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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

के लिए उकसाया? वे और हज़ारों लोग जो उनके साथ उठ खड़े हुए, बुरे आदमी
नहीं थे, भ्रष्ट नहीं थे, ख़ून के प्यासे नहीं थे, संगदिल नहीं थे, अपराधी नहीं थे,
और न ही स्वार्थी या पागल थे। तब वह क्या चीज़ थी जिसने इतने तीखे और गहरे
प्रतिवाद को उकसावा दिया...?
किसी ने भी इस सरल-सीधी बात पर गौर नहीं किया कि मनुष्य अपनेआप
को किसी विरोध के लिए बिना इस विश्वास के एकजुट नहीं करते कि कोई न
कोई चीज़ ऐसी है जिसका उन्हें विरोध करना है और कि किसी भी संगठित समाज
में व्यापक विरोध एक ऐसी चीज़ है जो गहरी छानबीन की दरकार रखती है।
– चार्ल्स एडवर्ड रसेल¹ (333)
<u>पृष्ठ 24 (21)</u>
क्रान्तिकारी की वसीयत
“मैं अपने दोस्तों से यह भी कहना चाहूँगा कि वे मेरे बारे में कम से कम चर्चा
करेंगे या बिल्कुल ही चर्चा नहीं करेंगे, क्योंकि जब आदमी की तारीफ़ होने लगती
है तो उसे इन्सान के बजाय देवप्रतिमा-सा बना दिया जाता है और यह मानवजाति
के भविष्य के लिए बहुत बुरी बात है...। सिर्फ़ कर्मों पर ही गौर करना चाहिए, उन्हीं
की तारीफ़ या निन्दा होनी चाहिए, चाहे वे किसी के द्वारा किये गये हों। अगर लोगों
को इनसे सार्वजनिक हित के लिए प्रेरणा मिलती दिखायी दे, तो वे इनकी तारीफ़
कर सकते हैं, लेकिन अगर ये सामान्य हित के लिए हानिकर लगें, तो वे इनकी
निन्दा भी कर सकते हैं, ताकि फिर इनकी पुनरावृत्ति न हो सके।
“मैं चाहूँगा कि किसी भी अवसर पर, मेरी क़ब्र के निकट या दूर, किसी भी
क़िस्म के राजनीतिक या धार्मिक प्रदर्शन न किये जायें, क्योंकि मैं समझता हूँ कि
मरे हुए के लिए ख़र्च किये जाने वाले समय का बेहतर इस्तेमाल उन लोगों की
जीवन-दशाओं को सुधारने में किया जा सकता है, जिनमें से बहुतों को इसकी
भारी आवश्यकता है।”
– फ़्रांसिस्को फेरेर² की वसीयत
स्पेनी शिक्षक (1859-1909), जिसे धर्म-पुरोहितों द्वारा बार्सिलोना दंगों के
बाद दुश्मनीवश एक षड्यन्त्र के तहत फाँसी दे दी गयी।

  1. चार्ल्स ई. रसेल (1860-1941) : मकरेकर्स नाम से प्रसिद्ध अमेरिकी लेखकों, पत्रकारों
    के समूह के प्रमुख सदस्य थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं में पूँजीवादी व्यवस्था की बुराइयों का
    भण्डाफोड़ किया।
  2. पूरा नाम फ्रांसिस्को फेरेर गुआर्दिया (1859-1909) : स्पेनी शिक्षाशास्त्री, जो बाद में
    समाजवादी बन गये; यद्यपि उन्होंने हिंसा का विरोध किया था, फिर भी उन पर मुक़दमा चलाया
    गया, और फाँसी दे दी गयी, जिसे बाद में चलकर “अदालती हत्या” नाम दिया गया।
    576 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

दान : “मेरे पीछे आओ”, ईसा मसीह ने धनी युवक को कहा।
लेकिन अपने व्यवसाय में लगे रहना और अपनी कुछ दौलत को
दान-कर्म में लगाना तुलनात्मक रूप से आसान था। परोपकार हरेक युग का चलन
रहा है। दान ग़रीबी के विद्रोही तेवर को नष्ट कर देता है। अतः परोपकारी धनी
आदमी अपने सरीखे दौलतमन्दों का ही हितैषी होता है, और उन्हीं की एहसानमन्दी
महसूस करता है; उसके लिए सभ्य समाज के सारे दरवाज़े खुले होते हैं। इसीलिए
उन्होंने (यानी ईसा मसीह ने – स.) भिक्षा-दान को सामाजिक काया के गहरे घावों
की मरहम-पट्टी के रूप में स्वीकार्यता देने से इन्कार कर दिया...। परोपकार को
न्याय के एक विकल्प के रूप में उन्होंने कतई तरजीह नहीं दी।
[पृष्ठ 25 (22) पर जारी]
दान दोहरा अभिशाप है – यह दाता को संगदिल और प्राप्तकर्ता को
नरमदिल बनाता है। यह ग़रीबों का शोषण से कहीं अधिक नुक़सान करता है,
क्योंकि यह उन्हें शोषित होने का इच्छुक बनाता है। यह दास भावना को जन्म
देता है, जो नैतिक आत्महत्या ही है। ईसा मसीह ने अथाह दौलत के लिए सिर्फ़
एक ही इजाज़त दी थी और वह यह थी कि उसे क्रान्तिकारी प्रचार के लिए
समर्पित कर दिया जाये, ताकि बाद में अथाह दौलत का जमा होना ही हमेशा के
लिए असम्भव हो जाये...।
– बक ह्वाइट, पादरी, जन्म 1870, यू.एस.ए. पृष्ठ(353)¹
मुक्ति-युद्ध
फ़ौजों की ताक़त एक दिखायी देने वाली चीज़ है
सुस्पष्ट, और देश काल में आबद्ध,
लेकिन कौन खोज सकता उस शक्ति की सीमाओं को
जिसे एक बहादुर जनता ही प्रकट कर सकती है
या चाहे तो, छिपा सकती है – मुक्ति-युद्ध में।
भड़क उठे न्यायसंगत प्रतिरोध का – कोई पाँव पीछा नहीं कर सकता,
कोई आँख नहीं देख सकती उस जानलेवा जगह को,
यह ताक़त चाहे तो उड़ान भरे पंख लगाकर
प्रचण्ड वायु की भाँति, या सोये मन्द वायु की भाँति
अपनी डरावनी गुफाओं में – साल दर साल
फैलाती मिट्टी से जन्मे इस विचार को – निकट और दूर,

