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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

मुझे यक़ीन है कि आपको यह बात याद होगी कि आप आरम्भ से ही मुझसे
यह बात मनवा लेने की कोशिशें करते रहे हैं कि मैं अपना मुक़दमा संजीदगी से
लड़ूँ और अपना बचाव ठीक से प्रस्तुत करूँ, लेकिन आपको यह भी मालूम है
कि मैं सदा इसका विरोध करता रहा हूँ। मैंने कभी भी अपना बचाव करने की इच्छा
प्रकट नहीं की और न ही मैंने कभी इस पर संजीदगी से गौर किया है।
आप जानते हैं कि हम एक निश्चित नीति के अनुसार मुक़दमा लड़ रहे हैं।
..मेरा हर क़दम इस नीति, मेरे सिद्धान्तों और हमारे कार्यक्रम के अनुरूप होना
चाहिए। आज स्थितियाँ बिल्कुल अलग हैं। लेकिन अगर स्थितियाँ इससे कुछ और
भी अलग होतीं तो भी मैं अन्तिम व्यक्ति होता जो बचाव प्रस्तुत करता। इस पूरे
मुक़दमे में मेरे सामने एक ही विचार था और वह यह कि हमारे विरुद्ध जो संगीन
आरोप लगाये गये हैं, बावजूद उनके हम पूर्णतया इस सम्बन्ध में अवहेलना का
व्यवहार करें। मेरा नज़रिय यह रहा है कि सभी राजनीतिक कार्यकर्ताओं को ऐसी
स्थितियों में उपेक्षा दिखानी चाहिए और उनको जो भी कठोरतम सज़ा दी जाये, वह
उन्हें हँसते-हँसते बरदाश्त करनी चाहिए। इस पूरे मुक़दमे के दौरान हमारी योजना
इसी सिद्धान्त के अनुरूप रही है। हम ऐसा करने में सफल हुए या नहीं, यह फ़ैसला
करना मेरा काम नहीं। हम खुदगर्जी को त्यागकर अपना काम कर रहे हैं।
वायसराय ने लाहौर साज़िश केस आर्डिनेंस जारी करते हुए इसके साथ जो
वक्तव्य दिया था, उसमें उन्होंने कहा था कि इस साज़िश के मुजरिम
शान्ति-व्यवस्था को समाप्त करने के प्रयास कर रहे हैं। इससे जो हालात पैदा हुए
उसने हमें यह मौक़ा दिया कि हम जनता के समक्ष यह बात प्रस्तुत करें कि वह
स्वयं देख ले कि शान्ति-व्यवस्था एवं क़ानून समाप्त करने की कोशिशें हम कर
रहे हैं या हमारे विरोधी? इस बात पर मतभेद हो सकते हैं। शायद आप भी उनमें
से एक हों जो इस बात पर मतभेद रखते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि
आप मुझसे सलाह किये बिना मेरी ओर से ऐसे क़दम उठायें। मेरी ज़िन्दगी इतनी
क़ीमती नहीं जितनी कि आप सोचते हैं। कम से कम मेरे लिए तो इस जीवन की
इतनी क़ीमत नहीं कि इसे सिद्धान्तों को कुर्बान करके बचाया जाये। मेरे अलावा
मेरे और साथी भी हैं जिनके मुक़दमे इतने ही संगीन हैं जितना कि मेरा मुक़दमा।
हमने एक संयुक्त योजना अपनायी है और इस योजना पर हम अन्तिम समय तक
डटे रहेंगे। हमें इस बात की कोई परवाह नहीं कि हमें व्यक्तिगत रूप में इस बात
के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ेगा।
पिता जी, मैं बहुत दुख का अनुभव कर रहा हूँ। मुझे भय है, आप पर दोषारोपण
करते हुए या इससे बढ़कर आपके इस काम की निन्दा करते हुए मैं कहीं सभ्यता
की सीमाएँ न लाँघ जाऊँ और मेरे शब्द ज़्यादा सख्त़ न हो जायें। लेकिन मैं स्पष्ट
शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूँगा। यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार
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करता तो मैं इसे ग़द्दारी से कम न मानता, लेकिन आपके सन्दर्भ में मैं इतना ही
कहूँगा कि यह एक कमज़ोरी है – निचले स्तर की कमज़ोरी।
यह एक ऐसा समय था जब हम सबका इम्तिहान हो रहा था। मैं यह कहना
चाहता हूँ कि आप इस इम्तिहान में नाकाम रहे हैं। मैं जानता हूँ कि आप भी इतने
ही देशप्रेमी हैं, जितना कि कोई और व्यक्ति हो सकता है। मैं जानता हूँ कि आपने
अपनी पूरी ज़िन्दगी भारत की आज़ादी के लिए लगा दी है, लेकिन इस अहम मोड़
पर आपने ऐसी कमज़ोरी दिखायी, यह बात मैं समझ नहीं सकता।
अन्त में मैं आपसे, आपके अन्य मित्रों एवं मेरे मुक़दमे में दिलचस्पी लेने वालों
से यह कहना चाहता हूँ कि मैं आपके इस क़दम को नापसन्द करता हूँ। मैं आज
भी अदालत में अपना कोई बचाव प्रस्तुत करने के पक्ष में नहीं हूँ। अगर अदालत
हमारे कुछ साथियों की ओर से स्पष्टीकरण आदि के लिए प्रस्तुत किये गये आवेदन
को मंज़ूर कर लेती, तो भी मैं कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत न करता।
भूख हड़ताल के दिनों में ट्रिब्यूनल को जो आवेदन पत्र मैंने दिया था और उन
दिनों में जो साक्षात्कार दिया था उन्हें ग़लत अर्थों में समझा गया है और अख़बारों
में यह प्रकाशित कर दिया गया कि मैं अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना चाहता हूँ,
हालाँकि मैं हमेशा स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के विरोध में रहा। आज भी मेरी वही
मान्यता है जो उस समय थी।
बोर्स्टल जेल में बन्दी मेरे साथी इस बात को मेरी ओर से ग़द्दारी और
विश्वासघात ही समझ रहे होंगे। मुझे उनके सामने अपनी स्थिति स्पष्ट करने का
अवसर भी नहीं मिल सकेगा।
मैं चाहूँगा कि इस सम्बन्ध में जो उलझनें पैदा हो गयी हैं, उनके विषय में
जनता को असलियत का पता चल जाये। इसलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि
आप जल्द से जल्द यह चिट्ठी प्रकाशित कर दें।
आपका आज्ञाकारी,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 419

