की विजय असम्भव है। कम्युनिस्ट पार्टी ने
त्रात्स्कीवाद को पार्टी में निम्न पूँजीवादी प्रवृत्ति के रूप में बेनकाब किया और उसे संगठन
व विचारधारा के दृष्टिकोण से पराजित किया। त्रात्स्की 1927 में पार्टी से निकाल दिये गये
ओर 1929 में सोवियत विरोधी गतिविधियों के कारण उन्हें देश निकाला दे दिया गया।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 603
को भी लागू करवाने के लिए, सिर्फ़ धीरे-धीरे काम करते रहने का सिद्धान्त पर्याप्त
नहीं है, और कि क्रान्ति का एक वास्तविक ख़तरा ज़रूरी है।
(पृष्ठ 29)¹
सामाजिक एकता :
...ऐसा हो सकता है कि एक बार जब हम एक ऐसे विशेषाधिकारप्राप्त वर्ग
के सफाये के लिए उठ खड़े हों, जो रंगमंच से हटना न चाहता हो, तब वर्ग-संघर्ष
की बुनियादी अन्तर्वस्तु, उसी में निहित प्रतीत हो। लेकिन नहीं। मैकडोनाल्ड²
सामाजिक एकता की चेतना “जागृत” करना चाहते हैं। पर किसकी? मज़दूर वर्ग
की एकता तो बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध संघर्ष में उसकी आन्तरिक सुसम्बद्धता की
अभिव्यक्ति होती है।
मैकडोनाल्ड जिस सामाजिक एकता का उपदेश देते हैं, वह शोषकों के साथ
शोषितों की एकता, या दूसरे शब्दों में, शोषण को बनाये रखने के अलावा और कुछ
नहीं है।³
क्रान्ति एक आफ़त :
“रूस की क्रान्ति ने” मैकडोनाल्ड के कथनानुसार, “हमें बड़ा सबक
सिखाया। इसने दिखा दिया कि क्रान्ति एक बरबादी और विपदा के सिवाय और
कुछ नहीं है।” [पृष्ठ 57 (54) पर जारी]
क्रान्ति तो विपदा को ही जन्म देती है लेकिन ब्रिटिश जनतन्त्र ने तो
साम्राज्यवादी युद्ध को जन्म दे दिया...जिसकी बरबादी की तुलना क्रान्ति की
विपदाओं से तो निश्चित तौर पर तनिक भी नहीं की जा सकती। फिर भी, जिस
क्रान्ति ने ज़ारशाही, कुलीनतन्त्र और बुर्जुआ वर्ग को उखाड़ फेंका, चर्च को हिला
कर रख दिया, 13 करोड़ लोगों के एक राष्ट्र या राष्ट्रों के एक समूचे कुल में, एक
नये जीवन का संचार किया, उसके सामने यह घोषणा करने के लिए कि
— क्रान्ति एक विपदा के सिवाय और कुछ नहीं है – ऐसे ही बहरे कानों और
निर्लज्ज चेहरों की ज़रूरत है।
(पृष्ठ 64)⁴
- वही
- सम्भवतः जेम्स रैम्ज़े मैकडोनाल्ड (1866-1937) : ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेता और दो
बार प्रधानमन्त्री - ह्वेयर इज़ ब्रिटेन गोइंग? 4. वही
604 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
शान्तिपूर्ण?