  1. बक ह्वाइट (1874-1951) : अमेरिकी समाजवादी और लेखक
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 577

नहीं बाँध सकती कोई भी कला – इस सूक्ष्म ताक़त को
जो फूटती ज़मीन से जलधारा की भाँति,
और पा लेती हर कोने में एक होंठ
जो इसकी क़द्र करे।
– डब्ल्यू. वर्ड्सवर्थ $^1$
पृष्ठ 26 (23)
लाइट ब्रिगेड का धावा
आधा लीग आधा लीग,
आधा लीग और,
मौत की घाटी में
बढ़ चले छः सौ वीर।
‘बढ़े चलो लाइट ब्रिगेड!
भर लो बन्दूकें!’ वह बोला,
मौत की घाटी में
बढ़ चले छः सौ वीर।
‘बढ़े चलो लाइट ब्रिगेड!’
क्या कोई था घबराया?
नहीं, गोकि मालूम था सैनिकों को
किसी न कर दी थी भारी भूल,
उनका काम नहीं था उत्तर देना,
उनका काम नहीं था सवाल पूछना,
उन्हें था बस लड़ना और मर जाना
मौत की घाटी में
बढ़ चले छः सौ वीर।
तोपें उनके दायें बाजू,
तोपें उनके बायें बाजू,
तोपें उनके ठीक सामने,
दगतीं और गरजतीं,
गोलाबारी की आँधी में,
बढ़ चले निडर वे सीधे

  1. विलियम वर्ड्सवर्थ (1750-1850) : प्रसिद्ध अंग्रेज़ कवि, जो अपनी युवावस्था में रैडिकल और गणतन्त्र समर्थक रहे।
    578 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

मौत के जबड़ों के भीतर,
नर्क के मुँह के भीतर,
बढ़ चले छः सौ वीर।
चमकाते सब नंगी तलवारें,
हवा में जब उनको लहराते
काटते जाते तोपचियों को,
हमला करते सेना पर, जबकि
सारी दुनिया चकराती,
<u>पृष्ठ 27 (24)</u>
पिल पड़े तोप के धुएँ में
बढ़ चले तोड़कर मोर्चा
कज़्ज़ाक और रूसी सिपाही
खाकर तलवार की चोटें
छिन्न-भिन्न हो जाते।
तोपें उनके दायें बाजू,
तोपें उनके बायें बाजू,
तोपें उनके पीछे से,
दगतीं और गरजतीं,
गोलाबारी की आँधी में,
भले गिरे अश्व और नायक
फिर भी वे इतना अच्छा जूझे
कि होकर मौत के जबड़ों से
लौटे वे नर्क के मुँह से,
जो भी थे बचे रह गये
छः सौ में से बचे रह गये।
कब हो सकता धूमिल उनका यश?
अरे वह उनकी विकट चढ़ाई!
सारी दुनिया चकराती।
आदर, उस हमले को
आदर, लाइट ब्रिगेड को!
श्रेष्ठ छः सौ वीरों को।
— लॉर्ड टेनीसन¹


  1. लॉर्ड अल्फ्रेड टेनीसन (1809-1897) : प्रसिद्ध अंग्रेज़ राष्ट्रवादी कवि
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 579

دل دے تو اِس مزاج کا پروردگار دے
جو غم کی گھڑی کو بھی خوشی سے گزار دے +
سجا کر میّتِ امید ناکامی کے پھولوں سے
کسی ہمدرد نے رکھ دی مِرے ٹوٹے ہوئے دل میں +
چھیڑ نہ اے فرشتے تو ذکرِ غمِ جاناں
کیوں یاد دلاتے ہو بھولا ہوا افسانہ +
नोट : पृष्ठ 27 (24) के अन्त में ये तीन शे'र उर्दू में लिखे हुए हैं। ये किस शायर के हैं,
यह स्पष्ट नहीं है। नीचे ये शे'र देवनागरी में प्रस्तुत हैं :
दिल दे तू इस मिज़ाज का परवरदिगार दे
जो ग़म की घड़ी को भी खुशी से गुज़ार दे।
सज़ा कर मय्यत-ए-उम्मीद नाकामी के फूलों से
किसी हमदर्द ने रख दी मेरे टूटे हुए दिल में।
छेड़ ना ऐ फ़रिश्ते! तू ज़िक्रे ग़मे-जानाँ।
क्यों याद दिलाते हो भूला हुआ अफ़साना।
580 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पृष्ठ 28 (25 )
जन्मसिद्ध अधिकार :
हम बेटे हैं उन पितरों के जिन्होंने मात दी थी
तख़्तो-ताज और पुरोहितों¹ के अत्याचार को;
उन्होंने दी थी चुनौती मैदाने-जंग में और फाँसी के तख़्ते से
अपने जन्मसिद्ध अधिकार के लिए – हम भी यही करेंगे!
(टी. कैम्पबेल)²
———o———
लक्ष्य की महिमा :
अरे! बेकार की नफ़रत के लिए नहीं,
न सम्मान के लिए, न ही अपनी शाबासी के लिए
बल्कि लक्ष्य की महिमा के लिए,
किया जो तुमने, भुलाया नहीं जायेगा।
(आर्थर क्लॉग)³
———o———
आत्मा की अमरता :
यदि तुम्हें कभी एक ऐसा आदमी मिल जाये जो अमरता में विश्वास रखता
हो, तो बस समझ लो कि अब तुम्हारी कोई भी कामना शेष नहीं रह जायेगी; तुम
उसकी सारी की सारी चीज़ें ले सकते हो – अगर तुम चाहो तो जीते-जी उसकी
खाल उतार सकते हो – और वह इसे एकदम खुशी-खुशी उतार लेने देगा।
(अपटन सिंक्लेयर 403) सी.जी.
———o———
खुदाई अत्याचारी
एक अत्याचारी शासक के लिए ज़रूरी है कि वह ज़ाहिरा तौर पर धर्म में
असाधारण आस्था दिखाये। जनता एक ऐसे शासक के दुर्व्यवहार के प्रति कम सचेत

