भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
परियोजना के सम्पादन की ज़िम्मेदारी दी गयी और 'हिन्दोस्तानी मंच' के महासचिव
सरदार ओबेराय, प्रो. आर.पी. भटनागर और डॉ. आर.सी. भारतीय ने उनके
सहयोगी की भूमिका निभायी। दुर्भाग्यवश, अर्थाभाव के कारण यह योजना खटाई
में पड़ गयी।
इसी दौरान डॉ. आर.सी. भारतीय को उक्त जेल नोटबुक की एक और टाइप
की हुई प्रतिलिपि प्राप्त हुई जो एक स्थानीय विद्वान डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी मास्को
अभिलेखागार से फ़ोटो-प्रतिलिपि कराकर लाये थे। 'मास्को प्रति' और 'गुरुकुल
प्रति' शब्दशः एक-दूसरे से मिल रहे थे।
1991 में भूपेन्द्र हूजा ने नोटबुक को किश्तों में अपनी पत्रिका 'इण्डियन बुक
क्रॉनिकल' में प्रकाशित करना शुरू किया। भगतसिंह की जेल नोटबुक इस रूप
में पहली बार व्यापक पाठक समुदाय तक पहुँची। डॉ. चमनलाल ने भी भूपेन्द्र हूजा
को सूचित किया कि उक्त नोटबुक की एक प्रतिलिपि उन्होंने भी नेहरू म्यूजियम
लायब्रेरी, नई दिल्ली में देखी थी।
इस तरह भूपेन्द्र हूजा व उनके सहयोगियों की नज़र में उक्त जेल नोटबुक की
आधिकारिकता और अधिक पुष्ट हुई। पहली बार 1994 में उक्त जेल नोटबुक
'इण्डियन बुक क्रॉनिकल' की ओर से ही भूपेन्द्र हूजा और जी.बी. कुमार हूजा
(बलभद्र भारती) की भूमिकाओं के साथ पुस्तकाकार प्रकाशित हुई। उक्त दोनों
भूमिकाओं से भी स्पष्ट है कि जी.बी.कुमार हूजा और भूपेन्द्र हूजा को इस तथ्य
की जानकारी नहीं थी कि उक्त डायरी की मूल प्रति भगतसिंह के भाई कुलबीर
सिंह के पास फ़रीदाबाद में भी मौजूद है। उन्हें जी. देवल के उस लेख की भी
सम्भवतः जानकारी नहीं थी जिन्होंने सबसे पहले 1968 में यह तथ्य उद्घाटित
किया था, न ही उन्हें मित्रोखिन का वह लेख (1981) ही मिला था जो उक्त
डायरी के विशद अध्ययन के बाद लिखा गया था।
बहरहाल, मित्रोखिन ने कुलबीर सिंह के पास उपलब्ध नोटबुक/डायरी से लिये
गये हवालों पर जो पृष्ठ अंकित किये हैं, उन्हें देखने से स्पष्ट हो जाता है कि जी.
बी. कुमार हूजा को प्राप्त 'गुरुकुल टेक्स्ट' उक्त मूल डायरी की ही
डुप्लीकेट/हस्तलिखित प्रतिलिपि है।
ऐसा सम्भव है कि डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी ने डायरी/नोटबुक की जो प्रतिलिपि
मास्को अभिलेखागार में देखी थी, वह मित्रोखिन ही भारत से ले गये हों। या यह
भी हो सकता है कि किसी और रूसी विद्वान ने भी डायरी का अध्ययन किया
हो।
बहरहाल, इन तथ्यों से डायरी की आधिकारिकता ही और अधिक पुष्ट होती
है।
'भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज' पुस्तक के सम्पादक-द्वय
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 553
जगमोहन सिंह और चमनलाल ने भी पुस्तक के दूसरे संस्करण की भूमिका (23
मार्च '89) में लिखा है : "भगतसिंह की जेल में लिखित 404 पृष्ठों की डायरी,
जिसमें महत्त्वपूर्ण राजनीतिक व दार्शनिक नोट्स हैं, अब भी सामान्य पाठकों की
पहुँच से बाहर है, हालाँकि इसकी फ़ोटो प्रति तीन मूर्ति स्थित जवाहरलाल नेहरू
मेमोरियल म्यूज़ियम व लायब्रेरी में सुरक्षित है। इस पर क्या कहा जा सकता है,
पाठक स्वयं ही सोचें।"
इस टिप्पणी से ऐसा लगता है कि जगमोहन सिंह और चमनलाल को भी यह
तथ्य ज्ञात नहीं था कि भगतसिंह की मूल जेल नोटबुक उनके भाई कुलबीर सिंह
के पास मौजूद है, जिसका अध्ययन 1968 में जी. देवल ने और 1977 में मित्रोखिन
ने किया था। यह विशेष आश्चर्य की बात इसलिए भी है क्योंकि जगमोहन सिंह
भी स्वयं भगतसिंह के परिवार के सदस्य हैं। वे भगतसिंह की बहन बीबी अमर
कौर के पुत्र हैं। भगतसिंह के दूसरे भाई कुलतार सिंह की पुत्री वीरेन्द्र सिन्धू ने भी
भगतसिंह पर दो पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने भी इसका उल्लेख नहीं किया है कि
भगतसिंह की जेल नोटबुक उनके परिवार के ही एक सदस्य के पास मौजूद है।
यदि इन परिवार-जनों को भी यह तथ्य नहीं पता था तो इस बारे में हमें कुछ नहीं
कहना। न ही इसकी अन्तर्कथा को जानने में हमारी कोई रुचि है।
यह सवाल हम यहाँ इसलिए उठा रहे हैं कि यह भारत में इतिहास की एक
गम्भीर समस्या है। आज़ाद भारत की कांग्रेसी सरकार ही नहीं, किसी भी पूँजीवादी
संसदमार्गी दल से हम यह अपेक्षा नहीं रखते कि उनकी सरकारें भगतसिंह के
विचारों को जनता तक पहुँचाने का काम करेंगी। उनका बस चलता तो वे भगतसिंह
की स्मृति तक को दफ़्न कर देतीं। पर यह उनके बस के बाहर की बात है।
लेकिन शहीदे-आजम भगतसिंह के परिवार-जनों का उनकी वैचारिक विरासत
के बारे में जो रुख रहा, उसके बारे में क्या कहा जाये? सीधा सवाल यह है कि
कुलबीर सिंह के पास यदि भगतसिंह की जेल नोटबुक मौजूद थी, तो उन्होंने उसे
भारतीय जनता तक पहुँचाने के लिए क्या कोशिश की? उन्होंने अख़बारों में,
इतिहासकारों को पत्र लिखकर इसे छपाने और जनता तक पहुँचाने की कोई कोशिश
क्यों नहीं की? क्या इसे प्रकाशित करने के लिए प्रकाशक नहीं मिलते? या जनता