कब और कहाँ सत्ताधारी वर्ग ने शान्तिपूर्ण मतदान के जरिये कभी सत्ता और
सम्पत्ति सौंपी है – और वह भी, खासतौर से ब्रिटिश बुर्जुआ वर्ग ने, जो सदियों
से दुनियाभर में लूटपाट करता आया है? (पृष्ठ 66)¹
समाजवाद का लक्ष्य : शान्ति
यह एकदम निर्विवाद सच्चाई है कि समाजवाद का लक्ष्य, सर्वप्रथम रूप से,
ताक़त के सबसे भोंड़े और ख़ूनी रूपों को ख़त्म करना है, और फिर उसके बाद
उसके और छिपे रूपों को भी ख़त्म करना है। (पृष्ठ 80)
“ह्वेयर इज़ ब्रिटेन गोइंग?”, त्रात्स्की
विश्व क्रान्ति का लक्ष्य :
- पूँजीवाद को उखाड़ फेंकना
- मानवता की सेवा के लिए प्रकृति का नियन्त्रण करना।
बुख़ारिन ने इसे ऐसे ही परिभाषित किया।
<u>पृष्ठ 58 (55)</u>
आदमी और मशीनरी
द युनाइटेड स्टेट्स ब्यूरो ऑफ़ लेबर का कहना है :
– मशीन पर काम करके एक आदमी 1 घण्टा 34 मिनट में पिनों का 12 पौण्ड
का पैकेट तैयार कर सकता है।
– अगर आदमी मशीन पर नहीं, बल्कि सिर्फ़ औज़ारों से काम करे तो उतने ही
काम में 140 घण्टा 55 मिनट का समय लगेगा।
(अनुपात – 1.34 : 140.55 मिनट)
– मशीन पर काम करके 100 जोड़े जूते बनाने में 234 घ. 25 मिनट लगते हैं।
– हाथ से इसमें 1,831 घण्टे 40 मिनट लगेंगे।
– मशीन पर काम करने पर श्रम की लागत $ 69.55 आती है।
– हाथ से...$ 457.79 आती है।
– मशीनी श्रम द्वारा 500 गज चारख़ानेदार कपड़ा तैयार करने में 73 घण्टे लगते हैं।
– हाथ के श्रम द्वारा, इसमें 5,844 घण्टे लगते हैं।
– मशीनी श्रम द्वारा 100 पौण्ड सिलाई का सूती धागा 39 घण्टों में तैयार होता है।
– हाथ से इसमें 2,895 घण्टे लगते हैं। - वही
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 605
पुनश्चः कृषि :
– एक भला-चंगा आदमी हँसुआ से एक एकड़ फ़सल एक दिन (12 घं.) में
काट सकता है।
– एक मशीन उसी काम को 20 मिनट में कर देती है।
– छः आदमी मूसल से 60 लीटर गेहूँ की मंडाई आधे घण्टे में कर सकते हैं।
– एक मशीन उतने ही समय में 12 गुना अधिक काम कर सकती है।
“मशीनरी के इस्तेमाल से मानव-श्रम की प्रभावकारिता में होने वाली बढ़ोत्तरी...राई
के मामले में 150 प्रतिशत से लेकर जौ के मामले में 2,244 प्रतिशत तक हो जाती
है...।”¹
पृष्ठ 59 (56)
सं.रा.अ. और उसकी आबादी की सम्पदा : ( 1850-1912 )²
प्रति व्यक्ति कुल आबादी
1850 में कुल सम्पदा थी
$ 7,135,780,000 $ 308 = 23,191,876
1860 $ 16,159,616,000 $ 514 = 31,443,321
1870 $ 30,068,518,000 $ 780 = 38,558,371
1880 $ 43,642,000,000 $ 870 = 50,155,783
1890 $ 65,037,091,000 $ 1,036 = 62,947,714
1900 $ 88,517,307,000 $ 1,165 = 75,994,575
1904 $ 107,104,202,000 $ 1,318 = 82,466,551
1912 $ 187,139,071,000 $ 1,965 = 95,40503
मशीनरी इस्तेमाल के कारण।
मशीन अपनी प्रकृति में सामाजिक है, जैसेकि औज़ार व्यक्तिगत था।³
“हमें ख़राब कपड़ा दो, लेकिन हमें बेहतर आदमी दो”, एमर्सन⁴ का कहना
है।
“सुखण्डी रोग से मरते शिशुओं की प्राण-रक्षा करो, फिर उसके बाद कपड़ा
व्यापार को तरजीह दो।” पृष्ठ 81⁵
- स्रोत अज्ञात 2. स्रोत अज्ञात 3. अज्ञात
- रैल्फ वाल्डो एमर्सन (1803-1882) : प्रसिद्ध अंग्रेज़ कवि, चिन्तक और निबन्धकार
- टॉमस कार्लाईल (1795-1881), पास्ट एण्ड प्रेज़ेण्ट, बुक IV