  1. अंग्रेज़ी में शब्द स्पष्ट नहीं
  2. टॉमस कैम्पबेल (1777-1844) : स्कॉट कवि के गीत मैन ऑफ़ इंग्लैण्ड की अन्तिम
    पंक्तियाँ। नोटबुक के पिछले संस्करणों में त्रुटिवश ‘टी’ को ‘जे’ पढ़ा जाने के कारण इनका
    परिचय आइरिश कवि जोज़ेफ़ कैम्पबेल के रूप में दिया गया था।
  3. आर्थर ह्यू क्लो (1819-61) : अंग्रेज़ कवि की कविता पेस्चिएरा की पंक्तियाँ। जिसमें
    इटली के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के दौरान पेस्चिएरा नामक स्थान पर 1848 में हुई लड़ाई
    का वर्णन है।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 581

होती है, जिसे वह ईश्वर से डरने वाला और पवित्र मानती है। दूसरे, वह आसानी
से उसके विरोध में भी नहीं जाती, क्योंकि उसे विश्वास रहता है कि देवता भी
शासक के साथ हैं।¹
पृष्ठ 29 (26)
सैनिक और चिन्तन :
“यदि मेरे सैनिक सोचना शुरू कर दें, तब तो उनमें से कोई भी सेना में नहीं
रहेगा।”
(फ़्रेडरिक महान²) 562
मरे जो सर्वश्रेष्ठ वीर :
मारे गये हैं सर्वश्रेष्ठ वीर। दफ़ना दिये गये वे
चुपचाप, एक निर्जन भूमि में,
कोई आँसू नहीं बहे उन पर
अजनबी हाथों ने उन्हें पहुँचा दिया क़ब्र में,
कोई सलीब नहीं, कोई घेरा नहीं, कोई समाधि-लेख नहीं
जो बता सके उनके गौरवशाली नाम।
घास उग रही है उन पर, एक दुर्बल पत्ती
झुकी हुई, जानती है इस रहस्य को,
बस एकमात्र साक्षी थीं उफनती लहरें,
जो प्रचण्ड आघात करती हैं तट पर,
लेकिन वे प्रचण्ड लहरें भी नहीं ले जा सकतीं
अलविदा के सन्देश
उनके सुदूर घर तक।
(वी.एन. फ़िग्नर)³
कारागार :
“तारे नहीं, देश नहीं, काल नहीं,
ठहराव नहीं, बदलाव नहीं, नेकी नहीं, बदी नहीं,

  1. अरस्तू, पॉलिटिक्स
  2. प्रशा का फ़्रेडरिक (1712-1786): प्रबुद्ध निरंकुश शासक के रूप में प्रसिद्ध
  3. वेरा निकोलायेव्ना फ़िग्नर (1852-1942) रूसी महिला क्रान्तिकारी और शहीद,
    ज़ारशाही के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करने वाली प्रथम रूसी महिलाओं में एक
    582 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

बल्कि ख़ामोशी, और एक निष्पन्द साँस
जो न जीवन की, न मृत्यु की।
(द प्रिज़न‍र ऑफ़ चिलोन)¹
पृष्ठ 30 (27)
आरोप-सिद्धि के बाद :
अपनी सज़ा सुन लेने के तुरन्त बाद के क्षणों में सज़ा के लिए अभिशप्त व्यक्ति
का दिमाग़ कई मायनों में उस आदमी के दिमाग़ जैसा हो जाता है जो मौत के कगार
पर झूल रहा होता है। चुपचाप, और मानो अन्तःप्रेरित होकर, अब वह उन सभी
चीज़ों से विरक्त हो जाता है जिन्हें उसे छोड़ जाना है, और वह, दृढ़भाव से, अपने
सामने देखता हुआ, उस सच्चाई के प्रति पूरी तरह सचेत हो जाता है, जो
अपरिहार्यतः घटित होने वाली होती है।
(वी.एन. फ़िग्नर)
क़ैदी :
“घुटन होती है इस नीची, गन्दी छत के नीचे;
निचुड़ती जा रही है मेरी ताक़त साल दर साल;
उत्पीड़ित करते हैं मुझे — यह पथरीला फ़र्श,
यह लौह-ज़ंजीरों से बँधी मेज
यह खाट, यह कुर्सी, बँधी हुई ज़ंजीर से
दीवारों के साथ, ताबूत के पटरों की भाँति,
इस चिरस्थायी, मूक, मुर्दा ख़ामोशी में
खुद को बस एक लाश ही समझा जा सकता है।”
“एन.ए. मोरोज़ोव” ²

  1. प्रसिद्ध अंग्रेज़ कवि लॉर्ड बायरन (1788-1824) की इस कविता में जेनेवा झील के पास
    चिलोन के क़िले में क़ैद एक देशभक्त फ्राँस्वा दि बोनिवार के जेल-जीवन का वर्णन किया
    गया है।
  2. निकोलाई अलेक्सान्द्र मोरोज़ोव (1854-1946) : रूसी क्रान्तिकारी, लेखक, कवि और
    वैज्ञानिक; 1880 में लन्दन में मार्क्स से मुलाक़ात और मेनिफ़ेस्टो ऑफ़ द कम्युनिस्ट पार्टी के
    रूसी में अनुवाद का जिम्मा, 1875 से 1878 तक, तथा 1881 से 1905 तक, क़रीब 25 वर्षों
    तक जेल की सज़ा के दौरान, रसायन विज्ञान, भौतिकी, गणित और खगोल विज्ञान पर 28
    पुस्तकों के अलावा कविताएँ और कहानियाँ भी लिखीं।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 583

नंगी दीवारें, जेल के ख़यालात,
कितने अँधियारे और उदास हो तुम,
कितना मुश्किल है कि बन्दी हो निष्क्रिय रहना
और देखना सपने आज़ादी के दिनों के।
(मोरोज़ोव)
———o———
تجھے ذبح کرنے کی خوشی اور مجھے مرنے کا شوق
میری بھی مرضی وہی جو میرے صیاد کی ہے۔ 1
पृष्ठ 31 (28)
“हर चीज़ यहाँ है कितनी ख़ामोश, बेजान, फीकी
वर्षों गुज़र जाते हैं यों ही, कुछ पता नहीं चलता,
हफ़्ते और दिन कटते हैं बड़ी मुश्किल से,
देता है सिर्फ़ बोरियत इनका यह सिलसिला।
(मोरोज़ोव)
———o———
लम्बी क़ैद से हमारे ख़्याल हो जाते हैं मनहूस;
भारीपन महसूस होता है हमारी हड्डियों में;
यन्त्रणा की पीड़ा से, लम्हे लगते हैं अन्तहीन
चार डग चौड़ी इस कोठरी में।
———o———
हमें जीना है पूरी तरह अपने हमसफ़र भाइयों के लिए,
हमें देना होगा अपना सर्वस्व उनके लिए,
और उन्हीं की ख़ातिर लड़ना होगा बदनसीबी के ख़िलाफ़!
... ... ...
(मोरोज़ोव)