से स्रोत-संसाधन नहीं जुटते? हमारी जानकारी के अनुसार, शहीदेआजम के परिवार
के लोग स्वयं भी इतने विपन्न नहीं हैं। उन्हें यदि भगतसिंह के आदर्शों से प्यार होता
और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की चिन्ता होती तो वे उक्त डायरी
स्वयं छपवा सकते थे। आश्चर्य तो तब होता है जब लगता है कि जेल नोटबुक के
कुलबीर सिंह के पास उपलब्ध होने का तथ्य स्वयं जगमोहन सिंह या वीरेन्द्र सिन्धू
को ही नहीं पता था। क्या यह एक शर्मनाक विडम्बना नहीं है कि भगतसिंह की
जेल नोटबुक पर आधारित पहला विस्तृत शोध-निबन्ध 1981 में एक रूसी विद्वान
554 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
मित्रोखिन की पुस्तक में संकलित होकर सामने आया? वैसे इस काहिली और
गैरज़िम्मेदारी के लिए उन इतिहासकारों को भी माफ़ नहीं किया जा सकता जो
इतिहास को केवल प्रोफ़ेसरी का जरिया बनाये हुए हैं और इतिहास की बहुमूल्य
विरासत को भी जनता तक पहुँचाने की जिन्हें रत्तीभर चिन्ता नहीं है। और भला
क्यों हो? वे इतिहास पढ़ाने वाले मुदर्रिस हैं, इतिहास बनाने से उनका भला क्या
सरोकार?
जहाँ तक भगतसिंह के परिवार के उन सदस्यों का सवाल है, जिन्होंने आज़ादी
के इतने वर्षों बाद तक इतिहास की एक बहुमूल्य धरोहर को पारिवारिक सम्पत्ति
की तरह दाबे रखा और उसे जनता तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की; वे
भी अपनी इस करनी के चलते इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं। वैसे हमारे
देश में यह कोई नई बात नहीं है। क्रान्तिकारी राजनीति और साहित्य में ऐसे कई
उदाहरण हैं कि महान विभूतियों के रक्त-सम्बन्धी उत्तराधिकारी उनसे जुड़े होने के
नाते इज़्ज़त तो खूब पा रहे हैं पर उनके आदर्शों और सपनों से उन्हें कुछ भी नहीं
लेना-देना। उनकी रुचि या तो सम्मान-प्रतिष्ठा-सुविधा में है या फिर रायल्टी की
मोटी रक़म में। भगतसिंह हों या राहुल सांकृत्यायन, उनका कृतित्व आज पूरे राष्ट्र
की, पूरी जनता की या उनके वैचारिक उत्तराधिकारियों की धरोहर न बनकर
परिवार-जनों की निजी सम्पत्ति बन गयी है। क्रान्तिकारियों के तमाम
बेटे-भतीजे-भांजे आज क्रान्तिकारियों के रक्त-सम्बन्धी होने के नाते स्वाभाविक
तौर पर जनता से इज़्ज़त पाते हैं और सीना फुलाते हैं। पर उन्हें इस बात में कोई
दिलचस्पी नहीं कि क्या उन क्रान्तिकारियों के सपने पूरे हुए? इसके विपरीत वे
उसी सत्ता से सुविधाएँ लेने और उन्हीं राजनीतिक दलों की राजनीति करने तक
का काम करते हैं, जिन्होंने क्रान्तिकारियों के सपनों के साथ विश्वासघात किया।
क्रान्तिकारियों के ऐसे वारिस भी क्या अपने महान पूर्वजों के आदर्शों का व्यापार
नहीं कर रहे हैं?
बहरहाल, 1994 में भूपेन्द्र हूजा और उनके साथियों ने भगतसिंह की जेल
नोटबुक का मूल अंग्रेज़ी संस्करण छापकर भारत की जनता और क्रान्तिकारी
आन्दोलन के लिए जो उपयोगी कार्य किया उसे कभी भी भुलाया नहीं सकता।
आम जनता को इतिहास की बहुमूल्य धरोहर से परिचित कराने के महत्त्वपूर्ण
कार्यभारों में से यह भी एक है कि भगतसिंह की जेल नोटबुक और उनके तथा
उनके साथियों के सभी दस्तावेज़ों को सभी भारतीय भाषाओं में अनूदित करके
जन-जन तक पहुँचाया जाये।
भगतसिंह की जेल नोटबुक स्कूली कापी की सामान्य साइज (17.50 से.मी.
ग 21 से.मी) की पुस्तिका है। नोटबुक खोलते ही पहले पेज (टाइटिल पेज) पर
अंग्रेज़ी में लिखा है : “भगतसिंह के लिए/चार सौ चार (404) पृष्ठ...” नीचे एक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 555
हस्ताक्षर है और 12.9.29 की तिथि दी गयी है। स्पष्ट है कि यह प्रविष्टि जेल
अधिकारियों द्वारा भगतसिंह को कापी देते समय की गयी है। जेल मैनुअल/
नियमावली के जानकार जानते होंगे कि जब भी कोई क़ैदी लिखने के लिए कापी
माँगता है तो जेल अधिकारी को कापी के शुरू और अन्त में ऐसा लिखना होता
है और क़ैदी को भी प्राप्त करते समय वहाँ हस्ताक्षर करना होता है। भगतसिंह के
हस्ताक्षर (अंग्रेज़ी में) टाइटल पेज पर भी मौजूद हैं और 12.9.29 की तिथि के
साथ कापी के अन्त में भी। नोटबुक की जो डुप्लीकेटेड/हस्तलिखित प्रतिलिपि
जी.बी. कुमार हूजा को गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ में मिली, उसमें नीचे बायें कोने पर अंग्रेज़ी
में यह भी लिखा हुआ था : “प्रतिलिपि शहीद भगतसिंह के भतीजे अभय कुमार
सिंह द्वारा तैयार।”
मूल नोटबुक के पृष्ठ भगतसिंह की छोटे अक्षरों वाली लिखाई से भरे हुए हैं।
ज्यादा नोट्स अंग्रेज़ी में लिये गये हैं, लेकिन कहीं-कहीं उर्दू का भी इस्तेमाल किया
गया है।
556 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक
भगतसिंह द्वारा जेल में (1929-31)
अध्ययन के दौरान लिये गये
नोट्स और उद्धरण
नोटबुक खोलते ही पहले पेज (टाइटिल पेज) पर अंग्रेज़ी में लिखा
है:
“ भगतसिंह के लिए
चार सौ चार (404) पृष्ठ...”