606 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
आदमी को मशीन पर कुर्बान नहीं किया जा सकता। मशीन को निश्चय ही
मानवजाति की सेवा में लगना चाहिए, जबकि अभी ही इस औद्योगिक व्यवस्था
में मानवजाति के ऊपर भारी कहर बरपा होने का ख़तरा मँडराने लगा है।
पॉवर्टी एण्ड रिचेज़ (पृष्ठ 81), स्काट नीअरिंग ¹
पृष्ठ 60 (57)
आदमी और मशीनरी :
सी. नैनफ़ोर्ड हेण्डरसन अपनी कृति “रे डे” में लिखता है :
यह उद्योग की संस्था, जो सभी संस्थाओं में सबसे पुरानी है, मानवजाति को
चीज़ों की निरंकुशता से मुक्त करने की गरज से संगठित और विकसित हुई, लेकिन
अब यह स्वयं उससे बड़ी निरंकुशता बन चुकी है, जो विशाल आबादी को गुलामों
की दशाओं में – ऐसे गुलामों की दशाओं में धकेलती जा रही है जो लम्बे और
थका देने वाले घण्टों तक काम करते हुए, ढेरों चीजें पैदा करते रहने के लिए
अभिशप्त हैं, जबकि वे जो चीजें पैदा करते हैं, खुद उन्हीं के अभाव से त्रस्त रहने
के लिए विवश हैं।
“पाव. रिचेज़, (पृष्ठ 87) ”
आदमी मशीनरी के लिए नहीं है :
आदमी ने इस्पात और आग के संयोग से जो चीज़ पैदा की है और जिसे मशीन
कहा है, उसे निश्चय ही हमेशा मनुष्य का स्वामी नहीं, बल्कि सेवक ही रहना
चाहिए। न तो मशीन और न ही मशीन के मालिक को मानवजाति पर शासन करने
का अधिकार है। पृष्ठ 88
साम्राज्यवाद :
साम्राज्यवाद विकास के उस चरण का पूँजीवाद है जिसमें इज़ारेदारियों और
वित्तीय पूँजी ने एक प्रभुत्वकारी प्रभाव हासिल कर लिया है, निर्यात-पूँजी भारी
महत्त्व प्राप्त कर चुकी है, अन्तरराष्ट्रीय ट्रस्टों ने दुनिया का बँटवारा करना शुरू कर
दिया है, और सबसे बड़े पूँजीवादी देशों ने पृथ्वी के समूचे भौगोलिक क्षेत्रफल
का आपस में बँटवारा पूरा कर लिया है।” – लेनिन ²
- स्कॉट नीअरिंग (1883-1983) : अमेरिकी पर्यावरणवादी, युद्धविरोधी कार्यकर्ता,
प्रचारक और लेखक। पॉवर्टी एण्ड रिचेज़ 1916 में प्रकाशित हुई थी। - वी.आई. लेनिन, साम्राज्यवाद, पूँजीवाद की चरम अवस्था
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 607
पृष्ठ 61 (58)
अधिनायकत्व :
अधिनायकत्व एक सत्ता है जो सीधे ताक़त पर आधारित होती है, और किसी
क़ानून से नहीं बँधी होती।
सर्वहारा वर्ग का क्रान्तिकारी अधिनायकत्व एक ऐसी सत्ता है जो बुर्जुआ वर्ग
के विरुद्ध और उसके ऊपर, सर्वहारा वर्ग द्वारा ताक़त की बदौलत लागू की जाती
है, और जो किसी क़ानून से नहीं बँधी होती।
प्रोलि. रिवो.¹ (पृष्ठ 18) – लेनिन
―――o―――
क्रान्तिकारी अधिनायकत्व :
क्रान्ति एक कार्रवाई है जिसके तहत आबादी का एक तबका दूसरे तबकों
पर रायफलों, संगीनों, बन्दूकों और ऐसे ही अन्य अत्यन्त सत्तावादी उपायों के
जरिये, अपनी इच्छा आरोपित करता है। और जो पक्ष विजयी होता है वह अपना
शासन आवश्यक रूप से, उस भय के जरिये स्थापित करता है, जिसे उसके
हथियार प्रतिक्रियावादियों में उत्पन्न करते हैं। यदि पेरिस के कम्यून ने बुर्जुआ वर्ग
के ख़िलाफ़ हथियारबन्द जनता पर भरोसा नहीं किया होता, तो क्या वह
अपनेआप को चौबीस घण्टे से भी अधिक क़ायम रख सका होता? इसके
विपरीत, क्या हमारी यह आलोचना जायज़ नहीं है कि कम्यून ने इस सत्ता का
बहुत ही कम इस्तेमाल किया?