बटुकेश्वर दत्त को भगतसिंह का पत्र
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
अक्टूबर, 1930
प्रिय भाई,
मुझे सज़ा सुना दी गयी है और फाँसी का हुक्म हुआ है। इन कोठरियों में मेरे
अलावा फाँसी का इन्तज़ार करने वाले बहुत-से मुजरिम हैं। ये लोग यही प्रार्थनाएँ
कर रहे हैं कि किसी तरह वे फाँसी से बच जायें। लेकिन उनमें से शायद मैं अकेला
ऐसा आदमी हूँ जो बड़ी बेसब्री से उस दिन का इन्तज़ार कर रहा हूँ जब मुझे अपने
आदर्श के लिए फाँसी के तख़्ते पर चढ़ने का सौभाग्य मिलेगा। मैं खुशी से फाँसी
के तख़्ते पर चढ़कर दुनिया को दिखा दूँगा कि क्रान्तिकारी अपने आदर्शों के लिए
कितनी वीरता से कुर्बानी दे सकते हैं।
मुझे फाँसी की सज़ा मिली है, मगर तुम्हें उम्रक़ैद। तुम ज़िन्दा रहोगे और
ज़िन्दा रहकर तुम्हें दुनिया को यह दिखा देना है कि क्रान्तिकारी अपने आदर्शों
के लिए सिर्फ़ मर ही नहीं सकते, बल्कि ज़िन्दा रहकर हर तरह की यातनाओं
का मुक़ाबला भी कर सकते हैं। मौत सांसारिक मुसीबतों से छुटकारा पाने का
साधन नहीं बननी चाहिए, बल्कि जो क्रान्तिकारी संयोगवश फाँसी के फन्दे से
बच गये हैं उन्हें ज़िन्दा रहकर दुनिया को यह दिखा देना चाहिए कि वे न
सिर्फ़ अपने आदर्शों के लिए फाँसी पर चढ़ सकते हैं, बल्कि जेलों की अँधेरी
कोठरियों में घुट-घुटकर हद दर्जे के अत्याचारों को भी सहन कर सकते हैं।
तुम्हारा,
भगतसिंह
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सुखदेव का तायाजी के नाम पत्र¹
बोर्स्टल, लाहौर
मान्य ताया जी,
दो पत्र पहले लिख चुका हूँ। कोई उत्तर नहीं मिला।
मैं सुन रहा हूँ मेरे कारण आपको बहुत कुछ मानसिक कष्ट उठाना पड़ रहा
है इसके पूर्व भी इस ख़याल से आपको पत्र द्वारा कहने की चेष्टा की है। अब फिर
वही कह रहा हूँ।
मैं जानता हूँ कि आपको मेरे स्वभाव (मूलपत्र में 'स्वाभाव' लिखा है। – स.
) के कारण बहुत चिन्तित रहना पड़ता है और मैं यह भी चाहता हूँ कि आपकी
यह चिन्ता किसी प्रकार दूर हो जाये। ख़ासकर इन दिनों में जबकि आपके लिए
दूसरे कष्ट काफ़ी इकट्ठा हो रहे हैं। परन्तु एक बात मैं आपसे साफ़ कहना चाहता
हूँ। मुझसे कोई बात सिर्फ़ इसीलिए कि उससे दूसरे खुश होंगे – नहीं हो सकती।
दाढ़ी ही की बात लीजिये। भला इससे आपको इतना दुखी होने की क्या
आवश्यकता थी। जैसे दाढ़ी-मूँछ कटाना एक फ़ैशन है वैसे ही दाढ़ी रखना भी तो
एक फ़ैशन ही है। अब क्या किसी व्यक्ति को इस बारे में भी माता-पिता द्वारा इतना
बाध्य होना पड़ेगा और उसे सर, दाढ़ी और मूँछ के बाल अपने माता-पिता की इच्छा
पर ही रखाने या कटाने चाहिए। तो क्या वे लोग जो दाढ़ी इत्यादि धर्म अथवा
माँ-बाप की ख़ातिर या रूढ़ी को क़ायम रखने की ख़ातिर रखते हैं ऐसा करने में
(justified) हुए न। मैं नहीं समझता कि आप जैसे स्वतन्त्र विचार रखने वाला पुरुष
क्यों अपने पुत्र से ऐसी आशा करता है कि वह मामूली-मामूली बात करने में इस
बात का विचार रखे कि उसके वैसा करने से उसका पिता तो बुरा नहीं मानेगा।
और वह आदमी आज़ाद विचारों वाला ही कैसे हो सकता है जो दूसरे व्यक्ति को
उसके अपनी इच्छानुसार करने पर बुरा समझे जबकि वह बात कोई ऐसी नहीं है
जिसे बुरी दृष्टि से (Morally) देखा जाना चाहिए।
हाँ, एक बात और है, शायद आपका यह विचार होता होगा कि इससे मैं
बदसूरत मालूम होता हूँ और मैं जान-बूझकर अपनी हालत ज़्यादा गन्दी रखना चाहता
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 421