नीचे एक हस्ताक्षर है और 12.9.29 की तिथि दी गयी है। स्पष्ट है
कि यह प्रविष्टि जेल अधिकारियों द्वारा भगतसिंह को कापी देते समय की
गयी है।
इसके नीचे भगतसिंह के दो पूरे और दो लघु हस्ताक्षर हैं।
पृष्ठ के ऊपरी दायें किनारे पर भी अंग्रेज़ी में भगतसिंह का नाम
लिखा है। (देखें सामने का पृष्ठ)
जेल मैनुअल/नियमावली के जानकार जानते होंगे कि जब भी कोई
क़ैदी लिखने के लिए कापी माँगता है तो जेल अधिकारी को कापी के
शुरू और अन्त में ऐसा लिखना होता है और क़ैदी को भी प्राप्त करते
समय वहाँ हस्ताक्षर करना होता है। भगतसिंह के हस्ताक्षर (अंग्रेज़ी में)
टाइटिल पेज पर भी मौजूद हैं और 12.9.29 की तिथि के साथ कापी के
अन्त में भी।
नोटबुक की जो डुप्लीकेटेड/हस्तलिखित प्रतिलिपि जी.बी. कुमार
हूजा को गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ में मिली, उसमें नीचे बायें कोने पर अंग्रेज़ी
में यह भी लिखा हुआ था : “प्रतिलिपि शहीद भगतसिंह के भतीजे अभय
कुमार सिंह द्वारा तैयार।”
नोटबुक आम स्कूली कॉपी के आकार की थी, लगभग
6.75 X 8.50 इंच या 17.50 X 21 सेण्टीमीटर।
— सम्पादक
558 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
Bhagat Singh Paper
For S Bhagat Singh
four hundred & four pages
[404 Pages]
Line
12/9/29
Bhagat Singh
Bhagat Singh
Copy by Abhey Kumar Singh
Nephew of Shaheed Bhagat Singh
पृष्ठ 2 (2)¹
ज़मीन के माप² :
जर्मन 20 हेक्टेयर – 50 एकड़ अर्थात 1 हेक्टेयर = 2½ एकड़
- नोटबुक की पृष्ठ संख्या टाइटल पृष्ठ से गिनी गयी है। कोष्ठक में दी गयी संख्या उन
पृष्ठों की है जिन पर लिखा हुआ है। उदाहरण के लिए पृष्ठ 2 (2) के बाद तीन पृष्ठ सादे
हैं और अगली लिखावट पृष्ठ 6 (3) पर है। नोटबुक में बीच-बीच में कुछ पृष्ठ नहीं हैं तथा
कई पृष्ठ ख़ाली छोड़े हुए हैं। कुल 145 पृष्ठों पर भगतसिंह ने नोट्स लिये हैं। - नोटबुक के पृष्ठ दो पर ज़मीन की माप सम्बन्धी सिर्फ़ इन्हीं दो इकाइयों – हेक्टेयर और
एकड़ की आपसी तुलना अंकित है।
560 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
<u>पृष्ठ 6 (3)</u>
सम्पत्ति से मुक्ति – “सम्पत्ति की स्वतन्त्रता”...जहाँ तक छोटे पूँजीपति और
किसान सम्पत्तिधारकों का सवाल है, “सम्पत्ति से मुक्ति” बन गयी।
विवाह अपनेआप में, पहले की भाँति ही, वेश्यावृत्ति का क़ानूनी तौर पर
स्वीकृत रूप, औपचारिक आवरण, बना रहा...।
(सोशलिज़्म, साइण्टिफ़िक एण्ड यूटोपिया)¹
―――――○―――――
दिमाग़ी गुलामी – “एक शाश्वत सत्ता ने मानवसमाज को वैसा ही रचा, जैसा
आज वह है, तथा ‘श्रेष्ठतर’ और ‘सत्ता’ के प्रति समर्पण दैवी इच्छा से ही
‘निम्नतर’ वर्गों पर लागू किया गया है।” उपदेशक गण, उपदेश मंच और प्रेस की
ओर से दिये जाने वाले इस सन्देश ने आदमी के दिमाग़ को सम्मोहित कर रखा
है और यह शोषण के सबसे मज़बूत स्तम्भों में से एक है।
(ओरिजिन ऑफ़ द फ़ैमिली में अनुवादक की भूमिका)²
<u>पृष्ठ 7 (4)</u>
एंगेल्स कृत द ओरिजिन ऑफ़ द फ़ैमिली...
