भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 597, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है, एक हृदयहीन दुनिया का अहसास है, ठीक
वैसे ही जैसेकि यह आत्महीन दशाओं की आत्मा है। यह जनता के लिए अफ़ीम
है।
लोग वास्तव में तब तक सुखी नहीं हो सकते जब तक कि वे धर्म का उन्मूलन
कर, इसके मिथ्या सुख से निजात नहीं पा लेते। यह अपेक्षा कि लोग इस मरीचिका
से अपनेआप को स्वयं अपनी ही दशा की ख़ातिर मुक्त करें, यह अपेक्षा है कि वे
उस दशा का ही त्याग करें जिसे इस मरीचिका की ज़रूरत होती है।
आलोचना का हथियार हथियारों की आलोचना का स्थान नहीं ले सकता।
भौतिक शक्तियों को निश्चित रूप से भौतिक शक्तियों द्वारा ही उखाड़ फेंका जाना
चाहिए; लेकिन सिद्धान्त भी जब जनसमुदायों में रच-बस जाता है, तो एक भौतिक
शक्ति बन जाता है।¹
<u>पृष्ठ 42 (39)</u>
क्रान्ति यूटोपियाई नहीं
एक आमूल परिवर्तनवादी क्रान्ति, यानी मानवजाति की आम मुक्ति, जर्मनी के
लिए कोई यूटोपियाई स्वप्न नहीं है; यूटोपियाई तो एक आंशिक, एक विशुद्ध
राजनीतिक क्रान्ति की धारणा होती है, जो (पूँजीवादी व्यवस्था की – स.) इमारत
के खम्भों को खड़ा छोड़ देगी।²
“महान इसलिए महान हैं क्योंकि
हम घुटनों पर हैं
आओ उठ खड़े हों!”³
<u>पृष्ठ 43 (40)</u>
राज्य के बारे में हर्बर्ट स्पेंसर⁴ का दृष्टिकोण :
“भले ही यह सच हो या न हो कि मनुष्य निष्कलंक पैदा हुआ और पाप में
सन गया, लेकिन यह निश्चित रूप से सच है कि सरकार का जन्म आक्रामकता
से और आक्रामकता के द्वारा हुआ।”
- कार्ल मार्क्स, हेगेल के न्याय-दर्शन की समालोचना का प्रयास से उद्धृत
- वही
- मूल में ये पंक्तियाँ पृष्ठ पर तिरछे लिखी हुई हैं
- हर्बर्ट स्पेंसर (1820-1903) : अंग्रेज़ दार्शनिक; महत्त्वपूर्ण कृतियाँ : द प्रिंसिपल्स ऑफ़
साइकोलाजी और फ़र्स्ट प्रिंसिपल्स
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 591