हूँ, जिसे आप अपने पुत्र के लिए अच्छा नहीं समझते। यदि ऐसा है तो मैं आपको
बताना चाहता हूँ कि आपका ऐसा विचार करना भूल है। अपने शरीर की जितनी
फिकर मुझे रहती है और देश तथा धर्म की ख़ातिर अपने शरीर को ख़राब करने
के बरख़िलाफ़ जितना मैं हूँ और शायद ही कोई हो। ऐसी अवस्था में मैं नहीं
समझता कि आपकी नाराज़गी का क्या कारण है।
साथ ही यह बात भी मैं आपके आगे रख देना चाहता हूँ कि मैं इस बात को
बहुत बुरा समझता हूँ कि मैं यह कुछ भी करने में सदा इस बात का ध्यान रखूँ
कि दूसरे क्या विचार करेंगे और न ही मैं यह अच्छा समझता हूँ कि और कोई मेरे
व्यक्तिगत जीवन की बातों में मुझे अपनी इच्छाओं से बाध्य करे। मैं चाहे कोई भी
हो – किसी की ख़ातिर अपना व्यक्तित्व खोना नहीं चाहता और फिर ऐसी-ऐसी
मामूली बातों की ख़ातिर मैं स्वयं इन बातों से तंग हो जाता हूँ।
दूसरा कारण आपके दुखी रहने का है मेरा आजकल का Attitude। ठीक है।
माता-पिता के लिए गौरव की बात यही है कि उनका लड़का उनके लिए नेकनामी
पैदा करे न कि कलंक। माता-पिता की सदा यह इच्छा रहती है कि उनका लड़का
बड़ा नाम कमाये और जीवन के संग्रामों में किसी से भी पीछे न रहे। मैं जानता
हूँ आपकी भी ऐसी ही मानसिक अवस्था है और जब आप देखते हैं कि मैं किसी
बात में भाग नहीं लेता और हमेशा चुप रहता हूँ तो आपको बहुत दुख होता है।
सचमुच, मैं आपसे सच्चे दिल से कहता हूँ, आपको इस बारे में दुखी देखकर मैं
स्वयं बहुत दुखी होता हूँ। और क्या कहूँ, मैंने इस कारण से कितने अपनों को नाराज़
किया है और कितनों की नज़र में बुरा बना हूँ। इतना होने पर भी इस बारे में मैं
कुछ नहीं कहना चाहता और न सफ़ाई देना चाहता हूँ। पर आपसे यह अवश्य कहूँगा
कि आप कभी इन विचारों को लेकर दुखी न हों और मैं क्या करता हूँ और मुझे
क्या करना चाहिए, इन बातों पर कभी विचार ही न करना चाहिए।
क्योंकि आपको यक़ीन करना चाहिए कि मैं आपका पुत्र हूँ। बस यही मेरी
सफ़ाई है। इस पर यक़ीन कीजिये।
क्या मैं आशा कर सकता हूँ कि आप मेरी ओर से निश्चिन्त हो जायेंगे।
आपका पुत्र,
सुखदेव
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सुखदेव का अधूरा पत्र
राष्ट्रीय अभिलेखागार, भारत सरकार, नयी दिल्ली के सौजन्य से प्राप्त सुखदेव
की यह अपूर्ण, अप्रेषित चिट्ठी सुखदेव के बोर्स्टल जेल से, सेण्ट्रल जेल लाहौर में
स्थानान्तरण के समय प्राप्त हुई थी। मूल चिट्ठी पाकिस्तान सरकार के रिकॉर्ड में
है लेकिन इसकी फ़ोटोस्टेट प्रतिलिपि राष्ट्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध है। – स.
7 अक्टूबर, 1930
बिरादरमन,
देर से कुछ भावनाएँ हृदय में उठ रही थीं जिनको कुछ कारणोंवश अब तक
दबाये हुए था। किन्तु अब अधिक नहीं दबा सकता। दबा सकता ही नहीं वरन
उनको दबाना उचित भी नहीं समझता। कह नहीं सकता मेरे इस प्रकार भाव
प्रकट करने को आप अच्छा समझें या बुरा। इनको कुछ महत्त्व दें या नहीं। ये
आपके अनुकूल हों या नहीं। आप इनसे सहमत हों या नहीं। लेकिन मैं तो वही
कर रहा हूँ जो मुझे उचित मालूम दे रहा है। आप इन्हें ग्रहण करना चाहें करें,
यह आपकी इच्छा है। और यदि आप इसका उत्तर देना चाहें तो बड़ी अच्छी बात
हो। इससे यह लाभ होगा कि मेरे विचार भी कुछ clear हो जायेंगे और मुझे इस
बात की तसल्ली भी हो जायेगी कि जेल की चारदीवारी ने मुझे मेरे ठीक-ठीक
judge कर सकने की शक्ति से वंचित नहीं कर दिया और practical life के field
से अलग हो जाने पर मैं idle और Vain Schemes के सोचने का आदी नहीं हो
गया हूँ।
जब से हम लोग जेल में आये हैं बाहिर का वातावरण बहुत गरम हो रहा है।
जहाँ तक actions का सम्बन्ध है, पत्रों द्वारा पता चलता है कि क़रीब हर एक
province में, ख़ासकर पंजाब और बंगाल में तो हद ही हो गयी है। इस पर
bomb तो एक साधारण-सी बात हो गयी है। बम द्वारा इतने actions हमारे
इतिहास में शायद ही कभी हुए होंगे। इन्हीं actions के बारे में ही मैं यहाँ पर
आपसे कुछ कहना चाहता हूँ। इस बारे में actions के सम्बन्ध में हमारी अपनी
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 423