  1. मूल में उर्दू में यह शे'र लिखा हुआ है :
    तुझे जबह करने की खुशी, मुझे मरने का शौक़,
    मेरी भी मर्ज़ी वही है, जो मेरे सैयाद की है।
    584 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

आये मुझे आज़ाद करने :
आखिर लोग आये मुझे आज़ाद करने;
मैंने न पूछा क्यों और न सोचा कहाँ,
मेरे लिए तो कुल मिलाकर एक ही था,
बँधे रहना या बन्धनमुक्त होना,
मैंने निराशा से प्यार करना सीख लिया था,
और इस तरह अन्ततः जब वे प्रकट हुए,
और उतार डाले मेरे सारे बन्धन
ये भारी दीवारें बन चुकी थीं मेरे लिए
एक संन्यास-आश्रम – पूरी तरह अपना।
(द प्रिज़नर ऑफ़ चिलोन)
पृष्ठ 32 (29)
“और हम सम्मानित किये गये हैं एक मिशन देकर!
हमने एक कठिन स्कूल पास किया, लेकिन हासिल कर लिया
ऊँचा ज्ञान।
निर्वासन, जेल, और मुश्किल दिनों की बदौलत
हम जान गये हैं और क़ीमत समझते हैं सच्चाई और आज़ादी की
दुनिया की।”
(प्रिज़नर ऑफ़ श्लुसेलबर्ग)¹
एक शिशु की मृत्यु और पीड़ा
‘एक बच्चा पैदा हुआ। उसने सचेत तौर पर न तो कोई बुरा काम किया, न
अच्छा काम किया। वह बीमार पड़ गया, वह लम्बे समय तक काफ़ी तकलीफ़
झेलता रहा, तब तक जब तक कि उस असह्य वेदना से मर नहीं गया। क्यों? क्या
वजह थी? दार्शनिक के लिए यह एक शाश्वत पहेली है।’²

  1. लेनिनग्राद क्षेत्र में स्थित श्लुसेलबर्ग क़स्बे के पास एक द्वीप पर पीटर महान की सेना
    द्वारा 1702 में बनाये गये क़िले को बाद में एक कारागार में बदल दिया गया था। इस कारागार
    में अनेक दिसम्बरवादी क्रान्तिकारी, अराजकतावादी बाकुनिन, पोलिश देशभक्त लुकासोविस्लाग,
    मार्शल दोलगोरुकी, और लेनिन के भाई अलेक्सान्द्र को क़ैद करके रखा गया था (लेनिन के
    भाई को यहीं फाँसी दी गयी)
  2. स्रोत अज्ञात
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 585

एक क्रान्तिकारी के दिमाग़ की बनावट :
“जो व्यक्ति कभी भी ईसा मसीह के जीवन से प्रभावित रहा है, जिन्होंने एक
आदर्श के नाम पर पीड़ा, अपमान और मृत्यु का वरण किया; जिसने उन्हें कभी
एक आदर्श तथा उनके जीवन को अनासक्त प्रेम की प्रतिमूर्ति माना है – वही उस
क्रान्तिकारी के दिमाग़ की बनावट को समझ सकता है जिसे सज़ा दी गयी है, और
जनता की आज़ादी के लिए काम करने के जुर्म में जीवित ही मक़बरे में डाल दिया
गया है।” (वेरा एन. फ़िग्नर)
अधिकार :
अधिकार माँगो नहीं। बढ़कर ले लो। और उन्हें किसी को भी तुम्हें देने मत
दो। यदि मुफ़्त में तुम्हें कोई अधिकार दिया जाता है तो समझो कि उसमें कोई न
कोई राज़ ज़रूर है। ज़्यादा सम्भावना यही है कि किसी ग़लत बात को उलट दिया
गया है।¹
<u>पृष्ठ 33 (30)</u>
कोई दुश्मन नहीं?
तुम कहते हो, तुम्हारा कोई दुश्मन नहीं?
अफ़सोस! मेरे दोस्त, इस शेख़ी में दम नहीं,
जो शामिल होता है फ़र्ज़ की लड़ाई में,
जिसे बहादुर लड़ते ही हैं
उसके दुश्मन होते ही हैं। अगर नहीं हैं तुम्हारे
तो वह काम ही तुच्छ है जो तुमने किया है।
तुमने किसी गद्दार के कूल्हे पर वार नहीं किया है,
तुमने झूठी क़समें खाने वाले होंठ से प्याला नहीं छीना है,
तुमने कभी किसी ग़लती को ठीक नहीं किया है,
तुम कायर ही बने रहे लड़ाई में।
(चार्ल्स मैके, 747)²
बाल-श्रम :
गौरैये का बच्चा गौरैये को दाना नहीं चुगाता,

  1. रोजर एन. बाल्डविन : अमेरिकन सिविल लिबर्टी यूनियन के निदेशक रहे। फ्री स्पीच
    फ़ाइट ऑफ़ द आई. डब्ल्यू. डब्ल्यू. (इण्डस्ट्रियल वर्कर्स ऑफ़ द वर्ल्ड) से
  2. चार्ल्स मैके (1814-1889) : स्कॉट कवि, पत्रकार और गीतकार
    586 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

