भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 595, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 37 (34)
सामाजिक संस्थाओं का स्थायित्व
प्रत्येक पीढ़ी के भ्रमों में से एक भ्रम यह है कि वह जिन सामाजिक संस्थाओं
के तहत जी रही होती है वे, कुछ ख़ास अर्थ में, "प्राकृतिक", अपरिवर्तनीय और
स्थायी हैं। फिर भी, अनगिनत हज़ार वर्षों से, सामाजिक संस्थाएँ उत्तरोत्तर पैदा होती
रही हैं, विकास करती रही हैं, पतनशील होती रही हैं और समसामयिक
आवश्यकताओं के अनुरूप दूसरी बेहतर संस्थाओं द्वारा क्रमशः विस्थापित की जाती
रही हैं...। तब, सवाल यह नहीं है कि हमारी वर्तमान सभ्यता बदलेगी या नहीं,
बल्कि यह है कि वह कैसे बदलेगी?
यह, सुविचारित अनुकूलन के जरिये, क्रमशः और चुपचाप एक नया रूप ले
सकती है। या, यदि अनुकूलन के बजाय कोई उग्र प्रतिरोध उठ खड़ा होता है, तो
यह धमाके के साथ ध्वस्त हो सकती है, और मानवजाति को सामाजिक अराजकता
और अव्यवस्था की अवस्था के निचले स्तर से एक नयी सभ्यता के निर्माण का
कष्टसाध्य कार्यभार सौंप सकती है, जिसमें पिछली व्यवस्था की सिर्फ़ बुराइयाँ ही
नहीं, बल्कि उसकी भौतिक, बौद्धिक और नैतिक उपलब्धियाँ भी नहीं रहेंगी।
– पी.आई. डिके ऑफ़ कैप. सिविलाइज़ेशन¹
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पूँजीवाद और वाणिज्यवाद :
जापानी छात्रों की एक सभा में रवीन्द्रनाथ² का भाषण :
जापान में आपका अपना उद्योग था; वह कितने कर्तव्यनिष्ठ भाव से ईमानदार
और सच्चा था, इसे आप इसके उत्पादों से – उनकी स्तरीयता और तादाद से,
छोटी-छोटी चीज़ों के प्रति उनके ध्यान देने से जान सकते हैं, जिन पर शायद ही
कोई टीका-टिप्पणी की जा सके। परन्तु आपकी भूमि पर झूठ की एक लहर दुनिया
के उस भाग से बहकर आ चुकी है जहाँ व्यापार सिर्फ़ व्यापार है और ईमानदारी
को सिर्फ़ सबसे अच्छी नीति माना जाता है। क्या आपको कभी शर्म नहीं महसूस
होती, जब आप उन व्यापारिक विज्ञापनों को देखते हैं, जो सिर्फ़ समूचे शहरी क्षेत्र
- सम्भवतः प्युट्रिफ़ैक्शन एण्ड इण्टर्नल डिके ऑफ़ कैपिटलिस्ट सिविलाइज़ेशन – पर
ठीक-ठीक स्रोत एवं सन्दर्भ का पता नहीं। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941) भाषण का स्थान, समय तथा अन्य ब्योरे उपलब्ध
नहीं हैं।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 589