policy क्या थी, आपके सम्मुख रखूँगा। इसके पश्चात actions के सम्बन्ध में
अपने विचार कहूँगा।
हम लोग कुछ दो actions कर पाये। एक साण्डर्स मर्डर, दूसरा असेम्बली बम।
इसके अतिरिक्त हमने दो-तीन और actions करने का प्रयत्न किया था यद्यपि
उनमें सफलता प्राप्त नहीं हुई। इनके सम्बन्ध में मैं इतना कह सकता हूँ कि हमारे
actions तीन प्रकार के थे – 1. Propaganda 2. Money 3. Special. इन तीनों
में से हमारा मुख्य ध्यान propaganda के actions की ओर था। बाक़ी दोनों गौण
कहे जा सकते हैं। इससे मेरा अभिप्राय उनकी importance को कम करने का नहीं
है तो भी हमारे लिए हमारी existence का उद्देश्य propaganda के actions करना
ही था। बाक़ी दोनों प्रकार के actions हमारा उद्देश्य नहीं थे, वरन उद्देश्य की पूर्ति
के लिए आवश्यक। इन तीनों को clear करने के लिए 1. Assembly action, 2.
Punjab National Bank Dacoity और 3. जोगेश चटर्जी को छुड़ाने की कोशिश
आप (शायद ‘आज’ – स.) आपके सम्मुख रखता हूँ।
पिछले दो प्रकार के actions को छोड़कर मैं propaganda actions को इस
स्थान पर discuss करना चाहता हूँ। propaganda शब्द से शायद इन actions को
ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता। दरअसल मतलब यह है कि हमारे ये actions
हमारी जनता के भावों के अनुकूल होते थे। उदाहरण के लिए Saunders' murder
को लो। लाला (ला. लाजपत राय) पर लाठियाँ पड़ने से हमने देखा कि देश में
इनके कारण बहुत हलचल है। इस पर Govt. के रवैये ने तेल का काम किया।
लोग बहुत नाराज़ हो गये। जनता का ध्यान revolutionaries की ओर खींचने के
लिए हमारे लिए यह बड़ा अच्छा अवसर था। पहले हमने सोचा था कि एक आदमी
पिस्तौल लेकर जाये और Scott को मारकर वहीं पर अपनेआप को पेश कर दे।
फिर Statement द्वारा यह कह दे कि National insult का बदला जब तक
revolutionaries ज़िन्दा हैं, इसी प्रकार लिया जा सकता है। किन्तु आसपास man-
power कम होने के कारण तीन आदमियों को भेजना ज़्यादा उचित समझा गया।
इसमें भी बचकर निकल जाने की आशा का विचार मुख्य नहीं था। इसकी तो आशा
भी नहीं थी। हमारा विचार यह था कि यदि murder के बाद पुलिस पीछा करे
तो खूब मुक़ाबला किया जाये। जो इस मुक़ाबले में बच जाये और पकड़ा जाये तो
Statement दे दे। इसी विचार से भागकर D.A.V. College boarding की छत पर
चढ़ गये थे। Action के समय यह प्रबन्ध था कि भगतसिंह जो Scott को पहचानता
था, पहली गोली चलाये और राजगुरु थोड़ी दूर पर उसकी हिफ़ाज़त करे। यदि
भगतसिंह पर कोई हमला करे तब राजगुरु उसको रोके। इसके बाद ये दोनों वहाँ
से भागें और चूँकि भागते हुए मुड़कर पीछा करने वालों पर निशाना नहीं लिया जा
सकता इसलिए पण्डित जी को इन दोनों की रक्षा के निमित्त पीछे खड़ा किया था।
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इसके साथ ही यह विचार हमारे सामने था कि अपने बचने के बजाय उसको मारने
का ज़्यादा ध्यान रखना है। हम यह भी नहीं चाहते थे कि जिस पर गोली चलायी
जाये वह हस्पताल जाकर मरे। इसीलिए राजगुरु द्वारा गोली मार देने के बाद भी
भगतसिंह ने तब तक गोली चलानी बन्द न की जब तक उसे तसल्ली नहीं हो गयी
कि वह मर गया है।
मारकर भाग जाना ही हमारा उद्देश्य नहीं था। हम तो चाहते थे कि देश जान
जाये कि यह political murder है और इस action के करने वाले
revolutionaries हैं न कि मालंगी के साथी, इसलिए हमने उसके बाद posters
लगाये और कुछ posters अख़बार वालों को छापने के लिए भेजे। अफ़सोस, हमारे
नेताओं और अख़बार वालों ने हमें इस सम्बन्ध में कुछ सहायता न की और Govt.
को धोखे में रखने के विचार से देशवासियों को धोखा दिया। हम तो केवल इतना
ही चाहते थे कि वह इसके सम्बन्ध में यह गोल-मोल करके लिख दें कि यह
political murder है और Govt. की policy का ही परिणाम है। ऐसे actions के
लिए वह responsible है। लेकिन उन्होंने जानते-बूझते और मेरे बार-बार कहने के
बावजूद भी ऐसा कहने की हिम्मत नहीं की। अच्छा हुआ हम पकड़े गये और देश
के सम्मुख सब प्रगट हो गया। मैं तो भाई, अपने पकड़े जाने को सौभाग्य समझता
हूँ। सिर्फ़ इसीलिए इस action की nature को clear कर देने के पश्चात अब मैं
इस policy को (Note : इसी समय पता लगा है कि आज Judgement होगी,
चलना है कि नहीं यह पूछने के लिए ख़ाँ साहिब और बख्शी जी आये थे। हम
सबने इन्कार कर दिया है) रखना चाहता हूँ। हमारा विचार था कि हमारे actions
जनता की desires और Govt. द्वारा grievances के उत्तर में होने चाहिए ताकि
हम लोग जनता को अपने साथ ले सकें और जनता हमारे प्रति सहानुभूति और
सहायता दिखाने के लिए तैयार हो जाये। इसके साथ-साथ हमारा यह विचार था
कि revolutionary ideals और tactics को public में फैलाया जाये और यह
उसके मुख से ज़्यादा अच्छी लगती है जो इनकी ख़ातिर gallows पर खड़ा हो।
तीसरा उद्देश्य यह था कि Govt. से direct टक्कर लेने से हमारी organisation
एक निश्चित programme अपने लिए बना सकेगी।
बाक़ी दो प्रकार के actions के सम्बन्ध में कुछ ज़्यादा नहीं कहना चाहता हूँ।
Money actions के लिए इतना आवश्यक होना चाहिए कि बंगाल वालों की तरह
dacoities में ज़्यादा energy और attention देना ठीक नहीं है। साथ ही
छोटी-छोटी dacoities क़तई लाभदायक सिद्ध नहीं हुई हैं। इसलिए हम सबकुछ
देकर भी एक जुआ खेलने को तैयार हो गये थे ताकि अगर बच गये तो अच्छी
तरह से निश्चिन्त होकर अपना काम करते जायेंगे और पैसा की समस्या को हम
एक बार risk लेकर हल करेंगे। साण्डर्स के murder के बाद तो हमें पैसा के लिए
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 425