चूज़ा मुर्ग़ी को चुग्गा नहीं कराता,
बिल्ली का बच्चा बिल्ली के लिए चूहे नहीं मारता –
यह महानता तो सिर्फ़ मनुष्य को नसीब है।
हम सबसे बुद्धिमान, सबसे बलवान नस्ल हैं –
हम क़ाबिले तारीफ़ हैं।
एकमात्र ज़िन्दा प्राणी
जो जीता है अपने बच्चों की मेहनत पर।
(शार्लोट पर्किन्स गिलमैन)¹
पृष्ठ 34 (31)
कोई वर्ग नहीं! कोई समझौता नहीं!!
(जॉर्ज डी. हेरसन)
समाजवादी आन्दोलन के दौरान एक ऐसा वक़्त आ रहा है, और सम्भव है,
वह वक़्त आ चुका है, जब सुधरी हुई दशाएँ या समायोजित उजरतें मज़दूरों की माँग
का जवाब नहीं रह जायेंगी, और तब ये चीज़ें सामान्य बुद्धि के लिए एक अपमान
के अलावा और कुछ नहीं सिद्ध होंगी। आज दुनियाभर में जो समाजवादी आन्दोलन
चल रहा है वह बेहतर उजरतों, सुधरी हुई पूँजीवादी दशाओं या पूँजीवादी मुनाफ़े
में हिस्सा बँटाने के लिए नहीं चल रहा है; यह चल रहा है उजरतों और मुनाफ़ों
के ख़ात्मे के लिए, और पूँजीवाद एवं निजी पूँजीपतियों की समाप्ति के लिए। सुधरी
हुई राजनीतिक संस्थाएँ, पूँजी और श्रम के बीच समझौता कराने वाली परिषदें,
परोपकार और विशेषाधिकार जो पूँजीपतियों की ख़ैरातों के अलावा और कुछ नहीं
हैं – इनमें से कोई भी चीज़ उस सवाल का जवाब नहीं दे सकती जो मन्दिरों,
सत्ता के सिंहासनों और संसदों को कँपकँपा रहा है। जो लोग दबे-कुचले हैं और
जो लोग उनकी पीठ पर सवार होकर आगे बढ़े हुए हैं, अब इन दोनों के बीच कोई
अमन-चैन नहीं रह सकता। अब वर्गों के बीच कोई मेल-मिलाप नहीं हो सकता;
अब तो वर्गों का सिर्फ़ अन्त ही हो सकता है। जब तक पहले न्याय न हो, तब
तक सद्भावना की बात करना अनर्गल प्रलाप है, और जब तक इस दुनिया का
निर्माण करने वालों का अपनी मेहनत पर अधिकार न हो, तब तक न्याय की बात
करना बेकार है। दुनिया के मज़दूरों की माँग का जवाब उनकी मेहनत की समूची
कमाई के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। (जॉर्ज डी. हेरसन)²

  1. शार्लोट पर्किन्स गिलमैन (1860-1935) : अमेरिकी उपन्यासकार, कहानीकार और
    समाज सुधारक की कविता जिसे 1920 के दशक में अमेरिका में बालश्रम क़ानून में संशोधन
    पर चली बहस में एक सांसद द्वारा उद्धृत किया गया।
  2. सम्भवतः जॉर्ज डेविस हैरोन (1862-1925), जो एक ज़माने में क्रिश्चियन सोशलिस्ट
    पादरी थे और अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य भी रहे।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 587

पृष्ठ 35 (32)
पूँजीवाद की बर्बादियाँ¹
ऑस्ट्रेलिया के बारे में आर्थिक अनुमान, थिओडोर हर्ट्ज़का² (1886) द्वारा :
प्रत्येक परिवार = 40 वर्ग फुट में 5 कमरों वाला मकान 50 वर्षों तक चलने
लायक।³
मज़दूरों की काम करने की उम्र = 16-50 (वर्ष – स.)
इस प्रकार हमारे पास हैं 5,000,000 (मज़दूर – स.)
615,000 मज़दूरों का श्रम = श्रम का 12.3 प्रतिशत 22,000,000 लोगों का
भोजन पैदा करने के लिए पर्याप्त है।
यातायात-परिवहन की श्रम लागत समेत, विलासिताओं हेतु सिर्फ़ 315,000
= 6.33 प्रतिशत मज़दूरों के श्रम की आवश्यकता पड़ती है।
इसका मतलब यह हुआ कि उपलब्ध श्रम का 20 प्रतिशत ही समूचे महाद्वीप
के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त है। शेष 80 प्रतिशत समाज की पूँजीवादी व्यवस्था
के कारण शोषित और बरबाद हो जाता है।
पृष्ठ 36 (33)
ज़ारशाही शासन और बोल्शेविक शासन
ब्रैज़ियर हण्ट⁴ का कहना है कि बोल्शेविकों ने अपने शासन के पहले चौदह
महीनों में, 4500 लोगों को मौत की सज़ा दी जिनमें से ज़्यादातर का जुर्म चोरी और
सट्टेबाज़ी था।
1905 की क्रान्ति के बाद, ज़ार के मन्त्री, स्तोलीपिन⁵ ने, बारह महीनों के
भीतर 32,773 लोगों को मौत की सज़ा दी थी।
*(पृष्ठ 390 ब्रास चेक)*⁶

  1. यह शीर्षक बड़े अक्षरों में लिखा हुआ है
  2. थियोडोर हर्ट्ज़का (1845-1924) : हंगारी-ऑस्ट्रियाई अर्थशास्त्री और पत्रकार। फ़्री
    लैण्ड : सोशल एण्टिसिपेशन के लेखक
  3. मकान के क्षेत्रफल में कुछ गड़बड़ है, आँकड़े स्पष्ट नहीं
  4. अमेरिकी पत्रकार
  5. प्योत्र अर्कादिएविच स्तोलीपिन (1862-1911) : 1906 से 1911 तक ज़ार की
    मन्त्रिपरिषद का अध्यक्ष और गृहमन्त्री
  6. अप्टन सिंक्लेयर की पुस्तक जिसे बुर्जुआ पत्रकारिता की बखिया उधेड़ने वाली पहली
    पुस्तक माना जाता है।
    588 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पृष्ठ 37 (34)
सामाजिक संस्थाओं का स्थायित्व
प्रत्येक पीढ़ी के भ्रमों में से एक भ्रम यह है कि वह जिन सामाजिक संस्थाओं
के तहत जी रही होती है वे, कुछ ख़ास अर्थ में, "प्राकृतिक", अपरिवर्तनीय और
स्थायी हैं। फिर भी, अनगिनत हज़ार वर्षों से, सामाजिक संस्थाएँ उत्तरोत्तर पैदा होती
रही हैं, विकास करती रही हैं, पतनशील होती रही हैं और समसामयिक
आवश्यकताओं के अनुरूप दूसरी बेहतर संस्थाओं द्वारा क्रमशः विस्थापित की जाती
रही हैं...। तब, सवाल यह नहीं है कि हमारी वर्तमान सभ्यता बदलेगी या नहीं,
बल्कि यह है कि वह कैसे बदलेगी?
यह, सुविचारित अनुकूलन के जरिये, क्रमशः और चुपचाप एक नया रूप ले
सकती है। या, यदि अनुकूलन के बजाय कोई उग्र प्रतिरोध उठ खड़ा होता है, तो
यह धमाके के साथ ध्वस्त हो सकती है, और मानवजाति को सामाजिक अराजकता
और अव्यवस्था की अवस्था के निचले स्तर से एक नयी सभ्यता के निर्माण का
कष्टसाध्य कार्यभार सौंप सकती है, जिसमें पिछली व्यवस्था की सिर्फ़ बुराइयाँ ही
नहीं, बल्कि उसकी भौतिक, बौद्धिक और नैतिक उपलब्धियाँ भी नहीं रहेंगी।
– पी.आई. डिके ऑफ़ कैप. सिविलाइज़ेशन¹
पृष्ठ 38 (35)
पूँजीवाद और वाणिज्यवाद :
जापानी छात्रों की एक सभा में रवीन्द्रनाथ² का भाषण :
जापान में आपका अपना उद्योग था; वह कितने कर्तव्यनिष्ठ भाव से ईमानदार
और सच्चा था, इसे आप इसके उत्पादों से – उनकी स्तरीयता और तादाद से,
छोटी-छोटी चीज़ों के प्रति उनके ध्यान देने से जान सकते हैं, जिन पर शायद ही
कोई टीका-टिप्पणी की जा सके। परन्तु आपकी भूमि पर झूठ की एक लहर दुनिया
के उस भाग से बहकर आ चुकी है जहाँ व्यापार सिर्फ़ व्यापार है और ईमानदारी
को सिर्फ़ सबसे अच्छी नीति माना जाता है। क्या आपको कभी शर्म नहीं महसूस
होती, जब आप उन व्यापारिक विज्ञापनों को देखते हैं, जो सिर्फ़ समूचे शहरी क्षेत्र