आदिम समाज के इतिहास में एक तर्कसंगत व्यवस्था प्रस्तुत करने का प्रयास
सबसे पहले मार्गन ने किया।³
वह इसे तीन मुख्य युगों में बाँटता है :
- असभ्यता, 2. बर्बरता, 3. सभ्यता
1. असभ्यता पुनः तीन अवस्थाओं में विभाजित : - निम्नतर; 2. मध्य; 3. उच्चतर
1. असभ्यता की निम्नतर अवस्था : मानवजाति की शैशवावस्था।
- फ़्रेडरिक एंगेल्स; समाजवाद, काल्पनिक एवं वैज्ञानिक
- फ़्रेडरिक एंगेल्स; परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति
- लुइस एच. मार्गन (1818–1881); अमेरिकी समाजशास्त्री जिन्होंने 1877 में प्रकाशित
अपनी पुस्तक प्राचीन समाज (Ancient Society, or Researches in the Lines of Human
Progress from Savagery through Barbarism to Civilization) में विस्तृत सामाजिक
अध्ययन के आधार पर इतिहास विकास की भौतिकवादी धारणा को पुष्ट किया था। एंगेल्स
ने अपनी पुस्तक परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति लिखने में मुख्य रूप से मार्गन
द्वारा प्रस्तुत सामग्री को आधार बनाया था।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 561
- पेड़ों पर रहना। 2. भोजन था फल, गिरीफल और कन्दमूल। 3. सुसंगत बोली
का विकास इस काल की प्रधान उपलब्धि। - मध्य अवस्था : 1. आग की खोज। 2. मछली भोजन के रूप में प्रयुक्त।
- शिकार के लिए पत्थर के औज़ार आविष्कृत। 4. मानव मांसभक्षण अस्तित्व में
आ जाता है।¹ - उच्चतर अवस्था : 1. धनुष और बाण, कुम्हारी नहीं। 2. ग्रामीण बस्तियाँ।
- घर बनाने में इमारती लकड़ी का इस्तेमाल। 4. कपड़े बुने जाने लगे।
असभ्यता की अवस्था में धनुष और बाण वैसे ही थे, जैसे बर्बरता की अवस्था
में लोहे की तलवार, और सभ्यता की अवस्था में आग्नेयास्त्र – यानी, प्रभुत्व के
हथियार।
पृष्ठ १ (5) - बर्बरता :
- निम्नतर अवस्था : 1. कुम्हारी का आरम्भ। पहले लकड़ी के बरतनों पर
मिट्टी की परतें चढ़ायी जाती थीं, लेकिन बाद में चलकर मिट्टी के बरतन
आविष्कृत कर लिये गये। - मानवजातियाँ दो स्पष्ट वर्गों में विभाजित :
(i) पूर्वी, जो जानवर पालती थीं और अनाज पैदा करती थीं;
(ii) पश्चिमी, जिनके पास सिर्फ़ 'मक्का' था। - मध्य अवस्था :
(अ) पश्चिमी गोलार्द्ध : अर्थात अमेरिका में वे खाद्य-फ़सलें उगाते थे, (खेती
और सिंचाई), और घर बनाने के लिए ईंटें पकाते थे।
(ब) पूर्वी : वे दूध और मांस के लिए पशुपालन करती थीं। इस अवस्था में
कोई खेती नहीं। - उच्चतर अवस्था :
- कच्चे लोहे को गलाना।
- दस्तावेज़ लिखने के लिए अक्षर-लिपि का विकास और उसका इस्तेमाल।
इस अवस्था में अनेक आविष्कार होते हैं। यूनानी नायकों का यही काल है। - बड़े पैमाने पर मक्का की खेती करने के लिए पशुओं द्वारा लोहे के हल
खींचे जाते हैं। - जंगलों की कटाई, तथा लोहे की कुल्हाड़ियाँ एवं लोहे की कुदालें इस्तेमाल
में आने लगीं। - यहाँ भगतसिंह ने हाशिये पर लिखा है : वेनिज़न = शिकार से प्राप्त पशु-मांस
562 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
- महान उपलब्धियाँ : (i) लोहे के उन्नत औज़ार, (ii) भाथियाँ, (iii) जान्ता,
(iv) कुम्हार का चाक, (v) तेल और शराब निकालना, (vi) धातुओं की ढलाई,
(vii) गाड़ी और रथ (viii) जहाज़-निर्माण [पृष्ठ 9 (6)] (ix) कलात्मक
वास्तु-शिल्प, (x) शहर और क़िलों का निर्माण, (xi) होमर युग और सम्पूर्ण
मिथकशास्त्र
इन उपलब्धियों के साथ ही, यूनानी तीसरी अवस्था – “सभ्यता” – में
प्रवेश कर जाते हैं।
संक्षेप में : - असभ्यता : मुख्य तौर पर तैयारशुदा प्राकृतिक उत्पादों के विनियोजन का
काल; मानवीय बुद्धि-कुशलता मुख्यतः इस विनियोजन में सहायक सिद्ध होने वाले
उपयोगी औज़ारों का आविष्कार करती है। - बर्बरता : पशुपालन, कृषि एवं मानवीय अभिकर्ता द्वारा प्रकृति की
उत्पादकता बढ़ाने के नये-नये तरीक़ों का ज्ञान हासिल करने का काल। - सभ्यता : प्राकृतिक उत्पादों के व्यापकतर उपयोग सीखने का,
मैन्युफ़ैक्चरिंग का, तथा कला का काल।
इस प्रकार, हमें, मानव-विकास की तीन मुख्य अवस्थाओं से आमतौर पर मेल
खाते हुए परिवार के तीन मुख्य रूप मिलते हैं : - असभ्यता के काल में : “यूथ विवाह”
- बर्बरता के काल में : युग्म परिवार
- सभ्यता के काल में : एकनिष्ठ विवाह के साथ-साथ व्यभिचार और
वेश्यावृत्ति। युग्म परिवार और एकनिष्ठ विवाह के दरम्यान, बर्बरता की उच्चतर
अवस्था में, दासियों के ऊपर पुरुषों के शासन और बहुपत्नी-विवाह का प्रवेश।
(पृष्ठ 90)
पृष्ठ 10 (7)
विवाह के दोष
ख़ासतौर से एक दीर्घकालिक लगाव, दस मामलों में से नौ में, व्यभिचार का
एक पक्का प्रशिक्षण स्कूल होता है। (पृष्ठ 91)
समाजवादी क्रान्ति और विवाह संस्था
अब हम एक ऐसी सामाजिक क्रान्ति की ओर अग्रसर हो रहे हैं जिसके
परिणामस्वरूप एकनिष्ठ विवाह का वर्तमान आर्थिक आधार उतने ही निश्चित रूप
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 563
से मिट जायेगा, जितने निश्चित रूप से एकनिष्ठ विवाह के अनुपूरक का,
वेश्यावृत्ति का आर्थिक आधार मिट जायेगा। एकनिष्ठ विवाह की प्रथा एक व्यक्ति
के – और वह भी एक पुरुष के – हाथों में बहुत-सा धन एकत्रित हो जाने के
कारण और इस इच्छा के फलस्वरूप उत्पन्न हुई थी कि वह यह धन किसी दूसरे
की सन्तान के लिए नहीं, केवल अपनी सन्तान के लिए छोड़ जाये। इस उद्देश्य
के लिए स्त्री की एकनिष्ठता आवश्यक थी, पुरुष की नहीं। इसलिए नारी की
एकनिष्ठता से पुरुष के खुले या छिपे बहुपत्नीत्व में कोई बाधा नहीं पड़ती थी।
परन्तु आने वाली सामाजिक क्रान्ति स्थायी दायाद्य धन-सम्पदा के अधिकतर
भाग को – यानी उत्पादन के साधनों को – सामाजिक सम्पत्ति बना देगी और ऐसा
करके सम्पत्ति की विरासत के बारे में इस सारी चिन्ता को अल्पतम कर देगी। पर
एकनिष्ठ विवाह चूँकि आर्थिक कारणों से उत्पन्न हुआ था, इसलिए क्या इन कारणों
के मिट जाने पर वह भी मिट जायेगा? (पृष्ठ 91)¹
पृष्ठ 11 (8)
“भर दो प्याला हे प्रिय मेरे, जो दूर करे
आज विगत के दुख औ' आगत के भय को –
कल? – क्यों, कल हो सकता मैं हो जाऊँ
सात हज़ार वर्षों के कल का अतीत।
... ... ...