ज़्यादा चिन्ता भी नहीं करनी पड़ी। साधारण dacoities में जितना धन हमें नहीं
मिलता उतना हम चुपचाप इकट्ठा कर लिया करते थे। आज तो उससे कहीं ज़्यादा
आसानी है। Special actions अनिवार्य होते हैं लेकिन उसी दशा में जब अत्यन्त
आवश्यक हों। हाँ, इनकी संख्या बहुत कम होनी चाहिए।
अब मैं उन actions के सम्बन्ध में कुछ कहना चाहता हूँ जो हमारे बाद घटित
हुए। वायसराय की ट्रेन को उड़ाने के प्रयत्न के अतिरिक्त बम द्वारा कई actions
हुए हैं। इनमें एक विशेष प्रकार के actions हुए हैं। अर्थात बम रास्ते में रख आयें
या जो actions पंजाब के चार-पाँच शहरों में एक साथ हुए हैं। मुझे समझ में नहीं
आयी कि यह actions किस विचार से किये गये हैं। जहाँ तक मैं अनुभव करता
हूँ जनता में ऐसे actions से विशेष जागृति तो आती नहीं है। यदि terrorise करने
का विचार था तो मैं पूछना चाहता हूँ कि आप लिखें कि इन actions ने इस उद्देश्य
की कहाँ तक पूर्ति की है। इस सम्बन्ध में चिटगाँववाले actions की यहाँ पर प्रशंसा
नहीं करना चाहता।
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आवाज़ दबाना दुखदायी है!
सुखदेव के भाई मथुरादास की पुस्तक ‘अमर शहीद सुखदेव’ में प्रकाशित
लेखकीय टिप्पणी के अनुसार सुखदेव ने यह पत्र सम्भवतः चन्द्रशेखर आज़ाद के
नाम लिखा था, जो उन तक पहुँच नहीं पाया। – स.
प्यारे साथी,
अभी-अभी पता चला है कि हमारा वह statement जो हमने 3 तारीख़ को
दिया है अखबार वालों ने नहीं छापा। कारण यह कहा जाता है कि उसमें लीडरों
को criticise किया गया है और उनके इस समझौते को बुरा कहा गया है। उफ़,
कैसी शरम की बात है! भाई, सच पूछो तो हमें सरकार फाँसी नहीं लगा रही। हमारा
गला तो हमारे So-called leaders ही दबा रहे हैं जो हमारी आवाज़ निकलने नहीं
देते। सरकार द्वारा गला दबाना हमारे लिए बुरा सिद्ध नहीं हो सकता। उसको हम
सहन कर सकते हैं लेकिन यह बात हमारे से बरदाश्त नहीं हो सकती कि हमारा
गला हमारे ये स्वार्थी high class leaders दबायें। इसके विरुद्ध हमें लड़ना पड़ेगा।
अपनी struggle को हमें उनसे अलग होकर स्वतन्त्र रूप से चलाना होगा और
सरकार का विरोध करते-करते इन उच्च जाति-नेताओं की पोल भी खोलनी पड़ेगी।
परन्तु दोस्तो, यह कार्य ज़्यादा देरी तक neglect नहीं किया जा सकता। इस
पर हमें विचार करना चाहिए और उसके लिए शीघ्र ही प्रबन्ध करना चाहिए। और
कब तक ऐसा व्यवहार सहते रहोगे। हम क्रान्तिकारियों के प्रति उनके इस प्रकार
neutral relation और हमारी गिरावट के दो मुख्य कारण हैं। पहला यह कि हमारी
कोई स्थायी organisation नहीं है, जो उनके मुक़ाबले में और उनसे अलग अपनी
lines पर काम कर रही हो। दूसरा यह कि जो भी थोड़ा-बहुत scattered element
है उसके हाथ में Press नहीं है जिसके द्वारा वह अपनी आवाज़ जनता तक पहुँचा
सके और जिसके बल पर वह बढ़े, डटकर सरकार तथा इन उच्च जाति-सन्तों का
भलीभाँति विरोध कर सके।
अनेक कारणोंवश हम लोगों को आज तक केवल गुप्त समितियाँ बनाकर ही
काम करते रहना पड़ा है। परन्तु यारो, अब समय आ गया है कि हम इस policy
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 427

का त्याग करें। साधारण जनता हमें और हमारे आदर्शों को मानने लग गयी है। उसकी
सहानुभूति हमारे साथ है। ठीक है, अपने कार्य को successfully चलाने और अपनी
organisation को क़ायम रखने हेतु बहुत कुछ गुप्त रखना पड़ेगा। हमें अपने काम
को गाँधी की lines पर नहीं चलाना है तो भी अब केवल इस जत्थेबन्दी और
गोली-बारूद द्वारा ही काम करना उचित नहीं। अब हमें आगामी struggle के लिए
एक force बनने की ज़रूरत है।
उसके लिए, जैसा मैंने पहले भी लिखा है, खुफ़िया सोसायटी के ढंग पर
पंजाब में एक Central Red Revolutionary Party क़ायम करने की आवश्यकता
है, जिसका मुख्य काम भिन्न-भिन्न local स्थानों पर Revolutionary work और
tactics का प्रचार और अच्छे क्रान्तिकारी worker तथा व्यवस्था होनी चाहिए। इसके
साथ-साथ उस कांग्रेस की नकेल अपने हाथ में रखनी चाहिए। अपने ideas को
legally or illegally दोनों प्रेसों द्वारा बराबर फैलाने की कोशिश करनी चाहिए।
ये सब शायद तुम्हें शेखचिल्ली की बातें जान पड़ती होंगी। लेकिन प्यारे, यह
तो करना ही होगा और शीघ्र करना होगा। मैं नहीं कह सकता इस कांग्रेस में इसी
वक़्त से कोई ऐसा wing तैयार हो जायेगा लेकिन इस कांग्रेस की तैयारी चाहे
कितनी भी मामूली हो उसकी beginning कर देनी चाहिए।
(Important) हमें मरने का दुख नहीं है। अपनी आवाज़ का दबाया जाना हमारे
लिए बहुत कष्टदायक है। मैं चाहता हूँ कि हमारी वह statement तुम सरदार जी
या हमारे वकील से प्राप्त कर एक छोटे-से appealing note के साथ उर्दू, गुरमुखी
और अंग्रेज़ी में लिखवाकर छपने का प्रबन्ध करो।
– सुखदेव
428 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