– एफ. एंगेल्स ²
―――o―――
बुर्जुआ जनतन्त्र :
बुर्जुआ जनतन्त्र, सामन्तवाद की तुलना में, एक महान ऐतिहासिक प्रगति होने
के बावजूद, एक बहुत ही सीमित, बहुत ही पाखण्डपूर्ण संस्था, धनिकों के लिए
एक स्वर्ग और शोषितों एवं ग़रीबों के लिए एक जाल और छलावे के अलावा न
तो कुछ है, और न ही हो सकता है।
लेनिन (पृष्ठ 28)³
―――――――――――――――
- लेनिन, सर्वहारा क्रान्ति और ग़द्दार काउट्स्की से
- फ्रेडरिक एंगेल्स, सत्ता के बारे में से
- वही
608 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
<u>पृष्ठ 62 (59)</u>
श्रम का शोषण और राज्य :
“सिर्फ़ प्राचीन और सामन्ती ही नहीं, बल्कि आज का प्रतिनिधि राज्य भी पूँजी
द्वारा उजरती श्रम के शोषण का एक उपकरण ही है।”
– एंगेल्स¹
अधिनायकत्व :
“चूँकि राज्य सिर्फ़ एक अस्थायी संस्थाभर है जिसका उपयोग अपने शत्रुओं
का बलपूर्वक दमन करने के लिए क्रान्ति में किया जाता है, इसलिए जनता के
स्वतन्त्र राज्य की बात करना कोरी बकवास है, जब तक सर्वहारा वर्ग को राज्य की
आवश्यकता रहती है, तब तक इसकी आवश्यकता स्वतन्त्रता के हित में नहीं,
बल्कि अपने विरोधियों का दमन करने के लिए पड़ती है, और जैसे ही स्वतन्त्रता
की बात करना सम्भव हो जाता है, वैसे ही इसका अस्तित्व अपनेआप ख़त्म हो
जाता है।”
बेबेल को लिखे एंगेल्स के पत्र से, 28 मार्च, 1875²
अधीर आदर्शवादी :
अधीर आदर्शवादी के लिए – और बिना कुछ अधीरता के शायद ही आदमी
प्रभावी सिद्ध हो सके – यह लगभग तय बात है कि दुनिया को खुशहाल बनाने
की कोशिश में उसे अपने विरोधियों की घृणा का पात्र बनना होगा और निराश भी
होना पड़ सकता है।
– बर्ट्रेण्ड रसेल
<u>पृष्ठ 63 (60)</u>
नेता :
कार्लाइल³ लिखता है, “कोई भी समय बरबाद न हुआ होता”, यदि कोई
महान आदमी मिल जाता जो काफ़ी समझदार और नेक होता, जिसमें इतनी
- परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति से
- अगस्त बेबेल (1840-1913) – जर्मन तथा अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर आन्दोलन के एक
प्रसिद्ध नेता। 1867 से जर्मन मज़दूर संघों की लीग के नेता, पहले इण्टरनेशनल के सदस्य, 1867
से राइखस्टाग (जर्मन संसद) के सदस्य, जर्मन सामाजिक-जनवाद के संस्थापकों में से एक,
मार्क्स तथा एंगेल्स के मित्र तथा सहयोगी, दूसरे इण्टरनेशनल के प्रमुख नेता - टॉमस कार्लाइल (1795-1881) : ब्रिटिश लेखक व निबन्धकार
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 609
समझदारी होती कि वह सही-सही जान ले कि वक़्त का तक़ाज़ा क्या है; जिसमें
इतना पराक्रम होता कि वक़्त के लिहाज़ से सही रास्ते पर नेतृत्व कर सकता, तब
तो इनकी बदौलत कोई भी समय मुक्ति का समय हो सकता था।
स्वेच्छाचारिता :
काउत्स्की ने “प्रोलितारियत डिक्टेटरशिप” शीर्षक से एक पुस्तिका लिखी,
जिसमें उसने बोल्शेविकों द्वारा बुर्जुआ वर्ग के लोगों को वोट देने के अधिकार से
वंचित किये जाने की निन्दा की। इस पर लेनिन ने अपनी “प्रोलितारियन
रिवोल्यूशन” : (पृष्ठ 77) में लिखा :
“स्वेच्छाचारिता! ज़रा सोचें तो कि इस खेद प्रकाश में कमीनेपन के किस
निकृष्ट स्तर पर उतरकर बुर्जुआ वर्ग की चापलूसी की गयी है, और कितना अधिक
मूर्खतापूर्ण पाण्डित्य बघारा गया है। जबकि सदियों से, मज़दूरों का दमन करने के