यहाँ घने गाछ के नीचे, साथ में रोटी,
मदिरा की सुराही, शायरी की किताब – और तुम
गा रही बगल में मेरे इस निर्जन बीहड़ में!
अब तो स्वर्ग बना यह निर्जन बीहड़ ही!
“उमर ख़य्याम”
राज्य : राज्य की पूर्वापेक्षा है बल प्रयोग की एक सार्वजनिक सत्ता, जो अपने
सदस्यों के सम्पूर्ण निकाय से पृथक हो चुकी हो।
– (एंगेल्स) (पृष्ठ 116)²
- एंगेल्स; परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति
- वही
564 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
राज्य की उत्पत्ति :
...पुराने ज़माने में क़बीलों के बीच होने वाले युद्धों द्वारा भ्रष्ट होते हुए नया रूप
धारण – जीविकोपार्जन के साधन के रूप में ढोर, दास और धन–दौलत लूटने के
लिए ज़मीन और पानी के रास्ते से बाक़ायदा धावे; संक्षेप में, धन–दौलत को दुनिया
में सबसे बड़ी चीज़ समझा जाने लगा, उसे प्रशंसा और आदर की दृष्टि से देखा
जाने लगा और पुराने गोत्र–समाज की संस्थाओं और प्रथाओं को भ्रष्ट किया जाने
लगा ताकि धन–दौलत को ज़बरदस्ती लूटना उचित ठहराया जा सके। अब केवल
एक चीज़ दरकार थी : ऐसी संस्था की, जो न केवल अलग–अलग व्यक्तियों की
नयी हासिल की हुई सम्पत्ति को गोत्र–व्यवस्था की पुरानी सामुदायिक परम्पराओं
से बचा सके, जो निजी स्वामित्व को, जिसकी पहले अधिक प्रतिष्ठा नहीं थी, न
केवल पवित्र क़रार दे और इस पवित्रता को मानवसमाज का चरम लक्ष्य घोषित
कर दे, बल्कि जो सम्पत्ति प्राप्त करने, और इसलिए धन–दौलत को लगातार बढ़ाते
रहने के नये और विकसित होते हुए तरीक़ों पर सार्वजनिक मान्यता की मुहर भी
लगा दे; ऐसी संस्था की, जो न केवल समाज के नवजात वर्ग–विभाजन को, बल्कि
सम्पत्तिवान वर्ग द्वारा सम्पत्तिहीन वर्ग के शोषण किये जाने के अधिकार को और
सम्पत्तिहीन वर्ग पर सम्पत्तिवान वर्ग के शासन को भी स्थायी बना दे।
और यह संस्था भी आ पहुँची। राज्य का आविष्कार हुआ।
(पृष्ठ 129–130)¹
───o───
एक अच्छी सरकार की परिभाषा : “अच्छी सरकार स्व–शासन का विकल्प
कभी नहीं हो सकती।”
“हेनरी कैम्पबेल बैनरमैन ”²
───o───
“हमें यक़ीन है कि सरकार का केवल एक ही रूप है, चाहे इसे जिस नाम
से भी पुकारा जाये, जिसमें अन्तिम नियन्त्रण जनता के हाथों में होता है।”
“अर्ल ऑफ़ बालफोर ”³
───o───
- एंगेल्स; परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति
- सर हेनरी कैम्पबेल–बैनरमैन (1836–1908) : ब्रिटिश उदारवादी राजनेता, 1905–08
तक प्रधानमन्त्री रहे। - सम्भवतः आर्थर जेम्स (1848–1930) : प्रथम अर्ल ऑफ़ बालफोर, ब्रिटिश राजनयिक
एवं प्रधानमन्त्री (1902–1905)
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 565
धर्म : “धर्म के प्रति मेरा अपना दृष्टिकोण वही है जो ल्यूक्रेटियस
का है। मैं इसे भय से पैदा हुई एक बीमारी के रूप में, और मानवजाति के लिए
एक अकथनीय दुख के रूप में मानता हूँ। लेकिन, मैं इससे इन्कार नहीं कर सकता
कि इसने सभ्यता में कुछ योगदान भी किया है। इसने आरम्भिक काल में
पंचांग-निर्धारण में मदद की, और इसी के चलते मिस्र के पुरोहितों ने ग्रहणों का
लेखा-जोखा इतनी सावधानी के साथ रखा कि बाद में वे इनके बारे में भविष्यवाणी
कर सकने में समर्थ हो गये। इन दो सेवाओं को तो मैं मानने के लिए तैयार हूँ,
लेकिन और किसी के बारे में मैं नहीं जानता।
-बर्ट्रेण्ड रसेल¹
पृष्ठ 13 (10)
परोपकारी निरंकुशता : मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड² ने ब्रिटिश सरकार को एक
'परोपकारी निरंकुशता' कहा है और, ब्रिटिश लेबर पार्टी के साम्राज्यवादी नेता, रैम्जे
मैक्डोनाल्ड³ के अनुसार “एक 'परोपकारी निरंकुशता' द्वारा किसी देश पर शासन
करने के सभी प्रयासों में, शासितों को कुचल डाला जाता है। वे व्यवहारशील
नागरिक नहीं, आज्ञाकारी प्रजा बन जाते हैं। उनका साहित्य, उनकी कला, उनकी
आत्मिक अभिव्यक्ति मर जाती है।”
भारत के प्रभारी विदेशमन्त्री, आनरेबल एस. मॉन्टेग्यू ने
भारत सरकार : हाउस ऑफ़ कामंस में 1917 में कहा “भारत सरकार,
आधुनिक उद्देश्यों के लिए किसी भी काम लायक होने की
दृष्टि से बेहद जड़, बेहद निर्मम, बेहद आदिम, और बेहद दकियानूस है। भारत
सरकार असमर्थनीय है।”