  1. सम्भवतः प्युट्रिफ़ैक्शन एण्ड इण्टर्नल डिके ऑफ़ कैपिटलिस्ट सिविलाइज़ेशन – पर
    ठीक-ठीक स्रोत एवं सन्दर्भ का पता नहीं।
  2. रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941) भाषण का स्थान, समय तथा अन्य ब्योरे उपलब्ध
    नहीं हैं।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 589

को ही झूठ और अतिशयोक्तियों से नहीं पाट रहे हैं, बल्कि उन हरित क्षेत्रों पर भी
धावा बोलते जा रहे हैं, जहाँ किसान ईमानदारी से मेहनत करते हैं, और उन
पर्वत-शिखरों को भी अपने हमले का निशाना बनाते जा रहे हैं, जो भोर के प्रथम
निर्मल प्रकाश का स्वागत करते हैं?...। अपनी भद्दी सजावटों की बर्बरता के साथ
यह वाणिज्यवाद समूची मानवता के लिए एक भयानक महाविपदा है, क्योंकि यह
प्रवीणता के ऊपर ताक़त के आदर्श का आरोपण कर रहा है। यह अपनी नग्न बेशर्मी
के साथ अपने में ही मगन रहने के चलन को गौरवान्वित कर रहा है। इसकी हरकतें
हिंसक हैं, और इसका शोर-शराबा बेसुरा और कर्कश है। यह अपने ही सर्वनाश
की ओर बढ़ रहा है, क्योंकि यह उसी मानवता को कुचल कर विकृत कर रहा
है...जिस पर यह स्वयं खड़ा है। [पृष्ठ 39 (36) पर जारी] यह आनन्द की क़ीमत
पर धन पैदा करने की कड़ी मशक्कत में लगा हुआ है...। यूरोप की वर्तमान सभ्यता
की मुख्य महत्त्वाकांक्षा यही है कि शैतान पर उसी का एकछत्र अधिकार हो।
पूँजीवादी समाज
“राजनीतिक अर्थशास्त्र की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि हर कोई यथासम्भव
कम से कम त्याग करके व्यक्तिगत सम्पदा प्राप्त कर लेना चाहता है।”
“नासाउ सीनियर”¹
पृष्ठ 40 (37)
धर्म के बारे में कार्ल मार्क्स का दृष्टिकोण
मनुष्य धर्म को बनाता है; धर्म मनुष्य को नहीं बनाता। धर्म वास्तव में, मनुष्य
की ही आत्मचेतना और आत्मभावना है, जिसने या तो अभी तक अपनेआप को पाया
नहीं है, या (यदि अपनेआप को पाया भी है तो) अपनेआप को फिर से खो दिया
है। लेकिन आदमी कोई ऐसी अमूर्त सत्ता नहीं है जो दुनिया से बाहर कहीं पालथी
मारे बैठी हुई हो। मनुष्य की दुनिया मनुष्यों, राज्य, समाज की दुनिया है। यह राज्य,
यह समाज धर्म पैदा करता है, एक उल्टी विश्व चेतना पैदा करता है, क्योंकि ये
खुद एक उल्टी दुनिया है। धर्म इसी दुनिया का एक सामान्यीकृत सिद्धान्त है,
इसका विश्वकोशीय सार-संग्रह है, एक लोकप्रिय रूप में इसका तर्क है...। इसलिए
धर्म के विरुद्ध संघर्ष उस दुनिया के विरुद्ध एक प्रत्यक्ष अभियान है जिसकी
आत्मिक सुगन्ध धर्म है। [पृष्ठ 41 (38) पर जारी]

  1. नासाउ विलियम सीनियर (1790-1864) : अंग्रेज़ अर्थशास्त्री
    590 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है, एक हृदयहीन दुनिया का अहसास है, ठीक
वैसे ही जैसेकि यह आत्महीन दशाओं की आत्मा है। यह जनता के लिए अफ़ीम
है।
लोग वास्तव में तब तक सुखी नहीं हो सकते जब तक कि वे धर्म का उन्मूलन
कर, इसके मिथ्या सुख से निजात नहीं पा लेते। यह अपेक्षा कि लोग इस मरीचिका
से अपनेआप को स्वयं अपनी ही दशा की ख़ातिर मुक्त करें, यह अपेक्षा है कि वे
उस दशा का ही त्याग करें जिसे इस मरीचिका की ज़रूरत होती है।
आलोचना का हथियार हथियारों की आलोचना का स्थान नहीं ले सकता।
भौतिक शक्तियों को निश्चित रूप से भौतिक शक्तियों द्वारा ही उखाड़ फेंका जाना
चाहिए; लेकिन सिद्धान्त भी जब जनसमुदायों में रच-बस जाता है, तो एक भौतिक
शक्ति बन जाता है।¹
<u>पृष्ठ 42 (39)</u>
क्रान्ति यूटोपियाई नहीं
एक आमूल परिवर्तनवादी क्रान्ति, यानी मानवजाति की आम मुक्ति, जर्मनी के
लिए कोई यूटोपियाई स्वप्न नहीं है; यूटोपियाई तो एक आंशिक, एक विशुद्ध
राजनीतिक क्रान्ति की धारणा होती है, जो (पूँजीवादी व्यवस्था की – स.) इमारत
के खम्भों को खड़ा छोड़ देगी।²
“महान इसलिए महान हैं क्योंकि
हम घुटनों पर हैं
आओ उठ खड़े हों!”³
<u>पृष्ठ 43 (40)</u>
राज्य के बारे में हर्बर्ट स्पेंसर⁴ का दृष्टिकोण :
“भले ही यह सच हो या न हो कि मनुष्य निष्कलंक पैदा हुआ और पाप में
सन गया, लेकिन यह निश्चित रूप से सच है कि सरकार का जन्म आक्रामकता
से और आक्रामकता के द्वारा हुआ।”