लिए, ग़रीब लोगों के हाथ-पाँव बाँधे रखने के लिए, और जनता के सीधे-सादे और
मेहनतकश समुदायों के रास्ते में एक सौ एक अड़ंगे और अड़चनें खड़े करते रहने
के लिए, पूरी तरह से बुर्जुआ, और उसमें भी पूँजीवादी देशों के प्रतिक्रियावादी
विधिवेत्ता ही नियम-विधान बनाते आये हैं, और वे ही विविध संहिताओं और
क़ानूनों पर सैकड़ों ग्रन्थ और उनकी व्याख्याएँ लिखते आये हैं – जहाँ इतना
सब किया गया है, वहाँ बुर्जुआ उदारपन्थियों और श्री काउत्स्की को कोई
“स्वेच्छाचारिता” नहीं दिखायी देती! तब तो यह सब क़ानून-व्यवस्था है! यह सब
इसलिए सोचा और लिखा गया है कि कैसे ग़रीबों को दबाये रखकर निचोड़ते रहा
जाये। हज़ारों-हज़ार बुर्जुआ वकील और सरकारी अहलकार क़ानूनों की ऐसी
व्याख्या करते रहते हैं कि मज़दूर और औसत किसान उनकी कँटीले तारों की
घेरेबन्दी को कभी तोड़ न सकें। बेशक, यह कोई स्वेच्छाचारिता नहीं है। बेशक,
यह उन गन्दे या मुनाफ़ाखोर शोषकों का अधिनायकत्व नहीं है जो जनता का ख़ून
पी रहे हैं। ओह, यह ऐसा कुछ भी नहीं है! यह तो ‘शुद्ध जनतन्त्र’ है, जो
दिन-प्रतिदिन शुद्धतर होता जा रहा है। [पृष्ठ 64 (61) पर जारी] लेकिन जब,
साम्राज्यवादी युद्ध द्वारा सरहद पार के अपने भाइयों से अलग कर दिये गये
मेहनतकश और शोषित जनसमुदायों ने इतिहास में पहली बार अपनी सोवियतें गठित
कर ली हैं, जब उन्होंने राजनीतिक निर्माण के लिए मज़दूरों का और उन वर्गों का
आह्वान किया है जिन्हें बुर्जुआ वर्ग उत्पीड़ित और जड़ बनाये रखता था, और जब
से वे एक नया सर्वहारा राज्य निर्मित करने के काम में लग गये हैं, तथा विकट
रूप से जारी युद्ध के दौरान, गृहयुद्ध की ज्वाला में, जब वे ‘शोषकों से रहित राज्य’
के बुनियादी सिद्धान्त निरूपित करने लगे, तब बुर्जुआ वर्ग के सभी पाजी तत्त्व, और
610 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
खून चूसने वालों के सभी गिरोह काउत्स्की के सुर में सुर मिलाकर, स्वेच्छाचारिता
की चीख़-पुकार मचाने लगे हैं!
(लेनिन) पृष्ठ 77-78¹
पार्टी :
लेकिन यह स्पष्ट हो चुका है कि जब तक क्रान्ति का नेतृत्व करने के लिए
एक सक्षम पार्टी न हो, तब तक कोई क्रान्ति सम्भव नहीं हो सकती।
(पृष्ठ 15, लेसंस ऑफ़ अक्टूबर, 1917)²
सर्वहारा क्रान्ति के लिए पार्टी एक अपरिहार्य उपकरण है।
(पृष्ठ 17, वही, त्रात्स्की कृत)
पृष्ठ 65 (62)
[हस्ताक्षर: BK Dutt, दिनांक: 12/7/30, 12/7/30]³
उसके (मेहनतकश, आदमी के) लिए क़ानून, नैतिकता, धर्म ये सब उसके
(सर्वहारा के) लिए नाना बुर्जुआ पूर्वाग्रह मात्र हैं, जिनकी आड़ में इतने ही बुर्जुआ
स्वार्थ घात लगाये रहते हैं।
कार्ल मार्क्स – घोषणापत्र ⁴
- लेनिन, सर्वहारा क्रान्ति और ग़द्दार काउत्स्की
- लिओन त्रात्स्की की किताब, लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
- पृष्ठ का ऊपरी लगभग दो-तिहाई भाग ख़ाली है। इसमें सिर्फ़ बी.के. दत्त (बटुकेश्वर
दत्त) का तिरछा हस्ताक्षर है। और दिनांक 12.7.30 दो बार अंकित है। - मार्क्स-एंगेल्स, कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 611
पृष्ठ 67 (64)
BK Dutta
12th July '30
⎧ Autograph
⎪ of Mr. BK Dutta
⎪ taken on 12th July '30
⎨ in Cell No: 137
⎪ Central Jail Lahore
⎪ four days before his final
⎩ departure from this jail.
