भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 596, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंको ही झूठ और अतिशयोक्तियों से नहीं पाट रहे हैं, बल्कि उन हरित क्षेत्रों पर भी
धावा बोलते जा रहे हैं, जहाँ किसान ईमानदारी से मेहनत करते हैं, और उन
पर्वत-शिखरों को भी अपने हमले का निशाना बनाते जा रहे हैं, जो भोर के प्रथम
निर्मल प्रकाश का स्वागत करते हैं?...। अपनी भद्दी सजावटों की बर्बरता के साथ
यह वाणिज्यवाद समूची मानवता के लिए एक भयानक महाविपदा है, क्योंकि यह
प्रवीणता के ऊपर ताक़त के आदर्श का आरोपण कर रहा है। यह अपनी नग्न बेशर्मी
के साथ अपने में ही मगन रहने के चलन को गौरवान्वित कर रहा है। इसकी हरकतें
हिंसक हैं, और इसका शोर-शराबा बेसुरा और कर्कश है। यह अपने ही सर्वनाश
की ओर बढ़ रहा है, क्योंकि यह उसी मानवता को कुचल कर विकृत कर रहा
है...जिस पर यह स्वयं खड़ा है। [पृष्ठ 39 (36) पर जारी] यह आनन्द की क़ीमत
पर धन पैदा करने की कड़ी मशक्कत में लगा हुआ है...। यूरोप की वर्तमान सभ्यता
की मुख्य महत्त्वाकांक्षा यही है कि शैतान पर उसी का एकछत्र अधिकार हो।
पूँजीवादी समाज
“राजनीतिक अर्थशास्त्र की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि हर कोई यथासम्भव
कम से कम त्याग करके व्यक्तिगत सम्पदा प्राप्त कर लेना चाहता है।”
“नासाउ सीनियर”¹
पृष्ठ 40 (37)
धर्म के बारे में कार्ल मार्क्स का दृष्टिकोण
मनुष्य धर्म को बनाता है; धर्म मनुष्य को नहीं बनाता। धर्म वास्तव में, मनुष्य
की ही आत्मचेतना और आत्मभावना है, जिसने या तो अभी तक अपनेआप को पाया
नहीं है, या (यदि अपनेआप को पाया भी है तो) अपनेआप को फिर से खो दिया
है। लेकिन आदमी कोई ऐसी अमूर्त सत्ता नहीं है जो दुनिया से बाहर कहीं पालथी
मारे बैठी हुई हो। मनुष्य की दुनिया मनुष्यों, राज्य, समाज की दुनिया है। यह राज्य,
यह समाज धर्म पैदा करता है, एक उल्टी विश्व चेतना पैदा करता है, क्योंकि ये
खुद एक उल्टी दुनिया है। धर्म इसी दुनिया का एक सामान्यीकृत सिद्धान्त है,
इसका विश्वकोशीय सार-संग्रह है, एक लोकप्रिय रूप में इसका तर्क है...। इसलिए
धर्म के विरुद्ध संघर्ष उस दुनिया के विरुद्ध एक प्रत्यक्ष अभियान है जिसकी
आत्मिक सुगन्ध धर्म है। [पृष्ठ 41 (38) पर जारी]
- नासाउ विलियम सीनियर (1790-1864) : अंग्रेज़ अर्थशास्त्री
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