  1. कार्ल मार्क्स, हेगेल के न्याय-दर्शन की समालोचना का प्रयास से उद्धृत
  2. वही
  3. मूल में ये पंक्तियाँ पृष्ठ पर तिरछे लिखी हुई हैं
  4. हर्बर्ट स्पेंसर (1820-1903) : अंग्रेज़ दार्शनिक; महत्त्वपूर्ण कृतियाँ : द प्रिंसिपल्स ऑफ़
    साइकोलाजी और फ़र्स्ट प्रिंसिपल्स
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 591

मनुष्य और मनुष्यजाति :
“मैं एक मनुष्य हूँ,
और उन सभी चीज़ों से मेरा सरोकार है जो मनुष्य-जाति को प्रभावित करती
हैं।”
“रोमन नाटककार”¹
इंग्लैण्ड की स्थिति की समीक्षा :
“अच्छे लोगो, इंग्लैण्ड में स्थितियाँ तब तक अच्छी नहीं हो सकतीं, जब तक
अच्छाइयाँ आम नहीं हो जातीं, और जब तक सज्जन लोगों के साथ दुर्जन लोग भी
बने रहते हैं। वे जिन्हें हम लॉर्ड कहते हैं, किस अधिकार से हमसे महान हैं? किस
आधार पर वे इसके क़ाबिल बने हुए हैं? वे क्यों हमें भू-दास बनाये हुए हैं? अगर
हम सभी एक ही बाप और माँ, आदम और हव्वा की सन्तानें हैं, तो वे यह कैसे
कहते या साबित करते हैं कि वे हमसे महान या बेहतर हैं? अगर वे अपने फ़ायदे
के लिए हमसे मेहनत नहीं करवाते तो वे अपनी शान-शौक़त में क्या ख़र्च करते?
वे खुद तो मख़मल पहनते हैं और अपनेआप को फ़रकोटों और शाही लबादों से गर्म
रखते हैं, जबकि हम चिथड़े लपेटे रहते हैं। उनके पास तो शराब, लज़ीज़ खाना और
डबलरोटी है, और हमारे पास जई की लिट्टी, घासपात और पानी। उनके पास
फुरसत ही फुरसत है और बढ़िया घर भी, और हमारे पास है तकलीफ़ और मेहनत,
खेतों में बारिश और आँधी; फिर भी यह हमारी मेहनत ही है जिसके बूते पर वे
राज कर रहे हैं।
फ्ऱायर ऑफ़ वॉट टाइलर्स रिबेल²
पृष्ठ 44 (41)
क्रान्ति और वर्ग
सारे के सारे वर्ग सत्ता पाने की कोशिश में क्रान्तिकारी ही होते हैं, और समानता
की बातें करते हैं। और सारे के सारे वर्ग जब सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो
संकीर्णतावादी हो जाते हैं और मान लेते हैं कि समानता सिर्फ़ एक रंगीन सपनाभर
है। सारे के सारे वर्ग, सिर्फ़ एक को – मज़दूर वर्ग को छोड़कर, क्योंकि जैसाकि

  1. अज्ञात
  2. कुछ शब्द स्पष्ट नहीं; आगे पन्ना फटा हुआ; उपरोक्त शब्द जॉन बॉल के हैं। जॉन बॉल
    और वॉट टाइलर्स इंग्लैण्ड में हुए 1381 के किसान विद्रोह के नेता थे।
    592 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

कॉम्टे¹ ने कहा है, “सच कहा जाये तो मज़दूर वर्ग एक वर्ग होता ही नहीं, बल्कि
वह तो समाज के निकाय का संघटक होता है।” लेकिन मज़दूर वर्ग का वक़्त, यानी
सभी लोगों के एक हो जाने का वक़्त अभी भी नहीं आया है।
“वर्ल्ड हिस्ट्री फ़ॉर वर्कर्स” पृष्ठ 47, अल्फ़्रेड बार्टन कृत²
पृष्ठ 45 (42)
सर हेनरी मेन³ ने कहा है :
“इंग्लैण्ड की अधिकांश भूमि वकीलों की ग़लती से इसके वर्तमान स्वामियों
के हाथ में चली गयी है – जिन ग़लतियों के परिणामस्वरूप छोटे-छोटे अपराधियों
को भी फाँसी की सज़ा दे दी गयी।”
“कानून मुजरिम क़रार कर देता है उस पुरुष या स्त्री को
जो चुराते हैं आम आदमी की मुर्गियाँ,
लेकिन छोड़ देता है बड़े अपराधियों को
जो चुरा लेते हैं मुर्गियों से आम आदमी को ही।”⁴
पृष्ठ 46 (43)
जनतन्त्र
जनतन्त्र, सैद्धान्तिक तौर पर, राजनीतिक और क़ानूनी समानता की एक
प्रणाली है। लेकिन ठोस और व्यावहारिक कार्रवाई में, यह मिथ्या है, क्योंकि कोई
समानता तब तक नहीं हो सकती, यहाँ तक कि राजनीति में और क़ानून के
समक्ष भी नहीं, जब तक कि आर्थिक शक्ति में असमानता मुँह बाये बरक़रार
रहेगी; जब तक कि सत्ताधारी वर्ग मज़दूरों के रोज़गार पर, देश के प्रेस और
स्कूलों पर तथा जनमत तैयार करने और अभिव्यक्त करने के सभी साधनों पर
अपना अधिकार जमाये रखेगा, जब तक कि यह सभी प्रशिक्षित सार्वजनिक
कार्यकारी निकायों पर अपना एकाधिकार बनाये रखेगा, और चुनावों को प्रभावित
करने के लिए बेशुमार धन ख़र्च करता रहेगा, जब तक कि क़ानून सत्ताधारी वर्ग