Bhagat Singh
नोटबुक में पृष्ठ 66 (63) नहीं है। इस पृष्ठ, यानी नोटबुक पृष्ठ 67 (64) पर, मध्य में,
बी.के. दत्त का तारीख़ (12.7.1930) सहित हस्ताक्षर है।
इसके नीचे भगतसिंह की लिखावट में पृष्ठ पर नीचे, दायीं तरफ़ यह टिप्पणी अंकित है :
श्री बी.के. दत्त का इस जेल से फ़ाइनल
डिपार्चर से चार दिन पहले कोठरी न. 137,
सेण्ट्रल जेल लाहौर, में 12वीं जुलाई '30
को लिया गया आटोग्राफ़,
इसके नीचे भगतसिंह के हस्ताक्षर हैं। इन प्रविष्टियों के अलावा नोटबुक में और किसी
प्रविष्टि में तारीख़ नहीं है।
नोटबुक में पृष्ठ 68 (65) नहीं है।
612 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 69 (66)
कम्युनिस्टों का लक्ष्य
“कम्युनिस्ट अपने दृष्टिकोण और लक्ष्य छिपाने से घृणा करते हैं। वे खुले तौर
पर एलान करते हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ़ समस्त मौजूदा सामाजिक दशाओं को
बलपूर्वक उखाड़ फेंकने के द्वारा ही हासिल हो सकता है। शासक वर्गों को
कम्युनिस्ट क्रान्ति के भय से कांपने दो। सर्वहाराओं के पास अपनी बेड़ियों के
सिवाय खोने के लिए कुछ नहीं है। जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है।
दुनिया के मज़दूरो, एक हो!¹
───o───
कम्युनिस्ट क्रान्ति का लक्ष्य
“हम ऊपर देख चुके हैं, कि मज़दूर वर्ग की क्रान्ति में पहला क़दम, सर्वहारा
वर्ग को उठाकर शासक वर्ग की स्थिति में लाना है, जनवाद की लड़ाई को जीतना
है। सर्वहारा अपने राजनीतिक प्रभुत्व का प्रयोग बुर्जुआ वर्ग से धीरे-धीरे करके सारी
पूँजी छीनने, उत्पादन के सभी उपकरणों को राज्य के, अर्थात शासक वर्ग के रूप
में संगठित सर्वहारा वर्ग के हाथों में केन्द्रीकृत करने तथा उत्पादक शक्तियों की
समग्रता में यथाशीघ्र वृद्धि करने के लिए करेगा।”
“कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो”²
पृष्ठ 70 (67)
कार्ल मार्क्स की ग़लतियाँ निकालना :
...और यह निश्चित मालूम पड़ता है कि त्रात्स्की मानो उससे सम्बन्धित थे
जिसे जर्मन “असली राजनीति” का स्कूल कहा करते थे, और किसी भी
विचारधारा के प्रति एकदम उतना ही मासूम थे जितना कि बिस्मार्क। और,
इसीलिए, यह देखकर कुतूहल होता है कि त्रात्स्की भी इतने क्रान्तिकारी नहीं हैं
कि कह सकें कि मार्क्स ने एक ग़लती की थी; बल्कि वह एक या अधिक पृष्ठ
अर्थनिरूपण के काम में – अर्थात यह सिद्ध करने में लगाना ज़रूरी समझते हैं कि
पवित्र पुस्तकों में जो कुछ कहा गया है, उसका अर्थ उससे एकदम भिन्न है।
त्रात्स्की कृत ‘लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917’ की भूमिका
भूमिका ए. सूसन लॉरेंस द्वारा लिखित
- कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र का आख़िरी पैरा
- कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 613
जनता की आवाज़ :
हमें जितनी सरकारों के बारे में जानकारी है, वे सबके सब मुख्य रूप से,
जनता के प्रति उदासीन रहकर ही शासन करती रही हैं, वे हमेशा ही देश के
राजनीतिक रूप से सचेत इस या उस तबके की, अल्पसंख्यक सरकारें ही रही हैं।
लेकिन जब यह दैत्य (यानी जनता – स.) जाग जायेगा, तो उसी की मर्ज़ी लागू
होगी, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि यह समय से जागेगा या नहीं।
भूमिका$^1$
पृष्ठ 71 (68)
लेनिन ने जुलाई, 1917 में लिखा, “यह अक्सर होता है कि जब घटनाएँ
अचानक मोड़ ले लेती हैं, तो एक अग्रणी पार्टी भी कुछ समय तक के लिए इस