- महान गणितज्ञ और दार्शनिक बर्ट्रेण्ड आर्थर विलियम रसेल (1872-1972)
- भारत में संवैधानिक सुधारों के सम्बन्ध में मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड रिपोर्ट (1918) जिसके
आधार पर भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत दोहरा शासन लागू हुआ। एडविन सैमुअल
मॉन्टेग्यू (1877-1924) 1917 से 1922 तक भारत के मामलों का प्रभारी ब्रिटिश विदेशमन्त्री
और लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड 1916 से 1920 तक भारत का वायसराय रहा। - जेम्स रैम्जे मैक्डोनाल्ड (1866-1937) : ब्रिटिश राजनयिक और ब्रिटिश लेबर पार्टी का
संस्थापक सदस्य। 1923-24 में तथा 1929-35 में ब्रिटेन का प्रधानमन्त्री रहा।
566 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
भारत में डॉ. रथफ़ोर्ड¹ के शब्द : “भारत में ब्रिटिश शासन जैसे
ब्रिटिश शासन : चलाया जा रहा है वह दुनिया में सरकार की सबसे निकृष्ट
और सबसे अनैतिक प्रणाली – एक राष्ट्र द्वारा दूसरे का शोषण – है।”
— ⚬ —
आज़ादी और “अंग्रेज़ लोग आज़ादी को स्वयं अपनी ख़ातिर ही प्यार
अंग्रेज़ लोग करते हैं। वे अन्याय की सभी कार्रवाइयों से घृणा करते हैं,
सिवाय उनके जो वे स्वयं करते हैं। वे ऐसे आज़ादी-प्रेमी लोग
हैं कि कांगो में दख़लअन्दाज़ी करते हैं, और बेल्जियनों पर “शर्म-शर्म” चिल्लाते
हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि उनकी एड़ियाँ भारत की गर्दन पर हैं।”
— एक आयरिश लेखक²
पृष्ठ 14 (11)
भीड़ का प्रतिशोध
...“अब आइये हम देखें कि कैसे लोग इस ढंग से सज़ा देने के विचार के
कायल हुए।
“वे इसे उन्हीं सरकारों से सीखते हैं जिनके अन्तर्गत वे जी रहे होते हैं, और
बदले में वही सज़ा देते हैं जिसको भोगने के वे आदी हो चुके होते हैं। सूली पर
टँगे सिर, जो वर्षों तक टेम्पल बार के ऊपर लगे रहे, पेरिस में सूली पर टाँगे जाने
वाले सिरों के दृश्य की भयावहता से तनिक भी भिन्न नहीं थे; फिर भी अंग्रेज़
सरकार ने यही किया। शायद कहा जा सकता है कि इससे आदमी को कोई ख़ास
फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मरने के बाद उसके साथ क्या किया जाता है; लेकिन जीवितों
को इससे काफ़ी फ़र्क़ पड़ता है, इससे या तो उनकी भावनाएँ विदीर्ण हो जाती हैं
या उनके दिल पत्थर हो जाते हैं, और दोनों ही सूरतों में, यह उन्हें शिक्षित करता
है कि जब सत्ता उनके हाथ में आये तो वे कैसे सज़ा दें।
“तब कुल्हाड़ी से जड़ पर ही प्रहार करो, और सरकारों को मानवता सिखा
दो। ये उनकी खूँखार सज़ाएँ ही हैं जो मानवजाति को भ्रष्ट करती हैं...। जनसामान्य
के सामने प्रदर्शित इन क्रूर दृश्यों का प्रभाव संवेदनशीलता को ख़त्म करने या
प्रतिशोध भड़काने के रूप में सामने आता है, तथा विवेक के बजाय आतंक के
- डॉ. वी.एच. रदरफ़ोर्ड की पुस्तक मॉडर्न इण्डिया : इट्स प्रोब्लम्स एण्ड देयर सोल्यूशंस,
लन्दन, 1927 से - सम्भवतः उपरोक्त पुस्तक में उद्धृत
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 567
| द्वारा लोगों पर शासन करने की इसी निकृष्ट और झूठी धारणा के जरिये वे मिसाल
बनते हैं।”
(राइट्स ऑफ़ मैन, (पृष्ठ 32), टी. पेन)¹
पृष्ठ 15 (12)
राजा और राष्ट्र ने लुई चौदहवें के विरुद्ध नहीं, बल्कि सरकार के
राजतन्त्र : निरंकुश सिद्धान्तों के विरुद्ध विद्रोह किया। ये सिद्धान्त
मूलतः उससे नहीं, बल्कि कई सदी पहले स्थापित आरम्भिक
व्यवस्था से पैदा हुए थे, और इतनी गहराई में जड़ जमा चुके थे कि ख़त्म नहीं
किये जा सके थे, तथा परजीवियों एवं लुटेरों का गन्दगी से भरा हुआ अस्तबल भी
इतने घृणास्पद रूप से गन्दा था कि एक सम्पूर्ण क्रान्ति ही उसे साफ़ कर सकती
थी। जब कोई काम करना ज़रूरी हो जाता है, तो उसे दत्त-चित्त होकर करना
चाहिए, या उसे करने की कोशिश ही नहीं करनी चाहिए...। राजा और राजतन्त्र दो
अलग-अलग भिन्न चीजें थीं; और पूर्वोक्त (यानी राजा – स.) या उसके सिद्धान्तों
के ही विरोध में यह विद्रोह हुआ और क्रान्ति की गयी।
– (पृष्ठ 19)²
प्राकृतिक और मनुष्य ने समाज में प्रवेश इसलिए नहीं किया कि वह
पहले से भी बदतर हो जाये, बल्कि इसलिए कि उसके