क्रान्तिकारी दोस्तों के नाम
सुखदेव का पत्र
प्यारे साथियो!
दो साल का समय हो चुका है जबकि पहले-पहल Long Live Revolution
का आरम्भ हुआ था। यह छोटी-सी आवाज़ आज एक भारी और भयानक रूप
धारण कर चुकी है। हमारे देश का बच्चा-बच्चा इन्क़लाब-ज़िन्दाबाद चिल्ला रहा
है।
किन्तु क्या यही काफ़ी है? क्या अब हमारे लिए कोई कार्य बाक़ी नहीं रहा?
नहीं। कार्य का आरम्भ तो अभी होना चाहिए। नहीं तो यह इन्क़लाब-ज़िन्दाबाद भी
गाँधी के ‘स्वराज्य’ की भाँति एक बेमानी चीज़ हो जायेगा, जिसे थोड़े समय बाद
जनता घृणा और नफ़रत की दृष्टि से देखेगी। काफ़ी देर तक हमने पब्लिक के
sentiments को उभारा है। अब समय आ गया है कि हम public को इसका अर्थ
समझाएँ। हम उनके आगे रखें कि Revolution क्या है। उसका masses के साथ
क्या सम्बन्ध है। उसकी क्या आवश्यकता है। और वह क्योंकर Successful की
जा सकती है।
याद रखो इन प्रश्नों को छुपाकर रखना हितकर नहीं होगा। मैं देख रहा हूँ –
लोगों के दिलों में ये प्रश्न उठ रहे हैं। यदि इन प्रश्नों का उत्तर न दिया गया, यदि
गाँधी की तरह इनको vague रखा गया तो सब गुड़गोबर हो जायेगा। आज तक की
सब मेहनत व्यर्थ हो जायेगी। परन्तु इसके साथ ही एक introductory काम और
भी है। यदि तुम्हारी यह धारणा है कि Long Live Revolution कह लेने से तुम
Revolutionary हो गये हो तो यह तुम्हारी भूल है। तुम लोगों में कोई ही होगा जो
वास्तव में Revolutionary कहलाने के योग्य होगा। लेकिन यह कोई शरम की बात
नहीं। अपने इस अभाव को हमें मानना चाहिए और इसे मानकर इसकी पूर्ति करनी
चाहिए। अपनी और सभी साथियों की revolutionary education के प्रबन्ध करने
चाहिए। उसके लिए कार्य आरम्भ करने चाहिए।
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 429

याद रखो, अपनी सफलता इस बात पर निर्भर है कि हमारे workers अपने
revolution ideals, tactics और struggle को ख़ूब समझते हैं। आज के arm
chair politicians और sentimental lectures द्वारा क्रान्ति का कार्य नहीं चलाया
जाना चाहिए। बल्कि ऐसे व्यक्तियों को अपनी Organisation में ही नहीं लेना
चाहिए। क्रान्ति करने के हेतु वे ही व्यक्ति लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं जो Self
sacrificing devotion के हों, जो revolutionary education प्राप्त किये हों और
जीवन में क्रान्ति को profession समझे हों। जो व्यक्ति Revolutionary work को
अपना profession नहीं बना सकता वह एक Sympathiser के सिवा कुछ नहीं
है।
मैं आशा करता हूँ कि समय की आवश्यकता को अनुभव कर आप मेरी इन
बातों पर ध्यान देंगे और जितनी जल्दी हो सके public demand को पूरा करने का
यत्न करेंगे।
(मूल पत्र यहीं समाप्त होता है और अन्तिम अक्षर अस्पष्ट हैं – स.)
430 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

कुलबीर के नाम
भगतसिंह का अन्तिम पत्र¹
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
3 मार्च, 1931
प्रिय कुलबीर सिंह,
तुमने मेरे लिए बहुत कुछ किया। मुलाक़ात के समय तुमने अपने ख़त के
जवाब में कुछ लिख देने के लिए कहा था। कुछ शब्द लिख दूँ, बस। देख, मैंने
किसी के लिए कुछ न किया। तुम्हारे लिए भी कुछ न कर सका। आज तुम सबको
विपदाओं में छोड़कर जा रहा हूँ। तुम्हारी ज़िन्दगी का क्या होगा? गुज़र किस तरह
करोगे? यही सब सोचकर काँप जाता हूँ। लेकिन भाई हौसला रखना। विपदाओं में
भी कभी न घबराना। इसके सिवाय और क्या कह सकता हूँ। अमेरिका जा सकते
तो बहुत अच्छा होता। लेकिन अब तो यह नामुमकिन जान पड़ता है। धीरे-धीरे
हिम्मत से पढ़ लो। अगर कोई काम सीख सको तो बेहतर होगा। लेकिन सबकुछ
पिता जी की सलाह से करना। जहाँ तक सम्भव हो प्यार-मुहब्बत से रहना। इसके
सिवाय और क्या कहूँ? जानता हूँ कि आज तुम्हारे दिल में ग़म का समुद्र ठाठें मार
रहा है। तुम्हारे बारे में सोचकर मेरी आँखों में आँसू आ रहे हैं; लेकिन क्या किया
जा सकता है? हौसला रख मेरे अज़ीज़! मेरे प्यारे भाई, ज़िन्दगी बड़ी सख़्त है और
दुनिया बड़ी बेरहम। लोग भी बहुत बेरहम हैं। सिर्फ़ हिम्मत और प्यार से ही गुज़ारा
हो सकेगा। कुलतार की पढ़ाई की चिन्ता भी तुम्हीं करना। बहुत शर्म आती है और
अफ़सोस के सिवाय मैं कर भी क्या सकता हूँ। साथ वाला ख़त हिन्दी में लिखा
है। ख़त बी.के. की बहन को दे देना। अच्छा नमस्कार अज़ीज़ भाई अलविदा...
रुख़सत।
तुम्हारा शुभाकांक्षी,
भगतसिंह

  1. फाँसी लगने से बीस दिन पूर्व।
    जेल की सलाख़ों के पीछे से / 431

कुलतार के नाम भगतसिंह का
अन्तिम पत्र¹
सेण्ट्रल जेल, लाहौर
3 मार्च, 1931
प्यारे कुलतार,
आज तुम्हारी आँखों में आँसू देखकर बहुत दुख पहुँचा। आज तुम्हारी बातों में
बहुत दर्द था। तुम्हारे आँसू मुझसे सहन नहीं होते।
बरखुरदार, हिम्मत से विद्या प्राप्त करना और स्वास्थ्य का ध्यान रखना। हौसला
रखना, और क्या कहूँ –
उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-जफ़ा क्या है,
हमें यह शौक़ है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख़ का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही, आओ मुक़ाबला करें।
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले-महफ़िल,
चरागे-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवा में रहेगी ख़याल की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक़ है फ़ानी, रहे रहे न रहे।
अच्छा रुख़सत। खुश रहो अहले-वतन; हम तो सफ़र करते हैं। हिम्मत से
रहना। नमस्ते।
तुम्हारा भाई,
भगतसिंह