नयी परिस्थिति के साथ अपनी सुसंगति नहीं बना पाती। वह वे ही पुराने जुमले
दोहराती रहती है, जो इस नयी परिस्थिति में अर्थहीन हो चुके होते हैं, तथा जिस
अनुपात में घटनाओं में 'अप्रत्याशित' परिवर्तन हो चुका होता है, उसी अनुपात में
उनकी अर्थवत्ता भी 'अप्रत्याशित रूप से' ख़त्म हो चुकी होती है।
लेसंस ऑफ़ अक्टूबर (पृष्ठ 17)$^2$
───o───
रणकौशल और रणनीति :
जैसे युद्ध में, वैसे ही राजनीति में भी, रणकौशल का अर्थ है अलग-अलग
कार्रवाई का संचालन करने की कला; रणनीति का अर्थ है विजय पाने की, अर्थात
सत्ता पर वास्तविक क़ब्ज़ा करने की कला।
(पृष्ठ 18)$^3$
───o───
प्रचार और कार्रवाई :
और जब सर्वहारा वर्ग की पार्टी तैयारी से, यानी प्रचार और संगठन एवं
आन्दोलन से, आगे बढ़कर सत्ता के लिए वास्तविक संघर्ष में उतरती है और बुर्जुआ
वर्ग के विरुद्ध एक वास्तविक जन-विद्रोह को अंजाम देने लगती है, तब एक
अत्यन्त अचानक बदलाव घटित होता है। ऐसे में पार्टी के भीतर ऐसे तत्त्व जो
दृढ़संकल्प नहीं रखते, या संदेहशील, या समझौतावादी, या कायर होते हैं – वे
──────────────────────────
- वही
- और 3. 1926 में प्रकाशित त्रात्स्की की पुस्तक लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
614 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
जेल नोटबुक, सुखदेव-राजगुरु के पत्र, अन्तिम इच्छा-पत्र व सम्पूर्ण उपसंहार
जन-विद्रोह का विरोध करने लगते हैं, अपने विरोध को उचित ठहराने के लिए
सैद्धान्तिक दलीलें खोजने लगते हैं, और उन्हें ये दलीलें, अपने कल के विरोधियों
के बीच, एकदम पके-पकाये तौर पर, मिल भी जाती हैं।
त्रात्स्की 19¹
पृष्ठ 72 (69)
“अब ज़रूरत इस बात कि है कि हम अपनेआप को पुराने फ़ार्मूलों से नहीं,
बल्कि नयी वास्तविकताओं से निर्देशित करें।”
लेनिन (पृष्ठ25)²
वह हमेशा ही भविष्य के लिए अतीत से लड़ते रहे।
पृष्ठ 41³
...लेकिन एक क्षण ऐसा आता है जब सोचने की यह आदत, कि दुश्मन
अधिक बलवान है, विजय के लिए मुख्य बाधा बन जाती है।
त्रात्स्की पृष्ठ 48⁴
...लेकिन ऐसी परिस्थितियों में हरेक पार्टी के पास अपना लेनिन तो होगा नहीं।
...महत्त्वपूर्ण क्षण को गँवा देने का क्या मतलब होता है?...
रणकौशलों की सारी कला इसी में है, कि जब परिस्थितियों का संयोग
सर्वाधिक अनुकूल हो तो उस क्षण के अनुरूप कार्रवाई की जाये...।
परिस्थितियों ने ऐसा ही संयोग उपस्थित किया था और लेनिन ने कहा था कि
संकट को किसी न किसी पक्ष में हल करना ज़रूरी है। लेनिन ने बार-बार कहा,
‘अभी या कभी नहीं’।
पृष्ठ 52⁵
पृष्ठ 73 (70)
एक क्रान्तिकारी पार्टी की ताक़त एक निश्चित सीमा तक बढ़ती है, लेकिन
उसके बाद इसका उल्टा भी हो सकता है...।⁶
“हिचकिचाना अपराध है”...अक्टूबर की शुरुआत में...(लेनिन ने)...लिखा,
1., 2., 3., 4. और 5. त्रात्स्की की किताब लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
6. आख़िरी शब्द मूल में अस्पष्ट; लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 615
“सोवियतों की कांग्रेस का इन्तज़ार करना औपचारिकताओं का एक बचकाना खेल
खेलना है, औपचारिकताओं के साथ एक अपमानजनक खेल खेलना है, यह क्रान्ति
के साथ विश्वासघात करना है।”
उपयुक्त क्षण :
राजनीति में समय एक महत्त्वपूर्ण कारक है, और युद्ध एवं क्रान्ति में तो यह
हज़ारों गुना अधिक महत्त्वपूर्ण है। चीजें जो आज की जा सकती हैं, कल नहीं की
