भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 561, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंमित्रोखिन की पुस्तक में संकलित होकर सामने आया? वैसे इस काहिली और
गैरज़िम्मेदारी के लिए उन इतिहासकारों को भी माफ़ नहीं किया जा सकता जो
इतिहास को केवल प्रोफ़ेसरी का जरिया बनाये हुए हैं और इतिहास की बहुमूल्य
विरासत को भी जनता तक पहुँचाने की जिन्हें रत्तीभर चिन्ता नहीं है। और भला
क्यों हो? वे इतिहास पढ़ाने वाले मुदर्रिस हैं, इतिहास बनाने से उनका भला क्या
सरोकार?
जहाँ तक भगतसिंह के परिवार के उन सदस्यों का सवाल है, जिन्होंने आज़ादी
के इतने वर्षों बाद तक इतिहास की एक बहुमूल्य धरोहर को पारिवारिक सम्पत्ति
की तरह दाबे रखा और उसे जनता तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की; वे
भी अपनी इस करनी के चलते इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं। वैसे हमारे
देश में यह कोई नई बात नहीं है। क्रान्तिकारी राजनीति और साहित्य में ऐसे कई
उदाहरण हैं कि महान विभूतियों के रक्त-सम्बन्धी उत्तराधिकारी उनसे जुड़े होने के
नाते इज़्ज़त तो खूब पा रहे हैं पर उनके आदर्शों और सपनों से उन्हें कुछ भी नहीं
लेना-देना। उनकी रुचि या तो सम्मान-प्रतिष्ठा-सुविधा में है या फिर रायल्टी की
मोटी रक़म में। भगतसिंह हों या राहुल सांकृत्यायन, उनका कृतित्व आज पूरे राष्ट्र
की, पूरी जनता की या उनके वैचारिक उत्तराधिकारियों की धरोहर न बनकर
परिवार-जनों की निजी सम्पत्ति बन गयी है। क्रान्तिकारियों के तमाम
बेटे-भतीजे-भांजे आज क्रान्तिकारियों के रक्त-सम्बन्धी होने के नाते स्वाभाविक
तौर पर जनता से इज़्ज़त पाते हैं और सीना फुलाते हैं। पर उन्हें इस बात में कोई
दिलचस्पी नहीं कि क्या उन क्रान्तिकारियों के सपने पूरे हुए? इसके विपरीत वे
उसी सत्ता से सुविधाएँ लेने और उन्हीं राजनीतिक दलों की राजनीति करने तक
का काम करते हैं, जिन्होंने क्रान्तिकारियों के सपनों के साथ विश्वासघात किया।
क्रान्तिकारियों के ऐसे वारिस भी क्या अपने महान पूर्वजों के आदर्शों का व्यापार
नहीं कर रहे हैं?
बहरहाल, 1994 में भूपेन्द्र हूजा और उनके साथियों ने भगतसिंह की जेल
नोटबुक का मूल अंग्रेज़ी संस्करण छापकर भारत की जनता और क्रान्तिकारी
आन्दोलन के लिए जो उपयोगी कार्य किया उसे कभी भी भुलाया नहीं सकता।
आम जनता को इतिहास की बहुमूल्य धरोहर से परिचित कराने के महत्त्वपूर्ण
कार्यभारों में से यह भी एक है कि भगतसिंह की जेल नोटबुक और उनके तथा
उनके साथियों के सभी दस्तावेज़ों को सभी भारतीय भाषाओं में अनूदित करके
जन-जन तक पहुँचाया जाये।
भगतसिंह की जेल नोटबुक स्कूली कापी की सामान्य साइज (17.50 से.मी.
ग 21 से.मी) की पुस्तिका है। नोटबुक खोलते ही पहले पेज (टाइटिल पेज) पर
अंग्रेज़ी में लिखा है : “भगतसिंह के लिए/चार सौ चार (404) पृष्ठ...” नीचे एक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 555