  1. फाँसी लगने से बीस दिन पूर्व
    432 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

फाँसी से पहले साथियों को
भगतसिंह का अन्तिम पत्र
22 मार्च, 1931
साथियो,
स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं
चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर ज़िन्दा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबन्द
होकर जीना नहीं चाहता।
मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रान्ति का प्रतीक बन चुका है और क्रान्तिकारी दल के
आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है – इतना ऊँचा कि जीवित
रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हरगिज़ नहीं हो सकता।
आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं। अगर मैं फाँसी से बच गया
तो वे ज़ाहिर हो जायेंगी और क्रान्ति का प्रतीक-चिह्न मद्धिम पड़ जायेगा या सम्भवतः
मिट ही जाये। लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में
हिन्दुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगतसिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश
की आज़ादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जायेगी कि क्रान्ति
को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी।
हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए
जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उनका हज़ारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर
सका। अगर स्वतन्त्र, ज़िन्दा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता
और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता।
इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया।
मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है। अब
तो बड़ी बेताबी से अन्तिम परीक्षा का इन्तज़ार है। कामना है कि यह और नज़दीक
हो जाये।
आपका साथी,
भगतसिंह
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 433

शहीद महावीर सिंह का पिता के नाम पत्र

शहीद महावीर सिंह को लाहौर षड्यन्त्र केस में उम्रक़ैद की सज़ा हुई थी। डॉ.
गया प्रसाद, शिव वर्मा, पण्डित किशोरीलाल, जयदेव कपूर, विजय कपूर सिन्हा और
कमलनाथ तिवारी को भी उम्रक़ैद हुई थी। इन सभी साथियों को सेल्युलर जेल,
अण्डमान भेजा गया था। ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों के विरुद्ध जेलों के भीतर
भी क्रान्तिकारियों का संघर्ष जारी रहा। महावीर सिंह ने 23 जनवरी, 1933 को
अण्डमान से पिता को यह पत्र लिखा था। - स.
पोर्ट ब्लेयर, अण्डमान
परम पूज्य पिताजी,
आपको पढ़कर आश्चर्य होगा कि उपरोक्त स्थान पर मैं कब आ गया। यही
पहेली हल करने मैं जा रहा हूँ। तारीख़ 19 जनवरी को प्रातःकाल लगभग 11 बजे
जेलर साहब सेण्ट्रल जेल बिलारी आये और कोठरी का दरवाज़ा खोलकर सूचना
दी कि तुम्हारा ट्रांसफर है, पर यह नहीं बताया कि कहाँ को है। पूछने पर केवल
इतना कहा कि शायद पंजाब में नये लाहौर साज़िश केस में गवाही देने के लिए
मद्रास भेजे जाओगे। अस्तु, 19 तारीख़ की शाम को जब मैंने सेण्ट्रल जेल मद्रास
में पैर रखा तो मेरे जीवन-मरण के साथी श्रीयुत भाई कमलनाथ तिवारी के दर्शन

  • लगभग दो वर्ष बाद - हुए और रात को भाई बी.के. दत्त और भाई कुन्दनलाल
    जी की आवाज़ें सुनीं। आप स्वयं ही जान सकते हैं कि मुझे कितनी प्रसन्नता हुई।
    परन्तु अलस्सुबह फिर कुछ निराशा की झलक नज़र आयी जब देखा कि तिवारी
    और भाई दत्त और कुन्दनलाल हमसे पहले पृथक ले जाये गये हैं, परन्तु 15 मिनट
    बाद वह फिर हर्ष में बदल गयी और मोटर लॉरी में हम फिर मिल गये। बहुत दिनों
    का वियोग मिट गया। उस समय तक हम मन की खिचड़ी पका रहे थे और मिलने
    के आनन्द में विह्वल थे, परन्तु यह पता नहीं था कि कहाँ जा रहे हैं। सोचते थे
    शायद पंजाब जावें, बाद में यहाँ आवें। परन्तु हमारी लॉरी बन्दरगाह पर पहुँची और
    विख्यात महाराजा जहाज़ के दर्शन हुए। उस समय समझा कि हम लोग अण्डमान
    अर्थात 'कालापानी' जा रहे हैं। मातृभूमि से तथा बन्धु वर्ग से सदैव के लिए अथवा
    कम से कम 18 साल के लिए पृथक हो रहे हैं। जिस जननी की गोद में पले हैं
    434 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