  1. आगस्त कॉम्टे (1798-1857) : फ्रांसीसी विचारक
  2. अन्य विवरण अनुपलब्ध
  3. सम्भवतः ब्रिटिश इतिहासकार और विधिवेत्ता सर हेनरी समर मेन (1822-1888), भारत
    में 1863 से 1869 तक काउंसिल के सदस्य, और कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर
    भी रहे
  4. इंग्लैण्ड में 19वीं सदी में एक अज्ञात कवि के द्वारा लिखी कविता का अंश
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 593

द्वारा बनाये जाते रहेंगे और अदालतों में इसी वर्ग के सदस्य अध्यक्षता करते रहेंगे,
जब तक वकील प्राइवेट प्रैक्टिशनर बने रहेंगे और अपनी विधि विशेषज्ञता का
कौशल सबसे अधिक फ़ीस देने वाले को बेचते रहेंगे, तथा अदालती कार्रवाई
तकनीकी और महँगी बनी रहेगी, तब तक क़ानून के समक्ष यह नाममात्र की
समानता भी एक खोखला मज़ाक़ ही बनी रहेगी।
एक पूँजीवादी व्यवस्था में, जनतन्त्र की पूरी मशीनरी बहुसंख्यक मज़दूर वर्ग
को पीड़ित कर, सत्ताधारी अल्पसंख्यक वर्ग को सत्ता में बनाये रखने का काम
करती है, और जब बुर्जुआ सरकार को जनतान्त्रिक संस्थाओं से ख़तरा महसूस
होता है, तब ऐसी संस्थाओं को अक्सर बड़ी बेरहमी के साथ कुचल दिया जाता
है।
“फ़्रॉम मार्क्स टु लेनिन”
(मॉरिस हिलक्विट¹ कृत) (पृष्ठ 58)
जनतन्त्र “हरेक वर्ग या पार्टी से सम्बन्धित हरेक व्यक्ति के लिए समान
अधिकार और सभी राजनीतिक अधिकारों में भागीदारी” सुनिश्चित नहीं करता
(काउत्स्की)। यह तो मौजूदा आर्थिक असमानताओं के लिए खुले राजनीतिक और
क़ानूनी खेल की अनुमति देता है...। इस प्रकार पूँजीवाद के अन्तर्गत जनतन्त्र
सामान्य, अमूर्त जनतन्त्र नहीं, बल्कि विशिष्ट बुर्जुआ जनतन्त्र...या जैसाकि लेनिन
ने इसका नाम दिया है – बुर्जुआ वर्ग के लिए जनतन्त्र होता है।²
पृष्ठ 47 (44)
क्रान्ति शब्द की परिभाषा
“क्रान्ति की अवधारणा को इस शब्द की पुलिसिया व्याख्या के अर्थ में, यानी
सशस्त्र विद्रोह के अर्थ में नहीं लेना चाहिए। यदि किसी पार्टी के पास दूसरे, कम
ख़र्चीले, और अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित तरीक़े इस्तेमाल करने की गुंजाइश है, और
तब भी वह सिद्धान्त के नाते विद्रोह का ही तरीक़ा अपनाती है, तो उसे पागल ही
कहा जायेगा। इस अर्थ में, सामाजिक जनवाद कभी भी सिद्धान्त के नाते क्रान्तिकारी
नहीं रहा। ऐसा यह सिर्फ़ इसी अर्थ में है कि यह इस बात को मानता है कि जब
इसे राजनीतिक सत्ता हासिल हो जायेगी, तो यह इसका इस्तेमाल वर्तमान व्यवस्था

  1. मॉरिस हिलक्विट (1869-1933) : अमेरिकी समाजवादी
  2. पैरे का स्रोत और सन्दर्भ वाला हिस्सा फटा हुआ। सम्भवतः मॉरिस हिलक्विट की ही
    पुस्तक से उद्धृत
    594 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

को टिकाये रखने वाली उत्पादन-प्रणाली को ख़त्म करने के अलावा और किसी
मक़सद के लिए नहीं करेगा।”
“कार्ल काउत्स्की”¹
संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में कुछ तथ्य और आँकड़े²
5 आदमी 1000 लोगों के लिए रोटी पैदा कर सकते हैं
1 आदमी 250 लोगों के लिए सूती कपड़ा पैदा (कर सकता) है
1 आदमी 300 लोगों के लिए ऊनी कपड़ा पैदा कर सकता है
1 आदमी 1000 लोगों के लिए बूट और जूते पैदा कर सकता है
– आयरन हील³ (पृष्ठ 78)
15,000,000 लोग बेपनाह ग़रीबी (में) जी रहे हैं जो अपनी श्रम-दक्षता को
भी बनाये नहीं रख सकते।
3,000,000 बाल-श्रमिक।
पुनश्च: इंग्लैण्ड⁴
युद्ध-पूर्व अनुमान (!)
इंग्लैण्ड का कुल उत्पादन £ 2000,000,000
(प्रतिवर्ष)
विदेशी निवेशों से लाभ £ 200,000,000
£ 2200,000,000
जनसंख्या के 1/9वें भाग ने
ले लिया ½ = £ 1100,000,000
जनसंख्या के 2/9वें भाग ने
ले लिया शेष = £ 1100,000,000
का 1/3 अर्थात = £ 300,000,000
(विवरण का बाक़ी हिस्सा फटा हुआ – स. ...)

  1. कार्ल काउत्स्की (1854-1938) : जर्मन सामाजिक-जनवादी आन्दोलन तथा दूसरे
    इण्टरनेशनल के एक नेता। शुरू में मार्क्सवादी थे पर बाद में मार्क्सवाद के साथ ग़द्दारी की और
    मज़दूर आन्दोलन में मौजूद एक अवसरवादी प्रवृत्ति (काउत्स्कीवाद) के सिद्धान्तकार बन गये।
  2. यह तथा नीचे आया इंग्लैण्ड सम्बन्धी शीर्षक मोटे अक्षरों में लिखे हुए हैं।
  3. जैक (जॉन) ग्रिफ़िथ लण्डन (1876-1916) का उपन्यास आयरन हील, जो 1908 में
    प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में पूँजीवाद के रक्तपिपासु और दमनकारी चरित्र तथा इसके विरुद्ध
    मज़दूरों के संघर्ष का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण है।
  4. स्रोत का पता नहीं
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 595