नागरिक अधिकार : अधिकार पहले से बेहतर ढंग से सुरक्षित हों। उसके
प्राकृतिक अधिकार ही उसके सभी नागरिक अधिकारों की आधारशिला हैं।
प्राकृतिक अधिकार वे हैं जो मनुष्य के जीने के अधिकार से सम्बन्धित हैं
(बौद्धिक-मानसिक आदि)।
नागरिक अधिकार वे हैं जो मनुष्य के समाज का एक सदस्य होने से सम्बन्धित
हैं। – (पृष्ठ 44)³
- टॉमस पेन की कृति, द राइट्स ऑफ़ मैन; अंग्रेज़ लेखक और प्रचारक टॉमस पेन
(1737-1809) अमेरिकी स्वतन्त्रता-संग्राम और फ्रांसीसी क्रान्ति में अपनी अविस्मरणीय
भूमिका के लिए सारी दुनिया में विख्यात है; उसका परचा कामन सेंस तथा यह कृति राइट्स
ऑफ़ मैन, इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। अमेरिकी स्वतन्त्रता-संग्राम के दौरान लिखा गया
राइट्स ऑफ़ मैन अमेरिकी संविधान का मुख्य आधार बना। - द राइट्स ऑफ़ मैन से
- वही
568 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 16 (13)
राजा की एक व्यक्ति के भरण-पोषण के लिए, किसी देश के
तनख़्वाह : सार्वजनिक टैक्सों में से, दस लाख स्टर्लिंग सालाना देने
की बात करना अमानवीय है, जबकि हज़ारों लोग जो इसमें
योगदान करने के लिए मजबूर किये जाते हैं, अभाव से त्रस्त और बदहाली से जूझ
रहे हैं। सरकार जेलों और राजमहलों के बीच, या कंगाली और शान-शौक़त
के बीच किसी समझौते के रूप में नहीं होती; यह इसलिए नहीं गठित की जाती
कि ज़रूरतमन्द से उसकी दमड़ी भी लूट ली जाये और ख़स्ताहालों की दुर्दशा और
बढ़ा दी जाये।
— (पृष्ठ 204)¹
“मुझे आज़ादी दो या मौत”
“...मामले को हलका बनाना बेकार है, महाशय। शरीफ लोग शान्ति, शान्ति
चिल्ला सकते हैं – लेकिन कोई शान्ति नहीं है। युद्ध तो वास्तव में शुरू ही हो
चुका है। अब अगला झंझावात जो उत्तर से उठकर...हमारे कानों तक पहुँच रहा है,
गुंजायमान हथियारों की टकराहटों का है। हमारे बन्धु-बान्धव तो पहले ही से लड़ाई
के मैदान में हैं। हम यहाँ बेकार क्यों खड़े हैं? आख़िर शरीफ लोग चाहते क्या हैं?
वे क्या करेंगे? क्या जीवन इतना प्यारा या शान्ति इतनी मीठी है कि उसे बेड़ियों
और गुलामी की क़ीमत पर भी ख़रीद लिया जाये?
रोको इसे, हे सर्वशक्तिमान ईश्वर। मैं नहीं जानता कि और लोग कौन-सा रास्ता
अख़्तियार करेंगे। लेकिन जहाँ तक मेरी बात है, मुझे “आज़ादी” दो या “मौत”।
— पैट्रिक हेनरी²
मज़दूर का अधिकार :
‘जो कोई भी कठिन श्रम से कोई चीज़ पैदा करता है उसे यह बताने के लिए
किसी खुदाई पैग़ाम की ज़रूरत नहीं कि पैदा की गयी चीज़ पर उसी का अधिकार
है।”
— राबर्ट जी. इंगरसोल³
- वही
- पैट्रिक हेनरी (1736-1790) : अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम के नेताओं में से एक, प्रखर
वक्ता और सांसद - रॉबर्ट जी. इंगरसोल (1832-1899) : अमेरिकी वकील, वक्ता और लेखक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 569
पृष्ठ 17 (14)
“लोगों के सिर कलम कर दिये जाने को तो हम भयंकर मानते हैं, पर हमें
जीवन-पर्यन्त बरक़रार रहने वाली मृत्यु की उस भयंकरता को देखना नहीं सिखाया
गया है जो ग़रीबी और अत्याचार द्वारा व्यापक आबादी पर थोप दी गयी है।”
– मार्क ट्वेन¹
अराजकतावादी : “...साहित्य के चयन में अराजकतावादियों और विद्रोह
भड़काने वालों को भी स्थान मिल जाता है; और यदि उसकी
कुछ चीजें पाठक को महज आक्रोश का उद्गार ही लगें, तो भी मैं कहना चाहूँगा
कि इसके लिए साहित्य के समर्पित चयनकर्ता को दोष नहीं देना चाहिए, यहाँ तक
कि रचनाकार को भी दोष नहीं देना चाहिए – उसे (यानी पाठक को – स.) को
स्वयं अपनेआप को ही दोष देना चाहिए, कि उसने उन परिस्थितियों की मौजूदगी
में चुप्पी साध ली है, जिनके चलते उसके देश-समाज के लोग पागलपन और
निराशा की चरम सीमा पर जा पहुँचे हैं।”
– अप्टन सिंक्लेयर², भूमिका, 19, क्राइ फ़ॉर जस्टिस
बूढ़ा मज़दूर : “...वह (बेरोज़गार बूढ़ा मज़दूर) उम्र से, प्रकृति से, और
परिस्थितियों से जूझ रहा था; समाज, क़ानून और व्यवस्था का
सारा बोझ उसके ऊपर भारी पड़ता हुआ, उसे अपना आत्मसम्मान और आज़ादी खो
देने पर मजबूर कर रहा था...। उसने फार्मों के दरवाज़े खटखटाये और वह सिर्फ़
मनुष्य में ही अच्छाई पा सका – क़ानून और व्यवस्था में नहीं, बल्कि सिर्फ़ मनुष्य