जा सकतीं। हथियार लेकर उठ खड़े होना, दुश्मन को पराजित करना, सत्ता पर
क़ब्ज़ा करना, आज सम्भव हो सकता है, और कल असम्भव हो सकता है। लेकिन
आप कह सकते हैं कि सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का मतलब तो इतिहास की धारा
को बदल डालना होता है, और क्या यह सम्भव है कि एक ऐसी चीज़ महज 24
घण्टे की देरी पर निर्भर हो? हाँ, जब सशस्त्र जन-विद्रोह की घड़ी आ जाती है,
तब घटनाएँ राजनीति के लम्बे पैमानों से नहीं, बल्कि युद्ध के छोटे पैमानों से नापी
जाती हैं। इसमें कुछेक हफ़्ते, कुछेक दिन, या यहाँ तक कि कभी-कभी एक दिन
की देरी का मतलब क्रान्ति का परित्याग हो सकती है, घुटने टेक देना हो सकता
है।
राजनीतिक चालबाज़ी, ख़ासतौर से क्रान्ति में, हमेशा ख़तरनाक होती है। आप
दुश्मन को धोखा दे सकते हैं, लेकिन इससे आपके पीछे चलने वाले जनसमुदाय
दिग्भ्रमित हो सकते हैं।
पृष्ठ 74 (71)
हिचकिचाहट :
नेताओं की ओर से दिखायी जाने वाली, और उनके अनुयायियों द्वारा महसूस
की जाने वाली हिचकिचाहट राजनीति में आमतौर पर नुक़सानदेह साबित होती है,
और सशस्त्र जन-विद्रोह की स्थिति में तो यह एक घातक ख़तरा है।
युद्ध
...“युद्ध युद्ध है”, चाहे जो भी हो, इसमें कोई हिचकिचाहट या वक़्त की
बरबादी नहीं होनी चाहिए।¹
- उपरोक्त सभी उद्धरण सम्भवतः त्रात्स्की की किताब लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से हैं।
616 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अक्षम नेता :
...ऐसे नेताओं की दो क़िस्में हैं जो पार्टी को ऐसे वक़्त पीछे खींचने की रुझान
रखते हैं, जब उसे सबसे तेज़ गति से आगे बढ़ने की ज़रूरत होती है। एक क़िस्म
ऐसे नेताओं की है जिनकी प्रवृत्ति क्रान्ति के रास्ते में हमेशा ही बेपनाह कठिनाइयाँ
और बाधाएँ देखने की होती है, और जो उन्हें देखकर – सचेत या अचेतन तौर पर
– उनसे बचने की इच्छा रखते हैं। ये मार्क्सवाद को तोड़-मरोड़कर इस रूप में
व्याख्यायित करने लगते हैं कि क्रान्तिकारी कार्रवाई क्यों असम्भव है।
दूसरे क़िस्म के नेता महज सतही आन्दोलनकर्ताभर होते हैं। वे जब तक
बाधाओं से टकराकर अपना सिर नहीं फोड़ लेते, तब तक उन्हें कभी बाधाएँ नज़र
ही नहीं आतीं। वे समझते हैं कि बस भाषण झाड़ कर ही वास्तविक कठिनाइयों
से निजात पा लेंगे। वे प्रत्येक चीज़ को अति आशावाद के साथ देखते हैं, और जब
सचमुच कुछ करने को होता है, तब ठीक उसी वक़्त पाला बदल लेते हैं।
पृष्ठ 80¹
पृष्ठ सं. 75 से 100 नोटबुक की हमें उपलब्ध हुई प्रति में नहीं थे।
अगली पृष्ठ अं. 101 (74) है। – सम्पादक
<u>पृष्ठ 101 (74)</u>
समाजशास्त्र²
मूल्य :
“1 पाव मक्का = क/ लोहे की क़ीमत। यह समीकरण हमें क्या बताता है?
यह हमें बताता है कि दो भिन्न-भिन्न चीज़ों में – मक्का पावभर में और लोहे की
क क़ीमत में – समान गुणों वाली कोई चीज़ दोनों में उभयनिष्ठ रूप से मौजूद
है। अतः इन दो चीज़ों को अवश्य ही किसी ऐसी तीसरी चीज़ के बराबर होना
चाहिए, जो स्वयं न तो पहली चीज़ हो, और न ही दूसरी चीज़...। अब आइये हम
इन दोनों उत्पादों में से प्रत्येक के भीतर निहित इस तीसरी अवशिष्ट चीज़ पर विचार
करें, यह प्रत्येक उत्पाद में, एक ही अभौतिक यथार्थ के रूप में, एकसार मानवीय
श्रम, यानी उस श्रम शक्ति के महज एक जमाव के रूप में निहित है, जिसमें इससे
- सम्भवतः लेसंस ऑफ़ अक्टूबर 1917 से ही
- हाशिये पर नोट किया हुआ
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 617