और धूलि में लोटे हैं उसके दर्शन से भी वंचित हो रहे हैं। आप लोगों के पदारविन्द
की रज से सदैव के लिए दूर हो रहे हैं। ऐसी दशा में प्यारे देश को छोड़ते हुए हृदय
में कितना ही कष्ट हुआ परन्तु साथ ही प्रसन्नता भी हुई, जोकि इसके सम्मुख कुछ
अधिक ही थी। वह थी एक साथ क्रान्तिकारी की दर्शनाभिलाषा – पुण्य पवित्र
तीर्थ स्थान की, जिसको भाई रामरक्खा मल ने अपनी समाधि बनाकर पवित्र किया
है और दूसरे बंगाली तथा सिक्ख वीरों की तपोभूमि रही है। और साथ ही आशा
थी कि हमारे जीवन के बन्धुगण सर्वदा साथ रहेंगे, और भी अनेक अपने कन्धे से
कन्धा सटाने वाले भाइयों के दर्शन होंगे। अस्तु, 23 जनवरी की सन्ध्या को विस्तृत
नील गम्भीर जल-राशि की 850 मील से अधिक लम्बी यात्रा करके हम इस पोर्ट
ब्लेयर की जेल में पहुँचे जहाँ पर अपने वर्तमान साथियों को मिलने के लिए अति
उत्कण्ठित पाया। उनकी वैसी ही दशा हो रही थी जैसी हमारी थी। यहाँ सम्प्रति
लगभग 40बी. क्लास के तथा 24सी. क्लास के राजनीतिक क़ैदी हैं और कुछ लोगों
की निकट भविष्य में आशा भी करते हैं।
हमारी जेल तिमंज़िला है और पास ही कुछ गजों के फ़ासले पर नीलास्व
(जल) राशि गम्भीर गर्जन के साथ किनारे से टक्करें मारती है, जो ऊपर से दीख
पड़ती है। यह द्वीप समूह जंगलों से भरा सुना जाता है जिसमें केवल नंगे रहने वाले
असभ्य लोग रहते हैं, परन्तु खुली हुई जगहों में कुछ भारतीय लोग भी बस गये हैं,
जिनकी भाषा हिन्दुस्तानी है। इन लोगों में से बहुत-से क़ैदी हैं, कुछ सरकारी नौकर
हैं और कुछ तिज़ारती लोग भी हैं। अभी हाल में तो जेल वालों का कुछ ठीक-ठीक
हाल मालूम होता है, लेकिन आगे की कह नहीं सकते। हमारे पुराने साथियों में अभी
हमारे साथ डॉ. गयाप्रसाद, मि. बी.के. दत्त, भाई कुन्दनलाल जी तथा कमलनाथ
तिवारी हैं। बाक़ी तीन साथी मद्रास सूबे में होंगे जोकि शायद अभी भी हंगर स्ट्रायक
पर होंगे। हमारे साथियों में 3/4 से अधिक संख्या बंगाल प्रदेश वालों की है।
पूज्यवर, शायद आप चिन्तित होंगे कि मैंने इतने दिनों से पत्र क्यों नहीं लिखा।
इसका कारण थी घनघोर घटाएँ जो चारों ओर मँडरा रही थीं। तनिक भी शान्ति का
अवसर नहीं देती थीं। इसी कारण मैंने उनमें फँसकर पत्र लिखने का सुयोग न पाया।
अब यह बहुत दिनों बाद पत्र लिख रहा हूँ, जिससे आप शान्ति-लाभ करेंगे। परन्तु
पिताजी, आप शान्ति हर दशा में रखें क्योंकि आप जानते हैं कि हमें कष्टों में आनन्द
और सुख मालूम होता है। अब कुछ इस कारागार में वास करके तथा अपने ध्येय
को सम्मुख रखते हुए कष्ट भी सुख ही प्रतीत होता है और यही है हमारा जीवन
और जहाँ ये बातें इसमें नहीं रहीं तो समझिए कि हम मर गये। इसलिए आप या
हमारी पूज्य बुआ जी तथा माता जी इस बात का ध्यान रखते हुए कभी कोई चिन्ता
न करें और सर्वदा शान्तिपूर्वक आनन्दित रहें।
प्यारे भाई का क्या हाल है, इसकी सूचना मुझे शीघ्र दीजियेगा। उसे केवल
जेल की सलाख़ों के पीछे से / 435

वैद्य ही बनने का उपदेश न देना, बल्कि साथ ही साथ मनुष्य बनना भी बतलाना।
आजकल मनुष्य वही हो सकता है जिसे वर्तमान वातावरण का ज्ञान हो, जो मनुष्य
के कर्तव्य को जानता ही न हो परन्तु उसका पालन भी करता हो। इसलिए समाज
की धरोहर को आलस्य तथा आरामतलबी तथा स्वार्थपरता में डालकर समाज के
सामने कृतघ्न न साबित हो। इससे शारीरिक तथा मानसिक दोनों ही प्रकार की
उन्नति करता रहे, क्योंकि दोनों आवश्यक हैं। शारीरिक पुष्टि अन्न तथा व्यायाम
से तथा मानसिक अध्ययन से। उसे आजकल के वातावरण का ज्ञान करने के लिए
समाचारपत्र तथा ऐतिहासिक, साम्पत्तिक तथा राजनीतिक, सामाजिक पुस्तकों का
अवलोकन (अध्ययन) को कहिये। समाज से मेरा मतलब आर्य समाज अथवा अन्य
संकीर्णताव्यंजक समाज नहीं है, परन्तु जन-साधारण का है। क्योंकि ये धार्मिक
समाज मेरे सामने संकीर्ण होने के कारण कोई भी मूल्य नहीं रखते हैं और साथ
ही इस संकीर्णता तथा स्वार्थपरता तथा अन्यायपूर्ण होने के कारण सब धर्मों से दूर
रहना चाहता हूँ और दूसरों को भी ऐसा ही उपदेश देता हूँ। केवल एक बात मानता
हूँ (और) उसको सबसे बढ़कर तथा मनुष्य तथा समाज का (के लिए)
कल्याणकारी समझता हूँ। वह है, “मनुष्य का मनुष्य तथा प्राणी-मात्र के साथ
कर्तव्य – बिना किसी जाति-भेद, रंग-भेद, धर्म तथा धन-भेद के।” यही मेरा
उपदेश बेटी सरोजिनी को है और दूसरे हमारे भाइयों को भी है।
पूज्यवर, आज जब मैं देखता हूँ कि सबकी बहनें समाज की सेवा के लिए
अपने को तन, मन, धन से लगाये हुए हैं, अभागा मैं ही ऐसा हूँ जिसकी ऐसी कोई
बहन नहीं। यद्यपि यह मेरी संकीर्णता है क्योंकि अपने मन के अनुसार दूसरी बहनें
भी अपनी ही हैं और वैसी ही समझता भी हूँ, परन्तु मैं उनकी संख्या में बढ़ती
चाहता हूँ, जिसकी कुछ आशा में अपनी पूजनीय जिया महताब कुँवरि से करता
था। उनका बहुत समय से कोई समाचार नहीं पाया है। यदि हो सके, मेरा
चरण-स्पर्श कहियेगा। श्रीमान दादा जी सरदार सिंह जी को, जो मेरे पहले-पहल
गुरु और आपके शिष्य हैं, सादर प्रणाम कहें। धनराज सिंह का हाल लिखना। चाचा
वर्ग तथा सब माताओं को चरण-स्पर्श, भाइयों को नमस्ते। पूज्य बुआ जी तथा माता
जी को प्रणाम, लली दोनों बहनों को, मुंशी सिंह जी को नमस्कार, भानजे तथा
भतीजों को प्यार। इति शुभम। पत्र शीघ्र भेजियेगा।
पता : महावीर सिंह पी.आई. 68 आपका आज्ञाकारी पुत्र,
सेल्युलर जेल, पोर्टब्लेयर (अण्डमान) महावीर
436 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

X.
विचारों की सान पर
क्रान्ति की तलवार