में ही।”
– रिचर्ड जेफ़रीज़ (80)³
पृष्ठ 18 (15)
ग़रीब मज़दूर : “...और हम लोग, जिन्होंने इस काम को अंजाम देने का
बीड़ा उठाया, इस दुनिया में कुजात ही रहे। एक अन्धी
क़िस्मत, एक विराट निर्मम तन्त्र ने काट-छाँटकर हमारे अस्तित्व का ढांचा निर्धारित
- असली नाम सैमुअल लैंगहॉर्न क्लीमेंस (1835-1910) : मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार
और व्यंग्यकार - मशहूर अमेरिकी उपन्यासकार और समाजवादी-सुधारक (1878-1968)। क्राइ फ़ॉर
जस्टिस सामाजिक प्रतिरोध के साहित्य का एक अनूठा संकलन है जो सिंक्लेयर के सम्पादन
में 1915 में प्रकाशित हुआ था। आगे कई पृष्ठों तक के नोट्स इसी पुस्तक से लिये गये हैं। - अंग्रेज़ प्रकृतिवादी और उपन्यासकार (1848-1887)
570 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कर दिया। हम उस वक़्त तिरस्कृत हुए, जब हम सबसे अधिक उपयोगी थे, हमें
उस वक़्त दुत्कार दिया गया, जब हमारी ज़रूरत नहीं थी, और हमें उस वक़्त भुला
दिया गया, जब हमारे ऊपर विपत्तियों का पहाड़ टूटा हुआ था। हमें बीहड़-बंजर
साफ़ करने के लिए, उसकी सारी आदिम भयंकरताओं को दूर करने के लिए, तथा
उसके विश्व-पुरातन अवरोधों को छिन्न-भिन्न कर डालने के लिए भेज दिया
जाता। हम जहाँ भी काम करते, वहाँ एक दिन एक नया शहर जन्म ले लेता; और
जब यह जन्म ले ही रहा होता, तब यदि हममें से कोई वहाँ चला जाता, तो उसे
‘बिना निश्चित पते का आदमी’ कहकर पकड़ लिया जाता और सिरफिरा-आवारा
कहकर उस पर मुक़दमा चलाया जाता।”
– (पैट्रिक मैकगिल की कृति,
चिल्ड्रेन ऑफ़ द डेड एण्ड, सी.जे. 48 से)¹
नैतिकता : “नैतिकता और धर्म उस व्यक्ति के लिए महज शब्दभर
हैं जो आजीविका का जुगाड़ करने के लिए गन्दे नाले में मछली
मारता है, और जाड़े की रात में कड़ाके की शीतलहरी से बचने के लिए सड़कों
पर पीपों के पीछे पनाह लेता है।”
– होरेस ग्रीले (128)²
भूख : “शासक के लिए उचित यही है कि उसके शासन में कोई भी आदमी
ठण्ड और भूख से पीड़ित न रहे। आदमी के पास जब जीने के मामूली
साधन भी नहीं रहते, तो वह अपने नैतिक स्तर को बनाये नहीं रख सकता।”
– कोंको होशी
(जापान का बौद्ध भिक्षु, 14वीं सदी, पृष्ठ 135)
पृष्ठ 19 (16)
मुक्ति
अरे मनुष्यो! करते हो गर्वोक्ति
कि तुम सन्तति हो मुक्त और वीर पितरों की,
पर यदि लेता साँस एक भी दास धरा पर,
तो क्या सचमुच तुम हो मुक्त और वीर?
- पैट्रिक मैकगिल (1889-1963) : आइरिश पत्रकार, कवि और उपन्यासकार। (सी.जे.
– क्राइ फ़ॉर जस्टिस का संक्षिप्त) - अमेरिकी पत्रकार और राजनीतिज्ञ (1811-1872)
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 571
यदि तुमको अहसास नहीं जब
बेड़ी पीड़ा देती एक भाई को,
तो क्या सचमुच तुम नहीं अधम दास
जो क़ाबिल नहीं मुक्त होने के?
क्या है वह सच्ची मुक्ति, जो तोड़े
ज़ंजीरें बस अपनी ख़ातिर,
और भुला दे संगदिल होकर
कि मानवता का क़र्ज़ है हम पर?
नहीं, सच्ची मुक्ति तभी जब हम बाँटें
सब ज़ंजीरें, जो पहने हैं अपने भाई,
और भाव औ' कर्म से लगकर
हाँ औरों की मुक्ति में तत्पर!
दास तो वे जो भय खाते हैं स्वर देने में
गिरे हुए और दुर्बल की ख़ातिर;
दास तो वे जो नहीं चुनेंगे
घृणा, डाँट और गाली
और दुबककर मुँह मोड़ेंगे
सच से, इस पर सोच ज़रूरी;
दास तो वे जो हिम्मत न करें
दो या तीन भी हों गर सच के हक़ में।
– “जेम्स रसेल लॉवेल” (पृष्ठ 189)¹
पृष्ठ 20 (17)
भरे पड़े हैं शुभ्र और निर्मल आभा के रत्न घनेरे
सागर के गहन अगाध गह्वर में,
खिलते हैं बहुतेरे फूल अनदेखे लज्जारुण होते,
और लुटा देते अपनी सुगन्ध निर्जन बयार में।²
—o—
आविष्कार : अब तक यह सवाल क़ायम है कि क्या अब तक किये
गये सारे के सारे आविष्कार किसी भी आदमी की रोज़मर्रा की
कड़ी मशक़्क़त भरी ज़िन्दगी को आसान बना पाये हैं।
– जे.एस. मिल³, 199
- अमेरिकी कवि, निबन्धकार और सम्पादक (1819–91)
- अंग्रेज़ कवि टॉमस ग्रे (1716–7) की रचना एलिजी रिटेन इन एक कण्ट्री चर्चयार्ड से
- जॉन स्टुअर्ट मिल, अंग्रेज़ निबन्धकार और उदारवादी दार्शनिक (1808–73)
572 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़